सुशील स्वतंत्र की पाँच कविताएँ

सुशील स्वतंत्र
1. दायरे में युद्ध
 
तय चालों के बलबूते
चौसठ खानों के रणक्षेत्र में
दी जाती थी शै और मात
राजा करते थे दायरे में युद्ध
इसीलिए मटियामेट हो गया राजतंत्र

तय दायरों में होती थी
जीत या शिकस्त
सिपाही से मंत्री तक
सबकी हदें तय होती थीं 
और यह सच छिपाया जाता था
कि जिसकी रक्षा के लिए
जान की बाज़ी लगाई जा रही है
प्यादों की रक्षापंक्ति के पीछे खड़ा
वह राजा स्वयं एक मोहरा है

वजीर, हाथी, बिशप, घोड़ा
अपनी-अपनी चालों के कैदी होते 
एक कदम आगे की चाल वाला प्यादा
आत्मरक्षा के अधिकार से वंचित होता 
काले-सफ़ेद राजाओं को
अपने पराक्रम से लड़ने का भ्रम होता 
हर बार विजयी वही होता
जो बिसात बिछाता

अपनी चालों की परिधि को
एक बार भी लांघने का
मोहरों को ख़याल नहीं आया
शतरंज के इतिहास में इसीलिए
कभी इन्कलाब नहीं आया।


2. लुगू बाबा

चित्रकार की कल्पना सा
काला-काला है पहाड़
कोयला खदानों से देखा हूँ उसे
मानो दैत्यों का कोई सैन्यदल खड़ा हो
माँ ने बताया था ये लुगू बाबा है

इस मौसम में
उसकी देह पर फ़ैल जाते हैं
डालियों से बिछुड़े पत्ते
रात भर मेवे बरसते हैं पत्तों पर
लुगू बाबा सुनता है
एक अनवरत धुन
टप-टप-टप
सूखे पत्तों की चादर में
सारी रात लुगू बाबा बटोरता है मेवा
माँ ने बताया था कि
यह कोई आसमानी मेवा नहीं है 
ये महुआ है महुआ

सूर्यास्त से सूर्योदय तक 
लुगू बाबा महुए से करता है श्रृंगार 
और सुबह होते ही
वह लुटा देता है अपनी देह
जो भी ले जाए, जितना ले जाए
दयालु लुगू किसी को रोकता नहीं है
लेकिन किसी की मज़ाल है
कि लुगू की देह पर चढ़कर
असंख्य महुआ पेड़ों से
तोड़ ले एक भी महुआ
सख्त़ है लुगू का नियम
टप-टप-टप महुए के झड़ने तक
इंतज़ार का है विधान
लुगू कहता है कि
पेड़ महुआ का मायका है
और अपनी यौवनावस्था में ही वह
छोड़ती है मायका
साँझ ढ़लने के बाद होती है उसकी विदाई
लुगू के विधान में
माँ के घर से कमउम्र महुआ को
उठा लाना गुनाह है
सब पर बराबर लागू होता है
लुगू का नियम
इसीलिए करना होता है
रात भर का इंतज़ार
लुगू बाबा के कानों में
अनवरत बजती है वही धुन
टप-टप-टप

कोयला खदानों पर खड़े होकर
चित्रकार की कल्पना की काली देह पर
आज शाम मैंने देखी है
लाल-लाल लकीरें
माँ ने बताया कि ये लकीरें
पत्तों की चादर में लगा दी गईं
आग की लपटें हैं
मायके से निकलकर
लुगू की गोद में आराम करती है महुआ
पत्तों का लिहाफ़ ओढ़े
गहरी नींद में सोती है
बहुत मुश्किल से ढूंढ पाते हैं उसे 
महुआ चुनने वाले
इसीलिए लुगू की देह में
शाम होते ही लगा दी जाती है आग
कोयला खदानों से आग की लपटें
काली देह से रिसते हुए
खून की लकीरों सी दिखती हैं
अपनी झुलसी हुई मादकता के साथ
सुबह-सुबह राख के रेगिस्तान में
बिछी हुई मिलती है महुआ

 
आह, वेदना की कैसी यात्रा से गुजरता है लुगू
ओ महुआ, चैत में जब निर्वस्त्र होते हैं जंगल
तुम्हारा तन उन्हीं दिनों क्यों भरता है?
***
 

3. यह बैसाख है

सालों से जानता हूँ
वह आता है
मैदानों, पहाड़ों, जंगलों में
डाल से बिछड़े हुए पत्तों की
कालीन बिछाता है
यादों के टिकोलों में
वह भरता है रस

दरकता है मन का दरख़्त
झड़ते हैं अटके हुए लम्हें
पीले पत्तों की कालीन में
स्मृति का एक हरा पत्ता चमकता है

देहरी पर पैरों के निशान छोड़
अभी-अभी गया है चैत
पतझड़ है, उजाड़ है
खाली-खाली जग
भरा-भरा मन है
पेड़ से बिछड़ा एक पत्ता 
निर्बाध सरसराता है
धूल से पटे मन के आँगन में
एक चेहरा उभर आता है
अधम हवा थमती नहीं है
अब वह महुए की डाल
तक नहीं जाती है 
चुन लिया गया है महुआ
झड़ गए हैं पलाश
मुनगा के फूल
सहजन की फलियों में
तब्दील हो गए हैं
धम्म से गिरने वाला है कटहल

कानों में मिश्री और
मन में नश्तर सी उतरती है
कोयल की कूक

एक चटकन सुनता हूँ मैं
फूट पड़ा है सेमल का फल
और रूई के फाहे सा दिशाहीन
उड़ने लगा है मन

सालों से जानता हूँ
ख़ूब पहचानता हूँ
गुलमोहर की गोद
भरने वाला
ये बैसाख है।
***


4. कठोर समय की यादें

भूचाल की तरह आती हैं
तबाही लाती हैं
कठोर समय की यादें

अपनों के बदले हुए चेहरों की
ऐसी चलचित्र होती हैं
कठोर समय की यादें
जिसमें कोई पॉज बटन नहीं होता

दृश्य-दर-दृश्य बेपर्दा होते किरदार
नश्तर से चुभते संवाद
अप्रत्याशित दृश्य
हृदय को छलनी करते
कहानी के मोड़

दृश्य बदलता है और
जेब टटोलता एक बाप दिखता है 
जिसके बच्चे को
स्कूल की ऑनलाइन क्लास से
आज ही बाहर निकाला गया है

चेहरे पर कुटिल मुस्कान लिए
भाई दिखता है
पिता की संपत्ति पर
अब जिसका कब्ज़ा है
लोभ की भेंट चढ़ गए
राखी के धागे दिखते हैं
संगिनी दिखती है
जिसे अब तक घर में
स्वीकारा नहीं गया
भाई के चंगुल में रहने वाली
माँ का बेबस चेहरा दिखता है

पत्थर बन रहे संबंधों को
पथराई आँखों से एकटक देखती
पिता की तस्वीर दिखती है

वह स्टेशन दिखता है
जहाँ से वर्षों पहले
पकड़ी थी ट्रेन

अगले दृश्य में
घर के रोशनदान से
बिखरे हुए तिनकों का
घोंसला दिखता है
एक नायक दिखता है
जो निशान से पहचानता है
अपने भाई का खंजर
और पीठ से खींचकर
चुपचाप अलमारी में रख देता है

कठोर समय के चलचित्र में अक्सर दब जाती हैं
नेपथ्य की सिसकियाँ
पर्दे पर सिर्फ अट्टहास दिखता है

आख़िरी दृश्य में
एक परिंदा दिखता है
जिसके पास पंख है
आसमान है
बस नीड़ में अब
उसके लिए जगह नहीं है

कठोर समय की यादें
कोमल नहीं होती हैं।
***

 
5. हल्का लाठी चार्ज

पीठ पर दर्ज़
लाल-लाल लकीरें
मिटने से पहले
उस समय का
दस्तावेज लिख देतीं हैं
जब प्रतिरोध के लिए
सिकुड़ती जगहों में
मुट्ठी बंद किये ज़िंदा लोग
सड़क पर उतरते थे

वायरलेस पर प्रसारित
‘स्थिति नियंत्रण में है’ वाला सन्देश 
दमन और शांति 
की दो स्थितियों के बीच की
संकरी गली का पता होता है
सीलन और अँधेरे में जहाँ
साँस लेता है वह भ्रूण
जिसकी पीठ
नर्म चमड़ी की चादर नहीं होती
शिलापट्ट होती है
जिस पर उकेरा जाता है
उसके समय का इतिहास।
###
 

परिचय: सुशील स्वतंत्र

दिल्ली की झुग्गी बस्तियों में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता से साप्ताहिक अखबार का संपादक और फिर लेखक बनें सुशील विभिन्न विधाओं में लेखन करते हैं। 1978 में उनका जन्म हजारीबाग (अविभाजित बिहार) में हुआ। बचपन कोयला खदानों के ऊपर दौड़ते-भागते बीता। दिल्ली विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण करने के दौरान ही वे झुग्गी बस्तियों में सामाजिक कार्य करने लगे थे। उन्हें लम्बे समय तक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एच.आई.वी./एड्स जागरूकता के लिए उच्य जोखिम समूहों जैसे महिला यौन कर्मियों व ट्रकर्स के साथ काम करने का अनुभव है। ढाई दशक से दिल्ली उनकी कर्मभूमि रही है लेकिन कोयला खदानों की धूल बार-बार उन्हें अपनी ओर खींच लाती है। फिलहाल दिल्ली एवं झारखंड के रामगढ़ दोनों ही जगहों में उनका प्रवास होता है। वे कविता, कहानी, आलेख, ऑडियो शो एवं उपन्यास लिखते हैं। वे हिंदी साहित्य की विस्तृत निर्देशिका “हिंदी साहित्यानामा” के संपादक एवं प्रकाशक हैं। असुर गाथा श्रृंखला की रचना के माध्यम से वे साहित्य जगत में अपने सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक योगदान के साथ उपस्थित हुए हैं। इस श्रृंखला का पहला उपन्यास "त्रिलोकपति रावण" इन दिनों काफी चर्चा में है।

वे ऑडियो शो भी लिखते हैं, जिनका प्रसारण विभिन्न ऑडियो प्लेटफॉर्म्स पर चुका है। उनकी रचनाएँ "संभावनाओं का शहर" कविता संग्रह एवं “ये वो संजना तो नहीं” उपन्यास के रूप में प्रकाशित हुईं हैं। वे हिंदी साहित्य की विस्तृत निर्देशिका “हिंदी साहित्यानामा” के संपादक एवं प्रकाशक हैं।

वे आजीविका के लिए एन.जी.ओ. जगत के साथ जुड़े रहने के साथ-साथ वर्षों से सामाजिक-साहित्यिक क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। समानता और लोकतन्त्र में गहरी आस्था के कारण उनके लेखन में प्रतिबद्ध जनपक्षधरता स्पष्ट दिखाई देती है। वे माइथोलॉजी के अध्ययन में रुचि रखते हैं। वर्तमान में लेखन के साथ-साथ एन.जी.ओ. कंसल्टेंसी करते हैं। वे जन सरोकार के मुद्दों के साथ जुड़कर महिला सशक्तिकरण, कला-संस्कृति, साहित्य एवं दक्षिण एशिया शांति विषयों पर कार्यकर्मों के संचालन व समन्वय के क्षेत्र में सक्रिय हैं। साप्ताहिक अखबार "हिंद वॉच" के संपादक होने के साथ-साथ कई सामाजिक, सांस्कृतिक, सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाओं के साथ प्रशिक्षक, मूल्यांकनकर्ता व सलाहकार के रूप में जुडे हुए हैं। वे सामाजिक संस्था ‘न्यू इंडिया मिशन’ के अध्यक्ष, धरती थियेटर के संस्थापक एवं संयोजक और सर्वधर्म समन्वय परिषद के सचिव भी हैं।

संपर्क: 
गीता सदन, राँची रोड़, अपूर्वा हॉस्पिटल के पीछे, पोस्ट – मरार, जिला - रामगढ़, झारखंड, पिन - 829117
ईमेल: sushilswatantra@gmail.com 
चलभाष: 9811188949

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