आत्मकथा-अंश: चंदर, बुद्धू है तू, यह तो फिल्म है!

प्रकाश मनु

प्रकाश मनु


श्याम भैया ने मेरे लिए जिंदगी और कला का एक नया झरोखा और खोला। फिल्में। श्याम भैया के साथ बहुत फिल्में देखीं। इनमें ‘भाभी’ और ‘छोटी बहन’ देखने की काफी अच्छी स्मृति है। ‘हम पंछी एक डाल के’, ‘काला बाजार’, ‘कैदी नं. नौ सौ ग्यारह’ और ‘मिस मेरी’ फिल्मों की भी धुँधली सी याद है। इसी तरह कुछ और फिल्में थीं, जिनके नाम तो याद नहीं आ रहे, पर उनके कुछ दृश्य बार-बार याद आते हैं और कुछ फिल्मों के गाने तो इस तरह स्मृति-पटल पर टँक गए कि उन्हें याद करते ही पूरा दृश्य आँखों के आगे साकार हो उठता है। 
‘छोटी बहन’ में राखी बाँधने से जुड़ा बड़ा करुण प्रसंग है। और संयोग से यह फिल्म रक्षाबंधन के आसपास ही आई थी। मुझे अच्छी तरह याद है कि उस दिन राखी का त्योहार था, जब श्याम भैया प्रकाश टाकीज में हमें यह फिल्म दिखाने ले गए थे। पर उनके बहुत भाग-दौड़ करने पर भी टिकट नहीं मिल पाए। वहाँ से सिर झुकाए हुए निराश लौटे तो मन कुछ ऐसे टूक-टूक था, मानो विश्वविजय के लिए निकली सेना कहीं से बुरी तरह हारकर और उजड़कर लौट रही हो। हालाँकि शायद दो-एक दिन बाद हम फिर श्याम भैया के ही साथ वहाँ गए और फिल्म देखी।

फिल्म सचमुच भावुक कर देने वाली थी। कहानी, अभिनय, गीत-संगीत हर तरह से बाँध लेने वाली। सभी ने फिल्म को बहुत पसंद किया। लौटते समय बारिश हो रही थी तो हम लोग साथ-साथ भीगे भी। और घर लौटने के बाद कपड़े बदलकर कड़क चाय के साथ गरमागरम पकौड़े खाए, तो फिल्म देखने का आनंद कई गुना बढ़ गया।

पर सच कहूँ, फिल्म देखते हुए मैं रो रहा था। मैंने आधी से ज्यादा फिल्म रोते-रोते ही देखी। छोटी बहन के साथ हुआ अन्याय और उसका दुख मुझसे बरदाश्त नहीं हो रहा था। इस फिल्म का बड़ा ही दर्द भरा गाना था, “भैया मेरे, छोटी बहन को न भुलाना....!” हालाँकि मैं ‘भुलाना’ को ‘बुलाना’ समझ रहा था और सोच रहा था कि भला छोटी बहन ने ऐसा क्या किया कि उस बुलाया ही न जाए। यह तो कुछ ठीक बात नहीं है। तो भी छोटी बहन का दर्द ऐसा था कि वह आठ-आठ आँसू रुला रहा था।

कहना न होगा कि इस फिल्म की मेरे जीवन में एक खास जगह है। इसलिए कि यह मेरी देखी हुई शुरुआती फिल्मों में से है।

इसी तरह फिल्म ‘कैदी नं. नौ सौ ग्यारह’ की भी याद है। इसमें एक शख्स अपराध की राह पर चल निकलता है। उसे रोकने की कोशिशें कामयाब नहीं होतीं। इस फिल्म का एक दृश्य याद आता है। नायक बुराई की राह छोड़कर अच्छाई पर चलने का संकल्प लेता है। फिर कुछ ऐसा होता है कि उसे मजबूरी में अनचाहे ही हाथ में चाकू पकड़ना पड़ता है। लेकिन घर से निकलने से पहले वह मंदिर में ईश्वर के आगे हाथ जोड़कर इसके लिए माफी माँगता है और अपनी मजबूरी बयान करता है, जिसके कारण उसे फिर उसी खराब राह पर चलना पड़ रहा है। फिल्म का एक गाना भी याद आ रहा है। उसमें एक माँ अपने बच्चे को बड़े प्यार-दुलार से भरकर सीख देती है, ताकि वह इऩसानियत की राह पर चले और कहीं भटके नहीं। माँ का कहना है—
मीठी-मीठी बातों से बचना जरा,
दुनिया के लोगों में है जादू भरा।

इस पर बच्चा भरोसा देता है कि वह सँभलकर रहेगा और भलाई की राह पर ही चलेगा। साथ ही, “आगे ही आगे बढ़ाऊँगा कदम...!”

इस गाने में माँ और बच्चे के बीच संवाद इतने नाटकीय हैं और फिल्म में उनकी प्रस्तुति इतनी खूबसूरत है, कि मैं अब भी उसे भूल नहीं पाया। संभवतः फिल्म में अभिनेत्री नंदा माँ बनी है, और बच्चे के रूप में डेजी ईरानी है। गाने में माँ और बच्चे की बातें इस कदर दिल को छू लेती हैं कि सुनने वाले का हृदय उमड़ने लगता है।

इसी तरह श्याम भाईसाहब के साथ मैंने ‘मिस मेरी’ फिल्म देखी थी। इस फिल्म की कुछ खास याद नहीं। बस, इतना याद है कि इस फिल्म में एक गाना है, जो मुझे बहुत पसंद है, “ऐ दूर के मुसाफिर, चंदा मुझे बता दे, मेरा कसूर क्या है, तू फैसला सुना दे...!”

चाँद को देखकर नायक अकेले में यह गाना गाता है तो मन दर्द में डूबता चला जाता है। पता नहीं कैसा दर्द था उस नायक जो, मेरे भीतर उतर गया। और मैं बहुत दिनों तक उसे याद करता रहा। आज भी वह दर्द भरी अनुभूति मेरे भीतर से गई नहीं है।
फिर एक फिल्म थी जिसमें देवानंद टिकटों की कालाबाजारी करता है और पिटता है। शायद फिल्म का नाम ‘कालाबाजार’ था। इसी तरह एक फिल्म थी, ‘हम पंछी एक डाल के’ जिसमें बहुत से पंछी एक साथ डाल से फुर्र करके उड़ते हैं और फिर युवाओं की तकलीफों पर फिल्म चल पड़ती है। फिल्म में पंछी भी थे, लड़के भी... पर यह समझ न आया था कि पंछी इन लड़कों को ही कहा जा रहा है। बाद में कभी दोबारा वह फिल्म देखी तो उसकी खूबसूरती का मैं कायल हो गया।
*

एक बात बड़ी अजीब थी। जब फिल्म में गाना आता तो श्याम भैया हॉल से बाहर चले जाते थे और गाना खत्म होते ही फिर आकर सीट पर बैठ जाते। मुझे हैरानी थी, सिर्फ श्याम भैया ही नहीं, बहुत से युवा और तरुण लोग ऐसा ही करते थे। वे बाहर आकर कुछ गपशप करते, थोड़ा घूम लेते और फिर जब फिल्म की कहानी आगे चल पड़ती तो वे आकर शामिल हो जाते थे। 

मुझे यह बड़ा विचित्र लगता था, इसलिए कि मुझे तो गाने ही अच्छे लगते थे। उन दिनों फिल्मों में गाने बहुत होते थे और बेहद सुरीले गाने होते थे। मैं उनका आनंद लेता, उनके सुरों के साथ-साथ भावना के ज्वार में बहता था। श्याम भैया और उनके बहुत से दोस्त गाना शुरू होते ही बाहर क्यों चले जाते थे, यह मैं तब भी नहीं समझ पाया था, आज भी नहीं समझ पाता।

एक बात और। फिल्म में कोई भी करुण दृश्य आता तो मुझे रोना आ जाता था। पूरे गाल आँसुओं से भीग जाते और कभी-कभी तो हिचकियाँ भी बँध जातीं। मुझे बात-बात पर रोते देख श्याम भैया डाँटते, “चंदर, बुद्धू है तू, यह तो फिल्म है। इसमें रोने की क्या बात..?”

पर फिल्म और जिंदगी के फर्क की बात मेरे पल्ले न पड़ती। पर्दे पर किसी का दुख देखकर मैं बिल्कुल सब्र नहीं नहीं कर पाता था। पहले आँसू बहते, फिर मैं चुप-चुप रोने लगता। पूरा चेहरा आँसुओं से भीग जाता।

इस पर श्याम भैया डाँटते, “अब तू रोया तो आगे कभी नहीं लाऊँगा!” उनका यह अस्त्र काम कर जाता, मैं बमुश्किल अपने आँसुओं पर काबू पा लेता। पर कुछ देर बाद फिर वही हालत। श्याम भैया जानते थे मेरी हालत। इसलिए बहुत ज्यादा डाँट-फटकार उन्होंने नहीं की।

और सच पूछिए तो मेरी यह हालत आज भी होती है। कोई फिल्म या कोई दुख भरी कहानी-उपन्यास पढ़ूँ तो कई बार तो अकेले में ही रोना छूटता है, पूरा चेहरा आँसुओं से भीग जाता है। मैं बार-बार आँखें पोंछता हूँ, पर आगे पढ़ने की उत्सुकता जरा भी कम नहीं होती। एक अजीब सा भावावेग...!

इसके बरक्स श्याम भैया पिक्चरों के शौकीन जरूर थे, लेकिन मजे के लिए पिक्चरें देखते थे, आँसू-वाँसू बहाने के लिए नहीं। और ज्यादातर वे अकेले नहीं, दोस्तों के साथ ही पिक्चर देखने जाते थे। घर में उन दिनों उन्हें काफी डाँट पड़ती थी। वे डाँट खाते, इम्तिहान में फेल होते, मगर मजाल है जो उनकी शरारतें छूट जाएँ। वे शरारतें, जिन्हें बड़े भाई और पिता जी आवारागर्दी कहा करते थे। 
फिर भी श्याम भैया किसी न किसी तरह आँख बचाकर अपने ‘लक्ष्य’ तक पहुँच ही जाते। इस मामले में उनकी योग्यता और रहस्यात्मक शक्तियों का तो जवाब नहीं था। कभी-कभी तो ऐसा भी होता कि आधी पिक्चर आज देख ली, बाकी की बची हुई कल। गेटकीपर उन्हें जानते थे और मजाल है कि श्याम भैया से कोई कुछ कह सके।

दो-एक बार ऐसा भी हुआ कि इंटरवल में वे घर चले आए। घर में पानी पिया, इधर-उधर घूमकर सूँघा कि कहीं कोई खतरा तो नहीं? और सब ठीक-ठाक होने पर दौड़कर फिर पिक्चर हॉल में पधार गए। पिक्चर खत्म होने पर घर आए तो कहते, “मैं तो यहीं था। चंदर से पूछ लो। दो बजे मैंने इसके पास बैठकर अमरूद खाया और पानी पिया था। अंग्रेजी का एक लेसन भी याद किया था।...पूछो इससे!”

जाहिर है, मुझे ‘हाँ’ ही कहना पड़ता था, वरना उनका गुस्सा क्या मैं जानता न था? और श्याम भैया की जीत हो जाती! ऐसे क्षणों में उनका चेहरा और अधिक लुभावना और गोलमटोल नजर आने लगता।

एक-दो बार श्याम भैया ने मुझे भी इस रपटीले रास्ते पर चलाने की हलकी-सी कोशिश की। लेकिन मेरा रुझान किताबों की ओर देखकर और कुछ शायद बड़े भाई की जिम्मेदारी का ख्याल करके छोड़ दिया। इस बारे में एक घटना मुझे अब भी याद है।

उस दिन श्याम भैया पिक्चर देखकर इंटरवल में घर आए थे। अब राम जाने कौन सी पिक्चर थी, बिल्कुल दिमाग से नाम उतर गया। पर इस बीच घर पर उनकी बुरी तरह ढूँढ़ मची थी। उन्हें दुकान पर किसी जरूरी काम से जाना था और वहाँ से जल्दी मुक्ति असंभव थी। उनके पास पिक्चर की आधी टिकट थी जो उनकी सफेद मक्खन जीन की पेंट में सुरसुरा रही थी। चोरी से उसे मेरे हाथ में थमाते हुए बोले, “जा चंदर, जल्दी से चला जा। गेटकीपर को दे दियो, अंदर बिठा देगा। कह दियो, श्याम भैया मेरे भैया हैं—सगे भाई।”

“मगर...!” मैंने प्रतिवाद करना चाहा। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था, माजरा क्या है? बल्कि मेरी हालत उस बिल्ली जैसी हो रही थी, जिसे जबरदस्ती किसी हँड़िया में सिर फँसाने के लिए कहा जाए।

“मैंने आधी पिक्चर देख ली है। यह टिकट ले जा, बाकी आधी तू देख लेना। रात को मुझे स्टोरी सुना देना, शुरू की स्टोरी मैं तुझे सुना दूँगा। बस, पूरी पिक्चर तेरी भी हो जाएगी, मेरी भी।” श्याम भैया ने फिर उकसाया।

“मगर मुझे इंग्लिश ग्रामर की तैयारी करनी है, कल टैस्ट है।” मैंने झूठ बोला।

“तो क्या फर्क पड़ता है? कोई डेढ़ घंटे की बात है, बल्कि पंद्रह मिनट तो निकल ही गए।...जा, दौड़ जा।”

“मगर...वहाँ दिक्कत तो नहीं आएगी? गेटकीपर...!” मैंने अब ‘अगर-मगर’ की शरण लेनी चाही। लेकिन श्याम भैया के पास मेरी हर समस्या का समाधान था, “अरे, जा तो। तू कहियो, मैं श्याम का भाई!...सब मुझे जानते हैं।”

मैं बड़े भारी मन से उठा। बड़ी कातर आँखों से श्याम भैया की ओर देखता हुआ कि शायद अब भी मुझ पर तरस खाएँ। आखिर उनकी बड़ी-बड़ी आँखों से डरता हुआ बाहर आ गया। घूमता-घूमता प्रकाश टॉकीज में पहुँचा। स्कूल से आते हुए दूर-दूर से देखा था और शायद तब तक एकाध पिक्चर भी श्याम भैया के साथ देखी थी, मगर...ऐसे!

इधर से घुसकर देखा, डर लगा...गेटकीपर! वह कोई मुच्छड़ सा बंदा था, चेहरे पर भरपूर गुंडापन! उधर से घुसकर देखा, डर लगा—यहाँ से देखा, डर लगा...वहाँ से देखा, डर लगा। पहले तो यह अंदर घुसने ही नहीं देगा और घुस भी गया तो भीतर अँधेरे में सीट तक कैसे पहुँचूँगा?

अँधेरा मेरे मन में डर बनकर घुस गया और मैं दुम दबाकर भागा। मगर इससे भला मुक्ति कैसे होती? शाम को श्याम भैया ने पूछा, “पिक्चर देखी थी...?”

“हाँ।” मैंने झिझकते हुए कहा।

“कैसी लगी...?”

“अच्छी।”

“वाकई कि ऐसे ही बोल रहा है...?”

“नहीं, वाकई...!”

मगर जाने क्या चोर था मेरे बोलने में कि वो समझ गए। मुझ पर आँखें गड़ाकर पूछा, “अच्छा! बता, क्या था उस पिक्चर में?”

अब मैं घबराया। सीधे-सीधे बता दिया, “नहीं देखी।”

“फिर...?”

“मैं गया तो था, लौट आया।”

“क्यों?”

“अंदर जाने का दिल नहीं किया।” कहते-कहते मेरी आवाज भर्रा गई।

“हूँ!...बेकार करा दिए न पैसे। तू किसी काम का नहीं है चंदर, क्या करेगा जीवन में?”

मुझे डर लगा, अब जरूर पिटाई होगी। मगर श्याम भैया थोड़ी देर मुझे कड़ी निगाहों से देखते रहे, फिर सॉफ्ट-सॉफ्ट हो गए।

“तुझे पिक्चरें अच्छी नहीं लगतीं?” बालों में कंघी करते हुए अचानक उन्होंने रुककर पूछा। मैं चौंका, 
अरे! यह मेरे ही श्याम भैया की आवाज है? इतना बहता हुआ स्नेह।

“नहीं, ज्यादा पसंद नहीं हैं...!” जाने क्या हुआ कि मैं रो पड़ा।

“पढ़ना अच्छा लगता है?” मेरी ठोड़ी पकड़कर उठा दी है उन्होंने।

“हाँ।” मैंने कहना चाहा, मगर सिर्फ एक मरी हुई फुस-फुस निकली मेरे होंठों से।

“ठीक है, मैं किताबें ला दूँगा।” और मेरी पीठ थपथपाकर चले गए।

पता नहीं कब तक मैं बैठा रहा, क्या-क्या सोचता रहा। शायद यह कि मेरे श्याम भैया क्या हमेशा ऐसे ही नहीं बने रह सकते, जैसे कि आज...? लेकिन श्याम भैया बदले, थोड़े से तो जरूर ही बदल गए।
*

इसके बाद वे न सिर्फ मेरे लिए किताबें लाते, दोस्तों के बीच भी जमकर तारीफ करते और कम से कम उन्हें मेरा मजाक तो नहीं उड़ाने देते। उन्होंने जो किताबें लाकर दीं, उनमें राजपाल एंड संस से छपी चंद्रशेखर आजाद और भगतसिंह की बाल जीवनियों की मुझे अब भी याद है। ये किताबें वर्षों तक मेरे पास रहीं।

श्याम भैया उनके बारे में पूछते और दोस्तों के बीच गर्व से कहते, “देखना, चंदर एक दिन बड़ा आदमी बनेगा!” मुझे अच्छा लगता, लेकिन अगले ही पल मैं झेंप जाता। कुछ भी हो, श्याम भैया के दोस्त जो उम्र में मुझसे बहुत बड़े थे, अब मेरा सम्मान करने लगे थे। और इस बात से मैं दूनी झेंप महसूस करता था और कन्नी काटने लगा था।

इसी चक्कर में मेरी एक ‘मैराथन’ दौड़-प्रतियोगिता हुई थी, श्याम भैया के एक दोस्त के छोटे भाई हरि के साथ। हालाँकि हरि मुझसे कोई दो-तीन बरस बड़ा तो जरूर ही होगा। बात कलकत्ते वाली कोठी की है, जहाँ हम कुछ समय किराए पर रहे थे। उन दिनों हमारा मकान बन रहा था। श्याम भैया ने मेरी दौड़ाकी की इतनी तारीफ की कि खेल-खेल में उन लोगों की बदाबदी हो गई। और दौड़ना पड़ा मुझे और हरि को। 

एक बार हम तकरीबन बराबरी पर छूटे थे, दूसरी बार मैं हारा। दौड़-प्रतियोगिता का आइडिया श्याम भैया का था। वे मुझे तेज-तेज चलते या भागते देखते थे तो उनके मन में कहीं यह बात बैठी होगी कि मैं अच्छा धावक बन सकता हूँ। मैं नहीं बन सका, पर इससे श्याम भैया की बारीक निगाह का पता चलता है, जो दूसरे के गुण पहचानने और उसकी खुली तारीफ करने में कोताही नहीं बरतते थे।
*

मजे की बात यह है कि श्याम भैया ने ही मुझे प्रेमचंद से पहली दफा मिलवाया था। उन्होंने मुझे प्रेमचंद की कहानियों की किताब ‘प्रेमचंद की श्रेष्ठ कहानियाँ’ किताब लाकर दी थी। इसी पुस्तक में थी उनकी वह महान कहानी, ‘बड़े भाईसाहब’ जिसे मैं मरते दम तक नहीं भूल पाऊँगा। क्या कहानी थी, क्या बात। क्या गजब का चरित्रांकन! उस कहानी को आज तक पढ़ी हजारों अच्छी और खूबसूरत कहानियों से मैं अलगा सकता हूँ। यह कहानी प्रेमचंद ही लिख सकते थे जो एक साथ अपने रचे पात्रों की कमजोरियों और खासियत दोनों को देख रहे होते थे। इतना ही नहीं, कहानी के शहंशाह की तरह जो वे देखते और सोचते थे, उसे कहानी में लाकर भी दिखा देते थे।

उस वक्त भी जब पहलेपहल पढ़ी थी, इस कहानी ने मेरे भीतर अजब-सी हलचल भर दी थी, क्योंकि यह तो हू-ब-हू हमारी कहानी थी—मेरे और श्याम भैया के अद्भुत संबंधों की कहानी। बाप रे बाप, प्रेमचंद को इसका पता कैसे चला और वे इतना पहले लिख कैसे गए यह कहानी? मैं चक्कर में पड़ गया था।

अलबत्ता सारी कहानियाँ मैं कोई डेढ़-दो दिनों में चाट गया था और जब ‘बड़े भाईसाहब’ कहानी पढ़ी थी, तो मेरी हालत यह कि ऊपर की साँस ऊपर, नीचे की नीचे। अरे! मेरी और श्याम भैया की यह कहानी प्रेमचंद ने कैसे लिख ली? मेरा मन हुआ कि दौड़कर श्याम भैया के पास जाऊँ और उन्हें बताऊँ कि देखिए-देखिए, यह जो प्रेमचंद के ‘बड़े भाईसाहब’ हैं न, बिल्कुल...बिल्कुल...जैसे आप!
पर उत्तेजना में, एकांत में खुशी से हाँफते हुए यह सोचना जितना आसान था, श्याम भैया के पास जाकर उसे कहना उतना ही मुश्किल! अगर खुदा न खास्ता उन्हें गुस्सा आ गया तो? मेरी हड्डी-पसली एक हो जाएगी।

तो भी श्याम भैया जो थे, सो थे। उनसे डर और संकोच के बावजूद एक अंदरूनी गहरा-गहरा-सा प्यार था और मेरी जिंदगी मजे में चल रही थी। मन में कहीं एक गहरी आश्वस्ति-सी थी कि कहीं कुछ भी हो, श्याम भैया सब सँभाल लेंगे। वे परम समर्थ हैं, उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
बचपन में मेरे ‘हीमैन’ थे श्याम भैया। और ‘हीमैन’ ही नहीं, सच्ची कहूँ तो गॉडफादर भी। हालाँकि उन्होंने होना चाहा नहीं था, यह मैं ही था जो प्रेम और आतंक से भरकर उनकी पूजा-सी करता था।
श्याम भैया थे ही ऐसे ग्रेट...!
*

हालाँकि नियति को शायद यह मंजूर नहीं था कि इतनी मस्ती से सराबोर श्याम भैया इतने खिले-खुले रहें। एक त्रासदी हमारे घर में घटित हुई और श्याम भैया एक अव्यक्त रोग की लपेट में आ गए।

हुआ यह कि मेरे सबसे बड़े भाईसाहब बलराज जी नहीं रहे। हार्टअटैक से वे गए...कुल बत्तीस साल की उम्र में। लगा कि पूरे घर में भूचाल आ गया और धरती काँप गई। वे घर के सबसे जिम्मेदार पूत थे और माँ-बाप के लिए बहुत बड़ा सहारा। खुद उनका अपना परिवार भी था। छोटे-छोटे बच्चे। उनकी विनम्रता और सद्चरित्र के कारण समाज में सब उनका आदर करते थे। पर हा, हंत!...उनका इस तरह जाना! हे भगवान, यह कैसी तेरी लीला। जिसने भी सुना, वह अवाक रह गया।

मुझे याद है, श्याम भैया ही हम भाई-बहनों को स्कूल से लेने के लिए आए थे। उस समय का उनका चेहरा नहीं भूलता। जैसे सारा खून सूख गया हो। कुछ पूछने की हमारी हिम्मत नहीं हो रही थी, पर समझ रहे थे कुछ ऐसा अघट घट गया है, जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। घर आए तो देखा, कुहराम मचा है। सारे भाई-बहन फूट-फूटकर रो रहे थे। माँ विलाप कर रही थीं, पिता विलाप कर रहे थे। सबको देख-देखकर हम बच्चे भी रोए, पर अकेले श्याम भैया होंठों को भींचकर बैठे थे। जैसे अंदर ही अंदर दुख को जज्ब कर रहे हों!

माँ ने देखा तो रोते-रोते बोलीं, “मेरा शाम रो नईं रया। कोई उन्नू रुआओ।”

पर श्याम भैया नहीं रोए। बस, होंठ भींचे बैठे रहे। और तभी से उनके भीतर जैसे कोई सदमा बैठ गया।...बहुत दिनों तक वे गुमसुम से रहे, फिर कुछ सामान्य हुए। पर उस हादसे का असर यह हुआ कि बीच-बीच में अचानक वे एकदम सुस्त और गुमसुम हो जाते। सामन्यतः खूब खुश रहते। पर बीच में कभी-कभी बहुत ढीले और उदास लगने लगते। माँ उनकी यह हालत सबसे ज्यादा समझती थीं और बहुत चिंता-फिक्र करती थीं। इसलिए जब तक श्याम भैया नहा-धोकर ठीक से खा-पी न लें, माँ के गले से भी खाने का कौर उतरता न था।...और एक दिन इसी ने उनके प्राण ले लिए। 

श्याम भैया को बहुत छोटी जिंदगी मिली। 1946 का उनका जन्म था और चवालीस बरस की अवस्था में वे चले गए। माँ 1988 में गुजरीं, वे 1990 में। जैसे माँ के पीछे-पीछे वे भी चल दिए हों।...हालाँकि इस छोटी सी जिंदगी को उन्होंने भरपूर जिया। सब पर भरपूर प्यार लुटाते हुए। मुझे भी बाद के दिनों में बड़े भाई और दोस्त दोनों का मिला-जुला प्यार दिया। मेरे दोस्त घर पर मिलने आते तो मुझसे ज्यादा श्याम भैया से बतियाना उन्हें पसंद था और श्याम भैया उन्हें खूब खिला-पिलाकर भेजने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ओढ़ लेते।

आज मैं कुछ न होता कहीं न होता, अगर बचपन में श्याम भैया ने किसी उस्ताद और गुरु की तरह कसकर भीतर-बाहर से थाप लगाते हुए मुझे पक्का न किया होता। वे मेरे दोस्त भी थे, गाइड भी, हीरो भी। उनके होते हुए लगता था, कोई मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वे मुझे सर्वशक्तिमान लगते, जिनकी छाया में मैं सुरक्षित था और बड़े आनंद से जी रहा था। उन्हें याद करते ही लगता है, मैं एक बार फिर बचपन में पहुँच गया हूँ, और चोरों ओर से ‘कुक्कू...कुक्कू’ की आवाजें सुनकर आनंदविभोर हो रहा हूँ।

ऐसे श्याम भैया को भला मैं भूल भी कैसे सकता हूँ?
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प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
चलभाष: 09810602327,
ईमेल: prakashmanu333@gmail.com

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