1857 के विद्रोह में मीरजापुर* की भूमिका

प्रवीण कुमार मिश्रा

प्रवीण कुमार मिश्रा

शोध छात्र, इतिहास विभाग, सामाजिक विज्ञान संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, पिन .221005
ईमेल: praveenishra@gmail.com
चलभाष: 9026473425

प्रागैतिहासिक एवं ऐतिहासिक धरोहरों, साथ ही शक्ति साधना के प्राचीन महत्व की आधारशिला पर स्थित विन्ध्य धाम मीरजापुर एक अतिप्राचीन महत्व का भौगोलिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र है। मीरजापुर, प्रयागराज और काशी जैसे पवित्र धार्मिक मान्यताओं एवं पौराणिक महत्व के शहर के ठीक बीच में स्थित है। इसकी खास विशेषताओं में आदिवासीय सँस्कृति को सजोये हुए लोक चेतना के रूप में 'कजरी' लोकगीत जुड़ा हुआ है। मीरजापुर शाक्त साधना का केंद्र है। इस अतिप्राचीन कालीन शहर की स्थापना की अवधारणा प्रागैतिहासिक काल से जुड़ा हुआ है। सी.ए. बेयली ने अपनी पुस्तक 'रूलर टाउन्समेन एंड बाजार' में मीरजापुर को एक व्यापारिक शहर के रूप में चिह्नित किया है जिसका केंद्र 'कंतित' नामक शहर है। एस. एन. सिन्हा ने अपनी पुस्तक 'सूबा ऑफ इलाहाबाद' में कंतित व चुनार को इलाहाबाद सुबे का हिस्सा बताते हुए ‘सरकार’ के रुप में चिह्नित किया है। आधुनिक मीरजापुर की स्थापना के बारे में डगलस डेवार ने 'प्री मुटिनी रिकॉर्ड' में बनारस से पृथक 1795 में जोनाथन डंकन द्वारा मीरजापुर की स्थापना किया गया। आज देश में आजादी का अमृत महोत्सव चल रहा है। हम अपने विलुप्त लोक संस्कृति, किवंदिती व उपेक्षित इतिहास को पुनः लिखने व परिभाषित करने का कार्य राष्ट्रीय स्तर कर रहे हैं। यह वह समय है जब देश में दबे हुए तथ्यों व लोकाख्यानों पर पुनः विचार भी किया जा रहा है। ऐसे में 1857 के विद्रोह में जनपद मीरजापुर के योगदानों के बारे में परिचर्चा महत्वपूर्ण है। इस कार्य का मुख्य सरोकार अपने देश के स्थानीय इतिहास को न केवल पुनर्जीवित करना है बल्कि राष्ट्रीय ऐतिहासिक प्रतिमाओं के दायरे को विस्तृत करना भी है।

 भारत के इतिहास में 1857 की लड़ाई व उसके जुड़ी अवधारणा अपने आप में उलझा हुआ है। साम्राज्यवादी इतिहासकार जो ब्रिटिश साम्राज्य के पक्षधर थे उनका मानना था कि यह 1857 का विद्रोह मात्र सैनिक विद्रोह है।   माल्सन ने अपनी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ द इंडियन म्युटिनी ऑफ 1857-58', जार्ज ओटो ट्रेविलियन अपनी पुस्तक 'कानपुर' में और टी.आर.ई होम्स अपनी पुस्तक 'ए हिस्ट्री ऑफ द इंडियन म्युटिनी' में 1857 के विद्रोह को सैनिक विद्रोह माना है। वहीं, एल.ई.आर रीज का मानना है कि 1857 का विद्रोह कुछ धर्मान्ध लोगों का ईसाइयत के विरुद्ध युद्ध था। टी.आर. ई होम्स का मानना है कि 1857 का विद्रोह 'बर्बरता और सभ्यता’ के बीच का युद्ध था। सर जेम्स आउट्रम अपनी पुस्तक 'कैम्पेनिंग इन इंडिया 1857-58' में 1857 के विद्रोह को हिन्दू-मुस्लिम  षड्यंत्र का परिणाम बताते हैं। डब्लू. टेलर ने अपने सुप्रसिद्ध स्मरण 'पटना क्राइसिस' में इस विद्रोह को हिन्दू-मुस्लिम षड्यंत्र माना है। एकमात्र ब्रिटिश प्रशासक जो उस समय ब्रिटिश संसद में रूढ़िवादी पार्टी के नेता थे, बेन्जामिन डिजरेली  जिन्होंने 1857 के विद्रोह को राष्ट्रीय विद्रोह माना है। 1857 की घटना के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में, यानी 1947 में जब देश आजाद हुआ तब 1857 पर फिर से सरकारी व निजी प्रयासों से मजबूत लेखन कार्य हुआ। इस मजबूत लेखन की शुरुआत 1909 में प्रकाशित वीर दामोदर सावरकर की पुस्तक '1857 का स्वतंत्रता समर' से होती है। सावरकर ने साम्राज्यवादी इतिहास लेखन को चुनौती देते हुए 1857 के विद्रोह को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मान कर ही लेखन कार्य किया है। सावरकर ने 1857 के विद्रोह में एक नए बहस की नींव रखी। जिसका प्रतिउत्तर रमेश चन्द्र मजूमदार 1957 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'सिपोय म्युटिनी एंड द रिवोल्ट ऑफ 1857' में देते हैं कि "तथाकथित 1857 का राष्ट्रीय स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम, न तो प्रथम, न राष्ट्रीय, और न ही स्वतंत्रता संग्राम था।" इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए सुरेन्द्र नाथ सेन भी 1947 में सरकारी प्रयास से प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'एट्टीन फिफ्टी सेवन' में 1857 के विद्रोह पर अपने विचार रखते हुए कहते हैं कि "मध्य उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय भारतीय राष्ट्रीयता भ्रूणावस्था में थी।" एस. बी. चौधरी 1957 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ' थेओरी ऑफ द इंडियन म्युटिनी'  के माध्यम से राष्ट्रवादी स्वर में कहीं न कहीं वीर सावरकर के लेखन समर्थन करते हैं। बाद में इतिहास लेखन में पार्थ चटर्जी, रणजीत गुहा, ज्ञानेंद्र पांडेय और डेविड अर्नाल्ड जैसे बुद्धिजीवियों द्वारा उपेक्षित वर्ग के निरंतर ऐतिहासिक प्रतिरोध को इतिहास की मुख्य धारा में स्थापित करने का कार्य किया है।

अब विषय यह है कि इतिहासकार जो कह रहे हैं उसे साहित्यकार कैसे देख रहे है!, साहित्यकारों की मुखर लेखन ने न केवल 1857 के  इतिहास बल्कि इतिहासकारों को भी लाकर साहित्य के कटघरे में खड़ा कर दिया। इतना ही नहीं अपने धरातलीय भ्रमण व इतिहास की मौखिक परंपरा का संवर्धन करते हुए साहित्यकारों ने पूरे विषय को दिलचस्प बना दिया। 1946 में वृंदावन लाल वर्मा की 'झांसी की रानी लक्ष्मीबाई' नामक उपन्यास प्रकाशित हुई। वर्मा जी के पूर्वज यानी परदादा दीवान आनन्द राय 1857 के विद्रोह में रानी लक्ष्मीबाई की ओर से लड़ते हुए मऊ की लड़ाई में मारे गए थे। वर्मा जी की परदादी अपनी बहू यानी वृंदावन लाल वर्मा की दादी को जो बताया था उसी आधार पर इस उपन्यास को लिखा गया है। ऐसा भी नहीं है कि उपन्यास केवल मौखिक विधा पर आधारित है।  स्वयं लेखक ने कई ख़तों और समकालीन प्रशासनिक अधिकारियों के लेखों का उल्लेख किया है। वर्मा जी तुराबअली नामक 115 वर्ष पुराने वृद्ध से भी मुलाकात की। तुराब अली अंग्रेजों की ओर से पुलिस में थानेदार थे। उन्होंने झांसी की रानी को कई बार देखा था। 

प्रसिद्ध साहित्यकार अमृत लाल नागर ने 1957 में उत्तरप्रदेश सरकार के सहयोग से प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध रचना 'गदर के फूल' में 1857 के विद्रोह पर अलग तरीके से प्रकाश डाला है। अपनी पुस्तक में नागर जी कहते हैं कि "न तो मैं इतिहासकार हूँ और न ही इतिहास की विद्या का पण्डित हूँ!, लेकिन इतिहास के प्रति जिज्ञासु जरूर हूँ! हाल ही में प्रकाशित होने वाले, अपने स्वनामधन्य इतिहासकारों के द्वारा लिखित सन सत्तावन की क्रांति के इतिहास पर लिखी कृतियों से मेरे मन में बड़ा ही क्षोभ है। अचानक जमी-जमाई आस्था को धक्का लगने के कारण नहीं, वरन इसलिए क्षुब्ध हूँ कि हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमानरहित स्वनामधन्य इतिहासकारों ने ऐसे सत्य को जिसका जनचेतना से बहुत ही गहरा लगाव है, महज ऊपरी तौर पर टटोल कर अपना फतवा दे डालने का दम्भ भरता है। कोई क्यों न हो, बड़े से बड़ा व्यक्ति क्यों न हो, एक राष्ट्र के प्रति अपना झूठा दम्भ लेकर नहीं आ सकता, सत्तावन के विद्रोह को लेकर आना तो और बात है।" अपनी रचना 'गदर के फूल' में  नागर जी किंवदंतियों, सन सत्तावन के विद्रोह के समय के जीवित सेनानी या उनके बेटों का साक्षात्कार, प्रचलित लोकगीतों, कहावतों के साथ ही जमीनी अवशेषों का सहारा लेते हुए बहुत से गुमनाम सेनानियों और देशभक्तों को साहित्य की पटल से उजागर करने का काम किया है। इसी क्रम में श्रीयुक्त दत्तात्रेय बलवंत पारसनीस की 1974 में हिन्दी भाषा में प्रकाशित पुस्तक 'झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई' पुस्तक प्रमुख है। दत्तात्रेय जी अपनी पुस्तक के प्रस्तावना में इतिहासकारों की ऐतिहासिक असफलता के प्रति अपना क्षोभ प्रकट किया है- "जब तक किसी महान विषय को इतिहास में स्थान नहीं दिया जाता तब तक उसका चिरस्मरणीय रहना नहीं बल्कि असम्भव है। अतएव अपने देश के महापुरुषों का वर्णन इतिहास में लिखा जाना बहुत ही आवश्यक है। अन्यथा उनके अपूर्व असाधारण कार्य यूँ ही नष्ट हो जाएंगे।" एक और साहित्यकार महाश्वेता देवी मूल बांग्ला भाषा में लिखित अपनी प्रथम प्रसिद्ध पुस्तक 'झांसी की रानी' के प्रस्तावना में ही इतिहासकारों के सतही कार्यों की आलोचना करते हुए इतिहास की मौखिक व यथार्थ धरातलीय परंपरा व पृष्ठभूमि पर जोर दिया है।

जब हम मीरजापुर में 1857 के विद्रोह की बात करते हैं तो हमें यह ध्यावत हो कि उस समय मीरजापुर, बनारस मंडल का ही हिस्सा था। उस समय बनारस मंडल में बनारस सहित मीरजापुर, गाजीपुर, जौनपुर एवं आजमगढ़ सम्मलित था। लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, झांसी और जगदीशपुर बिहार के ठीक बीच में बनारस मंडल का सामरिक महत्व मध्य गंगा क्षेत्र के व्यापारिक व राजनैतिक गंगा मार्ग से स्वयं सिद्ध होता है। मीरजापुर में उत्तर भारत के सर्वोच्चता का प्रतीक ऐतिहासिक चुनार दुर्ग स्थित था।  जिसपर 1765 से ही ब्रिटिश प्रशासन का कब्जा था। यहाँ से सैनिक सहायता समस्त उत्तर भारतीय विद्रोह स्थलों को सुलभ कराया जा रहा था।

 4 जून को बनारस में 37 वीं नेटिव बटालियन के असफल विद्रोह की सूचना मंडल के अन्य जनपदों में पहुँच चुका था। जनपद मीरजापुर के संदर्भ में राज्य अभिलेखागार लखनऊ में सुरक्षित पी.वाकर की डायरी से मीरजापुर में 1857 में घटित घटनाओं का विस्तृत उल्लेख मिलता है। पी. वाकर उस समय मीरजापुर के डिप्टी कलेक्टर थे। पी.वाकर अपने डायरी में लिखते हैं कि जब 4 जून को जब बनारस में घटना घटित हुई उसके बाद 17 मई 1857 को हमने सभी ब्रिटिश अधिकारियों को सचेत रहने का संकेत दिया। कैप्टन मांटेग्यू को मजबूत सिक्ख बटालियन के साथ जनपद के खजाने की सुरक्षा सौंपी गयी। 25 मई को रीवां के राजा के सहयोग से सिंगरौली क्षेत्र में सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था की गयी।  इसी बीच मीरजापुर से इलाहाबाद के बीच विद्रोहियों ने डाक व्यवस्था को नष्ट कर दिया। 10 जून को ठेकेदार माधोसिंह ने जिला प्रशासन को यह खबर भेजी इशानपुर के कुछ शसस्त्र लोगों द्वारा पड़ोसी गाँव की सम्पत्ति जब्त कर ली गयी है। 4 जून के बनारस 37 वीं नेटिव बटालियन के निशस्त्रीकरण  के प्रतिक्रिया स्वरूप गौरा, कोलापुर, भेवर, इंद्रपुर और ईसापुर में विद्रोह हुआ। 9 जून 1857 को विंध्याचल थानाध्यक्ष ने सूचित किया कि कटरा, मिसरान घाट पर कोलापुर के संदिग्ध लुटेरों ने अनाज से लदी हुई कुछ नावों को लूट लिया। भदोही गोपीगंज के थानेदार ने जिला प्रशासन को सूचित किया कि भिण्डा गाँव के कुछ विद्रोहियों ने राजा बनारस के सजावल की हत्या कर दी। इस प्रकार की घटनाओं के द्वारा विद्रोहियों ने ब्रिटिश हुकूमत को हिला कर रख दिया। पी. वाकर अपने डायरी में लिखते हैं, कमिश्नर टकर महोदय ने विद्रोहियों के विरुद्ध सख़्त कारवाई के निर्देश दिए। अंग्रेजों ने प्रतिक्रिया में पूरे गौरा गाँव को जला डाला। इस घटना में सैकड़ों गाँव की निर्दोष जनता जल कर राख हो गयी। 17 विद्रोहियों को बंदी बनाया गया। इस घटना से विद्रोहियों में गुस्सा और बढ़ गया।

15 जून 1857 को सिकरी, रामनगर की एक फर्म ने रिपोर्ट किया कि उनकी नाव सिकरी में लूट ली गयी है। इस समय मीरजापुर में भीषण अकाल पड़ा था। मिस्टर पी. वाकर के अनुसार सिकरी में लूटपाट के बाद 15 सिपाहियों और 6 सवारों के साथ जब वह सिकरी गये तब 15 विद्रोही सो रहे थे। जब उन्हें पता चला की उनको चारों तरफ से घेर लिया गया है तब भागने की कोशिश करने लगे जिस दौरन एक विद्रोही मारा गया, चार विद्रोही  भाग गये और 10 विद्रोहियों को बंदी बना लिया गया। भदोही परगने में विद्रोह का मुख्य कारण प्रमुख रूप से जबरन अंग्रेजों द्वारा करायी जाने वाली नील की खेती थी। इन विद्रोहों का नेतृत्व भदोही के मौनस राजपूत कर रहे थे। इसमें सबसे प्रमुख नाम उदवन्त सिंह का आता है। काशी नरेश की जमीनदारी का विरोध करते हुए उदवन्त सिंह ने अपने आप को भदोही का राजा घोषित कर दिया। अपने नजदीकी भोला सिंह और रामबख़्श को अपना दीवान बनाया। इन्होंने 1000 से 2000 तक का अपना एक फ़ौज भी बना लिया था। इस दौरान काशी नरेश के दीवान मुंशी दर्शनलाल और उदवन्त सिंह के बीच कई मुखभेंड़ हुए। अंत में, धोखे से उदवन्त सिंह, भोला सिंह और रामबख़्श को पकड़ लिया गया और 20 जून 1857 को गोपीगंज में एक इमली के पेड़ से लटकाकर मार्शल ला के अधीन तीनों को फाँसी दे दिया गया। इसके बाद पूरे जनपद में विद्रोह की लहर और तेज हो गयी।

उदवन्त सिंह की हत्या के बाद से ही गोपीगंज की पाली नील फैक्ट्री विद्रोहियों की निगाहों में चढ़ा हुआ था। पाली नील फैक्ट्री के मैनेजर मिस्टर जोंस ने विलियम रिचर्ड्स को पत्र लिख कर सूचित किया कि सरनाम सिंह परमार व उनके विद्रोही साथियों द्वारा फैक्ट्री के गोदाम को लूट लिया गया है। 3 जुलाई 1857 को रात्रि 1:30 बजे विलियम रिचर्ड्स मुर, फैक्ट्री सार्जेंट मिस्टर जोन्स और मिस्टर कैश पाली नील फैक्ट्री में पहुँचे। यहाँ एक विद्रोही टुकड़ी के साथ शिवदयाल सिंह को गिरफ्तार कर लिया। अगली सुबह 4 जुलाई 1857 को झुरी सिंह उनके साथी सरनाम सिंह, रघुवर सिंह और बलभद्र सिंह पाली नील फैक्ट्री को आग लगा दिया। जिसमें सार्जेंट जोंस और मिस्टर कैश मारे गये। उसी समय झुरी सिंह द्वारा ज्वाइंट मजिस्ट्रेट कैप्टन विलियम रिचर्ड्स मुर की हत्या कर दी गयी। उदवन्त सिंह की विधवा पत्नी के सामने मुर का कटा सिर लाकर भेंट किया गया। उदवन्त सिंह की विधवा पत्नी सुबूरिया देवी ने 300 सौ रुपये का नगद सम्मान झुरी सिंह को प्रदान किया। पाली नील फैक्ट्री के घटना के बाद झुरी सिंह अंग्रेजों की निगाहों में चढ़े हुए थे। गोपीगंज के थानेदार ने झुरी सिंह के ऊपर 1000 रुपये का इनाम घोषित किया। उदवन्त सिंह की पत्नी को गिरफ्तार कर लिया गया।  झुरी सिंह के साथी विद्रोहियों पर यही इनाम राशि 500 रुपये की थी। 23 अगस्त 1857 को झुरी सिंह ने कारे गाँव को लूटा, फिर बिसौली को लूटा अंत में 23 अगस्त को कोटगाँव के सुरियाना बनियों को लूटा उनसे 2000 रुपये वसूल किया। अंत में, अगस्त के अंतिम दिनों में झुरी सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया, उनके साथ 10 विद्रोही और पकड़े गये। लिखित दस्तावेजों में झुरी सिंह की मृत्यु कालरा होने से लिखित है। इस घटना के बाद पश्चिमी मीरजापुर में 1857 का विद्रोह समाप्त हो गया।

मीरजापुर जनपद के दक्षिणी हिस्से में राबर्ट्सगंज तहसील स्थित है। इस क्षेत्र में रहने वाले चंदेल राजपूत बाबू कुँअर सिंह के रिश्तेदार थे। इन नदी-पहाड़ी इलाके में विद्रोह को कुचलना मुश्किल था। 24 अगस्त को दानापुर के विद्रोही बाबू कुँअर सिंह के नेतृत्व में कर्मनाशा नदी पार कर मीरजापुर में प्रवेश करते हैं। घोरावल बाजार, खरेही गाँव और खैरा गाँव को उन्होंने लूटा। पुनः 29 अगस्त को चंदेल राजपूतों की सहायता से कुँअर सिंह द्वारा घोरावल बाजार को लूट लिया गया। इस दौरान सरकारी भवनों, दस्तावेजों और अभिलेखों को नष्ट किया गया। इन घटनाओं को देखते हुए कमिश्नर टकर महोदय द्वारा पुरे मीरजापुर में कठोर कारवाई करने का निर्देश दिया गया। विजयगढ़ के राजा लक्ष्मण सिंह इस समय विद्रोहियों का पूरा साथ दे रहे थे। 11 अक्टूबर को सिरसी समीप रामगढ़ में मद्रास बटालियन गयी। दक्षिणी मीरजापुर के जमींदार फतेहबहादुर सिंह, विजयगढ़ के इलाक़ेदार ईश्वरी सिंह भी विद्रोहियों का साथ दे रहे थे। विजयगढ़ राजघराने के वंशज जितेंद्र सिंह लिखते हैं कि 1857 के अंत महीनों में यह स्थिति हो गयी की पूरा विजयगढ़ स्वतंत्र हो चुका था। 5 नवंबर 1857 को 16 हांथी और 100 घुड़सवार सेना लेकर विद्रोहियों ने लालगंज, घोरावल और रॉबर्ट्सगंज को लूटा लिया। अंत में, 9 जनवरी 1858 को ब्रिटिश सेना के सिपाहियों व भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सपूतों के बीच भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध के बाद से दक्षिणी मीरजापुर में विद्रोह लगभग शांत हो गया।

मीरजापुर एक प्राचीन कालीन व्यापारिक नगर है; जो गंगा के किनारे स्थित है। अंग्रेजों के समय में मीरजापुर पीतल, कांसे व कालीन की व्यापार और नील की उपजाऊ फ़सल की व्यापार के लिये जाना जाता था। 1857 विद्रोह के दौरान असंतुष्ट सामंत व जमींदारों द्वारा साहूकारों, उद्योगपतियों और बिचौलियों को इस लिए निशाना बनाया गया ताकि आमजन के शोषण से इनका प्रत्यक्ष जुड़ाव था। जेम्स आउट्राम अपनी पुस्तक में मीरजापुर की कोयला खदानों को सेनानियों द्वारा लुटे जाने का उल्लेख किया है। माल्सन ने अपनी पुस्तक में दर्शाया है कि विद्रोह के दौरान बनारस में खाद्यान आपूर्ति मीरजापुर के बाजार किया जा रहा था। बनारस, गाजीपुर, जौनपुर की विद्रोहों से मीरजापुर का विद्रोह एकदम भिन्न था। बाद के गांधीवादी आंदोलन में भी जनपद मीरजापुर का महत्वपूर्ण योगदान रहा।


संदर्भ

1. सुरेंद्र नाथ सिन्हा, सूबा ऑफ इलाहाबाद, अंडर द ग्रेट मुगल, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली, 1974.
2. डगलस डेवार, ए हैंड बूक टु द इंग्लिश प्री-मुटिनी रिकॉर्ड, गर्वनमेंट प्रेस, 1860.
3. जार्ज ओटो ट्रेवेलियन, कानपुर, मैकमिलन एंड कंपनी, लंदन, 1865.
4. विनायक दामोदर सावारकर, 1857 का स्वतंत्रता समर, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, 2000.
5. रमेश चन्द्र मजूमदार, सिपोय म्युटिनी एंड द रिवोल्ट ऑफ 1857, के.एल.मुखोपाध्याय फर्मा, कलकत्ता, 1957.
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7. परमानंद मिश्र, गजेटियर ऑफ मीरजापुर, फोटो-लिटो प्रेस, रुडकी, 1998.
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9. पण्डित देवकुमार मिश्र, सोन के पानी का रंग, हिन्दी विश्वकोश, भाग-7,1983.   
10. सर जेम्स आउट्रम, कैम्पेनिंग इन इंडिया 1857-58, स्मिथ इल्डर एंड कंपनी, कम हिल, लंदन, 1860.  
11. शशि भूषण चौधरी, सिविल रिबेलियन इन द इंडियन मुटिनी (1857-59), द वर्ड प्रेस प्राइवेट लिमिटेड, कलकत्ता, 1957.
12. पी. वाकर डायरी, राज्य अभिलेखागार, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
13. ट्रॉय डाउन,फियर एंड लोथिंग इन भदोही, द रिवोल्ट ओफ मोनास राजपूत 1857-58, इंडियन इकॉनॉमी एंड सोशल हिस्ट्री  रिव्यू, लंदन,नई दिल्ली, 1990.
14. हेनरी जार्ज केने,  फिफ्टी सेवन, सम अकाउंट ऑफ द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ इंडियन डिस्ट्रिक्ट दुरिंग द रिवोल्ट ऑफ द बंगाल आर्मी, डब्लू एच एलेन एंड कंपनी, लंदन, 1883.

*मीरजापुर = पर्वतपुत्री का नगर (मिर्ज़ापुर की एक वैकल्पिक वर्तनी)

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