समीक्षा: नागा साधुओं के रहस्यमय जीवन को उद्घाटित करता उपन्यास

समीक्षक: सरस दरबारी, प्रयागराज

उपन्यास: कैथरीन और नागा साधुओं की रहस्यमयी दुनिया
प्रकाशक: किताबवाले प्रकाशन, दिल्ली
उपन्यासकार: संतोष श्रीवास्तव
मूल्य: ₹ 700.00


नागा साधु, जिन्हें शरीर की कोई भी भूख या इच्छा नहीं सताती। जिनका न कोई अतीत होता है न भविष्य। जो हिमालय की कन्दराओं, गुफाओं और जंगलों में रहते है, जहाँ कन्दमूल और फल उनका भोजन होता है।  नंग धड़ंग शरीर, जटाओं में रुद्राक्ष की, गले में गेंदे की माला। हाथों में त्रिशूल और डमरू, और मुँह से फूटते बम बम भोले के स्वर। यह सनातन धर्म की रक्षा करते हैं और समय आने पर देश के लिये जान भी न्योछावर कर सकते हैं। नागा बाबा उर्फ़ धर्म के कमांडो!

यह कहानी है सीधे साधे मंगल सिंह की,  इसरो का वैज्ञानिक बनने का सपना जिसकी आँखों में पलता था, पर आर्थिक अभाव के रहते वह सपना,  सपना ही रह गया।

मंगल सिंह,  जो दीपा को बेहद चाहता था, पर कभी कह न सका। तब भी नहीं जब दीपा ने  उसे बताया कि उसका पिता उसके विवाह की बात, मंगल सिंह के बड़े भाई कीरत  सिंह से करने जा रहे हैं। बहन रोली की कसम के साथ उसने हर इच्छा को तिलांजलि दे दी, और दीपा उसकी भाभी बनकर उसी घर में आ गयी।

यह कहानी है  उसी मंगल सिंह के नरोत्तम गिरि बनने के सफर की। नरोत्तम गिरि, जो प्रेम की पराकाष्ठा से गुज़रा, इसरो का वैज्ञानिक होने की महत्त्वाकांक्षा से गुज़रा। और अंततः उसका सफर नागा बाबाओं के बीच आकर रुका।  जहाँ एक नागा बाबा के रूप में उसका पुनर्जन्म हुआ।

"नागा साधु बनने की प्रक्रिया में नरोत्तम को, ब्रह्मचर्य, वैराग्य, ध्यान, संन्यास और धर्म की परीक्षा देनी थी, जो एक अलौकिक अनुभव था। गंगा के पानी में 108 डुबकियाँ लगा, वह गंगामय हो गया। पूरा शरीर ग्लेशियर की तरह ठंडा और दृढ़। बाबा बनने की अद्भुत प्रक्रिया से गुज़रकर मंगल नरोत्तम गिरि बन गया। नरों में उत्तम। अब भस्म ही उसकी पोशाक थी और त्रिशूल, तलवार शंख और चिलम ही उसके शस्त्र जो उसे योद्धा का दर्जा देते।"

कुम्भ के मेले में हर वर्ष, जब नागा बाबाओं का शाही स्नान के लिये जुलूस निकलता है, तो पूरा संगम तट भयाक्रांत रहता हैं।  नागा बाबाओं का रूप सदा सबके कौतुहल का केंद्र रहा, उनका जीवन सदा से रहस्यमय  लगता रहा। कौन हैं यह नागा बाबा, कहाँ से आते हैं? कुम्भ के बाद कहाँ विलीन हो जाते हैं? उनका न कहीं उल्लेख मिलता है, न ही उनके विषय में कोई जानकारी!

सरस दरबारी
संतोष श्रीवास्तव जी का नागा साधुओं पर यह वृहत एवं अद्भुत शोध कार्य, अचंभित करता है। एक आम मनुष्य से, दीक्षा प्राप्त करने तक की घोर तपस्या और उसके पश्चात नागा साधु बनने की कठिन प्रक्रिया का सविस्तार वर्णन...!

उनके शृंगार का उल्लेख करते हुए वे बताती हैं, "इनका शृंगार केवल भस्म है जो यह पूरे शरीर पर मलते हैं। पर यह कोई आम भस्म नहीं। यह भस्म  पीपल, पाकड़, रसाला, बेलपत्र, केले के पत्ते और पिंड, व गाय के गोबर  को जलाकर बनती है।, इस राख़ को महीन कपड़े से छानकर कच्चे दूध में साना जाता है। फिर इसके लड्डू बनाकर सात बार अग्नि में तपाये जाते हैं। इन तपते लड्डुओं को कच्चे दूध  से बुझाकर ही वह भस्म बनती है। टेल्कम पाउडर सी नर्म और मुलायम। यही उनका वस्त्र है जी उन्हें मच्छरों एवं कीटाणुओं से बचाता है।" निर्वस्त्र रहने के कारण यह दिगम्बर कहलाते हैं।

एक कमांडो जैसी मुश्किल परीक्षा से गुज़रकर यह  नागा साधु दीक्षा प्राप्त करते हैं। दीक्षा लेने से पहले उन्हें 12 वर्ष तक कड़ी तपस्या करते हुए एक सन्यासी जीवन बिताना होता है। ऐसा एकाग्र तप, जिसमें  शीशे को पिघलाने की पत्थर को मोम करने की ताक़त है लेकिन स्वयं को अहंकार रहित रखकर ही।

स्त्रियों को भी अखाड़े के महामंडलेश्वर दीक्षा देते हैं। पूरे विधि विधान से उनका मुंडन कर, गोमूत्र, भस्म दही, चन्दन और हल्दी से दशविधि स्नान करवाकर पाप मुक्त किया जाता है। तब उनका पुनर्जन्म होता है।

इतिहास में ऐसे कई गौरव पूर्ण युद्ध हुए हैं,  जब 40 हज़ार से अधिक नागा साधु ने योद्धा बनकर हिस्सा लिया।

इस उपन्यास को पढ़ते हुए नागा साधुओं के विषय में बहुत कुछ जाना। उनका कठोर जीवन उनकी दिनचर्या। ग्रहों और जड़ी बूटियों  का आपसी तालमेल। अचंभित करने वाले तथ्यों से गुज़रते हुए,  सौरमण्डल और ग्रहों के रहस्य, सप्तऋषि का ज्ञान। ऋतुओं के अनुसार उनका स्थान परिवर्तन...!

ज्ञान का भंडार है यह उपन्यास। भोजपत्र, हमारे वेद पुराण, नागा साधु का रहस्यमय जीवन, अघोरियों का विस्तृत वर्णन। वे कौन हैं कहाँ रहते हैं, क्या खाते हैं, क्या पहनते है, हर चीज पर कितना सूक्ष्म अध्ययन।

इस उपन्यास में शक्तिपीठों की उत्पत्ति  और सभी 52 शक्तिपीठों  पर वृहत जानकारी  सिमटी है। दुनिया के अजूबों का प्रवेश द्वार है यह उपन्यास! रहस्यमय  नागा साधुओं के जीवन के हर पहलू का सूक्ष्म अवलोकन! अद्भुत है इनका संसार भी। पर्वतों में रहने वाले गिरि कहलाते हैं, नगरों में भ्रमण करनेवाले पुरी, व जंगलों में रहने वाले अरण्य कहलाते है।

कहानी की एक और मुख्य पात्र है कैथरीन। कैथरीन बिलिंग जो ऑस्ट्रेलिया के सिडनी से आयी है, और जो नागा साधुओं पर शोध कर रही है।  वेदों की जानकारी के लिये उसने संस्कृत सीखी। उसका मानना है कि भारत एक अद्भुत स्थान है। जगह-जगह मंदिर, जगह-जगह आध्यात्मिक क्रियाएँ, कथाएँ, इतने सारे ग्रन्थ इतने सारे पंथ। इतना सब कुछ है, जिसे एक जन्म में तो नहीं समझा जा सकता।

कथा नायक नरोत्तम से अखाड़ों के विषय में वृहत जानकारी प्राप्त कर वह  भाव विह्वल हो जाती है, "मैं जिस किताब के लिये आँकड़े जुटाने भारत आयी हूँ, वह एक उपन्यास होगा जिसके नायक आप होंगे। मैं दुनिया को बताऊँगी  कि  भारतवर्ष में ऐसा भी पंथ है, जिसके अनुयायी लाखों नागा हैं। अनुभूति, कामेच्छा  और भोग ऐश्वर्य  से परे। लेकिन फिर भी मानव।"

कैथरीन ने अपनी माँ से पहले ही अपनी मंशा ज़ाहिर कर दी थी कि वह विवाह नहीं करेगी, अपितु देशाटन कर विश्व के विभिन्न धर्मों को जानना चाहेगी। वह एक "पहाड़ी झरने सी थी, मुक्त रागमय आकर्षक" नरोत्तम से मिलकर वह  सहज़ उसकी तरफ खिंचने लगती। नरोत्तम भी कैथरीन के समक्ष विचलित हो जाता। पर दोनों मजबूर थे। नरोत्तम ने जो राह चुनी थी जिसके लिये घोर तपस्या की थी, वहाँ से लौटना मुमकिन न था। दोनों को एक दूसरे का सान्निध्य अकथित सुख देता। पर बिछड़ना तय था।

"कितनी जल्दी बिछड़ने का समय आ गया ना। जो समय हमें अच्छा लगता है वह बहुत जल्दी बीत जाता है।"

"समय को उसके हिसाब से बहने दो कैथरीन। हमें अपने को समय के अनुरूप ढालना होगा। कुछ ही दिनों बाद तुम सिडनी में होगी और मैं पहाड़ों पर। यही जीवन है।" यही थी दोनों की नियति।

संतोष  श्रीवास्तव जी ने बहुत ही खूबसूरती से नागा बाबाओं पर अपने शोध और उपन्यास के दो मुख्य पात्रों के बीच प्रेम को गूँथकर एक रोचक कहानी बुनी है। अन्यथा यह उपन्यास केवल एक शोध ग्रन्थ बन जाता। अचंभित करता किन्तु नीरस। उनके इस प्रयोग से उपन्यास अंत तक बाँधे रखता है।

यह उपन्यास अपने उद्देश्य को बखूबी प्राप्त होता है। नागा साधुओं के रहस्यमय जीवन से पूर्णरूपेण परिचय कराता, जो उनके बीच रहकर ही संभव था। संतोष श्रीवास्तव जी की ज़िद, और समर्पण ध्यातव्य एवं अनुकरणीय है। संतोष श्रीवास्तव जी को उनकी इस उत्तम ज्ञानवर्धक कृति के लिये बधाई। यह निश्चित रूप से शोधार्थियों के लिये ज्ञान का कोष है।

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