मुक्त छंद में प्रवाह समेटे है 'अगन जल'

अगन जल
लेखक: विनोद राजावत 'पदरज'
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर
पृष्ठ: 96
मूल्य: ₹ 150 रुपए


सवाईमाधोपुर (राजस्थान) निवासी विनोद पदरज जी समसामयिक साहित्यकारों में छन्दमुक्त कविता के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी अब तक लगभग आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। साहित्यिक संस्थाओं द्वारा इन्हें विविध पुरस्कारों/सम्मानों से समय-समय पर नवाजा भी गया है। समीक्ष्य कृति 'अगन जल' में 96 पृष्ठों में आपकी 57 कविताएँ संकलित की गई है। आकर्षक आवरण पृष्ठ वाली इस पुस्तक की भूमिका सवाई सिंह जी शेखावत द्वारा लिखी गई है।

विनोद पदरज
 पुस्तक 'अगन-जल' सर्वप्रथम अपने शीर्षक से ही पाठक को आकृष्ट करती है। अग्नि व जल दोनों धुर विरोधी तत्व है जिनका एका पदरज जी ने अपनी पुस्तक के शीर्षक में किया है। अग्नि तत्सम शब्द है। इसका तद्भव सामान्यतः आग होता है। किंतु पदरज जी इससे भी दो कदम आगे तक चले। वे अगन तक आए। इस अगन में व्यापक निहितार्थ देखे जा सकते हैं जो पुस्तक की कविताओं से सिद्ध भी होते हैं। अग्नि यानी तत्सम को छोड़ कवि लोकोन्मुख होते हैं। आग को त्यागते हुए अगन तक आना लयात्मकता व सरसता की ओर उन्मुख होना है। जल को समाहित करते हुए उन्होंने जतला दिया है कि उनकी दृष्टि एकांगी नहीं।

पुस्तक की प्रथम कविता ‘मुकुट’ से अंतिम कविता ‘काल’ तक कहीं विराम लेने का मन न हुआ। यह लेखक की सफलता को प्रमाणित करता है। कवि का सर्वाधिक मजबूत पक्ष उसकी संवेदना है जो अधिकांश कविताओं में प्रत्यक्ष होती है। यह संवेदना कहीं पशुओं के प्रति है तो कहीं शोषित-उपेक्षित महिलाओं के प्रति। इनकी करुणा का प्रसार वृक्षों से होते हुए समूची वसुधा तक जाता है।
छोड़िए भी
इसे वे क्या समझेंगे
जिनके लिए
आडमी का अर्थ जानवर
और जानवर का अर्थ
फकत दूध और चर्बी और जूता है
(पशु मेले में)

यशपाल शर्मा 'यशस्वी'
पदरज जी प्रतीकों के माध्यम से अपनी बात कहने में सिद्धहस्त हैं-
पत्थरों से मिलकर पानी
खुरदरा नहीं होता
पानी से मिलकर पत्थर
मुलायम हो जाते हैं
(पत्थर और पानी)

स्त्रियों के प्रति कवि की दृष्टि जहाँ एक ओर श्रद्धा व सम्मान से परिपूरित है तो दूसरी ओर पुरुषप्रधान समाज में उनकी दुरवस्था देख कर सहानुभूति से सिक्त भी होती है।
आह!
पुण्य की ऐसी साध के लिए
और नैसर्गिक आह्लाद के लिए
उसे उम्र भर इंतजार करना पड़ा
(पुष्कर घाट पर)

उनके द्वारा प्रयुक्त उपमान पाठक को चमत्कृत करते हैं।  उनके लोकजीवन से सामीप्य को सिद्ध करते हैं। कवि की लेखनी की बिम्बविधायिनी शक्ति भी हजारों-हजार चित्रों को पाठक के मानस-पटल पर उकेरती चलती है। 
एक पुस्तकालयाध्यक्ष था
जो बल्ब की मरियल रोशनी में बैठा
इन परियों की चौकीदारी करता था
(पुस्तकालय में)

धूप अंगड़ाइयाँ लेती है सद्य विवाहिता सी
चाँदनी अभिसार को जाती हुई नायिका सी
(फगनौटी- एक)

श्री पदरज जी की कविता भाषा की प्रांजलता से पूरी तरह दूर तो नहीं किंतु देशज शब्दों के प्रयोग से वे झिझके भी नहीं। इनकी कविता में आसमान के तारों सी चमक कम किंतु मिट्टी की महक सशक्त रूप से देखी जा सकती है।

अनकहे ही बहुत कुछ कह जाने की उनकी कला चुभते हुए प्रश्नों से पाठक को स्तब्ध कर देती है। अतुकांत, छंदमुक्त कविताओं के इस संग्रह में लय अथवा प्रवाह का अभाव किंचित भी दृष्टिगत नहीं होता। कहन की मारक शैली इस पुस्तक को पुनः-पुनः पढ़ने के लिए आमंत्रित सी करती है। मैं कामना करता हूँ कि पदरज जी निरंतर अपनी लेखनी की ऊर्जा से साहित्य के भंडार को समृद्ध करते रहें।
शुभमस्तु।
***

यशपाल शर्मा 'यशस्वी'
पहुँना, जिला- चित्तौड़गढ़, राजस्थान 312206
चलभाष: 8104665141

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