डॉ. किशोर काबरा के काव्य उत्तरमहाभारत में मिथक तत्व और पात्रों की प्रासंगिकता

चौहान अनुराधा

शोधार्थी, हिंदी विभाग, भाषा साहित्य भवन, गुजरात यूनिवर्सिटी, अहमदाबाद 56
चलभाष: +91 960 197 8235; ईमेल: annulovesmom@gmail.com

शोध सार

 दुनिया के हर समाज में मिथकों का निर्माण होता आया है। यह युग की संवेदना के वाहक होते हैं, जो बड़ी से बड़ी समस्याओं को मनोवैज्ञानिक भूमि पर उभारते हैं। इनमें मनुष्य की भावनाओं, विश्वासो, आस्थाओं को जोड़कर इतिहास के प्रवाह में अपना स्थान बनाते हुए मानव की चेतना को प्रभावित करने की शक्ति होती है। किशोर काबरा जी के "उत्तर महाभारत में षट्विकारों के शमन और षड्दर्शन की प्राप्ति का बिंबात्मक आख्यान है। वस्तुतः छह व्यक्तियों के स्वभाव में वैचित्र्य का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है। जिसमें पूरे मानव समाज के अंतरंग एवं बहिरंग को रूपायित करने का प्रयास किया गया है। पाँच कर्मेंद्रियाँ और पाँच ज्ञानेंद्रियाँ पांडवों के बहिरंग एवं अंतरंग है। द्रौपदी मन है जो इनसे बंधी रहती है। ये छहों पात्र षट्दोषों के प्रतीक हैं जो स्वर्गारोहण पूर्व क्रमशः गिरते हैं। इसी प्रकार मूल कथावस्तु का डॉ. किशोर काबरा ने अपने महाकाव्य उत्तर महाभारत में कुछ विस्तार से प्रस्तुत किया है।

मिथक का अर्थ और परिभाषा

हिंदी में 'मिथक' शब्द को अंग्रेजी के मिथ (myth) के पर्याय शब्द के रूप में प्रयुक्त किया जाता रहा है। यूनानी शब्द माइथौस से इसकी उत्पत्ति मानी जाती है। जिसका अर्थ है 'मुँह से निकला हुआ'।"2 इस प्रकार मिथक को एक अलौकिक कथा रूप कहा गया है। किशोर काबरा जी के शब्दों में…."मिथक साहित्य सृजन में एक ऐसा तत्व है जो कथ्य एवं संरचना में रचनात्मकता, लाक्षणिकता और विलक्षणता देने में समर्थ पाया जाता है।"1

 डॉ नागेंद्र के अनुसार "संस्कृत में इसके निकटवर्ती दो शब्द है- 1. मिथस या मिथ: जिसका अर्थ है परस्पर। 2. मिथ्या, जो असत्य वाचक है। यदि मिथक का संबंध 'मिथस' से स्थापित किया जाए तो इसका अर्थ हो सकता है सत्य और कल्पना का परस्पर अभिन्न संबंध अथवा ऐकात्म्य। मिथ्या से संबंध जोड़ने पर मिथक का अर्थ 'कपोल कथा' बन सकता है। किंतु इसमें अर्थ साम्य की अपेक्षा ध्वनि साम्य ही अधिक है।"3

 साहित्यकार मिथक के माध्यम से अतीत और वर्तमान दोनों के तनाव से गुजरता है, तब वह अनायास ही अपनी रचना में प्राचीन मिथकों का परिष्कार करके रागात्मक संस्कार समाहित कर देता है। तथा युगीन समस्याओं का समाधान पुनः विचार परिवर्तन कर युग चिंतन के अनुरूप मिथक के द्वारा प्रस्तुत करता है। तुलसीदास की 'रामचरितमानस' , भारतेंदु की 'अंधेर नगरी' , दिनकर जी की 'कुरुक्षेत्र' , धर्मवीर भारती की 'अंधायुग' आदि युग प्रवर्तक रचनाएँ उसी युगीन समस्याओं को मिथक के माध्यम से व्यक्त करती हैं।

मूल आलेख-

 'उत्तरमहाभारत' में डॉ. किशोर काबरा जी ने महाभारत की उत्तर कथा यानी पाँच पांडव और द्रौपदी के महाप्रस्थान और स्वर्गारोहण के प्रतीकात्मकता में छिपे कई प्रश्नों के उत्तरों को हमारे सामने प्रस्तुत किया है। उन पात्रों के अंतर्द्वंद को प्रमुखता से उभारा है। यह काव्य सात सर्गों में बंटा हुआ है। प्रथम सर्ग में पांडवों के महाप्रस्थान की पृष्ठभूमि प्रस्तुत की गई है। महाभारत के निरंतर युद्ध के कारण चारों तरफ शव ही शव दिखाई देते हैं। उन लाशों का काग, चील, गिद्ध, बाज आदि मांस भक्षण कर रहे हैं। सभी सुनसान हो गया है। गाँव, नगर, चौगान, खेत, खलिहान सब वीराने बन गए हैं।

"कुरुक्षेत्र तेरे आंगन में/ 
बहुत दिनों के बाद- 
शवों के लगे बड़े अंबार/ 
शिखर के शिखर पर्वताकार।
रक्त की नदियों में विकराल/
भंवर क्या उठे क्षितिज के पार।
मुंड के झुंड, रुण्ड के ताड/
झरे सब पुष्प, गिरी सब डाल"4

 यह सब देखकर धर्मराज का मन पश्चाताप की अग्नि में जलने लगता है। उसका मन विषाद से भर जाता है। अतः युधिष्ठिर परीक्षित को हस्तिनापुर और कृष्ण के पौत्र ब्रज को इंद्रप्रस्थ के राज्य सिंहासन पर बिठाकर अपने भाइयों एवं द्रौपदी को लेकर हिमालय पर महाप्रस्थान के लिए निकल पड़ते हैं। साथ में जागरण का श्वान है। इस प्रबंध काव्य की मूल में है वे प्रश्न जो भीमने युधिष्ठिर से किए हैं और वे उत्तर जो युधिष्ठिर ने भीम को दिए हैं। द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन एवं स्वयं भीम हिमशिखरों पर गिर जाते हैं, और उनके गिरने का कारण युधिष्ठिर ने इस प्रकार बताया है। 

1. द्रौपदी

 भीम के प्रश्न पूछने पर युधिष्ठिर द्रौपदी के हिमशिखर पर से गिरने का कारण यह बताते हैं, कि द्रौपदी प्रज्ज्वलित सौंदर्य की महिमामयी दीपशिखा है। वह नीलमणि और नीलकमल सी लहर है, जिसे देवता, दानव सब चाहते हैं। वह ज्ञानसेनी है, कृष्णा है, आयोनिजा है, पांचाली है। द्रौपदी यहाँ मन का प्रतीक है, जो पाँचों काम, क्रोध, मोह, मद, मत्सर के प्रतीक पांडव को बांधे हुए रहती है। द्रौपदी में स्त्री के पाँच रूप है।

"माँ, बहन, संपत्ति, स्वामिनी और पत्नी। माँ रही सहदेव कि मैं/
नकुल की प्रिय बहन 
संपत्ति युधिष्ठिर की/
भीम की में स्वामीनी थी किंतु/ 
पत्नी मात्र अर्जुन की रही मैं।"5

फिर भी युधिष्ठिर को बार-बार यह कथन अनुचित सा लगता। उसके मन में आशंका होती है। द्रौपदी भले ही पाँचों की ब्याता है, पर वह अकेले पार्थ को चाहती थी‌। अन्य चारों को वह महज निबाती थी।और लोकाचार के भय से अंत तक यह बात मन में रखती है। जिसे केवल युधिष्ठिर ही जानते हैं। यही कारण है कि हिमशिखर पर अंतिम साँस लेने वाले द्रौपदी को युधिष्ठिर के मुँह से यह सच सुनना पड़ता है जिसे द्रौपदी ने जीवन भर हृदय में छिपा कर रखा था। उसका तन चाहे पाँचों में बंटा रहा पर मन सतत साधारण नारी का जीवन जीने के लिए छटपटाता रहा। द्रौपदी के दिल की यही एक व्यथा है कि -

 "समय ने मुझको नहीं माना/ 
 कभी आदर्श नारी"6

यह द्वंद उसको भीतर तक सालता था। पर वह बाहर उसकी भनक भी नहीं पड़ने देती थी। द्रौपदी के माध्यम से कवि ने एक नारी का अस्तित्व जो कल था वो आज भी है, यही बताने का प्रयास किया है। समकालीन जीवन में धर्म, मृत्यु और पाप के दबाव को अंकित करते हुए जड़ विश्वासों और अंधी आकांक्षाओं को चित्रित किया गया है। द्रौपदी जीवन पर्यंत अतृप्त ही रही। जिसे उसने चाहा वह उसे कभी नहीं मिला।वह आक्रोश, क्षमा, रुप और प्रतिभा का अद्भुत सामंजस्य स्थापित किए रहती है।

2. सहदेव
 भीम के प्रश्न पूछने पर युधिष्ठिर सहदेव के हिमशिखर पर गिरने का यही कारण बताते हैं कि सहदेव भूत, भविष्य, वर्तमान का ज्ञानी था। पर सबसे बड़ी दुख की बात उसके लिए यह थी, कि वह किसी को आगे आने वाले कल की बात नहीं कह सकता था। इसलिए युधिष्ठिर कहते हैं कि

"कालदर्शी था/
अतः सब कार्य-कारण जानता था। 
देख कर बस मुस्कुराता /
मूर्ख हमको मानता था।
क्रोध सहता कुढ़ता/ बह रहा था।
देव का सहदेव था /
सहदेव बनकर सह रहा था। 
कौन है मेरे बराबर/
सतत था यह ध्यान में।
कील बन गढ़ गया/ 
यह दंभ उसके प्राण में।"7

सहदेव त्रिकालदर्शी था। प्रचंड ज्योतिष था। युधिष्ठिर को कर्म एवं त्याग का समीकरण समझाने वाला और अंत में अपनी प्रतिभा को दंभ का कलंक ओढ़कर पश्चाताप की अग्नि में जलने के लिए हिमशिखर पर गिरनेवाला सहदेव छदम क्रोध का प्रतीक है। इस प्रकार सहदेव अंतर्मुखी व्यक्तित्व वाला अपने मन ही मन में घुटन सहनेवाला है।

3. नकुल
 भीम के प्रश्न पूछने पर युधिष्ठिर नकुल के हिमशिखर पर से गिरने का कारण यह बताते हैं। कि नकुल कामदेव से भी अधिक सुंदर है "नकुल अर्थात ऐसा परावलंबी व्यक्तित्व, जिसके केंद्र में वर्ण और सुवर्ण है। नकुल अर्थात दर्पण के आगे खड़े होकर स्वयं को निहारने वाला आत्मकेंद्रित व्यक्ति। वह दूसरों की आंखों के दर्पण में भी स्वयं को ही झांकता है, और मंत्रमुग्ध होता है। मृदुल शब्द, कोमल स्पर्श, अमलरूप मदिर रस और मादक गंध का पंच भौतिक आवरण अर्थात नकुल। स्वर्ण और सौरण्य, रूप और रोप्य का मंजुल मिश्रण अर्थात नकुल।"8 कविवर काबरा जी ने बहुत ही सुंदर ढंग से नकुल के रूप का वर्णन किया है।

"इस धरा पर अवतरित श्रृंगार ही था।
 एक कोमल रूप का हो दरस जैसे, 
 एक मीठे मदिर रस का परस जैसे ।
 एक मादक गंध का हो श्रवण जैसे, 
 पंच भूतों का अमल आवरण जैसे।"9 

नकुल अपने सामने सभी पांडवों को कुरुप मानता है। उसे अपने रूप का दर्प था। वह 'आत्मरती' का शिकार था। मनोविज्ञान में 'आत्मरती' शब्द का प्रयोग उसके लिए किया जाता है जो स्वयं पर ही मुग्ध हो। सब कुछ होते हुए भी उसकी कुछ अलग पहचान न थी। नकुल की जिंदगी नेवले के समान थी। वह स्वयं में कुछ भी नहीं था। इस प्रकार नकुल एक अंतर्मुखी पात्र है।

4.अर्जुन
 भीम के प्रश्न पूछने पर युधिष्ठिर अर्जुन के हिमशिखर पर से गिरने का कारण यह बताया है कि अर्जुन महाभारत का श्रेष्ठतम पात्र है। अर्जुन विश्व के श्रेष्ठतम धनुर्धर, अतिरथी एवं नर के अवतार हैं। उन्हीं के कारण गीता मैदान में उतर आई हैं।"अर्जुन का मोह ग्रस्त हृदय ही धर्म क्षेत्र है, कुरुक्षेत्र है। उसी के कारण समर है उसी के कारण शांति है।"10

 महाभारत की अधिकांश कथाएँ उससे जुड़ी हुई हैं वे चाक्षुषी और प्रतिश्रुति विद्याओं से युक्त दिव्यास्त्र एवं दिव्यदृष्टि से समन्वित, पाशुपतास्त्र के ज्ञाता और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी हैं। उनमें इंद्र का अंश है उसके कारण उनमें शक्ति का दंभ है। वह भोग और योग के बीच मोह ग्रस्त है। अर्जुन की जिंदगी में मोह के कितने अवसर आए लेकिन भोग और योग में निरंतर संघर्ष होता रहा । द्रौपदी को स्वयंवर में जीत के लाए थे पर यह मोह भी नहीं टिका। पत्नी को पाँच भागों में बांटना पड़ा।

"सुनो द्रोपदी/ मोहग्रस्त है मेरा जीवन, द्वंदग्रस्त है मेरा चिंतन, 
धर्म, कर्म और मातृभक्ति की बलिवेदी पर 
मेरी पत्नी पाँच भाग में बंटी/
और मैं टुकुर-टुकुर रह गया देखता।" 11 

द्रौपदी वस्त्र हरण के समय भी भरी सभा में तटस्थ से किंकर्तव्यविमूढ़ बने रहे। युद्धभूमि में सभी सगे-संबंधियों को देखकर जब अर्जुन मोहग्रस्त हो गए तब कृष्ण ने उन्हें उपदेश दिया। उनका भोग और योग में निरंतर संघर्ष होता रहा जहाँ भी गए वहाँ विवाह करके आए। चित्रा से लेकर सुभद्रा तक हर किसी में द्रौपदी की खोज करते रहे। महाभारत के युद्ध के बाद अर्जुन का व्यक्तित्व धूमिल हो जाता है। श्री कृष्ण भी गोलोकधाम चले गए। अर्जुन गोपियों को भी नहीं बचा पाते। उस समय वह पूरी तरह खोखले हो जाते हैं। उन्हें शास्त्रों के नाम भी याद नहीं है। इस प्रकार अर्जुन की महत्वकांक्षा ने उन्हें विकलांग बना दिया। उनके मन का अंतर्द्वंद इस तरह व्यक्त होता है-

" मैं अंतर्मन से बृहन्नाला हूँ/
 बृहन्नाला केवल प्रतीक है 
 मोहन ग्रस्त मानव की/ 
 किंकर्तव्य बुद्धि का।"12 
 
इस प्रकार यहाँ कवि ने अर्जुन के मोहग्रस्त हृदय का योग और भोग के बीच संघर्ष करते हुए उसके हृदय का अंतर्द्वंद अभिव्यक्त किया है।

5. भीम
 युधिष्ठिर ने भीम के हिमशिखर पर से गिरने का कारण यह बताया है कि भीम यह पात्र सभी पात्रों से अलग अपनी पहचान रखता है।" भीम में संपूर्ण काया भाव है। वह प्राकृत है, किसी ग्रामीण कलाकार के द्वारा निर्मित अनगढ़ मूर्ति की तरह। उसका भोजन प्रेम और मल्ल प्रेम प्रसिद्ध है। उसमें जो भोलापन है, जो विदूषकत्व है, जो ग्राम्यत्व है, वह उसे निर्दोष बनाता है।" जैसे कि-

"भीम कितना सहज, सीधा और सरल / तन वज्र मन कितना तरल!
भीतर और बाहर से लिए हैं एक जैसा मन /बड़ा प्राकृत 
किसी अनजान अनगढ़ मूर्ति-सा"13 

 उसने धर्म की आड़ में कोई अकर्म नहीं किया। "भीम मद का प्रतीक है। वही सही अर्थ में वृकोदर है। कोई उसे बैल कहता है, कोई उसे बिना मूछोंवाला कहता है। द्रोण की परीक्षा के समय भी उसे भोजन ही दिखाई देता है। विराटराजा के यहाँ भी भीम रसोईया बनता है।" भीम का चरित्र गुण-दोषमय है, कर्मण्यता और वीरता उनके चरित्र का महत्वपूर्ण गुण है। भीम का जीवन एक खुली किताब है, वह जो भी करता है खुलकर करता है, भीम की कर्मण्यता को लेकर कवि ने लिखा है।-

"यह हजार हाथियों की शक्तिवाला/ 
कर्म में सन्दर्म अनुरक्ति वाला 
दानवों पर दहकता सा/
मानवो पर महकता- सा/
पवन का उच्छवास प्यारा भीम।"14

 भीम छह रसों का दास है। कवि काबरा जी ने उसे "मद का एक निर्झर मुखर" कहा है। भीम के पूरे व्यक्तित्व का विश्लेषण उन छह रसों के आधार पर किया है। जिनसे 'मद' की निर्मित होती है। यह है मिष्ट, तिक्त, कषाय, कटु, अल्म, और क्षार। भीम को लड्डू पसंद थे। इसलिए दुर्योधन ने उसमें जहर मिलाया और गंगा की उफनती धारा में फेंक दिया। फिर भी भीम बच गया क्योंकि उसमें मद था। लाक्षागृह से अपनी माता और भाइयों को बचाया। हिडिंबा से विवाह किया। अत्याचारों का भीम ने डंटकर सामना किया । इन्ही रसों के कारण भीम ने वह सभी कार्य किए। जो अन्य पांडव नहीं कर सके इस प्रकार छह रसों के साथ भीम के स्वभाव का वर्णन किया गया है।

6. युधिष्ठिर 
 युधिष्ठिर धर्म के अंश होने के नाते धर्मराज कहलाते हैं। वे अजातशत्रु है। सूक्ष्म मत्सर के कारण अर्धसत्य 'नरो वा कुंजारो वा' उसका पीछा करता रहा। इस अर्धसत्य के अलावा उन्होंने कोई पाप नहीं किया। कभी किसी भी मुश्किल में धर्म को नहीं त्यागा। एक ही अर्धसत्य के कारण उन्हें नर्क दर्शन करना पड़ा। कोई भी अपराध हो सभी के सामने स्वीकार कर लेते थे" उनका मानना था कि पाप को छुपाना सबसे बड़ा पाप है। युधिष्ठिर भली-भांति जानते थे कि ध्युत और द्रौपदी वस्त्राहरण उनकी ही गलतियों का परिणाम है। उनका कहना था कि मेरे ही कारण से झगड़े हो रहे हैं। उन्होंने सारी गलतियों और अपराध को स्वीकार किया था । लेकिन अर्धसत्य वाला अपराध उनका मन स्वीकार न कर पाया। इसलिए उनका मन आत्मग्लानि से भर जाता है। "मत्सर की तरह पीछे पड़ा रहा वह स्वर्ग में जाने के पूर्व नरक दर्शन पर ही समाप्त हुआ। युधिष्ठिर ने धर्म की रक्षा के लिए बड़े से बड़े कष्ट उठाए यह सभी जानते थे। द्रौपदी और अन्य भाई उन पर व्यंग कसते थे लेकिन युधिष्ठिर की सहनशीलता देख कर चुप हो जाते थे। ध्युत उनके लिए युद्ध का प्रतीक था। पर द्रौपदी के दांव पर लगाने का पछतावा उन्हें बराबर बना रहा। उनका मानना था कि सार्वजनिक पछतावा करना बड़ा पुण्य है।

"चाहे जितना बड़ा रहे सत्कर्म/
 अगर मन में छिपा बैठा दंभ सरीरवा, 
 तो समझो बस, पाप हो गया। 16 

युधिष्ठिर ने धर्म को कभी नहीं छोड़ा, बनवास को भी स्वीकार कर लिया। उनमें यदि मत्सर का भाव होता तो वे चित्ररथ से कौरवों को न छुड़ाते। उन्होंने सोचा क्या यह वैर लेने का समय है। युधिष्ठिर ने इस बारे में अपने भाइयों से यही कहा था कि-

"जब तक बैर आपस का/
 वहाँ वें सौ यहाँ हम पाँच 
लेकिन तीसरे की जाँच में हम
 एक सौ और पाँच।"17 

युधिष्ठिर निष्काम कर्म को ही अपना धर्म मानते थे। कहीं भी काम भाव में बहे नहीं। वे इतने सहृदय थे कि घटोत्कच, कर्ण और अभिमन्यु के वध पर रो दिए। दुर्योधन का वध भीम ने जब छल से किया तब उनकी आंखें भर आई। धर्मराज काम, क्रोध, लोभ मोह, से परे थे। 'मत्सर' के कारण उन्हें नरक दर्शन करने पड़े। दुनिया में शायद ही कोई आदमी ऐसा हो जिसमें कोई विकार न हो। इस तरह युधिष्ठिर का चरित्र पश्चाताप की अग्नि में दह कर शुद्ध कंचन बन गया है।

निष्कर्ष-
 इस प्रकार उत्तर महाभारत में कवि ने छह व्यक्तियों के स्वभाव का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। मनोविज्ञान की सूक्ष्म विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए कवि ने उत्तर महाभारत के पात्रों के अंतर्द्वंद को प्रमुखता से उभारा है। काव्य के सामाजिक जीवन संदर्भों में प्राचीन पात्रों को कसते हुए आज के व्यक्ति की मनोग्रंथियों, कुंठाओ और दुर्बलताओं को व्यक्त करने की कोशिश की है। इस दृष्टि से 'उत्तर महाभारत' में प्राचीन चरित्रों की परंपरा द्वारा आधुनिक मनुष्य की त्रासदी को उद्घाटित करने में पूर्ण सफलता प्राप्त हुई है।

 
संदर्भ: -

1. उत्तर महाभारत: डॉ. किशोर काबरा, अभिव्यक्ति प्रकाशन दिल्ली
2. हिंदी के स्वातंत्र्योत्तर मिथकीय खंडकाव्य, कविता शर्मा पृष्ठ 13
3. The first Greek word 'mythos' means the thing spoken or uttered by the mouth; that was a speech of tell - the outline of mythology: Lewis Spence: P.1
4. मिथक और साहित्य डॉ. नागेंद्र पृष्ठ 6
5. उत्तर महाभारत: डॉ. किशोर काबरा, पृष्ठ 67
6. वही पृष्ठ 78
7. वही पृष्ठ 128
8. वही पृष्ठ 8
9. वही पृष्ठ 148
10. वही पृष्ठ 8 पृष्ठभूमि से उद्धृत
11. वही पृष्ठ 182
12. वही पृष्ठ 184
13. वही पृष्ठ 40 पृष्ठभूमि से उद्धृत
14. वही पृष्ठ 236
15. वही पृष्ठ 238
16. वही पृष्ठ 62


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