दोहे: शशि पाधा

शशि पाधा
दोहा हिंदी साहित्य का एक  लोकप्रिय छंद है। यह चार चरणों वाला एक छन्द होता है, इस छन्द के पहले तथा तीसरे चरण में  तेरह–तेरह मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में ग्यारह–ग्यारह मात्राएँ होती हैं। दोहा छन्द के चरणों के अंत मे लघु होता है। इसमें कुल 24 मात्राएँ होती हैं| दोहा छन्द एक सम मात्रिक छन्द होता है| 
प्रस्तुत हैं कुछ दोहे:


नदिया जैसी रात (दोहे)

नीले नभ से ढल रही, नदिया जैसी रात। 
ओढ़ी नीली ओढनी, चाँदी शोभित गात॥

श्यामल अलकें खोल दीं, तारक मुक्ताहार।
माथे सोहे चन्द्रिमा, चाँद गया मन हार॥

सागर दर्पण झांकती, अधरों पे मित हास।
लहरें हँसती डोलतीं, नयनों में परिहास॥

छमछम झांझर बोलती, धीमी सी पदचाप।
पात पात पर रागिनी, डाली-डाली थाप॥

मंद मंद बहती पवन, मंद्र लहर संगीत।  
रजनीगंधा ढूँढती, तारों में मनमीत॥

ओट घटा के चाँद था, रात न आए चैन।  
नभ तारों में ढूँढते, विरहन के दो नैन॥

चंचल चितवन चातकी, श्याम सलोनी रात।
चंदा देखें एकटक, दोनों बैठी साथ॥

श्वेत कमलिनी झील में, रात सो गई संग 
लहरों में घुल मिल गए, नीलम-हीरा रंग॥

भोर पलों में सूर्य ने, मानी अपनी भूल। 
धरती झोली भर दिए, पारिजात के फूल॥  


मुरली की तान (दोहे) 

बंसी ने जब जान ली, राधा मोहन प्रीत।
सुर दूजा  वो साधे न, और न गाए गीत॥

ब्रज की भोली गोपियाँ, सुन मुरली की तान।
घुँघरू बाँधें पाँव में, अधर धरें मुस्कान॥

कनक रंग राधा हुई, कारे- कारे श्याम।
दोपहरी की धूप से, खेल रही यूँ शाम॥

राधा रानी गूँथती वैजन्ती की माल।
श्यामा पहने रीझते राधा लाल गुलाल॥

ऊधो से जा पूछतीं अपने मन की बात। 
कान्हा ने विदेस से, भेजी क्या सौगात॥ 

यमुना तीरे श्याम ने, खेली लीला रास। 
लहर-लहर नर्तन हुआ, कण-कण बिखरा हास॥

गुमसुम राधा घूमती, दिल से है मजबूर।
हर पंथी से पूछती, मथुरा कितनी दूर॥

कोकिल कूजे डार पे, गाये मीठे गीत।
ढूँढे सुर में राधिका, बंसी का संगीत॥ 

सोचूँ जग में हो कभी, मीरा-राधा मेल।
दोनों सखियाँ खेलतीं, प्रीत-रीत का खेल॥

पल छिन चुभते शूल से, क्षीण हुई हर आस।     
कैसे काटे रात दिन, नैनन आस निरास॥                         
***

  मुक्तामणि छंद  एक मात्रिक छंद है जिसके विषम चरणों में 13 एवं सम चरणों में 12 मात्राएँ होती हैं।
    इसमें 13, 12 मात्रा पर यति चिह्न तथा कुल 25 मात्राएँ होती हैं।

मुक्तामणि छंद 
1
सोन परी के भाग में, गठरी भर-भर सोना।
पहने-ओढ़े खूब पर, खान-पान का रोना॥

आज धरा ने रीझ से, ओढ़ी चुनरी धानी। 
पाहुन ने पहचान ली, चूड़ी लाल निशानी॥

शीत हवाएँ क्या करें, मन में जलती ज्वाला।
मांगी औषध रोग की, दे दी उसने हाला॥

4
लोग सुनें ना पीर मन, बोल-बोल मैं हारी। 
अब चुप हूँ तो जग कहे, इसकी तो मति मारी॥

5
ढाई आखर में लिखी, उसने मन की बातें।
निर्मोही  कुछ समझे न, मुश्किल बीती रातें॥

2 comments :

  1. सुंदर दोहे! क्या बात!

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  2. सुललित दोहों पर मन मुग्ध हो गया। वाह, क्या बात है !!

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