काव्य: केशव शरण

केशव शरण
तुम जीना

पहले मुझे
झूल जाने दो
उसकी ऊँची डाल से
गले में फंदे के सहारे
फिर चलाओ उस पर आरे

प्राण देना कौन चाहता है
पर तुम मानते ही नहीं हो
तो यही रास्ता है

मेरे बाद
तुम जीना
बिना प्राणवायु के
और मरना
बरस पूरे कर
लम्बी आयु के
***


डाकघर

इसने मुझे
चवन्नी में
किसी से भी
जुड़ने की
सहूलियत दी थी
और मैंने
इसका भरपूर फ़ायदा उठाया
पोस्टकार्डों के द्वारा

आज ई-मेल का ज़माना है आया
और वह गुज़रे ज़माने की
बात हो गई है
मगर इधर से जब भी गुज़रता हूँ मैं
उसे गहरी कृतज्ञता से देखता हूँ

अब मुझे डाकघर पर
तनिक भी ग़ुस्सा नहीं आता
कि इसने मेरी
दो-तीन चिठ्ठियाँ
ग़ायब की हैं
***


दुनिया एक बाग़ हो

सुबह की
सुहानी हवा में
विहार करते हुए
ख़याल आया
हमारी दुनिया
एक बाग़ हो
जिसमें हम सैर करें
क्यों बैर करें

प्यार की ताक़त जानते हैं
फिर नफ़रत क्यों पालते हैं
लम्बी साँस भरते हुए
विचार आया

आवश्यकता है सम्पूर्ण मानवता के ज़ख़्मों पर
मरहम की
न कि एटम बम की
लम्बी साँस छोड़ते हुए
उद्गार निकला
और इसी के साथ सूरज
                      नारंगी रंग का
वृक्षाच्छादित क्षितिज के पार उभरा
***


केवल सोच रहे हो ये-वो

तुम देख नहीं रहे हो
सामने अचल पहाड़
और कल-कल बहती नदी

केवल सोच रहे हो ये-वो
जिससे हाय-तौबा है मची
तुम्हारे अंदर
जिसमें उतारना था तुम्हें इस पल
वह अचल पहाड़
और यह
कल-कल बहती नदी!
***


घर

एक छोटी-सी ज़मीन पर
एक ऊँचे मकान से
बेहतर है
एक बड़ी ज़मीन पर
एक छोटा-सा घर

पर जैसा भी हो
घर, घर है
बीस माले ऊपर
या पाइप के अंदर
***


एक प्लेटफार्म पर दो आदमी

खचाखच भरी रेल से
एक आदमी निढाल उतरा
प्लेटफार्म पर
बोरिया-बिस्तर लादे
एक आदमी तरो-ताज़ा

निढाल आदमी से ज़्यादा
उसके पास सामान था
मगर कुछ न हाथ में था उसके
न गले में
न पीठ पर
न कंधे पर
न कपार पर
***


बारात

धीमे-धीमे
सरकती बारात में
तेज़-तेज़ थिरक रहे हैं लोग
डीजे से दूर,
डीजे के क़रीब
झोपड़-पट्टी के बच्चे
नाच रहे हैं
जो किसी भी बारात में
बाजे के पीछे हो लेते हैं
स्वांत:सुखाय कि अर्थ:लाभाय
लेकिन आनंद लेते और देते हैं नाचने का
अपना फ़न दिखाते हैं
ईनाम पाते हैं

बारात शादी घर में जाती है
और वे लौट जाते हैं
***


टक्कर

आदमज़ात
जवानी की राह पर
चला ही था कि
एक हव्वा के सौंदर्य से
टकरा गया
उस टक्कर का नहीं असर गया
आदमज़ात चाहे जिधर गया

यह पहली टक्कर थी
कोई अंतिम नहीं
लेकिन आदमज़ात कभी ऐसा नहीं हिला
चाहे उसे चोट लगी
चाहे उसे प्यार मिला
***


सौभाग्य

इस जन्म में
मनुष्य हूँ
अगले जन्म का क्या
योनि, मनुष्य योनि हो
या मनुष्य योनि से हीन
पशु
      पंछी
            मीन
पर यही सौभाग्य रहे प्राप्त
कि मनुष्यों का रहूँ प्रेम-पात्र!
***


साइबेरियन पंछी

पंछी नहीं हैं हम
हमें पासपोर्ट चाहिए

हम उनकी भूमि पर नहीं उतर सकते
बिना पासपोर्ट के
वे हमारी गंगा में
अठखेलियाँ कर रहे हैं

वे उन्मुक्त हैं
लेकिन उनके यहाँ के लोग नहीं
उनके यहाँ के लोग भी
हमारी तरह ही बँधे हैं

ग़नीमत है कि
उनके यहाँ के लोगों की तरह
हम नहीं
युद्ध में फँसे हैं

गुनगुनी धूप में
काशीराज का क़िला देखते
आराम से
घाट पर बैठे हैं
***


एस 2/564 सिकरौल 
वाराणसी 221002
9415295137

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