अहिंसा एवं मानवाधिकारों का सार्वभौम घोषणा पत्र (यूडीएचआर)

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

पीठाचार्य, डॉ. आम्बेडकर पीठ (मानवाधिकार व पर्यावरण मूल्य) 
पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, भटिंडा
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लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।


संयुक्त राष्ट्र सार्वभौम घोषणा-पत्र (1948), 10 दिसंबर को आया था. इस घोषणा पत्र का मुख्य उद्देश्य उसकी 30 सूत्रीय मानवाधिकारों की प्रतिपूर्ति के लिए बनाए गए संकल्प हैं, जिससे मनुष्य के हितों की रक्षा हो। इसका मनोविश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि यह एक अहिंसक सामाजिकी के विनिर्मिति के लिए बनाए गए संकल्प हैं। इसमें गरिमा, सुरक्षा, बंधुता और स्वातंत्र्य का समावेश है। किसी भी अहिंसक व्यवस्था में सह-अस्तित्व के साथ सबकी गरिमा की अनुकूल प्रतिष्ठा हो, इससे बड़ा अहिंसक संकल्प कोई हो ही नहीं सकता। यह पृथ्वी हमारी है। चाहे भौगोलिक क्षेत्र कोई भी हो, इस पृथ्वी पर मनुष्य द्वारा सृजित-सत्ता है। इस पृथ्वी पर मनुष्य की इस सत्ता को चुनौती भी मनुष्य सभ्यता द्वारा लगातार दी जा रही है। हमारे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक विकास के लिए गढ़ी गई विभिन्न अवधारणाओं में हमें यह बताने की कोशिश होती है कि इस बदलाव से अमुक चीजें मनुष्य के लिए सहयोगी बनेंगी लेकिन होता कुछ नहीं है। एक उदाहरण देखें- बहुत ही ज्यादा समय का उदाहरण नहीं है यह, भारत स्वतंत्र हुआ और जवाहरलाल नेहरू की सरकार देश में विकास की बात करने लगी और यह बताया गया कि जब बांध बनेंगे तो बिजली बनेगी। बिजली बनेगी तो विकास होगा। इसी प्रकार जब भी परमाणु परीक्षण हुआ, तो यह बताया गया कि आत्म-सुरक्षा की दृष्टि से और अपने विकास व मेधा को प्रदर्शित करने के लिए यह साइंटिफिक रिसर्च व हथियार हमारे ज्ञान के विकास को प्रदर्शित करते हैं। यह हमारी संप्रभुता और शक्तिशाली होने को भी प्रामाणित करते हैं। दुनिया में शहरीकरण, बाज़ार, औद्योगीकरण से विकास को परिभाषित किया गया। कृषि आधारित उत्पादन के लिए खाद व रसायन का उपयोग होगा, तो यह हमारी तरक्की होगी, यह भी बताया गया। अब यह मनुष्यों द्वारा ईजाद किया गया भ्रम मनुष्य पर भरी पड़ने लगा है। बांधों से विस्थापन हुआ। परमाणु हथियारों से नागासाकी और हिरोशिमा हुआ। अन्य विकास के जो भी पैमाने बताए गए, उनसे मनुष्य-समाज किस प्रकार अपने ही ऊपर कसे गए सिकंजे में फंस हुआ स्वयं को पा रहा है, उसे हर व्यक्ति आज जान चुका है, समझ चुका है। ये सभी मानव अधिकारों के हनन के कारक हैं।
जब प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हुआ था तो दुनिया इकट्ठी हुई थी। लीग ऑफ नेशंस बनाया। द्वितीय विश्व युद्ध हुआ तो दुनिया जुटी और संयुक्त राष्ट्र बनाया गया। संयुक्त राष्ट्र बनने के बाद ही तो दुनिया में मानवाधिकारों के व्यापक संरक्षण की वकालत शुरू हुई थी। एलीनर रुजवेल्ट की अध्यक्षता में संयुक्त राष्ट्र सार्वभौम घोषणा पत्र तैयार हुआ था। भारत की हंसा मेहता भी इस महत्वपूर्ण दस्तावेज़ निर्माण में शामिल थीं। 10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र सार्वभौम घोषणा पत्र दुनिया के अधिकांश देशों ने सर्वसम्मति से अंगीकृत किया था, और जो उसके 30 सूत्रीय प्रतिज्ञा-पत्र थे, उसे किसी भी स्तर पर प्राप्त करने की प्रतिबद्धता दुहराई गई थी।

अपने उत्थान और पतन की पर्याप्त बहस में उलझा इंसान इस सार्वभौम घोषणा पत्र के 75 वर्ष बाद यह आँकलन कर रहा है कि हमने अपनी प्रतिबद्धताओं के साथ क्या किया? हम मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए कितना सफल हुए? हमने मनुष्य की आज की विकास यात्रा में कहीं मानवाधिकारों को पीछे ही तो नहीं छोड़ दिया, इसका आँकलन कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र सार्वभौम घोषणा-पत्र यानी यूडीएचआर के 75वीं दहलीज के बाद का मानवाधिकारों का जायजा अब लिया जाना जरूरी भी हो चुका है। यह समझने की आवश्यकता है कि विश्व की सर्वमान्य संस्था संयुक्त राष्ट्र, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकारों के उच्चायुक्त कार्यालय, गनहरी, राज्यों द्वारा स्थापित राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, विभिन्न राज्यों द्वारा स्थापित महिला अधिकार आयोग, मानव अधिकारों के पैरोकार, मानव अधिकारों के लिए आंदोलनकर्ता और मानव अधिकारों के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता, सबने मिलकर कितना मानवाधिकारों का संरक्षण किया और क्या शेष है, जो आज करना है, और आने वाली सदी में हमारी पीढ़ी को करना पड़ेगा? या यह सब आज तक जो हुआ वह सब एक प्रकार से भ्रम रचा गया। प्रश्न स्वयं से पूछकर देखिए तो हजार सवाल हैं सबके पास। कोई भी दुनिया का व्यक्ति आज से संतुष्ट नहीं है। लेकिन, ऐसा नहीँ है कि असन्तुष्ट लोगों की संख्या बहुत ही अधिक है। संतुष्ट अन्य मामलों में जो होगा भी, तो मानव अधिकारों को लेकर संतुष्ट नहीं है, ऐसा कहा जा सकता है। विश्व के विभिन्न हिस्से में निगाह उठाकर देखें तो पता चलता है कि आज भी सुरक्षा, गरिमा, स्वस्थ जीवन, भरपेट भोजन व स्वतंत्रता व संपन्नता पूर्णतया सबके लिए मौजूद नहीं है। शरणार्थियों की संख्या बढ़ रही है। विस्थापन हो रहे हैं। भूख बढ़ी है। गरीबी बढ़ी है। हिंसा बढ़ी है। अतिक्रमण बढ़े हैं। युद्ध निरंतर जारी हैं। जलवायु समस्या रुकने का नाम नहीं ले रही है। प्रकृति व धरती का दोहन जारी है। धरती को गरम होने से बचाव का कोई एजेंडा नहीं है। हमारा समुद्र और ग्लेशियर भी कहाँ सुरक्षित हैं। शहरीकरण और विभेदीकरण, आवारा पूंजी की रफ्तार और भावनाओं से खेलने की राजनीति हमारे आज को बिगाड़ चुके हैं। अब खुद सोचिए कि हमारे देश में ही नहीं दुनिया के राज्यों ने मानव अधिकारों के लिए क्या किया? क्या खोया और क्या पाया, सब आँख के सामने हैं। हमारा हैपीनेस इंडेक्स किस स्तर पर है, यह सबको पता है। राज्य सोचें कि वे अपनी वार्षिक रिपोर्ट के साथ जब अपनी पीठ थपथपाते हैं तो उसमें कितनी सचाई होती है और नागरिक और अनागरिक के रूप में जी रहा मनुष्य समाज कितने दुखों के पहाड़ के नीचे दबा हुआ महसूस कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र सार्वभौम घोषणा पत्र जब लाया गया। उन दिनों परिस्थितियाँ भिन्न थीं। औपनिवेशिक सभ्यता से मुक्त होते देश अपने नागरिकों के लिए नए स्वप्न के साथ अपने भौगोलिक क्षेत्र में बहुत कुछ करने की कोशिश में थे। स्वाधीन होने और संप्रभु होने के साथ वे एक कल्याणकारी राज्य बनकर नागरिकों के हित में नई क्रांति लाने की बात कर रहे थे लेकिन उन सभी स्वतंत्र हुए देशों के 75 वर्ष के इतिहास हमें सोचने के लिए आज मजबूर कर देते हैं। क्या लोकतंत्र खंडित नहीं हुए? क्या आतंकवाद नहीं हुआ? क्या हिंसाएँ नहीं हुईं? क्या महिलायें सुरक्षित हैं आज भी उन देशों में जो 75 साल पहले आजाद हुए थे? क्या हमारी सभ्यता के यही मापदंड उन दिनों थे, जिसकी बदौलत हम यूडीएचआर को हासिल करने की बात हम सब मिलकर कर रहे थे?

यूडीएचआर वास्तव में आज लगता है कि दुनिया की अरबों आबादी की समझ से बाहर की चीज है। दुनिया का सच यह है की आदिवासी समाज के लोग से लेकर जन-सामान्य से भी कोई पूछे तो उसे यूडीएचआर के बारे में पता नहीं है, ऐसा ही सुनने को मिलेगा। तो क्या अब 75 वर्ष बाद यूडीएचआर के बारे में जागरूकता फैलाने का समय है? तो क्या अब तक यूडीएचआर केवल संभ्रांतों का हथकंडा बनकर रह गया है? इस पर ही मंथन अगर राज्य कर लें तो भी बड़ी बात है। डर इस बात का है कि कहीं अन्य दिवस सेलीब्रेशन की भांति यह संयुक्त राष्ट्र सार्वभौम घोषणा-पत्र की 75वीं वर्षगांठ भी आत्मावलोकन की जगह भ्रम पैदा करने की एक आयोजना न बना दें। डर इस बात का भी है कि क्या हम 75 वर्ष बाद अपनी आने वाली पीढ़ी को धोखा देने के लिए तैयार हैं? भारत में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने सतत मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए कार्य किया है, इस बात का संतोष है। वर्तमान एनएचआरसी अध्यक्ष और उसके सम्मानित सदस्य निःसंदेह जो नए इनिशियेटिव लिए हैं, उसकी गनहरी ने तारीफ की है। विश्व में हमारे एनएचआरसी का सम्मान बढ़ा है। स्वतःसंज्ञान के भी मामले बहुत प्रभावकारी बन पड़े हैं। ऐसा ही पूरे विश्व के देश प्रयास करें। ऐसा ही हर व्यक्ति प्रयास करे। यूडीएचआर सबकी पहुँच का हिस्सा बन जाएगा। सबकी प्रसन्नता का पैमाना बदल जाएगा। मानवाधिकारों का संरक्षण आवश्यक है। ऐसे वातावरण को तैयार करने की आवश्यकता है जिससे सब सबमें अपने आपको देखें। व्यष्टि से समष्टि की यह यात्रा है। सबके सुख की कामना यदि सबमें व्याप्त होगी, तभी तो यूडीएचआर की अवधारणा को हम सच कर पाएंगे। 75वीं दहलीज पर खड़े विश्व से यह अपील हर नागरिक करे कि उन्हें व्यष्टि से समष्टि की ओर आगे बढ़ना है और निरंतर सबका ख्याल रखना है, तभी हम यूडीएचआर को सबके जीवन का हिस्सा बना सकेंगे और मनुष्य की गरिमा, स्वतंत्रता व प्रसन्नता को सतत बना सकेंगे। निःसंदेह बड़े आत्मावलोकन से गुजरकर ही इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।

अहिंसा की सभ्यता ऐसे ही संकल्प के लिए आग्रह करती है। एक ऐसे सभ्य समाज बनाने की बात करती है जिसमें सभी के मानव अधिकारों को प्रतिष्ठा मिले। वैश्विक स्तर पर यह बताया जा रहा है कि मनुष्य के भीतर सहन करने, दूसरे को समझने, दूसरों के साथ सहयोग स्थापित करने, समन्वित वैचारिकी का समावेशी समाज बनाने की क्षमता घाट रही है। यह जो पत्नोंमुख होने की वजहें हैं, वे हमारे मनुष्य बिरादरी को हिंसक बना रही हैं और प्रेम की जगह घृणा की राह पर ले जा रही हैं। प्रेम से ही तो अहिंसा की संभावना होती है। यदि प्रेम व त्याग की ही कसौटी पर मनुष्य दरिद्र हो जाएगा तो उसमें अहिंसा की संभावना बनती ही नहीं है। मनुष्य-सत्ता से स्थापित राज्यों की गवर्नेंस प्रणाली अहिंसक समाज व कल्याणकारी समाज तब हम नहीं बना सकेंगे यदि त्याग व प्रेम से विरक्त मनुष्य समाज का उत्पादन करेंगे. ऐसे में अहिंसा के लिए कोई स्थान बचेगा ही नहीं। हिंसा ही हिंसा व्याप्त होगी। यह सभ्यता पशुवत सभ्यता बन जाएगी जो केवल अप्मने उदरपूर्ति से मतलब रखता है।

संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार सार्वभौम घोषणा पत्र एक शुद्ध अहिंसक घोषणा पत्र है जिसमें दुनिया की उदारता, करुणा, प्रेम और मुदिता सबकुछ साथ-साथ अंगीकृत करने की अपील की गयी है। इसमें सह-अस्तित्व है। इसमें भ्रातृत्व है। इसमें सहयोग है। इसमें परोपकार है। समाज के जीवन जीने की शैली है। अहिंसा मनुष्य के समग्र जीवन का मूल्य है, जो अपने अभीष्ट में नैसर्गिक अहिंसक वातावरण की ओर ले जाने का माध्यम खोजता है। ऐसे में, संयुक्त राष्ट्र सार्वभौम घोषणा-पत्र (यूडीएचआर) के उज्ज्वल पक्ष की ओर सबका ध्यान जाना चाहिए जिससे मानव अधिकारों की हम रक्षा करें और अहिंसक पृष्ठभूमि वाली सभ्यता का सूत्रपात करें।

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