पुस्तक समीक्षा: गुमशुदा क्रेडिट कार्ड्स

समीक्षक: सरस दरबारी, प्रयागराज

कहानी संग्रह: गुमशुदा क्रेडिट कार्ड्स
संपादक: नीलम कुलश्रेष्ठ
प्रकाशक: वनिका पब्लिकेशन्स
मूल्य: ₹ 280.00

गुमशुदा क्रेडिट कार्ड्स, नीलम कुलश्रेष्ठ द्वारा संकलित 14 कहानियों से सजा यह संग्रह स्त्री विमर्श का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। इसमें सम्मिलित कहानियाँ खुलासे हैं उन चुनौतियों के, उन कठिनाइयों के, उन समझौतों के, जिससे एक नौकरीपेशा स्त्री, परिवार के दायित्वों को निभाते हुए, सतत जूझती है।

माँ बनना हर स्त्री का सपना होता है। तभी तो वह स्वयं को, और समाज उसे, सम्पूर्ण मानता है। परंतु एक नौकरीपेशा, स्त्री के लिए मातृत्व का दौर बहुत ही चुनौतियों भरा होता है। बच्चों की परवरिश के लिए उसे अपनी नौकरी, अपने सपने, अपनी उपलब्धियाँ भूलकर, एक गुमनाम ज़िंदगी जीनी पड़ती है, जहाँ उसके क्रेडिट्स, का कोई मोल नहीं होता। यह 14 कहानियाँ हैं उन स्त्रियों की जो घर और बाहर के बीच तारतम्य बैठाते बैठते, अपने क्रेडिट कार्ड्स खोती गईं।

सरस दरबारी
यह गुमशुदा क्रेडिट कार्ड्स जीवन की वह उपलब्धियाँ हैं, जिन्हें उन्होंने स्वत: तिलांजलि दे दी। वह सपने हैं, बीच उड़ान में, जिनके पंख कतर दिये गए हैं, ऐसे त्याग हैं, जो अपने परिवार के लिए उसे करने पड़े। वह आश्वासन हैं, जो वह स्वयं को देती रही, की बस कुछ ही दिन की बात है, फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा, जीवन की वह रेस है, जिससे वह स्वयं अपना नाम कटवाती रही, क्योंकि प्राथमिकताएँ तय करनी थीं। जिसमें सबसे बड़ी थी, मातृत्व। माँ बनने के सुख के साथ जुड़ जाते हैं, असंख्य समझौते, असंख्य चुनौतियाँ। ऐसे में कुछ स्त्रिएँ टूटने की कगार पर पहुँच जाती हैं, और कुछ उनका डटकर मुकाबला कर, दायित्वों से मुक्त हो, अपनी प्रतिभा की लौ को फिर प्रज्वलित कर, सम्पूर्ण आत्मविश्वास के साथ, अपनी दूसरी पारी आरंभ करती हैं।

दूसरी पारी यह शब्द कहीं मन को कचोटता है, क्योंकि दूसरी पारी भी थाली में सजाकर नहीं मिलती, भीड़ में, अपनी जगह बनाकर, हासिल करनी होती है। यह एक उपहार नहीं, एक संघर्ष है, जिससे हर प्रतिभाशाली स्त्री, एक लंबे अरसे से, पिछड़ जाने के बाद, गुजरती है। चाहे वह एक नृत्यांगना हो, एक आला अफसर हो, चित्रकार हो, लेखिका, महिला खिलाड़ी या कुछ और।। यहाँ पिछली उपलब्धियाँ परे हटा, उसे नए सिरे से अपनी पहचान, अपनी जगह बनानी होती है। उसे कष्ट तब होता है, जब परिवार और बच्चों के लिए किया बलिदान, अनकहा अनगुना ही रह जाता है।

नीलम कुलश्रेष्ठ
संग्रह की पहली कहानी नीलम कुलश्रेष्ठ जी की गुमशुदा क्रेडिट कार्ड्स में बच्चों का कहना “हाँ माँ जो अच्छा हो उसका क्रेडिट जल्दी से ले लेती हो”, टीसता है उस माँ का मन, जो, “उनकी उँगलियों की पोरों पर अच्छी कंपनियों के क्रेडिट कार्ड्स चमकें, इसलिए उन्हें पालने की चिंता में, वह अपने जीवन की उपलब्धियों के कितने ही क्रेडिट कार्ड्स खोती रही। अब वह उन्हें कहाँ से लाये।”

एक पन्ने की इस लघुकथा ने जहाँ पाठक के लिए संग्रह में ‘गुमशुदा क्रेडित कार्ड्स’ का संदर्भ स्पष्ट किया, वहीं इस संदर्भ को असीम विस्तार दिया कि किस प्रकार बच्चों कि परवरिश में वह स्वयं को भूलकर अपने बच्चों के लिए जीती है, और जब वही बच्चे, उस बलिदान की अहमियत नहीं समझ पाते, तो वह पीड़ा, शब्द-शब्द रिसती है।

जया आनंद जी की कहानी, मैं नहीं तू ही तू, मातृत्व और महत्वकांक्षा के बीच रस्साकशी की दास्तान है। करीर ओरिएंटेड तन्वी संगीत, पढ़ाई, डिबेट, हर चीज़ में अव्वल थी। उसके हिसाब से माँ बनने के अलावा, स्त्री की और भी प्राथमिकताएँ होनी चाहिए। केवल माँ बनकर ही नही, अपितु अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय, स्वतंत्र रूप से लेकर ही वह सम्पूर्ण हो सकती है। ऐसे में गर्भ ठहरना उसे बिलकुल मंजूर न था। वह बच्चा गिराना चाहती थी। पर बच्चे को जन्म के साथ ही धीरे धीरे उसके मोहपाश में बंधती जाती है। और अंतत महत्वाकांक्षा पर मातृत्व की जीत होती है। तन्वी के मन के द्वंद्व, उसकी ऊहा पोह को जया आनंद जी ने बहुत ही कुशलता से साधा है।

अमूमन देखा गया है कि घर में अतिरिक्त कमाई की आमद रहे, इसलिए अधिकतर परिवार एक पढ़ी लिखी नौकरीपेशा बहू चाहते हैं। परंतु उसके दायित्वों से, सबको परहेज है। चुनौतियों के बीच वह अक्सर स्वयं को दुविधाओं के दो राहे पर खड़ा पाती है जहाँ एक तरफ मातृत्व का दायित्व हैं और दूसरी तरफ मजबूरीयाँ। इनमें सबसे बड़ी चुनौती है, मातृत्व अवकाश के बाद एक दूधमुंहे शिशु को छोड़कर नौकरी पर जाना। किसके पास छोड़े! पूरी तरह माँ पर आश्रित शिशु को क्रेश में छोड़ने का विचार दिल देहला देता है। मात्रत्व अवकाश के बाद मुस्कान के लिए भी यह एक बहुत बड़ी समस्या थी। एक तरफ संतान दूसरी तरफ नौकरी, दोनों दायित्वों का निर्वाह बिना परिवार के सहयोग के संभव न था, जो उसे मिला, अपने अवकाश प्राप्त वृद्ध ससुर जी से। और वह अपने क्रेडिट कार्ड्स सुरक्षित रख सकी। रिश्तों के प्रति आश्वस्त करती कहानी।

हमारे समाज में नौकरीपेशा स्त्रियाँ जहाँ सम्मान की दृष्टि से देखी जाती हैं, वहीं गृहणियों को कमतर आँका जाता है। शुभ्रा एक सफल पत्रकार, अपनी नौकरी से इस्तीफा दे देती है, ताकि बच्चों की ठीक से परवरिश कर सके। और एक महत्वाकांक्षी सफल पत्रकार से एक साधारण गृहणी बन जाती है, जहाँ बात-बात पर प्रशंसा की जगह उलाहना मिलने लगती है। जहाँ, तुम्हें कितना कुछ आता है, कहने वाली पति की ज़ुबान, तुम्हें कुछ नहीं आता कहने लगती है। और सच मानिए,यही एक गृहणी की व्यथा है कि वह सबकी नज़रों में हमेशा नकारा ही रही है। दिनभर घर में, बैठी तो रहती हो, जैसे तीरों से सदा घायल हुई है। पर शुभ्रा की प्राथमिकताएँ तय थीं। वह अपने बच्चों का बचपन जीना चाहती थी, उन्हें बढ़ते हुए देखना चाहती थी वह अपने इस निर्णय से खुश थी।इस खुशी के एवज में, उसके लिए कोई कीमत, बड़ी न थी। पर पति के नज़रों में उसकी कोई वकत न थी। कहते हैं सुपीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स दरअसल इन्फ़ीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स होता है, जिससे उबरने के लिए पुरुष अपने भीतर एक श्रेष्ठता की भावना पाल लेता है। और स्त्री को गौण समझने लगता है। पर आत्मविश्वास से लबरेज शुभ्रा, बच्चों को सैटल कर, अपने जीवन की दूसरी पारी के लिए तैयार थी। शुभ्रा एक दृढ़निश्चयी, आत्मविश्वासी स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है, जिसकी आज के समाज को बहुत ज़रूरत है। शैली खत्री जी ने शुभ्रा के किरदार को बखूबी उभारा है।

अतीत जब टीस बनकर बार-बार उभरे, जब उड़ान के बीच अचानक परों की शक्ति क्षीण हो जाए, पर उड़ान का मोह न छूट पाये, और जीवन का एकमात्र सपना धराशायी हो जाए तो वह चोट बरसों तक टीसती है।

योगिता देश विदेश में प्रख्यात, सफल नृत्यांगना थी, जो निर्बाध गति से उड़ान भर रही थी। पति और पिता दोनों का भरपूर सहयोग उसे मिला था। माँ बनने की खुशी ही उसे अपने जुनून से विलग कर पायी। उसे विश्वास था कि कुछ समय बाद नौकरों की व्यवस्था कर वह पुन: उड़ान भर पाएगी। परंतु जुड़वाँ बेटियों में छोटी के दिव्याङ्ग होने से, भविष्य की सारी योजनाएँ चरमरा गईं। दोनों बेटियों के सपने पूरे करना ही उसका मक़सद रह गया, जो उसने पूरी निष्ठा से किया। अंतत: दोनों बेटियों ने अपने मनपसंद मुकाम हासिल कर लिए। योगिता उम्र के जिस पड़ाव पर खड़ी थी, वहाँ से उन सपनों के पूरे होने की संभावना बहुत क्षीण थी। पर किस्मत ने साथ दिया और अचानक उसके जीवन में एक ऐसा मोड़ आया कि सन्दूक में बंद उसके सपने परवाज़ को आतुर हो उठे। उसके घुँघरू फिर गूंज उठे। उसके गुम हो गए क्रेडिट कार्ड्स उसे फिर मिल गए।

पति जितना पढ़ा लिखा हो, पत्नी उतना ही गौरान्वित मेहसूस करती है, पर पुरुषों के साथ इसके विपरीत होता है। निखिला अपने पति की हीनभावना और कुंठा का शिकार बनी क्योंकि उसका पति एक दसवीं पास पंसारी था और वह एक मध्यमिक कॉलेज की प्रवक्ता। उसकी उपलब्धियाँ ही उसके लिए अभिशाप और उलाहना बन गई थीं। बेटा होने पर, वही समयाभाव उसका दुश्मन बन जाता है, जिसका दंश सबसे अधिक उसका बेटा सहता है। तनुज का अधिकतर समय अपनी दादी, दादा और पिता के साथ बीतता है, जो मिलकर उसे माँ के खिलाफ भरते रहते हैं। तनुज को सच्चाई ज्ञात होती है, जब माँ ब्रेन स्ट्रोक के कारण अस्पताल में भरती होती है। वह स्वयं के प्रति वितृष्णा और ग्लानि से भर जाता है। अंतत सत्य, समर्पण और निष्ठा की जीत होती है।और सबको छोड़, तनुज सदा के लिए माँ के पास आ जाता है। प्रश्न फिर खड़ा होता है, कि क्या औरत को टूटने ही कगार तक पहुँचने के बाद ही सुख मिलेगा ?

बच्चों की सफलता का श्रेय तो सभी लेते हैं, पर बच्चा जहाँ कमतर हुआ, या उससे कोई भूल हुई, तो गाज सीधे माँ पर ही क्यो गिरती है। उसे ही कटघरे में क्यों खड़ा किया जाता है।

शिवानी का बेटा सिद्धार्थ, जब एक विजातीय युवती से विवाह करना चाहता है, तो सारा दोष शिवानी के सिर मढ़ दिया जाता है। छूटते ही सास ताना मारती है, “ दुनियाभर की डिग्री लेकर क्या फायदा जब अपने ही घर में फ़ेल हो गए।” बेटे के इस फैसले से, वह अपराधी क्योंकर, हो गई? हर बार दूसरों की मर्ज़ी के आगे वह झुकी। माँ की खुशी के कारण अपने सपने परे खिसका उसने विवाह कर लिया। विवाह पश्चात नौकरी करनी चाही, तो पति ने दो टूक कह दिया, “मैं अच्छा खासा कमाता हूँ, क्या कमी है तुम्हे? माँ और भाभी भी तो पढ़ लिखकर इसी घर में रहती हैं।” अधूरी ख्वाइशों की हूक, दिल में रह रहकर उठती और वह मन मारकर उन्हें शांत करती। पर जब बेटे का अच्छे स्कूल में दाखिला, चिंता का विषय बना, तो उसने नौकरी करने का निर्णय ले लिया। घर में खूब कोहराम मचा, पर वह चुपचाप सारी ज़्यादतियाँ सहते हुए घर की जरूरतें पूरी करती रही। हमारे समाज की यह एक अनकही व्यवस्था है की एक पत्नी अपने पति के सपने पूरे करने में उसका साथ दे पर जब स्त्री के सपनों की बारी आती है, तो पति का पुरुषत्व आहत होता है। चाहे उसकी कमाई से घर के हालातों में सुधार आ रहा है, पर उसका श्रेय उसे नहीं मिलता। अपने सपने पूरे करने की कीमत वह ज़िंदगी भर चुकाती है। दरअसल सबको खुश रखने की कोशिश में वह अपनी खुशी भूल जाती है। पर अब उसने तय कर लिया था कि बेटे कि खुशी में ही उसकी खुशी है। और वह सिद्धार्थ के पक्ष में निर्णय ले लेती है।

हमारी प्राथमिकताएँ हमारे जीवन की दिशा और हश्र तय करती हैं। दोनों बहनें, गिरिजा और रेवा एक दूसरे से बिलकुल भिन्न थीं। गिरिजा के लिए उसका करीयर सर्वोपरि था। दोनों बेटे आया के भरोसे पल रहे थे। कहते हैं ना देंगे वही जो पाएंगे इस जहाँ से हम। माँ के पास बेटों के लिए कोई समय न था। और जब बेटे बड़े हुए तो उन्हें माँ से कोई लगाव न था।

रेवा एक सफल चित्रकार थी, पर उसने अपने बेटे के लिए अपने शौक, अपने करीर, को खुशी खुशी त्याग दिया। उस के बेटा और बहू उसपर जान छिड़कते। पोतों की देखभाल करते देख गिरिजा ने कई बार उसे झिड़का, की बच्चे तुम्हारे नही, बेटा बहू की ज़िम्मेदारी हैं। पर रेवा के विचार सुलझे हुए थे, वह अपनी बहू के साथ वह नहीं करना चाहती थी, जो उसके साथ हुआ। परवरिश का बच्चों पर बहुत असर पड़ता है। बेटा कबीर और बहू मानसी उसका बहुत ख्याल रखते। गिरिजा की बीमारी में भी उन्होंने उसकी बहुत सेवा की, जबकि उसका अपना बेटा बहू बस खाना पूरी करने के लिए अस्पताल पहुँचे।

बच्चे की परवरिश ही बच्चे के विचार उसका आचरण तय करती है। जिम्मेदारियों से फारिग हो रेवा ने फिर अपने पुराने शौक पेंटिंग को अपनाकर जीवन की दूसरी पारी आरंभ की।

इस कहानी की नायिका निधि है, पर इसकी जगह आप कोई भी नाम सोच लीजिये, क्योंकि यह कहानी एक स्त्री की है। माँ बनने की खुशी से ओत प्रोत निधि, पहले ही नौकरी और परिवार के प्रति उत्तरदायित्वों के पाटों के बीच पिस रही थी। दोनों खेमों में बंटी हुई, कहीं भी अपना 100 प्रतिशत नहीं दे पा रही थी। बेटे आरुष का आगमन कई नई चुनौतियाँ लेकर आया। हर पल किसी इम्तिहान सा प्रतीत होता है, और हर इम्तिहान में भरसक कोशिशों के बाद भी वह खुद को पिछड़ा पाती। वह फिर भी बुलंद हौसले और संकल्प लिए, मातृत्व के सुख से सराबोर, आश्वस्त, एवं अनुग्रहित थी। बेटे आरुष की देखभाल को लेकर बुआ दादी की टिप्पणी समस्या को सुलझाने की बनिस्बत,उसके लिए और अधिक मुश्किलें खड़ी करने के मक़सद से होतीं। ऐसे में समयाभाव की शिकायत हमेशा मुँह बाए खड़ी रहती। उसी में बेटे की शिकायत भी जुड़ गई। उसपर पैरेंट्स टीचर्स मीटिंग। हर जगह भला कैसे मौजूद रह सकता है कोई।

आखिर बच्चों की ज़िम्मेदारी माँ की ही चिंता का विषय क्यों। पिता का भी तो कोई दायित्व है। पति एक जिम्मेदार पिता क्यों नही बन सकता। बस इतना ही पूछा था निधि ने। और पती पत्नी के रिश्तों में कड़वाहट आ गई। बच्चे के बहाने स्त्री का सदैव ही भावनात्मक सोशण होता रह है। आवेश में लिए गए निर्णयों से, जीवन में एक खटास, एक अधूरापना पनपने लगता है। निधि ने नौकरी छोड़ दी। फलस्वरूप वह परिवार में बंधती गई। घर की सारी जिम्मेदारियाँ उसपर लाद दी गईं। बेटा भी यार दोस्तों में मशगूल हो गया। समाज ने माँ की ऐसी छवि गढ़ दी है की हर स्त्री उस साँचे में फिट होना चाहती है। त्याग वह करती है, पर उपलब्धियाँ दूसरों के हिस्से आती है। निधि के पती एक नामी कंपनी के डाइरेक्टर बन गए।बेटे का नामी कॉलेज में दाखिला हो गया। प्रश्न है की अपने जीवन के सारे क्रेडिट कार्ड्स खोकर, अपनी उपलब्धियों का खाता शून्य कर उसे क्या मिलता है। क्या यह ज़रूरी था। एक बहुत ही खूबसूरत नोट पर प्रभाजी कहानी का अंत करती हैं। “अब समर्पण और पराजय नहीं दोष और अपराधबोध नही, पूरे आत्मबल और विश्वास के साथ जीना सीखना होगा हर माँ को। अपने अरमानों, सपनों का उत्सव मनाएगी, न कि कंधों पर उनकी गठरी टाँग कर, मातम और शहादत। उसकी मुस्कान असली होगी, और आँखों में आँसू नहीं संकल्प और हौसले होंगे। इसी दृढ़ता के साथ निधि एक उच्च कंपनी में आवेदन देकर, अपनी दूसरी पारी की शुरुआत करती है। एक सकारात्मक दृष्टिकोण संप्रेषित करती सशक्त कहानी।

एक स्त्री को सबसे अधिक ज़रूरत होती है प्रेम, सहयोग, आदर और कंसर्न की। बिना इनके जीवन एक मरुस्थल बन जाता है। इस कहानी के तीन मुख्य पात्र हैं अंजलि, तेजसिंह और दिशा।

अंजलि एक कामवाली बाई है। अपने जीवन से खुश। क्योंकि उसके हर निर्णय में उसका परिवार हर पल उसके साथ था। साथ में खाना, साथ में घूमने जाना और शाम को साथ में टीवी देखते हुए पूरा परिववर पेपर बैग बनाता, जिससे अतिरिक्त आय हो जाती। रिशतेदारों ने शुरू में ऐतराज किया तो लड़ गई थी सबसे। दिशा सोचती कि कम पढ़ी लिखी अंजलि सीमित आय में भी कितनी खुश है, क्योंकि उसके साथ उसका परिवार खड़ा है। स्वयं की इच्छाएँ दबाते दबाते वह एक कठपुतली बन चुकी थी। मिट्टी की कला कृतियाँ बनाना,संगीत, नृत्य का शौक था उसे। पर उसके सारे हुनर परिवार की इच्छा अनिच्छा की भेंट चढ़ते गए, और वह अपने सारे क्रेडिट कार्ड्स खोती गई। कट्टर मानसिकता वाले परिवेश में उसका दम घुटता था। पर उसने कभी आवाज़ नहीं उठाई, कभी अपने लिए नहीं लड़ी।

ग्यारवी पास तेजसिंह दूध अपना दूध का जमा जमाया कारोबार छोड़कर चंडीगढ़ चला जाता है, क्योंकि उसकी पत्नी सुरजीत पीएचडी करना चाहती थी। एक तरफ यह कम पढ़ा लिखा सरदार था, जिसके लिए अपनी बीवी की खुशियाँ सर्वोपरि थीं, और एक तरफ दिशा का पति जो एक बड़ा अधिकारी था, पर पत्नी की खुशियों की जिसके लिए कोई अहमियत न थी।

पर उसका हुनर बेटी से छिपा नहीं रहता। फिर वही उसे प्रोत्साहित कर उसके खोये हुए क्रेडिट कार्ड्स दिलवाती है। और दिशा ज़िंदगी की दूसरी पारी के लिए, अपने नए पंखों से उड़ान भरने को तैयार हो जाती है।

जब भी पति पत्नी में उत्तरेदायित्वों को लेकर टकराव होता है, और समाधान नौकरी पर आकर फंस जाता है, तो क्यों एक स्त्री को ही त्याग करना पड़ता है।

वैदेही बहुत ही लोकप्रिय स्त्री रोग विशेषज्ञ थी। पर पति के कहने पर उसे अपने लकवाग्रस्त ससुर की देखभाल करने के लिए, मजबूरन अपनी मर्ज़ी के खिलाफ अपनी प्रैक्टिस छोडनी पड़ती है। क्यों हर बार पुरुष स्त्री से ही त्याग की अपेक्षा करता है। वैदेही अपने पति से अधिक कमाती थी, अधिक व्यस्त रहती थी। पर पुरुष अहम के आगे उसे ही झुकना पड़ा। पुरुष दरअसल स्त्री के झुकने को उसका त्याग नहीं कमजोरी समझता है, जब की सच तो यह है, कि वह सुकून और मन कि शान्ति चाहती है। फिर वही हुआ जो हर घर में होता है। जितना उसने घर को संभाला, वह और घिरती गई। एक एककर उसकी उपलब्धियों के सारे क्रेडिट कार्ड्स गुम होते गए। हर माह दो तीन लाख कमानेवाली वैदेही का बैंक बैलेन्स ज़ीरो होता गया। बच्चों की पढ़ाई, ससुर की बीमारी और घर की जरूरत पूरी करते करते वह खाली होती गई। उसकी भावनाओं के, उसकी हैसियत, उसके सपनों, उसके श्रम के सारे क्रेडिट कार्ड्स खो गए। दूसरी पारी की कोशिश में वैदेही अस्पताल के एड्मिनिसट्रेशन से जुड़ गई, इस उम्मीद में कि शायद एक दिन औजारों से फिर वही पुराना रिश्ता कायम हो सके।

आभासी दुनिया, यानी सोशल प्लैटफ़ार्म सदा विवादों से घिरा मुद्दा रहा है। कुछ के लिए परस्पर हौसला अफजाई, कुछ के लिए समय की बरबादी। इतना जुड़ जाते हैं हम इस आभासी दुनिया से की वास्तविक रिश्ते हमारे जीवन में गौण होने लगते हैं। पर यही दुनिया कभी किसी के जीने का सहारा भी बन सकती है। इस आभासी दुनिया के आभासी रिश्ते कभी कभी वह पतवार बन जाते हैं, जो अवसाद के दलदल में फंसी जीवन की नाव को एक रवानी, एक दिशा देते हैं। बेटों के जन्म के बाद शिवानी ने एक उज्ज्वल भविष्य को तिलांजलि दे दी और उसकी ज़िंदगी इन्ही के इर्द गिर्द सिमटकर रह गई। बड़े होकर बेटों ने विदेश में सैटल होकर वहीं प्रेम विवाह कर लिया।जिनके लिए अपना जीवन होम कर दिया, उन्ही के जीवन में अपना कोई महत्व न देख, एक खीज एक वितृष्णा उसके मन में पैठ गई।और वह दुनिया से विलग अपने ही खोल में घुस गई। उसे ज़िंदगी से, सबसे नफरत हो गई। न किसी से मिलना, न बोलना। कहानी के नायक अजय ने उसकी बीमारी पहचान, उसके अकेलेपन को दूर करने के लिए उसे सोशल मीडिया से जोड़ा। जहाँ उसके असंख्य मित्र बन गए और वह अपने खोल से निकल, अपनी एक पहचान बना, उपेक्षा के अकेलेपन से उबर पायी।

इस कहानी में एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया है। हम अपने बच्चों को चाँद दिखाते हैं, और जब वे वहाँ पहुँच जाते हैं, तो हमें शिकायत रहती है, कि वे हमसे दूर हो गए। और उनसे रखी उम्मीदें हमारे दर्द की वजह बन जाती हैं। ऊँचे सपने दिखाने से पहले, हमें यह सोचना है कि क्या हम इस सच्चाई को स्वीकार करने के लिए तैयार है। चुनना हमें है।

कभी कभी परिस्थिति वश भी क्रेडिट कार्ड्स गुम हो जाते हैं। देविका के पास हर वह सुख था जो कोई चाह सकता है। एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नृत्यांगना, ससुराल और मायके में सब की चहेती। पर जब एक मंदबुद्धि बेटी का जन्म हुआ, तो वही उसकी प्राथमिकता बन गई। नृत्य को तिलांजल दे वह उसकी परवरिश में जुट गई। शनै: शनै: वह खुशियाँ वह शोहरत जिसपर उसका हक़ था, उससे दूर हो गई। जिस सम्मान के लिए उसने इतना श्रम किया था, वह छिटककर उसकी प्रतिद्वंदी का मान बढ़ा रहा था। शून्य में खड़ी देविका ने स्वयं अपने सारे क्रेडिट क्कर्ड्स गँवा दिये थे।

एक माँ अपनी खुशी से अपने बच्चों के लिए त्याग करती है। हालांकि इससे उसके अपने क्रेडिट्स और उपलब्धियाँ नगण्य हो जाती है। पर जब वही बच्चे उसकी उपेक्षा करते हैं, उसकी तपस्या को खारिज कर देते हैं, तब या तो वह किरच-किरच बिखर जाती है, या सारी ताक़त जुटा, एक और पारी,एक और युद्ध के लिए फिर सजग हो जाती है। अवनी ने अपने पोते ऋत्विक और पोती रेशु को पालने में कोई कसर न छोड़ी, पर जब उन्होंने जब महमानों के समक्ष अपनी दादी को अपने हुनर, अपनी उपलब्धियों का श्रेय दिया तो रिया और रोहन को यह बहुत नागवार गुज़रा। जिस अवनी ने अपने मोटी तंख्वाह को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया था की उसकी अनुपस्तिथी में उसके तीन साल के बेटे रोहन की देखभाल ठीक से नहीं हो रही थी, जिसने अपने सारे क्रेडिट कार्ड्स खुद अपनी मर्ज़ी से गँवा दिये थे, आज बच्चों द्वारा उसीको क्रेडिट देना, उसके अपने बेटे बहू को इतना अखर गया था।

पहली बार अवनी को अपना हर निर्णय गलत, हर त्याग निरर्थक लगा। और उसने अपना बचा खुचा जीवन एक एनजीओ को समर्पित करने का निर्णय ले लिया। इस कहानी का ट्रीटमंट इसे खास बनाता है। अगर अवनी चुपचाप इसे स्वीकार कर लेती, तो यह कहानी एक आम मार्मिक कहानी बनकर रह जाती, पर शिवानी का कमजोर न होकर, अपने निश्चय के प्रति अटल होना, उसे एक सशक्त किरदार बनाता है। और कहानी को एक गहराई देता है। एक बेहतरीन कहानी।

गुमशुदा क्रेडिट कार्ड्स उस हुनर की आहुति है जो कर्तव्यों के यज्ञ ने माँगी। जहाँ स्त्रियों ने एक मुकम्मल पहचान होने के बावजूद, गुमनामी चुनीं, पर फिर हिम्मत बटोरी, कमर कसी, और उस दौड़ का हिस्सा बनने की जद्दोजहद में लग गईं, जिसमें बहुत पीछे छूट चुकीं थीं। गुमशुदा क्रेडिट कार्ड्स, कहानियाँ हैं उन स्त्रियों की जिन्होने यातनाएँ और अपमान सहे, पर अतत:, फीनिक्स की तरह अपने द्वारा बुझाये हुए शोलों की राख़ से फिर उठ खड़ी हुईं, और पंख पसार कर उड़ान के लिए उध्यत हुईं।

संग्रह के विषय ने इसे संग्रहणीय बना दिया है। गुमशुदा क्रेडिट कार्ड्स से जुड़ी सभी लेखिकाओं एवं इसकी संपादक, नीलम कुलश्रेष्ठ जी को इस अनुपम कृति के लिए बहुत बहुत बधाई।

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