प्रकाश मनु सर जब ‘साहित्य अमृत’ के संयुक्त संपादक बनकर आए!

प्रेमपाल शर्मा

संस्मरण: प्रेमपाल शर्मा


बाल जगत की मासिकी ‘नंदन’ के संपादकीय विभाग को दशकों तक पुष्पित-पल्लवित करने वाले तथा बाल साहित्य के मूर्धन्य लेखक प्रकाश मनु जी का परिचय देना तो वैसा ही है, जैसे दिनकर को दीप दिखाना। बहुत से लोग उन्हें उनकी रचनाओं के माध्यम से जानते हैं, और अधिकतर समकालीन साहित्यकार ऐसे हैं, जो किसी न किसी मंच पर उनका सान्निध्य, स्पर्श और स्नेह पा चुके हैं। मेरे पुण्य कर्मों का परिणाम रहा कि मुझे उनकी निकटता पाने, उनसे सीखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जब वे हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘साहित्य अमृत’ के संयुक्त संपादक बनकर प्रभात प्रकाशन संस्थान में आए। अपने कार्य के प्रति उनकी लगन तथा कर्तव्यपरायणता देखकर मैं तो दंग रह गया।

मैं जब पत्रिका कार्यालय पहुँचता, तो मनु सर को हमेशा पहले से ही काम में जुटा हुआ पाता। नित्य आने वाली रचनाओं को पढऩा, उन्हें यथास्थान रखना, अलग-अलग अंकों के लिए समायोजित करना, जरूरत के अनुसार लेखकों से रचनाएँ मँगवाना इत्यादि सब काम वे इस तल्लीनता के साथ करते कि उनके आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ से कोई कितनी बार निकल जाए, उन्हें पता ही नहीं चलता था।

हम लोगों ने पहली बार जाना कि काम को किस प्रकार से व्यवस्थित किया जाता है। इनके पूर्ववर्ती जितने संयुक्त संपादक रहे, सब के सब निष्क्रिय और नाम को ढोने वाले ही थे। वे लोग हमसे दूरी बनाकर रखते थे, मिलते भी तो अफसरी अंदाज में। पर मनु सर तो अपने अधीनस्थों से इतनी आत्मीयता और मधुपगी वाणी में नित्य ही बात किया करते थे। चल रहे काम में मार्गदर्शन करते, उनके स्नेहसिक्त व्यवहार के बारे में क्या कहूँ, जब सर चाय भी पीते तो हमें बड़े प्यार से एक-एक बिस्कुट जरूर खिलाते थे।

मनु सर प्रूफों की रीडिंग इतनी बारीकी से करते कि तथ्यात्मक, वर्तनीगत आदि गलतियाँ तो छोड़ो, कहीं कॉमा की गलती छूटने की भी कोई गुंजाइश न रहती। सायं में जब हम छुट्टी कर घर जाते, तब भी मनु सर काम में मुस्तैदी से जुटे रहते। दीदी (मनु सर की बिटिया) का बार-बार फोन आता तो कहते, “हाँ, बस निकल रहा हूँ।” दीदी कुछ देर बाद फिर फोन करतीं, सर फिर वही उत्तर देते, “हाँ-हाँ, बस निकल ही रहा हूँ।” मैं खुद भी कभी-कभी कहता, “सर, आप जाइए, मैं कल आकर इसे देख लूँगा।”

काम के प्रति ऐसे जुनून को देख, मैं तो इस नतीजे पर पहुँचा कि मनु सर रात को भी शायद ही सो पाते हों। हमारे आदरणीय संपादक त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी जी की हस्तलिपि काफी हद तक पढ़ने में नहीं आती। संपादकीय पढ़ते समय मैं खीज जाता था और सर से शिकायत के लहजे में कहता कि ताऊ जी (प्यार से हम उन्हें ताऊ जी कहते हैं) बहुत गंदा लिखते हैं। तब मनु जी मेरा एक हाथ अपने हाथ में लेते हुए बड़े इत्मीनान से कहते, ‘अरे, तो क्या हुआ? हम भी भूत हैं, कैसा भी लिखें, सब ठीक कर देंगे।’

मनु सर मेरे पढ़ने के बाद स्वयं पढ़ते, वाक्यों को इस सिलसिलेवार धाराप्रवाह कर देते कि पढ़ने में विभ्रम और अटकाव की कोई गुंजाइश न रहती। कभी-कभी मुझे बुलाकर उन वाक्यों को दिखाते भी और कहते कि देखो, इसे इधर से उधर करें तो कैसा रहे? संपादक जी का संपादकीय लेख मैं आज भी पढ़कर दुरुस्त करता हूँ, अब मुझे खीज नहीं होती, ‘भूत’ जो बन गया हूँ। इस उम्र में इतना मेहनती और काम को जुनून की हद तक करनेवाला व्यक्ति इससे पूर्व मेरे व्यवहार में नहीं आया था।

प्रकाश मनु
मनु सर शब्दों का प्रयोग बड़ा सोच-समझकर करते थे। मैं निरंतर उनकी बातों को ध्यान में रखकर काम करता और बाद के दिनों में तो सर मेरे ऊपर पूरा-पूरा भरोसा करने लगे थे। कई बार फरीदाबाद से ही फोन पर कह देते, “प्रेमपाल जी, उस प्रूफ को आप ही एक बार और देख लेना।” मैं हमेशा कोशिश करता कि सर को मेरे काम से निराशा न हो।

अपने आने के पहले ही महीने से मनु सर ने पत्रिका की सूरत-सीरत दोनों बदल दीं। उनके संपादन में निकले अंक एकदम अलग ही नजर आते हैं। ऐसे सर्वांग सुंदर अंक न उनसे पहले कभी निकले और न बाद में। कितने ही नए कवि-साहित्यकारों को उन्होंने ‘साहित्य अमृत’ से जोड़ा। प्रूफ और मैटर की सैटिंग तो छोड़ो, पत्रिका का कवर (मुखपृष्ठ) जब तक उनकी नजर में खरा न उतरता, तब तक उसमें संशोधन और बदलाव करवाते, इशारे से ही बता देते कि यहाँ थोड़ा लाइट कलर रखें तो कैसा रहे। हमारे सीनियर आर्टिस्ट मनोज गुप्ता जी उनकी हर बात, हर सुझाव पर गौर करते। मनु सर के सान्निध्य में हमारी पूरी टीम ऊर्जा से लबालब रहती। कारण कि मनु सर सबको प्रोत्साहित-प्रेरित करते थे। आज भी सब उन्हें बड़ी शिद्दत से याद करते हैं।

मनु सर आगामी चार महीने की सामग्री का समायोजन कर अलग-अलग फोल्डर्स में रख दिया करते थे। कलेवर की विविधता ऐसी होती कि लगभग सभी विधाओं की रचनाएँ उसमें रहतीं। मनु सर किसी रचना का चयन उसके स्तर एवं पठनीयता को देखकर ही किया करते थे। लेखक या रचनाकार कितने भी ऊँचे कद का या वरिष्ठ होता, अगर उसकी रचना या आलेख पत्रिका के स्तर का न होता तो उसे स्पष्ट, पर मुलायमियत से मना कर देते।

एक बार का वाकया मुझे याद है कि यू.के. के जाने-माने कथाकार कृष्ण कुमार भारत आए हुए थे, तो हमारे कार्यालय में भी आए। उन्होंने एक कहानी ‘साहित्य अमृत’ में प्रकाशन के लिए दी। मनु सर ने वह कहानी पढ़ी और बिल्कुल पसंद नहीं आई। सर ने उसी समय कह दिया, “कृष्ण कुमार जी, आप बहुत अच्छे लेखक हैं, पर यह कहानी ‘साहित्य अमृत’ के लायक नहीं है। कृपया आप कोई दूसरी कहानी भेजिएगा।” सामने ही बैठे हमारे प्रबंध निदेशक यह देखकर अवाक् रह गए।

जो व्यक्ति ईमानदार एवं अपने कार्य के प्रति समर्पित होता है, वह निडर होता है। मनु सर कितने उदार और सहनशील तथा संयत रहनेवाले इनसान हैं। एक बार मैंने मनु सर का क्रोधित रौद्र रूप भी देखा। प्रकाशित होनेवाले अंक की सर सूची बना दिया करते थे। सामान्यतया उसमें कोई हेर-फेर नहीं करते थे, न करने देते थे। हुआ यों कि प्रभात कुमार जी (हमारे बॉस) ने उसमें एक नई रचना मुझे कहकर जुड़वा दी। मनु सर को यह बात नागवार गुजरी। उन्होंने मुझे बुलाकर पूछा कि इसमें यह छेड़छाड़ किसने की है? मैंने सहजता से बता दिया कि प्रभात सर ने यह किया है।

मनु सर बड़े गुस्से में उन्हें सुनाते हुए मुझसे डाँटने के अंदाज में बोले कि “प्रभात जी कौन होते हैं इसमें दखल देने वाले। उनकी हिम्मत कैसे हुई यह सब करने की?”

हालाँकि प्रभात जी तीन फीट की दूरी पर ही बैठे अपनी टेबल पर काम कर रहे थे। मैं तो समझ ही रहा था कि मनु सर मेरे माध्यम से उन्हें ही सुना रहे हैं। डेढ़ साल के समय में मैंने पहली बार मनु सर को क्रोध करते हुए देखा था। 
कुछ घंटों बाद मौका देखकर प्रभात सर ने मुझे अपने कैबिन में बुलाया और पूछा कि तुम्हारे गुरु जी क्या कह रहे थे? मैंने कहा कि आप सुन तो रहे थे। फिर हँसते हुए बोले, “प्रेमपाल जी, आप सँभाल लेना, अब मैं कोई दखल नहीं दूँगा। मनु जी तो कभी क्रोधित नहीं होते, पर आज अचानक इतना गुस्सा...!”

इसके बाद तो प्रभात सर किसी की कोई रचना छपवाते तो मनु सर को आग्रहपूर्वक सौंप देते थे। उस दिन हमारे ऑफिस के बहुत सारे कर्मचारियों ने लंच समय में मुझसे कहा कि भाई, आज तो सच में बहुत मजा आया। जो सबको डाँटता है, आपने उसी को डाँट पिलवा दी।

मनु सर परदुखकातर इतने हैं कि उन्हें अपने कष्ट-तकलीफ की जरा भी फिक्र नहीं होती। दूसरों के कष्ट देखकर-सुनकर ही द्रवित हो जाते हैं। अपने अधीनस्थों को पितृ-गुरु तुल्य प्यार करते हैं। बरसात के दिनों में मनु सर एक जोड़ी कपड़े अपने थैले में डालकर चलते हैं। एक बार हमारा और मनु सर का प्यारा कंप्यूटर ऑपरेटर बाइक पर ऑफिस आते हुए भीग गया। वह सर के आगे से नमस्ते कर, वॉशरूम की तरफ जा रहा था कि देखते ही तुरंत बोले, “अरे बेटा मुकुल, तुम तो पूरे भीग गए। सुनो!” और अपने थैले से कुरता तथा पेंट निकाली, “लो, शर्ट उतारकर कुरता पहन लो, पैंट तो तुम्हारे आएगी नहीं।”

मुकुल संकोचवश मना करने लगा, पर मनु सर ने प्यार-मनुहार कर उसे कुरता पहना दिया, तब उन्हें कुछ चैन मिला। मनु सर का कोई प्रसंग आने पर मुकुल आज भी उनके बारे में बातें करता है तो इतना ही कहता कि मेरे घर-रिश्तेदार आदि में भी ऐसा कोई व्यक्ति नहीं, जो दूसरों से इतना निस्स्वार्थ स्नेह करता हो। मनु सर एकदम अलग तरह के इनसान हैं—दयालु, परोपकारी, हर किसी की मदद के लिए तत्पर।

हर किसी की मदद करना मनु जी का स्वभाव है। कहा जाता है कि लेखक-कवि बड़े भावुक और सहृदय होते हैं, पर मनु जी से ज्यादा नहीं। नए लेखकों को प्रोत्साहित-प्रेरित कर उनको निखारना, उनकी प्रतिभा को चमकाना, उसकी रचना की सराहना कर उसे और अच्छा लिखने के टिप्स देना, यह सब वे बिना किसी अपेक्षा के निःस्वार्थ भाव से करते हैं।

मनु जी शायद वर्ष 2013 के जून महीने में हमारे यहाँ आए थे। मैं जुलाई में उसी वर्ष पहली बार जगन्नाथ पुरी रथयात्रा में गया था। पहली बार मैंने उस यात्रा का विवरण लिखने की कोशिश की। मनु जी ने उसे पढ़कर ढंग से तराशा तो वह बहुत अच्छा बन गया। ‘साहित्य अमृत’ में प्रकाशन के बाद उस पर बहुत सारे पाठकों की प्रतिक्रियाएँ आईं। मैं भी प्रशंसा भरे फोन सुन-सुनकर फूला न समाया। कुछ महीनों बाद मनु जी ने मुझे टोका कि “प्रेमपाल जी, आपने और भी यात्राएँ की होंगी, उन पर लिखिए। आप तो बहुत अच्छा लिखते हैं। अब तक क्यों नहीं लिखा था?” मैंने कहा कि “सर, मैं जब दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ रहा था, यानी 1985 में अयोध्या गया था, और तो मैंने कोई यात्रा नहीं की।”

मनु जी बोले कि उसकी कुछ तो स्मृति होगी। मैंने कहा, “हाँ सर, समृतियाँ तो ताजा हैं।” मनु सर तुरंत बोले, “तब तो फौरन लिख डालो।” मैंने वह यात्रा-वृत्त ठीक तीस वर्ष बाद 2015 में लिखा तो मनु जी ने उसे ‘साहित्य अमृत’ में छापा। बहुत सारे पाठकों की प्रतिक्रियाएँ आईं। तब से मुझे भी लिखने का थोड़ा चस्का लग गया।

मैं किसी यात्रा पर जाता हूँ, तो यात्रा से आते ही मनु जी तकादा शुरू कर देते हैं, “प्रेमपाल जी, इसे तुरंत लिख डालो, देर होगी तो बात नहीं बनेगी।” मनु जी के मार्गदर्शन और प्रोत्साहन से अब तक मैं तेरह-चौदह यात्रा-संस्मरण लिख चुका हूँ। मनु जी ही मेरे प्रथम पाठक और आलोचक हैं। छपने से पूर्व मैं अपनी रचना मनु जी को अवश्य भेजता हूँ। मनु जी ने अपने कंप्यूटर में मेरे नाम से एक फोल्डर बना लिया है। कितने भी व्यस्त रहें, लेकिन मेरी रचना पढ़कर उस पर टिप्पणी अवश्य देते हैं।

मनु जी की व्यस्तता को देखते हुए भी मैं महीने में एक बार उनसे बात जरूर करता हूँ। वह भी तब, जब ‘साहित्य अमृत’ का नया अंक उनके पास पहुँच जाता है। मनु जी उसकी अच्छाई और कमियाँ, दोनों बेबाकी से बताते हैं। खास अवसर पर मुझे कोई खास रचना चाहिए होती है तो मैं हमेशा मनु जी से ही आग्रह करता हूँ। वे उतनी ही तत्परता से अपने संपर्कों से अभीष्ट रचना भिजवा देते हैं। अपना लेखन-कार्य तो संभवत: सभी लेखक करते हैं, परंतु जो दूसरों को प्रोत्साहित कर सच्चा मार्गदर्शन करते हैं, वे गिनती के ही हैं। और मनु जी जैसे साहित्य को पल-प्रति पल जीने वाले लेखक तो नाममात्र को ही होंगे।

आज के वातावरण में जहाँ लेखक-संपादक झूठी-सच्ची प्रशंसा-सम्मान पाने के लिए इतने लालायित रहते हैं कि इधर-उधर की जुगाड़ बिठाते हैं, परंतु मनु जी इतने प्रसिद्ध-पराङ्मुख हैं कि कोई संस्था उन्हें सम्मानित करने के लिए आग्रह करती है तो उसे शुभकामना देते हुए विनयपूर्वक मना कर देते हैं। अधिक से अधिक समय अपने लेखन को देना चाहते हैं। मनु जी खूब मेहनत कर कार्य को सिरे चढ़ाते हैं। अगर उसमें कुछ चूक हो जाए तो उसकी जिम्मेदारी स्वयं लेते हैं और उस कार्य को सराहना मिले तो उसका श्रेय अपने अधीनस्थों को देते हैं।

सभी लोग जानते हैं कि उनके कार्यकाल में ‘साहित्य अमृत’ के जो उत्कृष्ट अंक निकले, उनका श्रेय उन्हीं को जाता है। पर जब मनु सर ‘साहित्य अमृत’ के कार्य से मुक्त हुए, तब हमारे आदरणीय संपादक जी ने ‘साहित्य अमृत’ की उत्कृष्ट सेवा के लिए उन्हें एक धन्यवाद-पत्र मेल किया। मनु सर ने उसके आभार में जो पत्र हमारे बॉस को भेजा, उसे पढ़कर मैं इतना भाव-विह्वल हुआ कि अपने आँसू न रोक सका। उन्होंने लिखा था, “प्रभात जी, ‘साहित्य अमृत’ में मेरे रहते हुए अगर कुछ अच्छा हुआ तो इसका श्रेय प्रेमपाल जी और मुकुल को जाता है। मैं तो आते हुए ठीक से इन दोनों का धन्यवाद भी नहीं कर पाया।” आज कहाँ देखने में आती है ऐसी प्रसिद्धि-पराङ्मुखता!

मनु सर को मैं अपने गुरु के रूप में देखता हूँ। वही मेरे सच्चे साहित्यिक गुरु हैं। लेखन के क्षेत्र में मुझे उँगली पकड़कर चलाया और फिर सरपट दौडऩा सिखाया। आज की भागमभाग वाली जिंदगी और प्रतियोगी वातावरण में किसको किसकी पड़ी है। सब अपने आपको व्यवस्थित करने, निखारने में लगे हैं, पर शरीरधारी कुछ पवित्र आत्माएँ ऐसी हैं, जो जमाने की बुराइयों से कोंसो दूर हैं, मनु सर उनमें से एक हैं। प्रसिद्ध संत कवि सुंदरदासजी ने यह दोहा शायद मनु जी के लिए ही कहा है, ‘सद्गुरु सुधा समुद्र है, सुधामयी हैं नैन, नख-शिख सुधा स्वरूप पुनि, सुधा सु बरसत बैन।’

विद्वानों ने शिष्य शब्द को परिभाषित किया है, ‘जो गुरु की शिक्षा-विद्या को सहस्र गुना आगे बढ़ाए, वही है शिष्य।’ मैं आज भी मनु सर का शिष्य बनने की कोशिश कर रहा हूँ। उनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर केंद्रित अंक निकाला जा रहा है। यह अत्यंत स्वागतयोग्य कदम है। यह होना ही चाहिए। लेखक-कवि तो प्रशंसा के पादप होते हैं, उन्हें सराहना-प्रशंसा के जल से जितना सींचा जाता है, वे उतने ही पुष्पित-पल्लवित होते हैं। इस पावन अवसर पर मैं प्रकाश मनु सर का वंदन-अभिनंदन करता हूँ। मेरी एक ही अभिलाषा है कि ईश्वर उन्हें स्वस्थ-नीरोग एवं कलम का धनी बनाए रखे।
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‘साहित्य अमृत’, 4/19 आसफ अली रोड, नई दिल्ली-110002,
चलभाष: 9868525741


1 comment :

  1. ‘सेतु’ के सितंबर 2023 अंक में प्रकाशित आदरणीय प्रेमपाल जी का संस्मरण पढ़ा। मन आनंद से भर गया। बहुत सुंदर, संतुलित और सारगर्भित। ऐसा संस्मरण केवल वही व्यक्ति लिख सकता है, जो प्रकाश मनु जी को बहुत करीब से जानता हो, जिसने उनके भाव संवेदन को महसूस किया हो और जो उनके सानिध्य के ताप में तपा हो।
    आदरणीय प्रेमपाल जी ने बिल्कुल मेरे मन के भावों के अनुकूल लिखा है। मनु जी के उदार व्यक्तित्व को ठीक ऐसा ही मैंने अनेक बार महसूस किया है। पर सच्चाई यह है कि मनु जी का उदार व्यक्तित्व इससे कहीं आगे का और बड़ा व्यक्तित्व है। मनु जी अपने सम्पर्क में आने वाले हर पाठक को, सामाजिक व्यक्ति को और नौसीखिए लेखकों को हर दृष्टि से संपूर्णता देने का सतत प्रयास करते हैं। मनु जी केवल औपचारिकता के लिए सामने वाले से नहीं जुड़ते बल्कि उनके सानिध्य में पिता तुल्य संरक्षण है, गुरु जैसा मार्गदर्शन है और मां जैसा निर्मल ममत्व है।
    प्रेमपाल जी ने बड़ी बेबाकी और सहृदयता से मनु जी के पत्रकार पक्ष को उभारा है। इसमें मनु जी की कार्य शैली, उनके श्रम साधना और साहित्यिक सरोकार स्पष्ट नजर आते हैं। मनु जी दिखने में जितने सहज -सरल हैं, वैचारिक रूप से उतने ही दृढ़ और स्वाभिमानी हैं। वे अपने ही मूल्यों और शर्तों पर काम करने वाले हैं। अपने कार्य में अनावश्यक हस्तक्षेप उन्हें कतई पसंद नहीं है। वे एक पत्रकार और संपादक की गरिमा खूब समझते हैं। ’साहित्य अमृत' में आकर उन्होंने साहित्य और पाठकों पर बड़ा उपकार किया है। स्नेही प्रकाश मनु जी अपने कष्टों में खुद ही जीने वाले हैं, वे अपनी पीड़ा का एहसास दूसरों को नहीं होने देते। और हाँ, इस दौरान भी अपने कार्य को उसी अनुशासन और नियमितता से करते हैं। वे अपने किए गए कार्यों का श्रेय खुद न लेकर दूसरों को देकर आनंदित होते हैं।
    यह प्रकाश मनु जी की उदात्तता ही है कि वे चक्काचौंध वाली, दिखावे और भीड़भाड़ वाली आभासी दुनिया से हमेशा दूर रहे हैं। संपादक के रूप में प्रकाश मनु जी का आदर्श व्यक्तित्व हम सभी के लिए प्रेरणा स्रोत है।
    ऐसे अनूठे साहित्यिक आदर्श से जुड़ना, उनका सानिध्य और आशीष पाना
    ईश्वरीय प्रसाद से काम नहीं है। ईश्वर उन्हें दीर्घायु और अच्छी सेहत प्रदान करें। मनु जी सहित प्रेमपाल जी को बहुत बहुत शुभकामनाएँ।

    डॉ अशोक बैरागी

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