काव्य: मंजू सरगम

खुद के होने का एहसास

सोचती हूँ कुछ लिखूँ!
फिर ठहर जाती हूँ...
क्या वर्तमान दुनिया का आभासी पटल
वास्तविकता के एहसास को सहजता से
बिना किसी स्वार्थ से समझ जाएगा, 
इस वैश्वीकृत दौर में?
जहाँ सभी मानवीय सम्वेदनाएँ वस्तु मात्र हैं।
जिसका किसी भी क्षण मोल-भाव करना सम्भव है।
शायद नहीं,
फिर भी मैं लिखना चाहती हूँ।
अपनी उपस्थिति दर्ज करवाना चाहती हूँ,
क्योंकि
मैं जीवित हूँ,
संवेदनशील और सचेत भी,
इस धरा पर।
मेरे मूक शब्दों के संघर्ष को
अर्थहीन या व्यर्थ न समझा जाय,
कलम की शक्ति ही मेरी पहचान है।
लिखना मेरी कमजोरी और
'शब्द' शक्ति मेरी ऊर्जा।
जिसके माध्यम से,
आकार लेते हैं मेरे तार्किक विचार,
मेरे विचार ही निर्मित करते हैं,
मेरा रूप, अस्तित्व और मेरी पहचान भी॥
***


दलित स्त्री

जिंदगी वास्तव में
दोहरा अभिशाप है दलित स्त्री की 
समाज से ही नहीं अपनों से भी छली जाती हैं ये 
समाज में स्त्री होने की ही नहीं 
अछूत होने की भी 
विदारक पीड़ा को सहती हैं ये 
आक्रोश संघर्ष के साथ 
जिंदगी में बस इक उम्मीद के सहारे 
होगा नया सबेरा हमारे भी जीवन में।
थोंडा सा विचलित हो जाती हैं 
जब अपनों से ही ठगी जाती हैं ये 
फिर भी ये डरती नहीं 
आत्महत्या करती नहीं 
देती हैं चेतावनी 
उस पितृसत्तामक व्यवस्था को 
जिसकी वजह से रही 
ये अपाहिज सदा के लिए॥
***


दलित काव्य संवेदना

पारलौकिक  जगत की संवेदना को 
लौकिक यथार्थ जगत पर उतारती हैं
दलित कविताएं 
कल्पना की दुनिया में नहीं 
यथार्थ जगत का चित्र दिखलाती हैं
दलित कविताएँ  
समाज से ब्राह्मण, पंडितों को नहीं 
समाज में पनपे जातिवाद-वर्णव्यवस्था को 
मिटा देना चाहती हैं
दलित कविताएँ 
समाज में ऊँच–नीच का नहीं 
सबको समता और सम्मानपूर्वक जीने का हक़ 
दिलाना चाहती हैं
दलित कविताएँ 
समाज में फैली रोशनी को नहीं 
अँधेरे को मिटा देना चाहती हैं
दलित कविताएँ 
अब आ चुकी है दलितों में भी चेतना 
उस चेतना की झलक दिखलाती हैं 
दलित कविताएँ॥
***


न्याय 

था घनघोर अँधेरा,
चारों तरफ था केवल, भय और आतंक का डेरा।
इस भय और आतंक के साऐ में 
जाने कितनी बालाऐं हिम्मत हार गई।
कुछ समझ से परे रही और कुछ जान-समझकर भी
होनी को होनी मान, 
स्वीकार कर आगे बढ़ गई।
इन्हीं के बीच रही दो बालाएं,
जिन्हें थी अपने अस्तित्व की पहचान,
हिम्मत कर आगे बढ़ी,
अपनी अस्मिता, आजादी के साथ
अपनी जैसी और कितनी बालाओं के लिए
खुद से निश्चय कर, मांग किया, इंसाफ की।
देश के कानून और संविधान में विश्वास कर,
बरसों तक एक लंबा सफर तय करती हुई,
रहीं अडिग।
नहीं डरी वो किसी खौप से,
और न ही विचलित हुई
अपने काटों भरे पथ के संघर्ष से।
इंसाफ की चाह में,
पहुँच गई वो जिन्दगी के अगले पड़ाव में।
पर हिम्मत नहीं हारी॥
हुआ उस घनघोर तामसी राक्षस के साम्राज्य का अंत।
और फिर से विश्वास अटूट हुआ॥
हुई सत्य की विजय॥
छटी घटा उस तामसी की
हुआ सबेरा सभी की जिंदगी में,
और उम्मीद जगी फिर से रोशनी की...
गर्व है हमें अपने देश, कानून, और संविधान पर॥
हमारा कानून और संविधान॥
अपनी रोशनी से देश को और देश के लोगों को
सदैव विजयपथ की ओर अग्रसर करता रहेगा॥
जय हिंद!!! जय भारत!!!
***

डॉ. मंजू कुमारी
सहायक आचार्य (विभागाध्यक्ष, हिन्दी)
राजकीय महाविद्यालय देहरा 
कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश 
ईमेल: manjoo89jnu@gmail.com
चलभाष: 8076674373



 

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