व्यंग्य की परंपरा को समृद्ध करते हुए व्यंग्य – सर क्यों दाँत फाड़ रहा है

- राजेंद्र चौधरी


सर क्यों दाँत फाड़ रहा है (व्यंग्य)
लेखक: धर्मपाल महेंद्र जैन
तृतीय संस्करण- 2020 (पेपर बैक)
ISBN: 97893-89917-307
पृष्ठ: 120, पेपरबैक
मूल्य: ₹ 200 रुपये
प्रकाशक -किताबगंज प्रकाशन, गंगापुर सिटी 322201


धर्मपाल महेंद्र जैन
धर्मपाल महेंद्र जैन के व्यंग्य संकलन “सर क्यों दाँत फाड़ रहा है” का तीसरा संस्करण मेरे हाथों में है। यह उनकी पहली किताब है जो 1984 में व्यंग्य सम्राट श्री हरिशंकरजी परसाई के आशीर्वचन के साथ प्रकाशित हुई थी। इसमें संकलित रचनाओं का रचनाकाल 1976-1983 के समय का है। परसाईजी अपने पुरोवाक् में कहते हैं- 'ज़रूरी नहीं कि व्यंग्य में हँसी आए। यदि व्यंग्य चेतना को झकझोर देता है, विद्रूप को सामने खड़ा कर देता है, आत्म साक्षात्कार कराता है, सोचने को बाध्य करता है, व्यवस्था की सड़ांध को इंगित करता है और परिवर्तन के लिए प्रेरित करता है तो वह सफल व्यंग्य है।' धर्मपाल के व्यंग्य इस मानकों पर खरे उतरते हैं।

धर्मपाल की यह किताब 1985 में चर्चा में आई, जब इस पर रंग चकल्लस में सुप्रसिद्ध व्यंग्य आलोचक श्री बालेंदु शेखर तिवारी ने इस पर समीक्षा लिखी। 1985 में ही 'आजकल' और 1986 में 'मधुमति’ ने इस पर समीक्षाएँ प्रकाशित की। ‘आजकल’ ने लिखा (1985 डिजिटल खंड 41, पृ 49) “इन इकतीस लेखों के युवा लेखक धर्मपाल महेन्द्र जैन के व्यंग्य में चुभन और पैनापन पर्याप्तमात्रा में है, साथ ही लेखक की भाषा शिष्टता का भी दामन नहीं छोड़ती। उसकी भाषा-शैली में वैचारिक व्यंग्यात्मकता के साथ-साथ साहित्यिक चेतना भी उजागर होती है। ‘एक अदद तत्व’ इसका उदाहरण है। गुंडा तत्व की शास्त्रीय व्याख्या में लेखक का अर्थशास्त्रीय सोच प्रकट होता है।” राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका मधुमति (1986, डिजिटल खंड 25, पृ. 95) ने इस किताब पर चर्चा करते हुए लिखा- मध्य प्रदेश के युवा व्यंग्यकार धर्मपाल महेन्द्र जैन का यह इकतीस व्यंग्य लेखों का संग्रह एक नयी उम्मीद और उत्साह जगाता है। गुजरात हिंदी प्राध्यापक परिषद की संगोष्ठी (1992) के अवसर पर प्रकाशित समकालीन हिंदी व्यंग्य परिदृश्य में इस किताब पर चर्चा की गई।

राजेन्द्र चौधरी
व्यापक कैनवास पर रचे इकत्तीस नटखट निबंधों की इस किताब में व्यवस्था और समाज की विसंगतियों पर सटीक व्यंग्य हैं। हमारे आम चरित्र का भंडाफोड़ करने वाले ये व्यंग्य सिर्फ मनोरंजन ही नहीं, हमारे सोच और कार्य में बदलाव के लिए एक विचारोत्तेजक पहल भी है।
अपने शीर्षक व्यंग्य ‘सर क्यों दाँत फाड़ रहा है’ में धर्मपाल पुलिस की मानसिकता और आम चरित्र पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं- “बिना वर्दी के पुलिस वाले ताबूत लगते हैं। वर्दी उन्हें सामाजिक मान्यता देती है इसलिए वे घर में भी वर्दी पहन कर सोते हैं। रात-दिन चोरों, उठाईगिरों में रहने के कारण उनकी नस्ल बदल गई है। वे अब बदला-बदला व्यवहार करने लगे हैं। लोग पुलिस को मौके की तलाश में रहने वाला चलता–पुर्ज़ा कहते हैं।” सच ही तो है यदि पुलिसकर्मी बिना वर्दी के निकल जाए तो उसे कौन पहचानेगा और गाँठेगा। पुलिस की कार्यप्रणाली पर कटाक्ष करते हुए धर्मपाल लिखते हैं कि “पुलिस का काग़ज़ी उद्देश्य जनसेवा और देशभक्ति है। वे ख़ाकी नेकर और कमीज़ में लट्ठ बजाते हैं तो जन सेवा हो जाती है। सोने के बिस्कुट और अफ़ीम की ट्रकें रातों-रात पार करवा कर ये गेहूँ के दस-बीस थैले पकड़ लेते हैं। ये इसे देशभक्ति मानते हैं। पुलिस की फ़ुर्ती और चतुराई बेमिसाल है। नेताजी के घर पन्द्रह- बीस हज़ार रुपयों की चोरी हो जाए तो पच्चीस-पचास लोगों को पकड़ लाते हैं। गाँव में डकैती डल जाए तो इन्हें सिर्फ़ खाली पेटियाँ ही गाँव के बाहर मिल पाती हैं।”

पुलिसिया मानसिकता का यह कड़वा सच है। आम नागरिकों के प्रति पुलिस के कठोर व्यवहार की भर्त्सना विभिन्न मंचों और अखबारों के माध्यम से होती रहती है। इसके चलते साल में एक बार पुलिस अपनी 'छवि' सुधारने के लिए शिष्टाचार सप्ताह मनाती है, सांस्कृतिक कार्यक्रम करती है और जनप्रिय बनने की कोशिश करती दीखती है। शिष्टाचार सप्ताह का एक वाकया सुनाते हुए यहाँ धर्मपाल कहते हैं- “उस दिन ऑटो से स्टेशन जा रहा था। पुलिस ने ऑटो वाले को बुलाया और कहा- क्यों बे भाई साहब, कहाँ जा रहे हो? मुझे इस वाक्य रचना पर हँसी आ गई। पुलिस वाले ने मुझे घूरते हुए कहा ‘सर क्यों दाँत फाड़ रहा है? वे बड़बड़ाने लगे ‘श्रीमान को दो झापड़ देंगे तो बत्तीसी बाहर पधार जाएगी।’ मुझे ध्यान आया पुलिस वाले शिष्टाचार सप्ताह मना रहे हैं।” इस व्यंग्य में भरपूर कटाक्ष है, विट है और विसंगतियों को बखूबी उधेड़ा गया है।

राजनीति और राजनीतिज्ञ व्यंग्यकारों के पसंदीदा विषय रहे हैं। हमारी सामाजिक स्थितियों का सटीक चित्रण राजनेताओं के दोगले या बहुगुणे व्यवहार से जल्दी हो जाता है और जनता उसे सहज रूप में अपने आसपास घटते देखती है। राजनीतिज्ञ अपने वोट बैंक के खातिर क्या और किस तरह करते हैं उसका पारदर्शी चित्रण 'हवाई अड्डा लाना है’ व्यंग्य में निखालिस तरीके से उभर कर आया है। सेठजी के पात्र के बहाने धर्मपाल लिखते हैं- “कंकड़ को अनाज और घासलेट को पेट्रोल बनाना उनका एक रात का काम था। जिला बैंक उनके कार्यकाल में स्वर्गवासी हो गई थी। उन्होंने कहा ‘उद्योग तो मैं ही आज खोल दूँ। कच्चे माल का परमिट चाहिए और कम ब्याज पर बैंक से लोन चाहिए। माल की सरकारी ख़रीद हो और उद्योगों को सरकारी संरक्षण मिले।” सेठजी पक्की सड़‌क की माँग करते हैं तो बसपति और सड़क निर्माता ठेकेलाल अपने हितों की रक्षा के लिए पूरी बात पलट देते हैं। इनकी माँग इस तरह हो जाती है- “गाँव-गाँव में बैंक खुलना चाहिए, गाँव-गाँव पक्की सड़कें तो बन नहीं सकतीं।... ‘सर्वांगीण विकास के लिए पहुँच मार्ग बनना चाहिए। पुलिया बनना चाहिए, टूट-फूट की मरम्मत होना चाहिए।” रोजमर्रा के जीवन से उठाए गए पात्रों के जरिए पूरी व्यवस्था की अच्छी खबर ली गई है। राजनेता की योजना से किसी को लाभ है किसी नुकसान। ऐसी स्थिति में नेतागिरी संतुलन तलाश करती है और गोटीमलजी सांसद इस तरह अपना प्रस्ताव लाते हैं- ‘प्रधानमंत्री व्यस्त हैं, पिछड़ेपन का हल उन्हीं के पास है। उन्हें यहाँ लाना पड़ेगा। यहाँ लाने के लिए हवाई जहाज़ चाहिए, हवाई जहाज़ के लिए हवाई अड्डा चाहिए। पिछड़ापन दूर करने के लिए हवाई अड्डा चाहिए।’ गाँव के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए 'हवाई अड्डा'! अपने लोगों के हित साधने के चक्कर में पिछड़ापन हटाने की समस्या हाशिए पर चली जाती है और गैरजरूरी हवाई अड्डा अहम् बन जाता है। हमारी प्रशासनिक व्यवस्था के दोगलेपन का यह रचना अच्छी तरह से पर्दाफाश करती है। राजनेताओं पर लिखे अन्य लेख ‘खेलमंत्री उवाच', ‘नदी लाओ समिति’ आदि हैं। कुर्सी सिंह जैसे नेता का बयान दृष्टव्य है– “यदि नदी होती तो आए दिन उसमें कोई गिर जाता। तुम्हारे जैसे बेरोज़गार लोग नदी में कूद पड़ते और गिरने वाले को बचा लेते। मैं तुम्हारा नाम राष्ट्रपति को भेजता। तुम्हें राष्ट्रपति पदक मिलता। तुम्हारे चर्चे होते और तुम मुझे वोट दिलवाते।” 

विज्ञान के विद्यार्थी रहे धर्मपाल महेंद्र जैन व्यंग्य में तर्क शक्ति को सटीक प्रयोग करते हुए अपने व्यंग्य को धारदार बनाने की सफल कोशिश करते हैं। वे कहते हैं- “गुण्डा तत्व और पैसे के संयोग से नेता बनते हैं। गुंडा, बुद्धि के संयोग से स्मगलर बनता है। गुंडा, धर्म से क्रिया कर आत्म समर्पण करता है। गुण्डा तत्व, पैसे और धर्म से एक साथ क्रिया कर भगवान का आधुनिक अवतार बन जाता है।” (एक अदद तत्व)। ऐसी स्थापनाएँ इन व्यंग्यों की जान है।
दफ़्तरी माहौल में साहब से केवल स्टॉफ ही नहीं, ऑफिस में आने वाले लोग भी दस्तख्त पाने के लिए लालायित रहते हैं, पर नए साहब हैं जो दस्तखत करने से डरते हैं। साहब को दस्तख्त का गुरुमंत्र देते हुए व्यंग्यकार लिखता है- “सर आपके दस्तख़त साहबों जैसे नहीं हैं सर, साहब के दस्तख़त की भाषा नहीं होती सर। दस्तख़त का पहला अक्षर अंग्रेज़ी में तो दूसरा हिन्दी, तेलगु या हिब्रू का होता है सर। बाकी तो लाइन स्केच रहता है सर। इसलिए साहब के दस्तख़त की कोई लिपि नहीं होती सर। साहब के दस्तख़त बड़े होते हैं विशालता बताने वाले, संकुचित स्वभाव बताने वाले छोटे-छोटे नहीं होते सर। अनुभव और क्षमता से ज़्यादा दम दस्तख़त में होता है सर।” अफसर और बाबू के बीच दस्तख़्त की यह अहम भूमिका हमारे दफ्तरी चरित्र को बेनकाब करती है। 
दफ्तरी संस्कृति पर लिखा एक अन्य व्यंग्य 'जा तुझको जमी दुकान मिले’ के बहाने धर्मपाल महेंद्र जैन दफ़्तरों मे रूढ़ि बनते हुए भ्रष्टाचार पर प्रहार करते हैं। 'ब्रीफकेस प्रसंग' अफसरी संस्कृति पर बहुत गहरे वार करता है। अफसर ब्रीफकेस लिए दफ्तर क्या जाते हैं, व्यंग्यकार की निगाह इस यूँ पकड़ती है- “ब्रीफकेस की ‘हिप्टोनाइज़’ कर सकने की इस अद्भुत क्षमता ने मुझे चमत्कृत कर रखा है। जो कुछ नहीं करते वे सब कुछ करते दिखते हैं और जो करते हैं वे कुछ भी करते नहीं दिखते। इस कारण ब्रीफकेस में मुझे रहस्यवाद की प्रतीति होती है, जो है और जो नहीं भी है ऐसा गुत्थमगुत्था दर्शन मुझे ब्रीफकेस में मिलता है।”...“उनके लिए पत्नी और ब्रीफकेस एक जैसे हैं। जब उनकी पत्नी का जिक्र होता है वे ब्रीफकेस खोल लेते हैं और जब वे ब्रीफकेस में गोताखोरी कर कागज़ात निकालते होते हैं उन्हें पत्नी की फरमाइशों की याद आ जाती है।”

धर्मपाल के व्यंग्य में विषयों और मुद्दों की बहुलता है जो एकरसता और दोहराव से बचाती है। वे दफ़्तर या राजनेता से अलग हटकर हमारे सामाजिक मनोविज्ञान को व्यंग्य के दायरे में लाते हैं। 'उधार वर्ष मनाना है' शीर्षक वाली व्यंग्य रचना, उधारी के प्रति जनसामान्य के रुझान की पकड़ करते हुए सहज हास्य की रचना करती है- “उधार वर्ष का मुख्य उद्देश्य तमाम जनता को उधार दिलाना हो। उधार वर्ष की सफलता के लिए सभी सरकारें, बैंकें और खज़ाने मुक्त हस्त और उदार मन से धन उधार बाँटें। जो उधार नहीं ले उन्हें जबरदस्ती उधार दें और रिज़र्व बैंक के साथ-साथ विश्व बैंक के सारे पैसे को बराबर कर दें।” उधारवर्ष की सफलता के लिए धर्मपाल के रचनात्मक सुझाव प्रचलित नारों के पुनर्लेखन की बात करते हुए हमारी आम प्रवृत्तियों पर गजब का प्रहार करते हैं- “उधार वर्ष की सफलता के लिए हमें पुराने नारों में संशोधन करने होंगे। ‘उधार मोहब्बत की कैंची है’ नारे को संशोधित कर ‘उधार मोहब्बत की जड़ है’ बना दें। ‘आज नक़द कल उधार’ को ‘आज उधार कल नक़द’ कर दें। ‘उधार माँग कर हमें शर्मिन्दा न करें’ और ‘कृपया उधार न माँगें’ जैसी तख्तियों को बदल कर लिख दें ‘कृपया उधार माँगें’। भरपूर उधार मिलेगा तो कोई विदेश नहीं जाएगा।”

'महँगाई' एक सर्वकालिक सत्य है। महंगाईबाला के माध्यम से व्यंग्य कथा बुनते हुए धर्मपाल नेतासिंह, चमचेलाल, अधिकारीपाल, कर्मचारी कुमार, सेठमल, जनताचंद आदि विशिष्ट पात्र गढ़ते हैं और उनके माध्यम से महँगाई का आरेखन कर जाते हैं। सामाजिक चरित्र उद्घाटित करते हुए लिखा गया व्यंग्य ‘आखिरी तारीख का इंतज़ार’ धर्मपाल का बेजोड़ व्यंग्य है। इसमें वे आखिरी तारीख तक इंतजार करने की हमारी आम प्रवृत्ति की अच्छी खबर लेते हैं। वे कहते हैं- “भाई लोग, आख़िरी तारीख़ तो क्या आख़िरी क्षण तक का इंतज़ार करते रहते हैं और फिर ताबड़तोड़ काम शुरू करते हैं गोया काम विधानसभा का प्रश्न हो गया हो।” आख़िरी तारीख पर सरकारी दफ्तरों का हाल बयां करते हुए वे लिखते हैं- “सरकारी तंत्र की आख़िरी तारीख़ मार्च के इकत्तीसवें दिन आती है। सभी सरकारी कर्मचारियों में उस दिन ग्लूकोज चढ़ जाता है। चार-छः दिन में सारे साल की ख़रीद-फ़रोख्त हो जाती है और आटे-दाल का वार्षिक गणित हल हो जाता है।” इस व्यंग्य की अंतिम पंक्तियाँ इस चरम तक पहुँचती है- “हम तब आख़िरी तारीख़ की बजाय आख़िरी मिनटों की प्रतीक्षा करेंगे। जैसे आज भी ट्रेन रवाना होने वाली होगी तो स्टेशन पहुँचेंगे, बैंक काउंटर बंद कर देंगे तो रुपया लेने पहुँचेंगे और मरने वाले होंगे तो डॉक्टर को बुला कर उसकी फजीहत कर जाएँगे।”
फाइल संस्कृति हमारे प्रशासन तंत्र की नब्ज़ है। हर कोई फाइलों के 'गुम' हो जाने के कारण परेशान है। फाइल निकलवाने और आगे बढ़वाने के लिए हर तरह के प्रयास करता है। फाइलें किस तरह गुम होती हैं, इस पर धर्मपाल महेंद्र जैन का व्यंग्य देखिए- “अलमारियाँ स्वतः खुली होंगी और महत्वपूर्ण फाइलों ने बाहर निकल प्रार्थनारत हो कहा होगा, ‘हे साँड देवता, हम महत्वपूर्ण फाइलें हैं हमारा भक्षण करो। हमारे भक्षण से इस विभाग का भला होगा।’ विघ्न विनाशक साँड देवता ने उन सभी फाइलों को उदरस्थ कर लिया होगा। क्षुधा शांत हो गई होगी और वह चला गया होगा। चूँकि क्षुधा चिर है वह फिर भड़की होगी और ऐसा ही होते रहने में सब महत्वपूर्ण फाइलें ख़त्म हो गई होंगी।” (फाइल इतनी दीजिए)।

'कलमकार! नारे रचो' गोष्ठीजीवी साहित्यकारों की तुकबंदियों पर तीक्ष्ण कटाक्ष है। धर्मपाल नए नारे लिखने पर जोर देते हुए कहते हैं- “प्रगति का दायित्व नारों का है। पुराने नारे ख़त्म हो गए हैं। नारा नहीं होगा तो न ‘क्यू’ होगी, न राशन होगा, न अकर्मण्यों का सिंहासन होगा। अतः हे क़लम के धनी उठाओ क़लम और लिखो, कमज़ोर सरकार को सहारा दो, निठल्ले लोगों को नारा दो।” व्यंग्य कथा ‘आदमी के बच्चे’ के रूप में आदमी के बच्चे बनाने की विधाता की योजना पर प्रकाश डालते हुए धर्मपाल सरकार के कर्ताधर्ता मंत्रियों की सोच-विचार शैली की पोल खोलते हैं। बच्चे क्यों जरूरी है, इसके उत्तर पर व्यंग्य का पटाक्षेप इस तरह होता है- “छुट्टियों में बड़े बच्चे टाटपट्टियाँ बनाएँगे और छोटे बच्चे गाजर घास उखाड़ने का काम करेंगे। बच्चे देश की दौलत होंगे, इसलिए बच्चों का प्रस्ताव स्वीकृत किया जाना चाहिए।” 

धर्मपाल के व्यंग्य पढ़ते हुए, खासकर विषय-वैविध्य के कारण, व्यंग्य की मार और धार मंद नहीं पड़ती। कहीं ये व्यंग्य चुहल करते गुदगुदाते लगते हैं तो कहीं वे योजनाबद्ध हो कर जबर्दस्त प्रहार करते हैं। भाषा के स्तर पर सतर्क रहते हुए धर्मपाल महेंद्र जैन प्रयोगवादी हैं, नए मुहावरे गढ़ते हैं और प्रतीकों का समुचित उपयोग करते हैं। धर्मपाल की व्यंग्य रचनाओं का यह पहला संकलन निश्चित ही आशान्वित करता है कि उनके व्यंग्य, व्यंग्य की परंपरा को समृद्ध करेंगे।
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राजेंद्र चौधरी
‘संस्कार’, 29 राणा प्रताप एनक्लेव, विक्टोरिया पार्क, मेरठ 250001 (भारत)
ईमेल: rajendrapsingh@hotmail.com

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