प्रेत: प्रपात

अनिमा दास
मूल रचना (ओड़िआ)- रक्षक नायक
अनुवाद - अनिमा दास (कटक, ओड़िशा)


मैं मेघों में रहूँ अथवा सीपों में
हूँ मैं चिर क्षुधित।

कुछ अनावश्यक चिंताएँ
मेरी लेखनी को करतीं नियंत्रित
मलिन व व्यर्थ स्वप्नों के कीर्तन में
उन्मुक्त बछड़े को मुक्त प्रांगण देते हुए
अदृश्य हो जाता है मेरा गमथ
घुल जाता है मुझमें
हिंस्र-नदन...
करता मैं देह-स्वेद परिष्कृत
एवं भाग्य को निंदित।

मेरी गठरी को न करो स्पर्श
यदि यह खुल गई
तुम बन जाओगे एक कहानी 
पुष्पों से न करो मेरे वक्ष को स्पर्श
हो रहा अति उतप्त
मेरे उदर का निम्न भाग...

मैंने लील लिया है
एक विराट अजगर व
एक ध्यानमग्न सन्यासी
पर्वतों पर घिसकर
मेरी जिह्वा हुई है तीक्ष्ण 
निद्रा सी सघन गहराई में
किया है कवलित
पिशाची स्वप्नों को
अभी भी हूँ क्षुधित
अभी भी है मन तृषित
चक्षु की गंदगी सहित 
मैंने त्याग दिए हैं 
अनेक सूर्योदय।

मैं हूँ विषाक्त... चरित्रहीन
किया है मैंने धर्षित
एकाकीत्व में,
आराध्या देवियों के
निरीह इतिहास को....
एकाकी नक्षत्रों को भी
किया है मैंने अपहृत...।

मेरे कथ्य पर करो विश्वास
किंतु मुझ पर नहीं...
मैंने देखा है उत्स 
कलिकाओं के चीत्कार का 
व भौगोलिक फूत्कार का।

जर्जर होकर ले रहा हूँ 
आश्रय...ग्रासित तम में
वीभत्स पवन का घूर्णन बन 
रहा मैं पंचांग में...
कांपती रहीं ...बिखरती रहीं 
अस्थियाँ...
अग्नि बन नाचता रहा
जरायु में.... आयु में।

क्षुधा से होगी...मेरी मृत्यु 
है यही नियति।

वैसे भी भाग्य व क्षुधा हेतु 
मैं नहीं हूँ चिंतित।

प्रेत होकर प्रपात सा
निन्मगामी होना ही
है मेरा धर्म...।
प्रेत का क्या होता है जीवन!
प्रपात का  क्या होता है मरण!

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