अंधकार की सरहद पर (प्रांत-प्रांत की कहानियाँ)

(प्रांत-प्रांत की कहानियाँ से साभार)
मूल भाषा: सिन्धी
लेखक: महराण मल्लाह
अनुवाद: देवी नागरानी

परिचय: देवी नागरानी जन्म: 1941 कराची, सिंध (तब भारत), 12 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, 2 भजन-संग्रह, 12 सिंधी से हिंदी अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिंधी, हिन्दी, तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्पर अनुवाद। श्री मोदी के काव्य संग्रह, चौथी कूट (साहित्य अकादमी प्रकाशन), अत्तिया दाऊद, व रूमी का सिंधी अनुवाद. NJ, NY, OSLO, तमिळनाडु, कर्नाटक-धारवाड़, रायपुर, जोधपुर, केरल व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। डॉ. अमृता प्रीतम अवार्ड, व मीर अली मीर पुरस्कार, राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद व महाराष्ट्र सिन्धी साहित्य अकादमी से पुरस्कृत। अंतर्जाल: https://nangranidevi.blogspot.com ईमेल: dnangrani@gmail.com 


महराण  मल्लाह
आख़िर मैं उसकी परवाह करती ही क्यों हूँ? जब मैंने ही उसे दुत्कार दिया है, तो फिर उसके ख़याल आकर क्यों मेरे दिल का दरवाज़ा खटखटाते हैं? उसकी अपनी समस्या है, जब सम्पर्क होगा तो उसकी मदद करूँगी। मैं क्यों खुद को परेशान करूँ? पर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि जैसे उनकी समस्या मेरी समस्या है। अगर मेरा उसके साथ कोई नाता नहीं है तो फिर यह बेचैनी, यह छटपटाहट कैसी? 
जब वह रूठा था तो उसने कहा था, ‘अच्छा, आप अपने अलगाव पर क़ायम रहना, हम अपना नाता निभाएंगे।’
मैंने सोचा वह निराश होकर भाग जाएगा, पर उसने वाक़ई अपना नाता निभाया। जैसा कहा, वैसा कर दिखाया। पर मेरा अलगाव इतना कमज़ोर कैसे पड़ गया है, जो न चाहते हुए भी उसका ख़याल मेरे मन में घर कर गया है। मैं उसकी याद की सीमा के पार जाना चाहती हूँ, ताकि उसकी कोई भी बात, कोई भी याद मेरा पीछा न कर सके। मैं उससे घृणा करना चाहती हूँ, ताकि उससे मेरा घर प्रभावित न हो और उसकी समस्याओं का यह बेचैनी-बखेड़ा बना रहे। 
पिछले साल एक बार मिलने के बाद उसने मुझे वॉक  करने की ऑफ़र दी थी, और कुछ ऐसे विनम्र अंदाज में ज़ोर दिया कि मैं खुद को रोक न पाई। मेरी गाड़ी ने भी आने में देर की थी इसलिये सोचा जब तक ड्राइवर पहुँचे थोड़ा टहल लूँ। रोड के दोनों तरफ़ खड़े क़द्दावर पेड़ तेज़ हवा के कारण झूम-झूम कर इक दूजे से स्नेह का नाता निभा रहे थे। वह भी मुझसे कुछ दूरी रखकर, बराबरी में चल रहा था। ‘कुछ कहना है?’, मैंने पूछा।
‘हाँ!’ उसने मेरी तरफ़ देखते हुए गर्दन को हलके से हिलाते हुए कहा। 
‘देखो, अगर वही प्यार-व्यार वाली बकवास शुरू की तो मैं यहीं से लौट जाऊँगी।’
‘तुम्हारे लिये प्यार का शब्द इतना बेमतलब क्यों है?’
‘यह फ़ुरसत में रहने वालों का मनोरंजन है। अस्वीकृत और असफ़ल लोगों की कमज़ोरी है। जब ज़िन्दगी में कोई भी काम करने के लिये नहीं होता तो आदमी प्यार करता है। वह सिर्फ़ सुस्ती का सामान हासिल करता है।’
मैंने प्यार के खिलाफ़ ऐसे भावुक वाक्यांश निकाले ही थे कि वह संत्रस्त हो गया। हवा के झोंके रात रानी की महक लिये हमें छू कर जाते रहे थे। चांद किसी जासूस की तरह पेड़ों के झुरमुट के बीच से झाँक कर हमें देख रहा था।
‘अब कह भी डालो, तमाम रास्ता चुप रहते आए हो।’
‘तुम सच में बहुत कृपालु हो। मेरी सभी नादानियों के बावजूद मुझे वक़्त देती हो, मेरी बातें सुनती हो, मेरी परवाह करती हो।’
‘असली बात पर आओ।’
‘तुम नाराज़ होती हो न! अच्छा अब आगे से न मैं तुम्हें एस.एम.एस. करूँगा और न ही कोई फ़ोन कॉल। न तुम्हारे ऑफ़िस में आऊँगा, न ही ऐसा कोई काम करूंगा जिससे तुम्हारा दिल दुखी हो। पर तुम्हें क़सम है, कभी भी मुझसे यह माँग न करना कि मैं तुम्हें चाहना छोड़ दूँ, क्योंकि तुम्हारे बिना मैं जी न सकूँगा।‘
उस दिन मेरे अस्तित्व को मौत के सन्नाटे ने घेर लिया। पश्चाताप की अग्नि मेरे भीतर सुलगने लगी थी। एक व्यक्ति के सामने दूसरे की विवशता ने मेरे भीतर एक भूचाल पैदा किया। मैंने अपने अस्तित्व को चूर-चूर होकर बिखरते हुए देखा। इसीलिये उस रात मेरे मुँह से एक भी शब्द न निकल पाया। 
आज मैं कितनी अकेली हूँ। सभी सम्बंध होते हुए भी बेगानी और व्याकुल, पर इस दुनिया में एक व्यक्ति ऐसा ज़रूर है, जिससे मैं खुद को छुपा न पाई हूँ। जबकि मैं सख़्त से सख़्त बात को भी मुस्कराकर टाल देती हूँ। पर वह मेरी मुस्कराहट में छुपी उदासी को भी भाँप लेता है। 
कितना घमंड है उसे! अपना काम औरों से छुपाए फिर रहा है। काश! अगर मुझसे वह सीधे-सीधे कह दे तो मैं अपनी तरफ़ से प्रयास करके उसकी मदद कर दूँ, पर बड़ा बद-दिमाग़ है वह। अगर काम उसका अपना है तो वह सम्पर्क क्यों नहीं करता? अभी परसों ही मैंने उसे फ़ोन किया और पूछा, ‘कोई भी काम हो तो मुझसे कहना।’ 
पर अभी तक उसने कोई समाचार ही नहीं दिया है। दिल चाहता है कि ऐसे लापरवाह व्यक्ति को सब्के सामने तमाचा मारूँ! 
मुझे पता है कि अब वह हर्गिज़ फ़ोन नहीं करेगा। हो सकता है किसी मुसीबत में हो? मुझे ही उसे फ़ोन करना चाहिए। मैंने उसे अपनी ज़िन्दगी से डिलीट ज़रूर किया है पर उसका मोबाइल नंबर मेरे सिमकार्ड में सुरक्षित है। यह लो, यह उसका ही नंबर स्क्रीन पर आ गया है। कॉल तो करूँ पर पता नहीं वह क्या समझ बैठे? खैर छोड़ो उसे, ऐसा मौक़ा भी तो फिर नहीं आएगा, क्योंकि अपने घर में भी वह सभी से उखड़ा-उखड़ा-सा है। 
मुझसे फैसला क्यों नहीं होता? चलो उसे कॉल करती हूँ। भला जो इतना प्यार करे उससे क्या लेखा-जोखा करना! अगर वह सुधर गया होता तो बहुत दिन पहले भाग गया होता। पर वह तो आज़माइश पर पूरा उतरा है। मुझे याद आ रहा है कि एक दिन वह मेरे ऑफ़िस में चला आया। संयोग से तब वहाँ कोई और नहीं था। मुझसे कहा, ‘कभी तुमने सोचा है कि मैं तुमसे क्या चाहता हूँ?’
‘वही जो एक मर्द एक औरत से चाहता है!’ मैंने जवाब दिया।
‘नहीं’ उसने कहा। ‘मैं सिर्फ़ इतना चाहता हूँ कि तुम मान लो कि मैं तुम्हारा चाहने वाला हूँ।’
‘उससे क्या होगा?’ 
‘उससे क्या होगा? मैं यह समझने लगूँगा कि मैं तुम्हें चाहने के योग्य बन गया हूँ। मैं तुम्हारे दिल के दफ़्तर में अपना रजिस्ट्रेशन करवाना चाहता हूँ।’
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कभी-कभी मुझे उसकी बातें बिलकुल समझ में न आतीं। उसके साथ मेरा रिश्ता ख़ुद मेरे लिये प्रतियोगिता बनी हुई है। पर एक बात ज़रूर है, कि वह जब भी मेरे नज़दीक होता है तो मेरा मन प्रफुल्लित हो जाता है, मुझे किसी ताक़त व संतुलन का अनुभव होता है। 
सोच रही हूँ कि उसे कॉल करूँ, पर जाने कहाँ से कहाँ पहुँच गई। कॉल तो कर लूँ, पर बात कहाँ से शुरू करूँ? चलो ऐसा करती हूँ, पहले तो सामान्य दुआ-सलाम करूँगी और फिर अपना नाम बताऊँगी। पर उसके आगे क्या कहूँगी? और क्या कहूँगी, यही कि आप ने तो सम्पर्क ही काट दिया। आपकी समस्या का क्या हुआ? फिर ऐसे ही बात आगे बढ़ती जाएगी। लेकिन... ऐसा भी तो हो सकता है कि वह कॉल रिसीव ही न करे या बेरुखी से पेश आए। कुछ भी हो सकता है। फ़िलहाल ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा। इस वक़्त वह किसी तकलीफ़ के दौर से गुज़र रहा है और इसी बहाने बात की जा सकती है। पर मान लो यह पल गुज़र गया तो फिर शायद सम्पर्क की कोई राह ही न बचे!
भाड़ में जाये, मेरा क्या जाता है! उसकी ज़िन्दगी में ऊँच-नीच जो भी है, वह ख़ुद जो करना चाहे कर ले। समझा-समझा कर थक गई हूँ, पर मज़ाल है कि उसकी खोपड़ी कुछ सीधा सोचे। हमेशा उलटी सोच, उलटा अमल। कहा है, कई बार कहा है कि मैं कभी भी तुम्हारी नहीं हो सकती, पर ‘ऊँटनी लगाये दस, ऊँट लगाए तेरह’ वाली बात हो गई। वाक़ई आशिक, और गंवार को समझाना असंभव है!
मेरे ख़याल हैं, या रेगिस्तान का सफ़र, जो ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेते। अच्छा अब उसका नम्बर ही मिला लेती हूँ। 

नम्बर मिलाती हूँ तो मोबाइल से आवाज़ आती है, ‘आपका मिलाया हुआ नम्बर फ़िलहाल अभी बंद है, कृपया थोड़ी देर बाद पुनः प्रयास करें।’ 
***

लेखक परिचय: महराण मल्लाह
25 अप्रैल, 1974 में जन्मे, और मोरो, सिन्ध (वर्तमान पाकिस्तान) निवासी कथाकार सिंधी, उर्दू और अंगेजी भाषाओं में दक्ष हैं। 
पता: C-31, फेज़ -1, कासिमबाद, हैदराबाद, पाकिस्तान 71000 
चलभाष: 92-301-3531832

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