काव्य: राजकुमार गीत

राजकुमार गीत
हमारे होने का अर्थ

पेड़ आदमी की परिभाषा है
आदमी नहीं होता है पेड़
लेकिन पेड़ों के होने से
बचा रह जाता है
हमारा आदमी होना
आदमी के होने के तमाम परतों को
बेहतर जानता है पेड़
क्योंकि हमारे होने के बहुत पहले से है
इस धरती पर पेड़
और अंततः उसी के साए में
उसी की जड़ों में,
बीजों, हरी पत्तियों, टहनियों के इर्द-गिर्द
बचा रह जाता है
हमारे होने का अर्थ
बचपन की तिपहिया गाड़ी से लेकर
चिता की लकड़ी, 
मुखाग्नि की जलती लुकाठी तक।
***


एक चित्र: लेटी हुई मुद्रा में

एक पल
जब कुछ भी नहीं होता है
आसपास
निस्तब्धता,
एक ठहरी हुई चुप्पी 
और सैकड़ों डरावने चित्रों से
भर जाता है
सारा आकाश

कोई कितना भी कहे
पर कितना कठिन है
सब कुछ सहेजना
बिल्कुल भीतर तक
और फिर यूं रह जाना 
जैसे कुछ हुआ ही नहीं
चेहरा: बंजर जमीन,
काली रात की परछाई

आदमी का भय 
मृत्यु नहीं , 
और जटिल होती 
जिंदगी का ज़रासीम है 
जिसमें किसी एक आदमी के लिए
पूरी पृथ्वी की परिधि
कम पड़ती हो 
और सुबह का उजाला
नाश्ते की प्लेट में बचा, 
पड़ा रह जाता हो

और तब
कितना सही समय हो सकता है
अपने आप को उकेरने के लिए 
एक छोटी सी छत के नीचे
फर्श पर
लेटी हुई मुद्रा में।
***


सांझ

बहुत देर हुई 
बैठी हुई है
दूर चट्टान पर 
स्वयं को अपने में समेटे 
न जाने क्या सोचती हुई 
लड़की 
मुझे लग रहा है 
उठ कर चली जाना चाहती है 
वह 
पर व्यर्थ 
उसके शरीर में 
अपनी-सी न लगने वाली
हरकत हुई 
और थम गई 
और बैठी रही 
बैठी रही 
लड़की 
अनजाने ही सही 
असंख्य क्षणों की अनुभूतियां 
बुला रही होंगी उसे 
साथ ही 
कभी न समाप्त होने वाली 
सोचों का एक लंबा सिलसिला 
उसे रोके रखती है 
क्षण-भर 
ऐसा कभी हुआ है 
एकबारगी आकर चली गई हो 
सांझ।
***


क्योंकि इस दुनिया में तुम हो

असंख्य आकाशगंगाओं के 
उजाले से रौशन अलौकिक,अप्रतिम
सबसे सुंदर चेहरा तुम्हारा 
चांद से चेहरे के गिर्द
सिमटा है गेसुओं के बादल
और अनंत आसमान की 
अनगिनत यात्राओं के अनुभव 
कह रहा है तुमसे
तुम्हारे ही कानों में
काश जिसे सुन सकता 
मैं भी
किस कदर मोहक है
जीवन का अर्थ
तुम्हारी आँखों में ही 
झांककर देखा जा सकता है 
जिसकी आँखें रचती हैं 
इस धरती का सबसे मोहक
सबसे सुंदर गीत
जिसे पढ़ना और बंध जाना
हर क्षण के लिए 
इन आँखों में जो जीवन है
जिसे और कहीं पाना असंभव सा है
इन आँखों में 
जीवन पाने की कामना और
इस दुनिया के सारे दस्तूर 
तोड़े जा सकते हैं सहज ही
जिसकी उनींदी आँखों में 
जीवन का सबसे सुंदर स्वप्न 
देखा और जिया जा सकता है
और महसूस किया जा सकता है
अपने आपको 
इस दुनिया का सबसे खुशनसीब
और हुआ जा सकता है
एक हद तक अभिमानी भी
जिसके सुर्ख लाल होंठों से ही निखरा हो
धरती के तमाम फूलों में चटक रंग
तभी तो कहता हूँ
कि बेहद सुंदर है
यह दुनिया 
क्योंकि इस दुनिया में तुम हो
तुम्हारे होने से ही है
यह दुनिया
मेरे लिए।
***


परिचय: राजकुमार गीत
जन्म: 20 दिसंबर ,1972, शिलांग (मेघालय)
शिक्षा: एम.ए. (हिंदी), बी.एड.
प्रकाशन: 'शाल वन की धरा से' , 'कसौटी पर कविताएं', 'उर्वि' एवं 'शतरंग' साझा संकलन में कविताएं शामिल तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।
संप्रति: ओ.पी. जिंदल स्कूल, पतरातू, रामगढ़ (झारखंड) में शिक्षक।                                    
संपर्क: क्वार्टर नंबर M/S/S -17, निकट इंदिरा चौक, गांधीनगर, अरगडा, जिला- रामगढ़, झारखंड - 829101
चलभाष: 7903005153, 9955950390
ईमेल: rajkumarjha138@gmail.com


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