प्रवासी साहित्यकार हंसा दीप का उपन्यास साहित्य

समीक्षा: मधु संधु

पूर्व प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, पंजाब


           प्रवासी साहित्यकार हंसा दीप का उपन्यास साहित्य डॉ. दीपक पाण्डेय और डॉ. नूतन पाण्डेय के संपादकत्व में प्रकाशित पुस्तक है। कथाकार हंसा दीप के चार उपन्यास, सात कहानी संग्रह और दर्जनों आलेख, संस्मरण, समीक्षाएँ, लघु कथायेँ प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रस्तुत पुस्तक में डॉ. हंसा दीप के चारों उपन्यासों पर कुल 15 आलेख/ शोधपत्र हैं। संप्रति हंसा दीप कैनेडा के टोरेंटों विश्व विद्यालय में प्रवक्ता पद पर कार्यरत हैं।
 
      भूमिका में दो आलेख हैं। प्रथम आलेख डॉ. दीपक पाण्डेय का कनाडा में हिन्दी भाषा और साहित्य की समृद्ध परंपरा पर है । बताते हैं कि निसंदेह भारत में हम हिन्दी के महत्व को पहचानें या न, लेकिन प्रवासी भारतीय को अपनी पहचान के लिए हिन्दी की सर्वाधिक आवश्यकता है। कैनेडा में भारतीयों का इतिहास देते कहते हैं कि- 1903 से यहाँ भारतीयों के आगमन शुरुआत हुई, 1966 में वीज़ा छूट मिली और आज यहाँ 14-15 लाख भारतीय या भारतीय मूल के लोग निवास करते हैं। आज कैनेडा की नगरपालिका, कोर्ट, अस्पताल, शैक्षिक सेवाओं में हिन्दी की सुविधा का भी प्रावधान है। सत्तर के दशक में गैर- सरकारी संस्थाओं द्वारा हिन्दी अध्ययन अध्यापन की शुरुआत हुई। आज कैनेडा के टोरेंटों, यार्क, वेस्टेर्न, मोंट्रियल, ब्रिटिश कोलंबिया, मैकगिल, सास्कातून, कैलगरी विश्व विद्यालयों में भी हिन्दी अध्ययन- अध्यापन की सुविधाएँ हैं। कैनेडा से निकालने वाली हिन्दी पत्रिकाओं/ वेब पत्रिकाओं-  साहित्य कुंज, हिन्दी चेतना, वसुधा, प्रयास, संवाद, पुस्तक भारती, भारत सौरभ ने भी हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता में अपना विशेष स्थान बनाया है। कैनेडा के हिन्दी लेखन की परंपरा को समृद्ध करने में सुमन घई, श्याम सिपाही, रत्नाकर नराले, स्नेह ठाकुर, विजय विक्रांत, शैलजा सक्सेना, धर्मपाल महेंद्र, सरन घई, गोपाल बघेल मधु, मानोशी चैटर्जी, समीरलाल समीर का विशेष योगदान है।
 
मधु संधु
              दूसरा प्रपत्र डॉ. नूतन पांडेय का हंसा दीप का औपन्यासिक वैशिष्टय है। कथाकार हंसा दीप का, उनके चारों उपन्यासों- बंद मुट्ठी (2007), कुबेर (2019), केसरिया बालम (2021), काँच के घर (2022) का सामान्य परिचय देते हुये वे उनके औपन्यासिक वैशिष्टय की बात करती हैं। सृजनात्मक गुणवत्ता और सक्रियता, अनुभवशीलता और कुशल रचनाधर्मिता, सैद्धान्तिक चिंता और बौद्धिक स्वीकृति, समकालीन सरोकारिता और प्रगतिवादी मूल्य, सक्रियता और निरंतरता, सुखान्तता और प्रेमचन्दीय आदर्शोन्मुख यथार्थवाद, सूत्रात्मकता और व्यंग्य/कटाक्ष उनके उपन्यासों को सार्वजनीन और सार्वकालिक बनाते हैं। यहाँ अपनी मिट्टी से बिछुड़ने का दर्द और विदेश में नया भारत गढ़ने का संकल्प एक साथ मिलते हैं।
 
                  बंद मुट्ठी उपन्यास पर चार शोधपत्र/ आलेख हैं। बंद मुट्ठी की कहानी इस प्रकार है कि भारतीय मूल की सिंगापुर में रहने वाली तान्या पढ़ाई के सिलसिले में कैनेडा जाती है और पिता की सहमति न होते हुये भी पोलैंड के सैम से प्रेम विवाह कर, चीन की रिया को गोद लेती है। यानी रिश्ते खून के ही नहीं होते, दिल के भी होते हैं। श्री राजेन्द्र प्रसाद सार्वभौमिक मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर नए क्षितिज तलाशने की जिजीविषा में कहते हैं –
                 “ ‘बंद मुट्ठी भावनाओं का एक ऐसा जीवंत दस्तावेज़ है, जो पाठक को मोह लेता है।---बचपन की अठखेलियाँ हों या युवावस्था के सपने और चुहलबाज़ियाँ हों या प्रौढ़ावस्था में सामान्यत: अपने बच्चों से रखी जाने वाली अपेक्षाएँ हों, उनको व्यक्त करने के लिए उपन्यास में जिन शब्दों का सटीक और प्रभावी चयन किया गया है, वह बताता है कि लेखिका ने अपना बाल मन, युवा मन, प्रौढ़ मन कितना सहेज कर रखा है, यह निश्चय ही एक कुशल लेखिका की विशेषता है।
हंसा दीप
[1]
 
            दिनेश अहिरवार बंदमुट्ठी को परंपरा और आधुनिकता के अंतरद्वंद्वों की शिनाख्त मानते हैं। उनके अनुसार पूरे उपन्यास में एक ही प्रश्न पूरी शिद्दत के साथ गूंज-अनुगूँज उत्पन्न कर रहा है कि हमें पुरानी परम्पराएँ चाहिए या अपनों की खुशी। जैसे-
            तान्या अपने परिवार वालों की बगैर अनुमति के ही अपने प्रेमी के साथ शादी करने का फैसला ले लेती है। यह फैसला आधुनिक समाज की यथार्थता को अभिव्यक्त करता है कि आजकल के युवा----घरवालों को बताना भी उचित नहीं समझते। दूसरी ओर यह भी बताने का प्रयास किया गया है कि तान्या यहाँ पुरानी परम्पराओं और जड़ताओं को तोड़ती हुई आधुनिक रूप में प्रेम विवाह करती है।[2]

            डॉ. टीकम चंद मीना अपने शोध पत्र प्रेम और पारिवारिक विघटन की दास्तान में कहते हैं कि निसंदेह समाज, संस्कृति और परम्पराओं की देन अमूल्य होती है, लेकिन तान्या के पिता द्वारा इन्हीं का पालन पारिवारिक विघटन का कारण बनता है। संकुचित मानसिकता और रूढ़िवादी परम्पराओं के अंधानुकरण के कारण पिता बेटी की खुशियों को स्वीकार नहीं पाते और संबंधों में विघटन आ जाता है।

            बंद मुट्ठी पर चतुर्थ आलेख डॉ. विजेंद्र प्रताप सिंह का है- भावनाओं का जीवंत दस्तावेज़ । वे इसे पठनीयता की दृष्टि से उत्तम कृति कहते हैं। सिंगापुर, टोरेंटों, पोलैंड, चीन  की बहुदेशीय पृष्ठभूमि में उभर रहा भारतीय जीवन और दो पीढ़ियों की सोच का जीवंत अंतर चित्रित है। पिता का भावजगत और बेटी की भावनाओं का सूक्ष्म अंकन है। अंत में डॉ. विजय प्रताप सिंह विभिन्न भौगोलिक, सांस्कृतिक भिन्नताओं के उन पात्रों की मानवीय संवेदना की बात करते हैं। शैली की दृष्टि से उन्होंने इसे संस्मरणात्मक एवं आत्म कथात्मक कहा है और भाषा को भावानुकूल तथा अर्थग्राही माना है।

                        ‘कुबेर उपन्यास पर पाँच शोध पत्र/ आलेख हैं । कहानी धन्नू नामक एक निहायत गरीब, ग्रामीण बालक द्वारा अपने आत्मबल और परिश्रम से धनंजय प्रसाद, डी. पी. और फिर डी. पी. सर बनने की है। कंगाल से कुबेर बनने की है। बी. एल. आच्छा के अनुसार कुबेर हिन्दी उपन्यास को नया धरातल दे रहा है। फ्लैश बैक  में लिखा गया यह उपन्यास ग्रामीण आँचल की टपरी से निकल कर न्यूयार्क की झिलमिलाती ज़िंदगी तक ले जाता है। कथातत्व में वास्तविकता और संयोग दोनों हैं। यह यात्रा दुखांत से सुखांत की है। लिखते हैं-
            “सरल सी प्रवाही भाषा, उलझावहीन कथानक, देश-विदेश की सभ्यता- संस्कृति के अंत:संक्रमित परिदृश्य--- उपन्यास को पठनीय बनाते हैं।[3]
 
            डॉ. भुवनेश्वर दुबे मेरे नज़र में’ में मानते हैं कि कुबेर मर्मांतक चित्तवृत्तियों के माध्यम से लोकजीवन को जीवन सूत्र प्रधान करने का अद्भुत प्रयत्न है। उपभोक्तावादी संस्कृति पर व्यंग्य है। कर्म और कर्मठता, आदर्श- यथार्थ और लोक हित का लक्ष्य लेकर नायक इतने संस्थान खोलता है कि कुबेर नाम एकवचन से बहुवचन में बदल जाता है। डॉ. भुवनेश्वर दुबे उपन्यास के लक्ष्य, धन्नू के चरित्र, भाषा पर प्रवासी प्रभाव की भी बात करते हैं।

           डॉ. मधु संधु इसे सामाजिक प्रेरणाप्रद उपन्यास कहती लिखती हैं, एक सुपर मैन देश में, विदेश में, गाँव में, जीवन ज्योत में छा गया और उसकी इस सफलता के पीछे उसके अंदर की आग, दृढ़ निश्चय, सही मार्ग दर्शक हैं।  उसके पास बड़ी-बड़ी सफलताएँ भी हैं और ढेरों बाधाएँ भी। कभी माँ से कॉपी पेंसिल के लिए पैसे मांगने पर डांट के साथ उत्तर मिला था, “कुबेर का खजाना नहीं है मेरे पास, जो हर वक्त पैसे मांगते रहते हो। और उसे स्कूल छोड़ना पड़ा। एक भागमभाग में वह शहर, देश छोड़ता हुआ न्यूयार्क और लास वेगस शहर का जाना पहचाना चेहरा बन जाता है। कुबेर रेएलिटी इंक’, “कुबेर इनवेस्टमेंट लिमिटेड’, ‘कुबेर इनकार्पोरेशन  के नाम से अपनी कंपनियां शुरू कर उपन्यास के अंत तक आते-आते यही नायक एक नहीं, अनेक धन-कुबेर खड़े कर देता है। यह कुबेर खजाना ढूँढता नहीं, खजाना बनाता है। [4]

            डॉ. नीलोत्पल रमेश ने अपने विचार एक सामान्य बालक से कुबेर बनने की गाथा के अंतर्गत विश्लेषित किए हैं कि एक मजदूर परिवार का बच्चा कैसे अङ्ग्रेज़ी स्कूल पहुँचता है, ढाबे पर काम करता है, जीवन ज्योत में आ दादा का सहयोगी बनाता है, न्यूयार्क पहुँचता है, टैक्सी चलाता है, रियल एस्टेट की बारीकियाँ समझता है, ग्यारह बच्चे गोद लेता है, अनेक कंपनियाँ बनाता है।
 
            डॉ. श्याम सुंदर पाण्डेय ने इसे स्वस्थ समाज की परिकल्पना का उपन्यास कहा है। नायक की पूरी जीवन यात्रा संस्मरण के रूप में लिख दी गई है। धन्नू का जीवन सूत्र कड़ी मेहनत है, जिसका आज तक कोई विकल्प नहीं है। डॉ. श्याम सुंदर पाण्डेय कहते हैं कि नायक मैनहैट्टन की गगनचुंबी इमारतों और वेगस के कैसीनो में पहुँच कर भी अपने गाँव, अपनी जड़ों को नहीं भूलता। लिखते हैं-
            कुबेर उपन्यास हंसा दीप द्वारा किए गए एक ऐसे समाज की कल्पना की परिणति है, जिसमें हर तरह के स्वस्थ नागरिकों की परिकल्पना है। यह उस मानव शृंखला की परिकल्पना है, जो साथी हाथ बढ़ाना की भाव भूमि पर खड़ी होती है।[5]
                
                          हंसा दीप के केसरिया बालम उपन्यास की कहानी राजस्थान से न्यूजर्सी के ऐडिसन तक आई है। यह स्नेहिल रिश्तों में पली-बढ़ी राजस्थान के उच्च मध्यवर्ग की इकलौती लाड़ली बेटी धानी के विवाहोपरान्त अमेरिका बसने की कहानी है। जबकि उसका पति, केसरिया बालम  उस यंत्र युग का प्राणी है जहाँ यंत्र की तरह मनुष्य भी जल्दी ही आउट डेटेड हो जाते हैं। अपने भौतिकतावादी दृष्टिकोण और कुंठाओं के कारण केसरिया बालम मन:रोगी बन अस्पताल पहुँच जाता है। यानी यान्त्रिकी और भौतिकतावाद जब हमारी सोच पर हावी हो जाये तो जीवन को तहस-नहस होने से कोई नहीं बचा सकता।

            केसरिया बालम पर तीन आलेख संकलित हैं। प्रथम आलेख श्री विजय कुमार तिवारी का है- केसरिया बालम: प्रेम का भावपूर्ण, मार्मिक चित्रण उपन्यास में इक्कीस खंड हैं और श्री विजय कुमार तिवारी ने खण्डश: गदयांश बनाकर प्रत्येक खंड का विश्लेषण किया है। कहते हैं-
            कहानी अपने देश की राजस्थानी मिट्टी से शुरू होती है और दूर पाश्चात्य देश- देशांतर तक जाती है। उनका अपने उपन्यास का समर्पण देखिये, लिखती हैं, ” जीवन में, किताबों में, कलाकृतियों में, प्रेम के ढाई अक्षर को उकेरते उन तमाम प्रेमियों को समर्पित। “यह कोई साधारण समर्पण नहीं है, प्रेम से भरे एक प्याले का तमाम प्रेमियों तक पहुँचना है। यह उदारता भी है, सहभागिता भी और समर्पण तो है ही। [6]
 
            सरोजिनी नौटियाल अपने आलेख परदेश की धरती पर राजस्थान की खुशबू में मानती हैं कि यह छिन्न- भिन्न होते सम्बन्धों में भारतीय पारिवारिक मूल्यों की अपराजेयता की कथा है। जगह का बेगानापन नायिका को सालता है, लेकिन तोड़ता नहीं।  लिखती हैं-
            एक उपन्यास की दृष्टि से केसरिया बालम का फ़लक छोटा है। उपकथाओं का संगुफन नहीं है। पात्रों की संख्या न्यून है। लेकिन इसकी विषय वस्तु नारी विषयक एक महत्वपूर्ण बिन्दु पर चिंतन करने के लिए विवश करती है। दूर देश जा रही हमारी बेटियाँ क्या सुरक्षित हैं? चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हैं? हमारी छानबीन क्या पुख्ता है?”[7]
 
                        ‘विदेश की धरती पर धानी रंग डॉ. बीना चौधरी का आलेख है। उनके अनुसार यहाँ विदेश की धरती पर भी प्रेम का धानी रंग है। यहाँ मनोविज्ञान और मानवतावाद है। पारिवारिक मूल्य और संस्कार हैं। भारतीय और विदेशी वातावरण का तुलनात्मक चित्रण है।  भाषा में आंचलिकता और आलंकारिकता है।
 
                        ‘काँच के घर उपन्यास कोरोना काल के बाद के छद्म साहित्यकारों का व्यंग्यात्मक चित्रण लिए है। लॉक डाउन में हुए वेबिनारों, संगोष्ठियों, फेसबुक के लाइव कार्यक्रमों में स्क्रीन स्टार बने इन लोगों की तो यही कामना है कि लॉक डाउन और सोश्ल मीडिया का यह खेल चलता ही रहे। फेसबुक, व्हाट्स ऐप पर बधाइयाँ, लाइक्स, कमेंट्स मिलते रहें। शौहरत और दौलत, यश और अर्थ की लिप्सा इन कुकुरमुत्ते की तरह फैले आत्ममुग्ध, असाहित्यिक साहित्यकारों के जीवन के चित्र लिए है। सब काँच के घर में बैठे होने के बावजूद एक दूसरे को पत्थर मारने में जुटे हैं। सब चाहते हैं कि उनके शहर की पहचान उनके नाम से हो। पद्म श्री उनकी झोली में गिरे।
 
                        ‘काँच का घर पर प्रथम आलेख काँच के घर में झाँकते हुये डॉ. कृष्ण गोपाल शर्मा का है। वे उपन्यास का विश्लेषण इसके 26 सर्गों के आधार पर करते हैं। विजय कुमार तिवारी जी ने इसे लेखन जगत की संगतियों विसंगतियों का अद्भुत हास्य- व्यंग्य शीर्षक दिया है। वे भी 26 खंडों पर क्रमानुसार बात करते हुये कहते हैं-
            काँच के घर लिखकर उन्होंने हिन्दी साहित्य को अलग तरीके से समृद्ध किया है और लेखकों, साहित्यकारों की सच्चाई व वस्तुस्थिति से परिचित करवाया है।[8]

             डॉ. विजया सती एक सभ्य जंगल की कहानी में लिखती हैं-
            इस उपन्यास के पात्र कांचघर में रहते हुये भी पत्थरबाजी से बाज़ नहीं आते। ---शब्दों के व्यवहार के और उठा-पटक के ढेले मारते आखिरकार जब थक जाते हैं तो--- पत्थरबाजी बंद कर फिर से काँच के घर में ही रहने लगते हैं।[9]
 
            अंत में हंसा दीप से दीपक पाण्डेय का संवाद है- 27 पृष्ठों में। यहाँ 24 प्रश्न है- लेखन, अध्ययन- अध्यापन, घर- परिवार- जीवन, हिन्दी भाषा, कहानियों, उपन्यासों, नारी स्वातंत्रय, विमर्श, आंदोलन, भारतीय और विदेशी परिवेश, सूचना प्रौद्योगिकी के विषय में। भाषा पर चिंता व्यक्त करती कहती हैं-
            धीमी गति से हिन्दी के साथ वही हो रहा है, जो संस्कृत और लैटिन जैसी अपने जमाने की समृद्ध भाषाओं के साथ हो चुका है। अङ्ग्रेज़ी का दबदबा इसलिए है कि सिर्फ 26 अक्षरों में वह दुनिया की कई भाषाओं के कई शब्दों को अपने में समा लेती है और सभी भाषाओं पर राज करती है। ----- हिन्दी को हमें जीवित रखना है तो सरलीकरण के नाते प्रयोगों से कतराना नहीं, बल्कि उन्हें स्वीकारना होगा।--- 26 अक्षर दुनिया भर के शब्दों को लिखते हैं चाहे फिर टोरेंटों--- का T हो या तान्या--- का T[10]
 
            नारी स्वातंत्रय, विमर्श, आंदोलन की बात करते कहती हैं,
            किसी आंदोलन की नहीं, हिम्मत की ज़रूरत है। परम्पराओं के नाम पर थोपे गए सामाजिक बंधनों को तोड़ना भी है और परिवार को विघटित भी नहीं होने देना है। [11]
 
            अंत में हंसा जी की शैक्षिक और साहित्यिक उपलब्धियों, पुरस्कारों, वेबिनारों आदि का संक्षिप्त परिचय है।
 
संदर्भ:
[1] डॉ. दीपक पाण्डेय एवं डॉ. नूतन पाण्डेय, प्रवासी साहित्य कार हंसा दीप का उपन्यास साहित्य, राजेन्द्र चौधरी, ‘सार्वभौमिक मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर नए क्षितिज तलाशने की जिजीविषा’, सर्व भाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली, 2023, पृष्ठ 38
[2] वही, दिनेश अहिरवार, परंपरा और आधुनिकता के अंतर द्वन्द्वों  की शिनाख्त, पृष्ठ 48
[3] वही, बी. एल. आच्छा, हिन्दी उपन्यास को नया धरातल देता कुबेर, पृष्ठ 75 
[4] वही, डॉ. मधु संधु, सामाजिक प्रेरणाप्रद उपन्यास कुबेर, पृष्ठ 87-88
[5] वही, डॉ. श्याम सुंदर पाण्डेय, स्वस्थ समाज की परिकल्पना का उपन्यास:कुबेर, पृष्ठ 102
[6] वही, श्री विजय कुमार तिवारी, केसरिया बालम: प्रेम का भावपूर्ण, मार्मिक चित्रण, पृष्ठ 105
[7] वही, सारोजिनी नौटियाल, परदेश की धरती में राजस्थान की खुशबू- केसरिया बालम, पृष्ठ 118-119
[8] वही, विजय कुमार तिवारी, लेखन जगत की संगतियों विसंगतियों का अद्भुत हास्य- व्यंग्य, पृष्ठ 141
[9] वही, डॉ. विजया सती, एक सभ्य जंगल की कहानी, पृष्ठ 142
[10] वही, हंसा दीप से दीपक पाण्डेय का संवाद, पृष्ठ 152, 155  
[11] वही, हंसा दीप से दीपक पाण्डेय का संवाद, पृष्ठ 163 

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