पर्यावरणीय संवेदना और हिंदी साहित्य

सूर्यकांत शिंदे 

हिंदी विभागाध्यक्ष, लोकमान्य महाविद्यालय, सोनखेड जिला नांदेड
ईमेल: suryakantshinde03@gmail.com
चलभाष: 8208691286

प्रस्तावनाः

पर्यावरण का असंतुलन वर्तमान दौर में संपूर्ण विश्व के लिये सबसे बड़ी समस्या है। इस समस्या को दूर करने के लिए हर देश प्रयत्नशील है। भारत भी इस समस्या से अछूता नहीं है। पिछले कई वर्षों से भारत में भी लगातार जल, वायु और मृदा की स्वच्छता में गिरावट देखी जा रही है। लगभग विश्व के सभी देशों के सामने ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की समस्या खडी है। आज ‘भूमंडलीकरण और उदारीकरण’ के नाम पर जो विकास का तांडव फैला है वह विनाश का कारण बन रहा है। लगातार आधूनिकीकरण, नगरीकरण, और औद्योगीकरण ने पर्यावरण असंतुलन को सबसे ज्यादा बढाया है। औद्योगीकरण, नगरीकरण के साथ-साथ विशालकाय मिल, फैक्टरी, कारखाने भी स्थापित हुए, जिसके परिणाम स्वरूप कृषि में विज्ञान का प्रवेश हुआ। इन सबने इन्सानों की भोगवादी प्रवृत्ति से मिलकर प्राकृतिक पर्यावरण को नष्ट-भ्रष्ट करके विश्व को इस संकट के करीब लाकर खड़ा कर दिया है। 

देखा जाए तो हिंदी साहित्य के आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक के साहित्यकारों ने पर्यावरण को विशिष्ट स्थान दिया है। पर्यावरण संवेदना की समृद्ध परंपरा हमारे साहित्य में रही है। प्रसिद्ध कवि रूपेश कनौजिया की पंक्तियाँ है...
 प्रकृति तो हमेशा ही मेरी माँ जैसी है, 
 गुलाबी सुबह से माथा चूम कर हँसते हुए उठाती है। 
 गर्म दोपहर में उर्जा भर के दिन खुशहाल बनाती है, 
 रात की चादर में सितारे जडकर मीठी नींद सुलाती है, 
 प्रकृति तो हमेशा ही मेरी सुंदर माँ जैसी है।

पर्यावरण के संदर्भ में हमारा संवेदनहीन होते जाना ही पर्यावरण के संकट को जन्म दे रहा है। आज हमारा लगाव न तो नदियों से है, न पशु पक्षियों से है, न हवाओं से क्योकि अब हमारे अंदर ही पशुओं ने जन्म लिया है। ऐसी परिस्थिति में एक साहित्यकार का कर्तव्य बनता है कि हम प्रकृति से जुडे रहें। इसका अर्थ यह नहीं कि सर्दियों की रेशमी धूप में पिकनिक मनाना या किसी हिल स्टेशन पर जाकर किसी रिसोर्ट में रह आना भी प्रकृति से जुडना नहीं है। बल्कि प्रकृति के संवर्धन के लिए प्रयास की अपेक्षा है।

 आजकल अखबारों में बेहद चिंताजनक खबर आ रही है कि भारत में ‘गौरैया’ लगभग नष्ट होने जा रही है। एक समय हमारे घरों की छतों पर , मुंडेरों पर, घरों के झरोखों में, खिडकियों पर उसका अधिकार होता था। हम उसे मिट्टी के बरतन में पीने के लिए पानी रखते थे। लेकिन दुर्भाग्यवश आज उसका अस्तित्व ही संकट में आ गया है। अब हमने तो गौरैया को अपनी संवेदना से ही निकाल दिया है। ऐसी हालात में साहित्यकारों की अहम भूमिका होनी चाहिये परंतु दुर्भाग्यवश साहित्यकारों का ध्यान पर्यावरण से कटता जा रहा है। लेकिन एक तरफ भारत का किसान पढे-लिखे आदमी से कही ज्यादा ज्ञानी था। भले ही वह अशिक्षित था। हम सब जानते हैं प्रदुषण इस समय धरती की सबसे बडी समस्या है। कई सारे जीव-जंतुओं की प्रजातियाँ खत्म हो गई है। धरती को खोद-खोद कर खोखला कर दिया है। पहाडों के पत्थर, सीसा, कोयला, ताँबा सब कुछ मनुष्य हजम कर रहा है- तो हमारे सामने सबसे बडा प्रश्न है कि यह पृथ्वी कितने वर्षों तक बच पायेगी? इस पर गंभीरता से साहित्यकार को विचार करने की आवश्यकता है।

 अनादि काल से प्रकृति और मनुष्य कविता का प्रिय और मुख्य विषय रहे हैं। भारतीय साहित्य और दर्शन संपूर्ण रूप से पर्यावरण पर केंद्रित रहा है। मानव का प्रथम कर्तव्य होता है कि वह प्रकृति की रक्षा करें। प्रत्येक युग में साहित्यकारों ने अपने साहित्य में प्रकृति का गुणगान किया है। महाकवि तुलसीदास जी के रामचरितमानस में प्रकृति के साथ-साथ गंगा और सरयू नदी के माध्यम से पर्यावरण का चिंतन मिलता है। कविवर रहीम ने भी पानी के माध्यम से जीवन के तत्व का ज्ञान कराया है-
"रहीमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून!
 पानी गए न ऊबरे, मोती मानस चून!!"

यह पंक्ति वर्तमान संदर्भ में अधिक चरितार्थ और उपयुक्त है। जंगल काटने के कारण वन संपदा का दोहन तो हुआ ही है। जिससे जल और शुद्ध वायु पर भी गहरा प्रभाव पडा है। प्रकृति की छटा का सुंदर रूप मैथिलीशरण गुप्त जी ने साकेत, पंचवटी, सिद्धराज.यशोधरा आदि रचनाओं में किया है। रात्रिकालीन बेला की प्राकृतिक छटा का बडा ही मनोहारी वर्णन इन पंक्तियों में मिलता है-
 “चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही हैं जल थल में, 
 स्वच्छ चांदनी बिछी हुई है अवनी और अंबरतल में”

छायावादी कवि महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, जयशंकर प्रसाद और सूर्यकात त्रिपाठी निराला ने भी अपनी कविताओं में प्रकृति के रूपों का अनोखा वर्णन किया है। छायावदी कवियों की दृष्टि अपेक्षतया अधिक संवेदशील थी। इन कवियों ने निर्जिव प्रकृति में प्राण-प्रतिष्ठा करके प्रेम और सौंदर्य के भव्य धरातल पर प्रतिष्ठित कर दिया है। एक विद्वान आलोचक के शब्दों में- “पंत की कोमल कल्पनाओं ने प्रकृति के लहराते हुए अंचल को सुकुमार भावनाओं से भर दिया है, महादेवी की विरह-व्यथा पूर्ण पुकार ने क्षितिज तक फैली हुई रम्य वन-स्थली के कण-कण को प्रतिध्वनित कर दिया है और निरला को ओजपूर्ण 'बादलराग' ने प्रकृति के प्रतीकों द्वारा जन-जन की नई चेतना का उद्घाटन किया है।”

 सुमित्रानंदन पंत प्रकृति की सुंदरता में इतने मुग्ध हो जाते हैं कि उन्हे अपनी प्रेयसी का प्यार भी तुच्छ लगने लगता है-
 “छोड द्रुमों की मृदु छाया, तोड प्रकृति से भी माया, 
 बाले, तेरे बाल-जाल में, कैसे उलझा दूँ लोचन”

इस प्रकार कवि विशेष के हाथों पड़कर प्रकृति का रूप अथवा पक्ष विशेष ही उद्घाटित होता है। पंत को प्रकृति का सुकुमार कवि इसलिए कहा जाता है। क्योंकि उन्होंने प्रकृति के भीतर केवल माधुर्य और सौंदर्य के ही दर्शन किये है। 

 प्रकृति के प्रति निराला की दृष्टि स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से सूक्ष्मत्तर होती गई हैं। ‘जुही की कली’ निराला की सबसे पहली और उनकी श्रेष्ठतम रचनाओं में से एक है। इस कविता में कवि ने जुही की कली और मलयानिल के माध्यम से श्रृंगार और सौंदर्य का एक अत्यंत रूपहला चित्र प्रस्तुत किया है। कवि ने इस भाव को इस प्रकार व्यक्त किया है-
नायक ने चूमे कपोल
 डोल उठी वल्लरी की लडी जैसे हिंडोल
इस पर भी जागी नहीं
 चुक क्षमा माँगी नहीं
 निद्रालस बंकिम विशाल नेत्र मूंदे रही…

उत्तर आधुनिक युग में भूमंडलीकरण व औद्यौगिक क्रांति और मुनाफे पर आधारित उपभोक्तावादी संस्कृति ने जिस तेजी के साथ प्रकृति का विनाश किया है वह पूर्ववर्ती कवियों ने सोचा भी नहीं होगा। आज मानव पूरी तरह से बाजारवादी ताकतों की गिरफ्त में है। ऐसी परिस्थितियों में समकालीन कवि अपनी सशक्त रचनाओं के माध्यम से अपने इस कर्तव्य से भली भाँति परिचित है। इसलिए समकालीन कविता बाजारवादी-उपभोक्तावादी संस्कृति का मुखर विरोध करती है। समकालीन कवि वीरेन डंगवाल की ‘बच्चा और गौरैया’कविता पर्यावरणीय संवेदना को मुखरित करती है-
“इस तरह बदहवास
मत टकराओ गौरैया
खिडकी के कांच से
शीशे से
 तुम्हारी चोंच टूट जाएगी
 और नाखून उलट जाएंगे।“

गौरैया जिसका हमारे पर्यावरण में विशेष स्थान रहा है। आज बडे बडे महानगरों में तो वह पूर्णतः लुप्त हो चुकी है। वर्तमान उपभोक्तावादी संस्कृति ने गाँवों का शहरीकरण बडी तेजी के से किया है। शहरों के लिए प्रकृति एकदम अजनबी सी हो गयी है।

इसी संदर्भ में समकालीन कवि स्वर्गीय मंगेश डबराल की कविता अत्यंत महत्वपूर्ण है। अपनी कविता ‘यहाँ थी वह नदी’ में लिखते हैं-
 “हमें याद है
 यहाँ थी वह नदी इसी रेत में
 जहाँ हमारे चेहरे हिलते थे
 यहाँ थी वह नाव इंतजार करती हुई
 अब वहाँ कुछ नहीं है। 
 सिर्फ रात को जब लोग नींद में होते हैं। 
 कभी-कभी एक आवाज सुनाई देती है रेत सी।"

एक नदी के सूख कर रेत हो जाने की त्रासदी को कवि ने मार्मिक तरीके से व्यक्त किया है। 
 हिंदी के वरिष्ठ कवि ज्ञानेंद्रपति ने भी अपनी अनेक कविताओं में पर्यावरण प्रदूषण के बढते आतंक का चित्रण किया है। उनकी ‘नदी और साबुन’ जो ‘गंगातट’, काव्य संग्रह की एक महत्वपूर्ण कविता है। नदियों को प्रदुषित होता देख ज्ञानेंद्रपति ने इस कविता में नदी को लेकर चिंता जताई है। वे इस कविता में नदी से पूछते हैं-
 “नदी
 तू इतनी दुबली क्यों हैं?
 और मैली कुचली...
 मरी हुई इच्छाओं की तरह 
 मछलियाँ क्यों उतराई हैं?
 तुम्हारे दुर्दिन के दुर्जल में, 
 किसने तुम्हारा नीर हरा, 
 कलकल में कलुष भरा। 
 बाधों के जुठारने से तो
 कभी दुषित नहीं हुआ तुम्हारा जल...
 आह! लेकिन…”

प्रस्तुत कविता के माध्यम से कवि ने अपनी पर्यावरणीय संवेदना को व्यक्त किया है। कवि के अनुसार आज नदियों की स्वच्छता एवं पवित्रता नष्ट हो गयी है। पहले वह स्वच्छ हुआ करती थी। अब वह मैली कुचैली एवं क्षीण हो गई है। इसलिए कवि सवाल करता है, किसने नदी के पवित्र जल को मलिन किया है। इसी प्रकार अपनी दूसरी कविता ‘पोलिथिन की थैलियाँ’ में कवि ने पोलिथिन से उत्पन्न भयावह त्रासदी की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है। इस समस्या का चित्रण करते हुए कवि कहता है-
 करोडों या अरबों, कितनी हो सकती हैं
 पोलिथिन की थैलियाँ, कितनी नदियों का दम घुट सकता है। 
 इन थैलियों में... पोलिथिन पोलिथिन, तंग हूँ मैं इस पोलिथिन से...

जिस प्रकार समकालीन कवियों ने अपने साहित्य के माध्यम से पर्यावरणीय संवेदना प्रकट की है उसी प्रकार आदिवासी हिंदी रचनाकारों ने भी पर्यावरण के प्रति गहरा लगाव व्यक्त किया है। वास्तव में प्रकृति आदिवासी जीवन और संस्कृति का मूलाधार है। आदिवासी जन प्रारंभ से ही प्रकृति प्रेमी रहे हैं। यह प्रकृति प्रेम उनकी कविताओं में सहज रूप में दिखाई पडता है। जंगल की कटाई के कारण उनके प्राकृतिक भोजन नष्ट हो गये हैं। तथाकथित सभ्य समाज ने उनसे उनका सुखी जीवन बडी बेरहमी से छीनने का प्रयास किया है। आदिवासियों की प्राकृतिक संपदा लूट की चीज बनकर रह गयी है। आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल अपनी कविता में कहती हैं-
 “क्या तुमने कभी सुना है
 सपनों में चमकती कुल्हाडियों के भय से
 पेडों की चीत्कार?
 सुना है कभी...
 रात के सन्नाटे मे अँधेरे से मुँह ढाँप
 किस कदर रोती हैं नदियाँ?”

निर्मला पुतुल ने अपनी कविता में जंगलों की अवैध कटाई, जल के स्रोत सूख जाने की गहरी चिंता प्रकट की है। जल, जमीन, जंगल उनके अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। इसलिए तो उन्हें पेडों की चीत्कार सुनाई दे रही है। इसलिए वह विकास के ठेकेदारों से सवाल पूछती है कि आपको क्यों नहीं सुनाई देता पेडों का दर्द।

 कवि हरिराम मीणा पर्यावरण को नष्ट करनेवाले सभ्य समाज को स्पष्ट शब्दों में चेतावनी देते है और उसके खिलाफ आदिवासियों को सचेत करते हुए लिखते हैं-
 “देखो तुम्हारे पेड गिर रहे हैं!
 समुद्र मैला हो रहा है
 तटों पर प्लास्टिक की थैलियाँ बिखर रही हैं। 
 मछलियाँ दूर चली गई
 अक्टोपस छुप गए—
 और तुम चुप हो?”

वास्तव में आदिवासी कविता का स्वर मूलतः प्रतिरोधी है। जल, जमीन और जंगल से जुडी संवेदना समकालीन आदिवासी कविता का केंद्रीय स्वर है। पर्यावरण के प्रति वह आश्वस्त है इसलिए प्रकृति को बचाने की गुहार लगा रहा है। 

 इस प्रकार वर्तमान समय मे अन्य महत्वपूर्ण विमर्शों के साथ-साथ पर्यावरण विमर्श भी महत्वपूर्ण बन गया है। पर्यावरण मनुष्य के न सिर्फ जीवन में बल्कि शरीर के भीतर-बाहर भी समाहित है। इसलिए आदिकाल से लेकर आधुनिक काल के रचनाकारों ने इस पर गंभीरता से हमारा ध्यान आकर्षित किया है। पर्यावरण अर्थात हमारे चारों ओर जो भी वस्तुएँ हैं, शक्तियाँ हैं और जो हमारे जीवन को प्रभावित करती है, वे सभी पर्यावरण के अंग है। जल, जंगल, जमीन, हवा, प्रकाश, अंधकार, वन्य जीव-जंतु, खनिज पदार्थ आदि हमारे पर्यावरण के अभिन्न अंग है। आज उसी पर संकट मंडरा रहा है। इसके लिए आवश्यक है कि हम मशीनीकरण और आधुनिकता की दौड से बाहर निकल कर प्रकृति की ओर पुनः प्रस्थान करें। हिंदी के लगभग सभी साहित्यकारों ने विविध विधाओं के माध्यम से पर्यावरणीय संवेदना को हमारे सम्मुख रखा है। अगर हमें एक बेहतर समाज चाहिए तो पर्यावरण संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। आज मानव अपने भोग एवं सुख की प्राप्ति के लिए प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहा है, इसका खामियाजा हमें तो भूगतना पडेगा ही, हमारी भावी पीढी इससे और ज्यादा नुकसान झेलेगी आज असमय बारिस, बाढ, भूकंप, आदि केवल प्राकृतिक घटना न होकर संपूर्ण मानव जाति के लिए बहुत बडी चेतावनी है।

संदर्भ सूचीः
1. समकालीन कविता में पर्यावरणीय संवेदना, डॉ.शर्मा मीना। 
2. महाकवि निरला और उनका राग-विराग, डॉ.शर्मा कृष्णदेव। 
3. पर्यवरणीय चेतना एवं जागरूगता, पांडेय रीतिका। 
4. सेतु-नवम्बर, 2018 (द्वैभाषिक मासिक)
5. हिंदी साहित्य में पर्यावरण चेतना, डॉ. प्रेमकुमारी सिंह। 
 

1 comment :

  1. प्रासंगिक विषय के अनुकुल लेख
    बहुत बढिया

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