एक परिचय: कमला दास (नये हस्ताक्षर)

आयुषी तिवारी
अंग्रेज़ी से अनुवाद: आयुषी तिवारी (An Introduction By Kamala Das)


राजनीति से मैं अनजान, पर सत्ताधारियों के नाम 
नेहरू से आरंभ कर ऐसे दुहरा सकती हूँ, 
जैसे दिनों या महीनों के नाम!
मालाबार में जन्मी,गेहुँए रंग की, 
मैं वह भारतीय हूँ, 
जो तीन भाषा में बोल सकती हैं, दो में लिख सकती है, और एक में अपने सपने बुन सकती हैं!
अंग्रेजी मेरी मातृभाषा नहीं, इसलिए वह मुझे इससे लिखने को मना करते हैं। 

अरे मुझे अकेले छोड़ दो मेरे चाहनेवाले?
मेरे द्वारा बोली गई भाषा अपने  टेढ़ेपन विलक्षणता के साथ मेरी हैं। 
चाहे वह आधी अंग्रेजी हो, आधी भारतीय, 
मजाकिया हो, पर सच्ची है, 
वह उतनी ही मानवीय है, जितनी कि मैं, 
क्या तुम देख नहीं सकते?

वह मेरी खुशी, मेरी लालसा, मेरी आशा का उधार है। 
उतनी ही उपयोगी जितनी एक कौए के लिए काँव-काँव या शेर के लिये दहाड़ हो। 
यह मानवीय बोली है, वह बोली जो, 
मेरी चेतना में हैं, और वही चेतना, जो देख सकती है सुन सकती हैं, 
और 
यह बहरा और अंधा स्वर नहीं हैं, 
जो भीषण आंधी में पेड़ या वर्षा के बादल या चिता से निकलने वाली लपटों के होते हैं। 
मैं बच्ची थी, फिर 
मेरे शारीरिक बदलवा के कारण उन्होंने मुझे वयस्क बना दिया। 
अनजाने में जब मैंने प्रेम मांगा, तो उन्होंने सोलह वर्ष के युवा को मेरे घर में डाल कर दरवाजा बंद कर दिया। 
बिना उससे मार खाए,
मेरी दुखी नारी सताता बहुत पीटी हुई सी प्रतीत हुई। 
मेरे गर्व के भार ने मुझे कुचल दिया। मैं घृणा से दब गई। 
फिर अपने भाई का पोशाक पहन, छोटे बाल किए और उपेक्षित हुई। 
उनके अनुसार मेरा काम साड़ी पहनना हैं। 
चाहें मैं लड़की हूँ या पत्नी। मेरी समस्त भूमिका में चेतना है, फिर चाहे कशीदाकार हो, रसोई हो या नौकर से झगड़ा कराने वाली हो। 
भेद करनेवालों ने जुड़ने को कहा। 
दीवार पर न बैठो या जालीदार खिड़की से ताक-झाँक मत करो। 
चाहे तुम्हारा कोई भी नाम हो - एमी, कमला या माधवी कुट्टी। 
अब समय है अपना नाम चुनने का, अपनी भूमिका का। 
अब दिखावे का खेल नहीं खेलने का। 
मानसिक विकारों से न खेलो। 
असफल प्रेम में भी अश्रु प्रभाव  न करो। 
असफल प्रेम में भी कहो कि एक पुरुष से मिली। 
उससे प्रेम किया। उसे किसी नाम से न पुकारा। 
वह भी अन्य पुरुषों की तरह है, जिसे एक महिला चाहिए। 
ठीक वैसे ही जैसे मैं हूँ, जो प्रेम ढूँढती हैं। 
उसमें एक प्यासी नदी की धारा हैं और,
मुझ में सागर की अथक प्रतीक्षा है। 
मैंने सबसे सबका परिचय पूछा पर उत्तर में मैं ही मिली। 
कहीं भी और सर्वत्र मैंने सबको मैं-मैं कहते सुना। 
वह म्यान में लगे तलवार जैसा था। 
मैंने आधी रात को अकेले अनजान शहर के होटल में मदिरापान किया। 
वह मैं थी जो खुल कर हँसी 
वह मैं थी जिसने प्रेम और नफरत दोनों पाये। 
वह मैं ही हूँ जो गले की घरघराहट से मरी। 

मैं ही पापी, मैं ही धर्मात्मा। 
मुझे ही प्रेम मिला तथा मुझे ही धोखा भी, 
मैं ही दुखी पर वह दुख तुम्हारा नहीं। 
मैं दर्द से भरी पर वह दर्द तुम्हारा नहीं 
फिर भी स्वयं को मैं कहती हूँ। 
***

शिक्षा: कोलकाता विश्वविद्यालय में बीए (इंग्लिश ऑनर्स) में अध्ययनरत
रुचियाँ: हिंदी व अंग्रेज़ी साहित्य, संभाषण, नाटक, मंच-संचालन
 

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