अमृतलाल नागर: बच्चों के बाँके दोस्त किस्सागो

प्रकाश मनु

प्रकाश मनु

‘मानस का हंस’ वाले नागर जी। ‘बूँद और समुद्र’ वाले नागर जी। ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ वाले नागर जी। ‘एक दिल हजार अफसाने’ वाले नागर जी। प्रेमचंद के बाद हिंदी के सबसे बड़े कथाकार और असाधारण किस्सागो नागर जी।...नागर जी की इतनी छवियाँ हैं हम सबके मन में कि उनका नाम आते ही मानो एक पूरा समंदर उमड़ पड़ता है और लगता है, हम उसमें डूब और उतरा रहे हैं।

सच पूछिए तो कथाशिल्पी अमृतलाल नागर (1916-1990) हिंदी के ऐसे उस्ताद किस्सागो हैं, जिन्हें हजारों पाठक दीवानगी की हद तक प्यार करते हैं और साथ ही हिंदी के युवा और पुरानी पीढ़ी के लेखक भी जिन्हें गुरुवत आदर देते हैं तथा उनसे हर क्षण कुछ नया सीखते हैं। नागर जी को गुजरे एक अरसा हो गया, पर इसके बावजूद वे इस कदर हमारे बीच मौजूद हैं कि उनकी सदाबहार शख्सियत और रचनाओं की याद तथा उन्हें पढ़ते हुए कैसे भाव हमारे भीतर उमगते हैं, उस सबका स्मरण रोमांचित कर देने वाला है।

हिंदी बाल साहित्य के लिए यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं कि हिंदी के मूर्धन्य कथाकार अमृतलाल नागर ने बच्चों के लिए लिखा और पूरी तरह बच्चे के मन और उसकी सतरंगी दुनिया के रेशे-रेशे से जुड़कर, बल्कि बच्चों के साथ बिल्कुल बच्चा बनकर खेलते हुए लिखा। इसीलिए उनकी बाल रचनाएँ बच्चों से ऐसा सहज रिश्ता बना लेती हैं कि एक बार पढ़ने के बाद बच्चे उन्हें कभी भूलते नहीं। बल्कि बड़े होने पर भी उनकी सुवास कहीं मन को गुदगुदाती है तो साथ ही बहुत चुपके से उन्हें इनसानियत के प्रेममय रास्ते पर चलने को न्योतती है। यों नागर जी बच्चों के लिए लिखते हैं तो एकदम बच्चों के दोस्त होकर लिखते हैं, जिनके आगे बचपन की सारी निधियाँ और खजाने खुल पड़ते हैं। रससिद्ध और अलमस्त कथाकार अमृतलाल नागर इतनी खूबसूरत कारीगरी से उन्हें अपनी बाल रचनाओं में सजा लेते हैं कि ये रचनाएँ बच्चों को क्रीड़ा-कौतुक भरे खूबसूरत खिलौनों की मानिंद लगने लगती हैं।

कान्यकुब्ज कालेज 1961-62 (चित्र सौजन्य: श्रीमती लावण्या शाह)
बैठे हुए बाँए से: सर्वश्री कांति मोहन अवस्थी (प्रिन्सिपल, इण्टर विभाग), पं. छंगालाल मालवीय (अध्यक्ष, हिन्दी विभाग), पं. नरेन्द्र शर्मा, कविवर सुमित्रानंदन पंत, प्रिंसिपल मदनगोपाल मिश्र, भगवती चरण वर्मा, अमृतलाल नागर, लक्ष्मीशंकर मिश्र 'निशंक', डा. महेन्द्र नाथ मिश्र। खड़े हुए बाँए से: सर्वश्री कृपाशंकर तिवारी, श्रीपाल सिंह, हरीकृष्ण शर्मा (अध्यक्ष, संसद), सत्यप्रकाश राना (प्रधानमंत्री, संसद), सतीश चन्द्र बाजपेयी, दयाशंकर दीक्षित (सभापति, हिंदी परिषद), परमिथलेश कुमार शुक्लम लाल मणि मिश्र, कु. प्रभा शर्मा, कु. आशा मेहरोत्रा

17 अगस्त, 1916 को आगरा में जनमे यशस्वी कथाकार अमृतलाल नागर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि अपनी पीढ़ी के तमाम लेखकों की तरह वे बच्चों को सीधे-सीधे उपदेश नहीं देते। हाँ, अपनी बात अकसर वे बड़ी अनोखी युक्तियों से और ऐसे दोस्ताना लहजे से कहते हैं कि वे बच्चों के दिलों में जैसे छप जाती हैं। इसीलिए उनकी ये रचनाएँ बाल साहित्य का भंडार भरने वाली दस्तावेजी रचनाएँ हैं, जो बार-बार उन लेखकों के आगे एक बड़ी चुनौती उपस्थित करती हैं जो जीवन भर बाल साहित्य लिखते हैं, बस बाल साहित्य ही लिखते हैं पर उसमें भी कोई नई राह नहीं ले पाते। जबकि नागर जी की हर रचना मानो अपने लिए एक नई राह खोजने की चुनौती के साथ सामने आती है। यह बड़ी बात है, बहुत बड़ी बात जो बड़ों के साथ-साथ उन्हें बाल साहित्य के भी सिरमौर लेखक होने की ऊँची गद्दी पर बैठाती है।

यों तो नागर जी ने बच्चों के लिए प्राय: हर विधा में लिखा है। उन्होंने बड़ी सरस और मनोरंजक बाल कहानियाँ, उपन्यास, पद्यकथाएँ, नाटक, और बच्चों के लिए बड़ी ही रसपूर्ण जीवनियाँ लिखीं। पर मेरे खयाल से एक किस्सागो के रूप में उनका कद सबसे बड़ा है। बल्कि सच शायद यह है कि उन्होंने चाहे कहानियाँ और पद्यकथाएँ लिखीं या उपन्यास, नाटक लिखे या जीवनियाँ, पर अगर आप मुझसे पूछें कि इनमें कौन-से नागर जी आपको सबसे ज्यादा आकर्षित करते हैं या कि नागर जी का कौन-सा रूप है जो इन सबमें पिरोया हुआ है और वे बच्चों के लिए कुछ भी लिखें, सबसे पहले वही उझक-उझककर सामने आता है, तो वह है उनका किस्सागो रूप। और यह आज भी इतना बड़ा है कि कम से कम मेरी पीढ़ी के लिए वह एक अभेद्य दुर्ग-सा है, जिसे देखकर अब भी आँखें चकाचौंध होती हैं और उसे सिर्फ प्रणाम किया जा सकता है।

बाल साहित्य में भारतीय पुरा आख्यान को नए कलेवर में प्रस्तुत करने की दृष्टि से नागर जी का एक बड़ा ही उल्लेखनीय काम है, जिसकी तुलना बस प्रेमचंद द्वारा किशोरों के लिए लिखी गई रामकथा या फिर रामविलास जी के भारतीय संस्कृति के अद्भुत भाष्य से की जा सकती है और यह है उनके द्वारा लिखा गया ‘बाल महाभारत’। इसे नागर जी ने पूरी तन्मयता से, बल्कि बाल-मन और बाल कल्पनाओं में सराबोर होकर लिखा है, मगर यहाँ भी उनकी सबसे बड़ी खासियत जाननी हो तो वह उनकी विलक्षण किस्सागोई ही है, जिसने महाभारत को बच्चों के लिए एक खूबसूरत उपन्यास सरीखा बना दिया है। यानी तथ्य खरे, एकदम खरे और शोधपूर्ण पर लिखने का अंदाज ऐसा कि बच्चे उसे एक दिलचस्प किस्से-कहानी की तरह पढ़ सकते हैं। यहाँ भी सबसे अधिक उनका किस्सागो रूप ही उभरकर आया है।

सच पूछिए तो यह ऐसी जगह है जहाँ नागर जी एक ऐसे विराट सर्जक नजर आते हैं जिसके पाँव जमीन पर, लेकिन सिर आसमान को छू रहा है। इस विद्या के वे महागुरु हैं और कोई चाहे तो उनसे उम्र भर सीखता रह सकता है। शायद इसीलिए कम से कम मेरी पीढ़ी के लोग नागर जी को जितना पढ़ते हैं, उतना ही वे और अधिक मुग्ध करते हैं और उन्हें पढ़ने और जानने की प्यास निरंतर बढ़ती ही जाती है।
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नागर जी के बाल साहित्य लेखन की शुरुआत कहानियों से हुई और उनकी कहानियों में गजब का आकर्षण और विविधता है। उनकी एकदम शुरू की कहानियों में ही उनकी लंबी दौड़ की निशानियाँ और एक बड़े किस्सागो होने के लक्षण नजर आने लगते हैं। उनकी शुरुआती कहानियों में ‘नटखट चाची’ बड़ी दिलचस्प है। यों तो यह चाची कहानी के कथावाचक, यानी एक छोटे-से बच्चे के साथ बड़ा कठोरता भरा व्यवहार करती है। पर जब रात के समय घर में चोर के आने का अंदेशा होता है तो चाची की सारी दबंगी हवा हो जाती है और उस समय जिस तरह की बेचारगी और घिघियाहट से भरा उनका रूप नजर आता है, नागर जी ने उसे बड़ा रस लेकर और हास्य की फुहारों में लपेटकर प्रस्तुत किया है। हालाँकि वह चोर असल में चोर नहीं है और यह बात कहानी के अंत में खुलती है जिससे कहानी का मजा और बढ़ जाता है।

भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर, सुमित्रानंदन पंत, तथा पं. नरेंद्र शर्मा
(चित्र सौजन्य: श्रीमती लावण्या शाह)

‘साझा’ इसकी तुलना में एकदम अलग मिजाज की और थोड़ी गंभीर कहानी है। यह दो मित्रों की कहानी है, जिनकी मित्रता खुद एक मिसाल है। डूँगरसिंह के पास काफी धन है। उन्होंने पंडित जी के साथ किसी काम में पैसा लगाया और दोनों का साझा व्यापार अच्छा चल निकला। पर तभी एक ऐसी बात अचानक डूँगरसिंह के मुँह से निकली जो पंडित जी को चुभ गई। इसके बाद कहानी में पंडित जी और डूँगरसिंह के झगड़े, या कहिए कशमकश का वर्णन है। पर यह बहुत ही प्यार भरा झगड़ा है, जिसमें पंडित जी हर हाल में डूँगरसिंह के पैसे लौटाना चाहते हैं और डूँगरसिंह उसे लेने को हर्गिज तैयार नहीं हैं। दोनों के व्यक्तित्व का जो बड़प्पन इस कहानी में वर्णित है, उसे अमृतलाल नागर सरीखा एक बड़े दिल का बड़ा लेखक ही लिख सकता था।

इसी तरह ‘सूअर की कहानी’ भी एक अलग लीक पर चलती दिलचस्प कहानी है, जिसमें मानो सूअर बनकर उसके भीतर के दर्द को महसूस किया गया है। एक चित्र को आधार बनाकर पत्रिका के संपादक के अनुरोध पर लिखी गई यह कहानी तमाम रंग बदलती है और यहाँ तक कि पत्रिका के संपादक जी भी उसकी लपेट में आ जाते हैं। उन पर भी हास्य की फुहारें पड़ती हैं।

नागर जी की कुछ कहानियों में हास्य के बड़े मजेदार छींटे हैं। इनमें ‘अंतरिक्ष सूट में बंदर’, ‘अमृतलाल नागर बैंक लिमिटेड’ तथा ‘लिटिल रेड इजिप्शिया’ तो खासी दिलचस्प हैं जिन्हें भुलाया ही नहीं जा सकता। ‘अंतरिक्ष सूट में बंदर’ कहानी में अपनी धरती जैसी कई धरतियों का जिक्र है जहाँ हमारे जैसे ही लोग रहते हैं और उनके पास विज्ञान के नए-नए साधन भी हैं। ऐसे ही एक अंतरिक्ष-लोक से उड़ती हुई एक लड़की एक दफा हमारी धरती पर आ गई। वह अंतरिक्ष सूट पहने हुई थी जिसमें किस्म-किस्म की शक्तिशाली मशीनें लगी थीं। लिहाजा उड़ने में उसे कोई मुश्किल नहीं आई। धरती पर उतरी तो उसने झील के पास पेड़ों के एक झुरमुट में रह रहे बूढ़े साधु बाबा को देखा। साधु बाबा उसकी बोली तो नहीं समझे, लेकिन यह जरूर समझ गए कि लड़की को खासी भूख लगी है। उन्होंने उसे खाने को मीठे फल दिए। लड़की को धरती और यहाँ के लोग अच्छे लगे।

इस कहानी का सबसे दिलचस्प प्रसंग यह है कि एक दिन बंदर उस अंतरिक्ष सूट को पहनकर अंतरिक्ष में जा पहुँचा। मगर वहाँ उसकी घबराहट और उस घबराहट में किए जाने वाले कारनामे कुछ ऐसे थे कि तोबा-तोबा। उसने एक साथ बहुत सारे बटन दबा दिए जिससे और भी गड़बड़झाला हो गया। बमुश्किल बाबा जी ने उसे नीचे उतारा। फिर इस कहानी के अंत में जंगल में रहने वाले सीधे-सादे बाबा जी भी अंतरिक्ष यात्रा पर जाने की सोचें, यह अनोखी कल्पना शायद नागर जी को ही सूझ सकती है।

‘अमृतलाल नागर बैंक लिमिटेड’ तथा ‘लिटिल रेड इजिप्शिया’ में छोटे बच्चों की उपस्थिति और उनकी दुनिया की उलझनों के साथ-साथ उनकी नटखट शरारतों का बड़ा ही दिलचस्प वर्णन है। इनमें ‘अमृतलाल नागर बैंक लिमिटेड’ में छोटे-छोटे बच्चे अचानक बड़े हो जाते हैं और एक बैंक खोल लेते हैं। इसलिए कि ये छोटे बच्चे इस बात से परेशान हैं कि जरा-जरा सी बात पर कभी टीचर डाँट देता है तो कभी घर वाले आफत मचा देते हैं। टीचर बार-बार इसलिए टोकते हैं कि इस सेंटेंस में यह व्याकरण की गड़बड़ है, उसमें वो भूल है। मगर एक दफा बैंक खोलकर बड़े आदमी बन जाएँ तो हर आदमी दौड़-दौड़कर हम तक आएगा। फिर जब हम अपनी कुर्सियों पर तनकर बैठे होंगे तो व्याकरण की चाहे जितनी भी टाँग तोड़ें या जो भी गड़बड़ करें, किसी की कुछ भी कहने की हिम्मत न होगी।

उसके बाद जाहिर है, बैंक खुला और ऐसे ताबड़तोड़ उत्साह और जोश के साथ खुला कि क्या कहने! मगर फिर इन बच्चा दोस्तों और बच्चा अफसरों के आपसी झमेले शुरू हुए और होते-होते कुछ ऐसे उलझ गए कि उन्हें शायद सुलझाने में ही सदियाँ लग जातीं। और फिर जैसा कि होना ही था, एक महान महत्वाकांक्षी बैंक का विसर्जन हो गया, मगर बड़े ही गुदगुदा देने वाले मीठे अनुभव के साथ।

कुछ-कुछ यही मिठास ‘लिटिल रेड इजिप्शिया’ कहानी के नायक रेड इजिप्शिया जी में है, जो छोटेलाल मिश्र से रेड इजिप्शिया बने तो उनके नाम की पहेली हल करने में बड़े अच्छे-अच्छे खाँ चकरा गए। यहाँ तक कि बेचारे हैडमास्टर जी को भी हार मानते हुए निवेदन करना पड़ा कि श्रीमान रेड इजप्शिया जी, आप ही बताइए कि आपके नाम का मतलब क्या है? ऐसी-ऐसी विकट चक्करदार पहेलियाँ रचने में नागर जी उस्ताद हैं और उनसे सीखा जा सकता है कि मिट्टी का एक ढेला या क्षुद्र तिनका भी अगर आपके हाथ में है, तो उससे पूरी सृष्टि कैसे रची जा सकती है।

‘पराग’ पत्रिका में छपी नागर जी की बहुचर्चित कहानी ‘एक पत्ता जो जासूस नहीं था’ में भी उनका यही हुनर है। कहानी का नाम तो है ‘एक पत्ता जो जासूस नहीं था’, मगर सच्ची पूछो तो वह जासूस इतना तगड़ा है कि आज के तमाम सीआईडी वालों के कान काट ले। इसलिए कि उसकी आँखें एकदम खुली हैं। वह एक पत्ता भले ही हो, मगर हद दर्जे तक संवेदनशील है और उसने पता नहीं मुक्तिबोध को पढ़ा या नहीं, मगर इस सवाल का जवाब उसके पास है कि “पार्टनर, तुम कहाँ खड़े हो?” और वह एक अकेला पत्ता, जिसे लोग बेचारा पत्ता भी कह सकते हैं, मगर इतना मजबूत तो वह है कि हमेशा कमजोर आदमी की बात करता है, उसके बारे में सोचता है और उसके दुख-दर्द से विचलित होता है। इसीलिए बड़े-बड़ों का भ्रष्टाचार उसके आगे खुलता है तो वह उसी तरह तिलमिलाता है जैसे हमारे देश का एक आम आदमी, जो अपने चारों ओर भ्रष्टाचार का बाजार देखकर गुस्से से भर जाता है, मगर कहीं न कहीं लाचार भी है।

तो एक कहानी में—बच्चों के लिए लिखी एक कहानी में नागर जी बहुत चुपके से, आहिस्ता से इतनी बड़ी बात ले आते हैं। उसे कहानी की शर्त पर लाना और इस सबके बावजूद वह कहानी बच्चों के लिए जैसा कि होना ही चाहिए, एक मोहक कहानी बनी रहती है, तो यह एक ऐसा असाधारण हुनर है जिससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। ‘बलिया के बाबा’ भी एकदम अलग ढंग की कहानी है, जिसमें हमारे पूरे स्वाधीनता-संग्राम और देशभक्तों के बलिदानों की महक है।

नागर जी ने बच्चों के लिए कुछ दिलचस्प लोककथाएँ भी प्रस्तुत की हैं, पर उनका पुनर्कथन करते हुए वे उन्हें एकदम नए शिल्प और अंदाज में ढाल देते हैं। इससे वे लोककथाएँ जैसे निखर-सी गई हैं। ‘सात पूँछों वाला चीकू’ इसका सबसे बेहतर उदाहरण है जिसमें सात पूँछों वाले चूहे का किस्सा एक नए ही रंग में सामने आता है। इसलिए कि वह चूहा कहानी में एक खास शख्यियस बनकर उभरा है। वह कोई मामूली चूहा नहीं, चीकू है और चीकू का बोलने-चालने, सोचने और नटखट क्रीड़ाओं का एक अलग अंदाज है। इसी तरह सतखंडी हवेली के मालिक का किस्सा नागर जी के यहाँ दिल को गहरे छू जाने वाली एक अद्भुत कथा का रूप ले लेता है। ‘पान की कहानी’ में पान के साथ चूने, कत्थे और सुपारी की दोस्ती या संग-साथ को मानो एक प्रतीक-कथा की शक्ल दे दी जाती है। 
और एक चर्चित लोककथा में ढोल में बैठकर जंगल पार करने वाली ‘बुढ़िया की चालाकी’ का तो कोई जवाब ही नहीं। यह कहानी कई दफा पढ़ी है, सुनी भी है, पर नागर जी के शब्दों में इसे पढ़ते हुए लगा मानो नागर जी नहीं, मेरी दादी या नानी यह किस्सा सुना रही हैं, जिनके किस्सों या किस्सागोई से हम सब जनमे हैं, जैसे गोगोल के ओवरकोट की जेबों से रूस की पूरी एक पीढ़ी ने जन्म लिया था। और सचमुच लोककथाओं को लिखने की सार्थकता इसी में है कि उसे दादी-नानी की किस्सागोई के इसी रस और कल्पनाशीलता से जोड़ दिया जाए, जिसमें हर बार सुनाते समय कुछ न कुछ नया जुड़ जाता था।

कुछ-कुछ यही बात नागर जी की ‘सोने का चूहा’ सरीखी कहानियों के बारे में कही जा सकती है जिनमें कुछ कहानियों को दादी-नानी की किस्सागोई के मौलिक रस से जोड़ने के लिए उनके अंत में ये सतरें जुड़ जाती हैं कि “जैसे उनके सुख के दिन लौटे, राम करे हर किसी के बहुरें।” थोड़े-थोड़े शब्द बदलते हैं, पर भाव वही।

नागर जी ने पद्यकथाएँ भी लिखी हैं, पर उनमें कविता के साथ-साथ किस्सागोई पर पूरा जोर है। यानी नागर जी का कौशल इसमें है कि पद्य में लिखे होने के बावजूद इसमें कथा या वृत्तांत का आनंद कम नहीं होता, बल्कि उलटे बढ़ जाता है। ‘सात भाई चंपा’ इसका बेहतरीन उदाहरण है, जिसमें मातृहीन सात भाइयों और पारुल दीदी की करुणा मन में गहरे उतर जाती है। इसी तरह ‘निंदिया आ जा’ नागर जी की बड़ी लोकप्रिय पद्यकथा है, जिसमें मुन्नी परियों के पंख लेकर एकदम परियों की तरह चंद्रलोक में पहुँचती है और वहाँ तरह-तरह के तमाशे होते हैं। इसमें एकदम परीकथाओं सरीखी कल्पना का रस-आनंद है।

‘तीन लफंगे’ एक सुधार-कथा है जिसमें हास्य-विनोद के रंग हैं। ‘विकलांगों की सच्ची सेवा’ में एक प्यारी-सी सीख भी है कि विकलांगों पर झूठी दया दिखाने की बजाय हमें उन्हें सहारा देना चाहिए, ताकि वे हिम्मत से जी सकें। पर यह सीख कविता और कथा के रस पर भारी नहीं पड़ती।
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नागर जी ने अपनी बाल कहानियों में जो सुर साधा, वह बच्चों के लिए लिखे गए उनके उपन्यासों में अपनी पूरी लय, ऊँचाई और रससिद्धता हासिल कर लेता है। यहाँ भी बाल साहित्य का जो आदर्श उनके सामने है, वह यही कि बच्चों के लिए लिखना है तो हमें पूरी तरह बाल कल्पनाओं और बचपन के रस में सराबोर होकर लिखना चाहिए। और ठीक यही बात नागर जी के बाल उपन्यासों में है।

यहाँ उनका खुशनुमा रंगों से भरा, कौतुक और मस्ती भरा अंदाज आज भी हमारी पीढ़ी के बहुत-से लेखकों को दिशा देने का काम करता है। बच्चों के लिए उन्होंने चार उपन्यास लिखे हैं—‘बजरंगी-नौरंगी’, ‘बजरंगी पहलवान’, ‘बजरंगी स्मगलरों के फंदे में’ तथा ‘अक्ल बड़ी या भैंस’। इनमें ‘बजरंगी-नौरंगी’, ‘बजरंगी पहलवान’ और ‘बजरंगी स्मगलरों के फंदे में’ एक बड़ी ही कद्दावर शख्सियत वाले बजरंगी पहलवान को केंद्रीय चरित्र बनाकर लिखे गए अद्भुत उपन्यास हैं, जो न सिर्फ विलक्षण कौतुकपूर्ण और जबरदस्त पठनीय हैं, बल्कि उनका अपना एक ऐतिहासिक महत्त्व भी है।

इस शृंखला में ‘बजरंगी-नौरंगी’ उपन्यास सन् 1965 में बाल पत्रिका ‘नंदन’ में दो किस्तों में छपा था और आश्चर्य नहीं कि इस उपन्यास में भारत पर चीन के हमले की छायाएँ बहुत स्पष्ट रूप में नजर आती हैं। यों ‘बजरंगी-नौरंगी’ जिंदादिली से भरपूर एक ऐसा दिलचस्प उपन्यास है जिसमें नागर जी की किस्सागोई का जाना-पहचाना अंदाज अपने पूरे रंग और शबाब में नजर आता है। बजरंगी और नौरंगी के रूप में उन्होंने जिन पात्रों को लिया है, वे हैं भी बड़े गजब के। बजरंगी और नौरंगी दोनों भाई हैं और दोनों में ऐसी-ऐसी खासियतें हैं कि अपनी-अपनी जगह दोनों ही बेजोड़ हैं।

इनमें बजरंगी तो बड़े लहीम-शहीम और ऐसे आदमकद किस्म के पहलवान हैं कि चारों ओर उनके नाम की दुंदुभी बजती है। हालत यह है कि जहाँ कहीं किसी पर मुसीबत पड़े, हर कोई बजरंगी पहलवान के नाम की दुहाई देता है और कोई भी पुकारे, बजरंगी पहलवान उसकी मदद के लिए ऐसे आ जाते हैं, जैसे स्वर्ग से कोई देवदूत उतरा हो। सब ओर उनके प्रशंसक और चाहने वाले हैं और हर ओर उनके निराले किस्से सुनने को मिलते हैं। उपन्यास में बजरंगी पहलवान चांगचू द्वीप के दानव फेनफू को पछाड़ने निकलते हैं, जिसने सबको आफत में डाल रखा है। मायावी दानव फेनफू का जो वर्णन ‘बजरंगी नौरंगी’ में है, वह नाम और शख्सियत दोनों में एक चीनी आक्रांता जैसा लगता है, जिसके खिलाफ पूरे देश में गहरा रोष पनप गया था।

अब बजरंगी पहवान चांगचू द्वीप के उस मायावी दानव से भिड़ने चले तो क्या-क्या तैयारियाँ उन्होंने कीं? वहाँ जाकर किन-किन मुसीबतों में पड़े? इस सबका वर्णन नागर जी ने ऐसी किस्सागोई वाली शैली में किया है कि एक-एक शब्द-चित्र मन को बाँध लेता है। वह शख्स इतनी रहस्यमय शक्तियों से पूर्ण है कि उससे लड़ते-लड़ते बजरंगी पहलवान भी विचित्र मुसीबतों में फँस गए। आखिर छोटे भाई नौरंगी उनकी मदद के लिए दौड़े आए। और फिर दोनों प्यारे और लाजवाब भाई बजरंगी और नौरंगी मिलकर उस रहस्यमय दानव फेनफू की रहस्यमयी शक्तियों की काट करते हुए किस तरह उसे पछाड़ते हैं और उस किले में गुलामों की-सी जिंदगी जी रहे लोगों को मुक्ति दिलाते हैं, यह उपन्यास पढ़कर ही जाना जा सकता है।

अलबत्ता बच्चों के लिए लिखे गए नागर जी के इस उपन्यास में बजरंगी पहलवान के करतबों का वर्णन बेहद रोमांचक है। उपन्यास इतनी जानदार भाषा में लिखा गया है तथा बजरंगी और नौरंगी के चरित्र इतने गजब के हैं कि हिंदी के बाल उपन्यासों में ‘बजरंगी-नौरंगी’ की धज कुछ अलग ही नजर आती है।

‘बजरंगी-नौरंगी’ की तो अब भी यत्र-तत्र चर्चा भी मिलती है, लेकिन नागर जी के ‘बजरंगी पहलवान’ और ‘बजरंगी स्मगलरों के फंदे में’ बाल उपन्यासों को मानो भुला ही दिया गया है। हालाँकि ये खासे रोमांचक और विलक्षण बाल उपन्यास हैं। ‘बजरंगी पहलवान’ बाल उपन्यास की कथावस्तु काऊकाऊ नाम के एक कीमियागर के इर्द-गिर्द घूमती है। काऊकाऊ नाम के इस दुष्ट कीमियागर ने एक ऐसे अनोखे रसायन का आविष्कार किया था, जिससे बर्फ को मिश्री की डली में बदला जा सकता है। अपने इस आविष्कार से काऊकाऊ का दिमाग कुछ इतना बिगड़ा कि उसने पूरे हिमालय पहाड़ को मिश्री में बदलने का षड्यंत्र कर लिया, ताकि अरबों की संपदा कमाई जा सके। इसके लिए उसने चीन, जापान, इंग्लैंड आदि मुल्कों के राजाओं को चिट्ठियाँ लिखीं। नवाब इंग्लैजुद्दौला जैसा स्वार्थी आदमी फौरन काऊकाऊ की मदद करने के लिए तैयार हो गया। इधर कुबेरपुर की हालत खराब है। कुबेरपुर के राजा इस बात से परेशान हैं कि सुगंधा नदी समेत सब नदियाँ सूख गईं, यह हो क्या रहा है?

तब राजा के कहने पर बजरंगी पहलवान बिजली नाम की अपनी घोड़ी पर चढ़कर हाथों में दूरबीन लेकर निकले और काऊकाऊ और इंग्लैजुद्दौला के सारे षड्यंत्र का पता कर लिया। गुस्से में आकर बजरंगी पहलवान पहाड़ की चट्टानों को तोड़-तोड़कर नीचे गिराने लगे, जिससे काऊकाऊ और इंग्लैजुद्दौला के दल में हाहाकार मच गया। आखिर में काऊकाऊ गिरफ्तार होता है और नौरंगी स्वामी उसके सींग और लंबी दुम उगा देता है जिससे वह चिड़ियाघर में कैद होकर दर्शकों का मनोरंजन करे! कुबेरपुर में नदियाँ फिर बह उठती हैं तथा वहाँ खुशहाली छा जाती है। नागर जी के ‘बजरंगी पहलवान’ में वाकई उनके कथाकार की उस्तादाना छटा देखने को मिलती है। यह उपन्यास इतना रोमांचक है कि एक साँस में पढ़ा जा सकता है।

‘बजरंगी स्मगलरों के फंदे में’ उपन्यास भी खासा जोरदार है। इसके नायक भी बजरंगी पहलवान ही हैं, मगर उनके सामने अब समस्या दूसरी है। शहर में स्मगलरों और मुनाफाखोरों के अड्डे बढ़ते जा रहे हैं और लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। बजरंगी पहलवान इस समस्या से भी अपने निराले अंदाज में निबटते हैं और सेठ मानकचंद का असली चेहरा उघाड़ देते हैं। इसमें उनके बड़े निराले और जांबाज शिष्यों की भूमिका भी बड़ी दिलचस्प है और घटना-क्रम तो किसी तिलिस्म की तरह इतना चक्करदार और रहस्यों से भरपूर है कि क्या कहने? अंत में बजरंगी पहलवान किसी बाँके हीरो की तरह सामने आते हैं जो सेठ मानकचंद के पूरे तिलिस्म को चकनाचूर कर देते हैं। इसके बाद शहर में कलात्मक मूर्तियों की चोरी रुक गई और एक बार फिर से बजरंगी-नौरंगी के झंडे गड़ गए।

नागर जी का ‘अक्ल बड़ी या भैंस’ कुछ भिन्न तरह का यथार्थपरक उपन्यास है, जिसमें गाँव के प्रधान और उनके बेटे के चेहरे पर जबर की लाठी वाली अकड़ देखी जा सकती है। हालाँकि कथानायक की अक्ल और समझदारी ने उन्हें नाकों चने चबवा दिए। उपन्यास में गाँव के यथार्थ का वर्णन और घटनाएँ इतनी सजीव हैं कि यह भी बच्चों को खुद में लीन कर देने वाला विलक्षण बाल उपन्यास बन गया है, जिसमें नागर जी की आत्मकथा के रंग छिटके हुए नजर आते हैं। 
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नागर जी के लेखन में किस्सागोई के साथ-साथ नाटकीयता भी कम नहीं है। इसलिए उनके नाटक कैसे होंगे, इसकी कल्पना की जा सकती है। बच्चों के लिए उन्होंने सिर्फ दो नाटक लिखे हैं—‘बालदिवस की रेल’ और ‘परीदेश की सैर’। पर ये दोनों ही यादगार नाटक हैं जिनसे उनके नाटककार की एक मुकम्मल छवि आँखों के आगे आ जाती है। इसलिए कि ये लिखने के लिए लिखे गए नाटक नहीं। ये मानो बच्चों के साथ उसी तरह खेलते हुए और खेल-खेल में रचते हुए लिखे गए नाटक हैं, जैसा एक बेहतरीन उदाहरण हमारे पास रेखा जैन का है।

सच्ची बात तो यह है कि नाटक नाटक तो है, पर सबसे पहले वह खेल है। इसीलिए नाटक किया नहीं जाता, नाटक खेला जाता है। अगर आप बच्चों के साथ खेल नहीं सकते तो आपको बच्चों के लिए नहीं लिखना चाहिए और कम से कम नाटक तो नहीं लिखना चाहिए। और नागर जी बच्चों के साथ खेलते हुए इतने रम जाते हैं कि बच्चों और उनके बीच के फासले एकदम हवा हो जाते हैं।

यही वजह है कि ‘बाल दिवस की रेल’ में वे मानो बच्चों के साथ पूरे भारत की यात्रा पर निकल जाते हैं और यह यात्रा इतनी आनंदपूर्ण और यादगार है कि लगता है, काश, हम भी नागर जी के साथ होते और इन दुर्लभ क्षणों का आनंद लेते। इसी तरह ‘परीदेश की सैर’ में परी तो है, पर परी से ज्यादा यह उड़ने का सुख है और उड़ते हुए बच्चों के साथ बच्चा बनकर एक कल्पना की दुनिया बसाने का सुख है जो हमारी दुनिया से कहीं अधिक सुंदर है, इसलिए कि उसमें हमारी दुनिया की तमाम जड़ताएँ और भौंडापन नहीं है।

पर नागर जी अपने नाटकों में यह रस लाते कैसे हैं? यह जानना हो तो उनका अद्भुत व्याख्यान ‘आओ बच्चो नाटक लिखें’ पढ़ लीजिए, जो खुद में किसी नाटक से कम दिलचस्प नहीं है। इसलिए कि यह बच्चों के बीच दिया गया व्याख्यान है और नागर जी बच्चों को नाटक के बारे में बता कम रहे हैं, उनके साथ-साथ नाटक रच ज्यादा रहे हैं। नाटक का प्लाट कैसा हो, चरित्र कैसे हों जो एकदम सच्चे और प्रभावी हों, दोस्ती सच्ची हो तो उसे कैसे दर्शाया जाए, दुश्मनी या ईर्ष्या नाटक में किस तरह असरदार ढंग से दिखाई जाए? यानी इतनी चीजें इस व्याख्यान में आ-आकर नाटक की शक्ल लेती हैं कि यह खुद में एक क्रिएटिव नाटक सरीखा बन गया है।

सच पूछिए तो यह कोई व्याख्यान नहीं, बल्कि बड़े आनंद के साथ नाटक को पल-पल जीते हुए, कहे गए शब्द हैं। पढ़ते हुए आपको लगेगा कि नागर जी नाटक पर बोल रहे हैं और सामने नाटक चल रहा है। 
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और अब दो शब्द ‘बाल महाभारत’ के बारे में, जो नागर जी का एक बड़ा शाहकार काम है, जिसकी तरफ दुर्भाग्य से बाल साहित्य से जुड़े लोगों का भी अधिक ध्यान नहीं गया था। हालाँकि यह बड़े श्रम और बड़ी मेधा से लिखी गई कालजयी कृति है। नागर जी ने बड़ा रस लेकर बच्चों के लिए महाभारत की यह कथा लिखी है। महाभारत शुरू होने से पहले मोहल्ले के सब लोगों की पिकनिक का किस्सा भी मजेदार है। और यह पिकनिक स्थल है नैमिषारण्य जहाँ चारों ओर पेड़ ही पेड़ हैं, हजारों पेड़। बच्चे सोच रहे थे, इस जगह में भला क्या खास बात है? पर तभी एक साधु बाबा प्रकट होते हैं जो बच्चों को प्रतीति कराते हैं कि इस जंगल का हर पेड़ एक-एक ऋषि है और आधी रात को यह जंगल महाभारत की कहानियाँ सुनाता है।

फिर तो जैसे जादू हो गया। सचमुच उस जंगल में पुराणकालीन हजारों ऋषि प्रकट हो गए, जंगल कहानियाँ सुनाने लगा और बाबा जी की सुनाई उन कहानियों में महाभारत की पूरी कथा रूप-आकार पाने लगी। नागर जी ने सचमुच बच्चों के लिए महाभारत का कथारस निचोड़कर प्रस्तुत कर दिया है, अपनी इस चिर परिचित किस्सागोई के साथ कि हर पल प्रतीक्षा रहती है कि फिर क्या हुआ, आगे क्या हुआ? काश, नागर जी का यह बाल महाभारत एक स्वतंत्र पुस्तक में सुंदर और सजीव चित्रों के साथ सामने आए, तो यह बाल पाठकों के लिए एक खूबसूरत सौगात या अनमोल धरोहर बन जाएगी। यहीं इस बात का जिक्र भी जरूरी है कि प्रेमचंद ने भी किशोरों के लिए पूरी रामकथा लिखी थी, हालाँकि वह उर्दू में थी। तो भी यह तो जरूर समझ में आता है कि प्रेमचंद हों या अमृतलाल नागर, वे बच्चों को भारतीय कथा-परंपरा से जोड़ने की जरूरत कितनी शिद्दत से महसूस करते थे। इसके पीछे की उनकी बेचैनी और सोच को आज गंभीरता से समझने की दरकार है।

इसी तरह ‘इतिहास झरोखे’ नागर जी का अपने ढंग का एक बड़ा काम है, जिसमें देश-विदेश के महापुरुषों की जीवनियाँ हैं। यहाँ भी कथा-युक्ति के रूप में एक जादुई दर्पण उपस्थित है जो इतिहास को बड़ा मोड़ देने वाले एक-एक युगनायक के चरित की सच्ची तसवीर पेश करता है। इनमें ऋषभदेव हैं, राजा सगर हैं, अगस्त्य मुनि हैं, राम, कृष्ण और गौतम बुद्ध हैं तो ईसा और पैगंबर मोहम्मद साहब भी हैं और उनके धवल चरित्र मानवता की सच्ची पूँजी बनकर हमारे सामने आने लगते हैं।

बच्चों के लिए रवींद्रनाथ ठाकुर की जीवनी भी नागर जी ने लिखनी शुरू की थी, जो दुर्भाग्य से पूरी नहीं हो सकी। हाँ, कवींद्र रवींद्र के बचपन की कथा अवश्य उनकी संपूर्ण बाल रचनाओं के बृहत् संचयन में उपलब्ध है और यह बड़े रोचक अंदाज में लिखी गई है। 
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वैसे यह बात भी कम दिलचस्प नहीं है कि नागर जी जिन्होंने अपनी साहित्य-यात्रा के शुरुआती चरण में ही बाल साहित्य की महत्त्वपूर्ण रचनाएँ दी थीं, वे अपनी जीवन-यात्रा के आखिरी चरण में भी बच्चों के साथ खेल-खेलकर लिखने में व्यस्त थे। और कुल मिलाकर उनका मिजाज और अंदाजेबयाँ वही है जो शुरू में था। हाँ, आखिर तक आते-आते वह और सादा होता चला गया और अपनी सादगी में कुछ और निखर गया। इससे यह भी पता चलता है कि अमृतलाल नागर उन लेखकों में न थे, जो बस कभी-कभार मौज में आकर बच्चों के लिए भी एकाध रचना लिख देते हैं, मानो ऐसा करके कोई अहसान कर रहे हों। इसकी बजाय वे बाल-मन और कल्पनाओं से सराबोर लेखकों में थे, जो बच्चों के लिए लिखने में सचमुच आनंद अनुभव करते थे।

यह एक ऐसी चीज थी जो उनके व्यक्तित्व से एकाकार थी और उन्हें हर क्षण जीने का उत्साह और रचने की प्रेरणा देती थी। यही वजह है कि प्रेमचंद की तरह ही हिंदी बाल साहित्य की पुख्ता नींव रखने वाले दिग्गज लेखकों में अमृतलाल नागर का नाम भी हम बड़े फख्र के साथ लेते हैं।

यह कम प्रसन्नता की बात नहीं कि नागर जी की संपूर्ण बाल रचनाएँ जिन्हें उनके साहित्यमना पुत्र शरद नागर जी ने कोई बीस वर्षों के निरंतर श्रम और अध्यवसाय से एकत्र किया, अब पुस्तकाकार उपलब्ध हैं। हिंदी बाल साहित्य के लिए यह एक गौरवपूर्ण उपलब्धि है। खासकर इस हालत में, जबकि शरद जी खुद ह्वील चेयर पर थे और बड़ी कठिनाई से चल-फिर पाते थे, उन्होंने इतना बड़ा काम पूरा कर दिखाया, यह और भी चकित कर देने वाला है। 
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