सर्जनात्मकता के लिहाज से बच्चों और बड़ों के लिए लिखे साहित्य में कोई फर्क नहीं है!

वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश मनु जी से साक्षात्कार

- प्रीति प्रसाद


जीवन-संगिनी डॉ. सुनीता के साथ प्रकाश मनु
हिंदी के प्रसिद्ध बाल साहित्यकार प्रकाश मनु ने अपनी कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना, संस्मरण, ज्ञान-विज्ञान साहित्य आदि कई विधाओं से हिंदी बाल साहित्य को समृद्ध किया है। इनका बाल साहित्य विभिन्न धारणाओं के बीच जीवन-बोध को बालसुलभ दृष्टि से देखने का उपक्रम है। विशेष रूप से मनु जी का कथा साहित्य समकालीन दौर के बालमन की अनगिनत समस्याओं का चित्रण करने के साथ-साथ, उनके समाधान की ओर भी संकेत करता है। उऩका बाल उपन्यास ‘गोलू भागा घर से’ बाल पाठकों के साथ ही अभिभावकों को भी बालमन को समझने की राह दिखाता है। ऐसे ही साहित्य अकादेमी के पहले बाल पुरस्कार से सम्मानित ‘एक था ठुनठुनिया’ बाल उपन्यास मानवीय मूल्यों के व्यवाहारिक तथा वैचारिक पक्षों की सामासिकता का चित्रण करता है। ‘खजाने वाली चिड़िया’ बाल उपन्यास में एक रहस्यमय चिड़िया बच्चों के लिए आशा और उम्मीद का प्रतीक बन जाती है, जो उन्हें निडर और साहसी बनाने के साथ ही हर पल आगे बढ़ने की प्रेरणा दे जाती है।

सच तो यह है कि अपने साहित्य के माध्यम से प्रकाश मनु जिस दुनिया की परिकल्पना करते हैं, उसे मात्र कल्पना एवं फंतासी कहकर नकारा नहीं जा सकता है। उसका यथार्थ से गहरा रिश्ता है। अपने मूल स्वरूप में यह दुनिया आपकी-हमारी जानी-पहचानी दुनिया है जिसका विस्तार अनंत है। मनु जी के कथा साहित्य में प्रकृति और पर्यावरण के साथ ही मानवेतर मूक प्राणियों की समस्याओं जैसे जीवंत मुद्दों का वर्णन इसका प्रमाण है।

इसी तरह प्रकाश मनु जी की बाल कहानियाँ बालमन की सुबोधता की प्रतिध्वनि हैं। इनके यहाँ ‘लावनी की आँखें’, ‘जानकीबाई है एक परी का नाम’, ‘सरस्वती बाबू की कहानी’ जैसी प्रेरणादायक कहानियाँ हैं तो ‘गोपी की फिरोजी टोपी’, ‘मन्ना रे, मत तोड़ो फूल’ सरीखी वैज्ञानिक संचेतना की कहानियाँ भी हैं। ‘फागुन गाँव की परी’ जैसी यथार्थपरक फंतासी की कहानियाँ हैं तो ‘पिंकी का जन्मदिन’, ‘खिलौना का मेला’, ‘रहमान चाचा का लट्टू’ जैसी बालमन की रोचक कहानियाँ हैं। कलेवर की विविधता मनु जी के बाल कथा साहित्य की मुख्य विशेषता है। वे अपनी प्रायः सभी कृतियों में अनायास ही सह-अस्तित्व, सामूहिकता एवं सामासिकता जैसे जीवन के शाश्वत मूल्यों को अपनी सहज, सरल एवं सुगम भाषा द्वारा बच्चों के मानस पर उकेरने का प्रयास करते हैं।
मनु जी ने बच्चों के लिए बहुत लिखा है, और अब भी पूरी तरह समर्पित होकर लिखने में निमग्न हैं। ऐसे सरल, समर्पित और मृदुभाषी रचनाकार प्रकाश मनु जी के साथ बाल साहित्य से जुड़े समसामयिक प्रश्नों पर हुई बातचीत, यहाँ प्रस्तुत है।
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प्रीति प्रसाद: मनु जी, आपने अपना पूरा जीवन बाल साहित्य के लिए समर्पित किया है। बाल साहित्य में आपका काफी काम है, नाम भी है। तो मैं बातचीत की शुरुआत इस सवाल से करना चाहती हूँ कि समकालीन बाल साहित्यकारों के मध्य आप अपने लेखन को किस रूप में दर्ज करते हैं?
प्रकाश मनु: प्रीति जी, मेरे लिए यह कह पाना बहुत कठिन है। देश के अलग-अलग भागों में जो लोग मुझ पर शोध कर रहे हैं, जिनमें आप भी हैं, इसका बेहतर जवाब दे सकते हैं। या मेरे पाठकों से यह बात पूछनी चाहिए। हाँ, मैं इतना जरूर कह सकता हूँ कि मेरे लेखन में कुछ है, जो बच्चों और किशोर पाठकों को बहुत आकर्षित करता है। इसलिए वे खोज-खोजकर मेरी कविता, कहानी, उपन्यास और नाटक वगैरह पढ़ते हैं, और फिर जीवन भर सहेजकर रखते हैं। कभी-कभी इस बारे में उनके छोटे-छोटे पत्र, संदेश या फिर फोन आ जाते हैं, और वे बड़े उत्साह से बताते हैं कि मनु अंकल, आज हमने आपकी फलाँ कहानी पढ़ी, बहुत अच्छी लगी...या कि मनु अंकल, हमारी लाइबेरी में आपकी बहुत किताबें हैं। आप बहुत अच्छा लिखते हैं...मैंने आपकी बहुत सारी किताबें पढ़ी हैं। ऐसे क्षणों में कितनी खुशी मिलती है, आप इसका अंदाजा नहीं लगा सकतीं। मुझे लगता है, जैसे दुनिया का सबसे बड़ा खजाना मिल गया हो। और सच पूछिए तो दुनिया का कोई बड़े से बड़ा पुरस्कार भी इसका मुकाबला नहीं कर सकता, फिर चाहे वह नोबेल पुरस्कार ही क्यों न हो।
बच्चों के लिए लिखी गई मेरी रचनाएँ औरों से अलग क्यों हैं, मैंने इस बारे में सोचा तो एक-दो बातों पर मेरा ध्यान गया। एक तो यह कि बच्चों के लिए लिखते हुए उन्हें आनंदित करने की बात मेरे मन में पहले आती है। उन्हें किसी किस्म का उपदेश देना मुझे नहीं भाता, और मुझे लगता है, बच्चे भी ऐसी उपदेशात्मक चीजों से दूर भागते हैं। पर हाँ, कोई इसका अर्थ यह लगाए कि अपने बाल साहित्य से मैं बच्चों का मनोरंजन करता हूँ, तो यह बात भी ठीक नहीं। इसके बजाय खेल-खेल में अपनी बात कहना मुझे प्रिय है, जिससे बच्चों के मन में अनायास कोई अच्छा काम करने या अच्छा बनने की भावना पैदा होती है। आप चाहें तो इसे मेरे बाल साहित्य की एक ऐसी विशेषता मान सकती हैं, जो बच्चों को बहुत प्रभावित करती है। लुभाती भी है।

दूसरी बात यह है कि बच्चों के लिए लिखी गई मेरी रचनाओं में ज्यादातर बच्चे और किशोर ही मुख्य पात्र होते हैं। यह बात भी शायद बच्चों को काफी आकर्षित करती है, क्योंकि मेरी कहानी, उपन्यास या नाटक में शामिल बच्चों और उनके क्रिया-कलापों से वे काफी जुड़ाव महसूस करते हैं। साथ ही, उनकी बातों, भीतरी कशमकश और क्रिया-कलापों से बहुत कुछ सीखते भी हैं और उसकी गहरी छाप उन पर पड़ती है। लेकिन यह सब अनायास ही होता है, एकदम अनायास। इसलिए यह सब उन्हें आनंदपूर्ण लगता है, और बड़ी स्फूर्ति भी देता है। शायद यही कारण है कि मेरी पुस्तक का एक पन्ना पढ़ने के बाद, तब तक वे इसे छोड़ नहीं पाते, जब तक मेरी पूरा किताब न पढ़ लें। यहाँ तक कि मेरी किताब पूरी होने पर वे मेरी लिखी हुई दूसरी किताबों की खोज भी करते हैं। मेरे लिए यह बेशक बड़े आनंद की बात है।
इस सिलसिले में नन्हे-मुन्ने बच्चों के मम्मी-पापा या अन्य अभिभावकों के फोन आते हैं तो मैं किस कदर भावविभोर और अभिभूत हो जाता होऊँगा, इसकी आप कल्पना कर सकती हैं। हालाँकि इसे लेकर मेरे मन में कोई अभिमान का भाव नहीं है। शायद ईश्वर ने मुझसे यह कार्य करवाना चाहा और इसके लिए मुझे माध्यम बनाया, बस यही बात मन में आती है।...और सच तो यह है प्रीति जी, कि बच्चों के लिए कोई नई रचना लिखते समय मैं बहुत डरा हुआ होता हूँ कि पता नहीं, वह कुछ बन भी पाएगी कि नहीं। फिर रचना पूरी होने के बाद बड़े धड़कते दिल से मैं खुद एक बच्चे की तरह उसे पढ़ता हूँ। और वह मन को जँच जाती है, तो मेरे चेहरे पर उस समय कैसा आश्वस्ति का भाव आता है, काश, मैं आपको बता पाता।
तो हर रचना मेरे लिए एक नया इम्तिहान है। उसे पूरा करने के बाद जो आनंद मुझे मिलता है, उसे बताना मेरे बस की बात नहीं है। बस, गूंगे का गुड़ ही समझिए। शायद इसी से मेरे बाल साहित्य में कुछ अलग बात आई हो। हालाँकि वह ठीक-ठीक क्या है, यह बता पाना तो खुद मेरे लिए भी मुश्किल है।

प्रीति प्रसाद:
साहित्य के अन्य क्षेत्रों से बाल साहित्य को आप किस रूप में भिन्न समझते हैं?
प्रकाश मनु: कोई फर्क नहीं है, प्रीति जी। बस, एक ही फर्क है कि बाल साहित्य के पाठक बच्चे होते हैं, और यह खयाल मन में हमेशा रहता है। इसलिए बात कहने के अंदाज में या भाषा और वाक्य-रचना में, अभिव्यंजना में इसका प्रभाव खुद-ब-खुद आ जाता है। पर बाल साहित्य लिखते हुए भी मेरा मन उसी तरह तन्मय हो जाता है जिस तरह बड़ों का साहित्य लिखने में। इस लिहाज से दोनों में कोई फर्क नहीं है, किंचित भी नहीं।
इसी तरह बच्चों के लिए कोई कविता, कहानी या उपन्यास लिखते समय उसकी गहनतम अनुभूति कैसे मन को कैसे बाँध लेती है और जब तक रचना पूरी न हो जाए, मन एक तरह के सर्जनात्मक तनाव और पीड़ा से मुक्त नहीं हो पाता—यह चीज जिस तरह बड़ों के लिए कविता, कहानी आदि लिखने में मैं महसूस करता हूँ, ठीक वैसे ही बाल साहित्य में। दोनों में कोई फर्क नहीं है। यानी दोनों में एक ही तरह की सर्जनात्मक तन्मयता की दरकार है, और यह बात बहुत महत्त्वपूर्ण है। जो लोग बाल साहित्य को दोयम दर्जे का साहित्य मानते हैं, या जो बड़ों के साहित्य से बाल साहित्य को कुछ हेठा या कमतर मानते हैं, उन्हें यह बात समझनी चाहिए और अपनी भ्रांति दूर कर लेनी चाहिए।
तो मैं समझता हूँ कि सर्जनात्मकता के लिहाज से बच्चों और बड़ों के लिए लिखे साहित्य में कोई फर्क नहीं है, और दोनों ही लेखक से पूरे समर्पण और तन्मयता की माँग करते हैं। बल्कि बाल साहित्य में सर्जनात्मक प्रतिभा और समर्पण की कहीं अधिक दरकार है, क्योंकि इसमें बराबर यह खयाल रहता है कि जो हम लिख रहे हैं, वह कहीं ऐसा तो नहीं कि बाल पाठकों के ऊपर-ऊपर से निकल जाए, और उसे गहण करने में उन्हें अड़चन आए। इसलिए जो हम कहना चाहते हैं, वह वैसा ही बच्चों के दिलों में पहुँचे, इसके लिए आसान शब्द या आसान अभिव्यक्ति की तलाश करते हुए कहीं अधिक रचनात्मक श्रम, या जतन करना होता है।
यों बाल साहित्य का महत्त्व बड़ों के साहित्य से किसी भी तरह कम है, यह मैं मानने को तैयार नहीं हूँ। बल्कि आप देखेंगी कि विश्व की अन्य भाषाओं के साहित्य में तो बाल साहित्यकार को बड़ों के लिए लिखने वालों से कहीं अधिक यश और सम्मान मिलता है, और धन, मानदेय आदि भी। यहाँ तक कि वहाँ बच्चों के लिए लिखने वाले साहित्यकार कुछेक पुस्तकें लिखकर ही इतनी रॉयल्टी या मानदेय हासिल कर लेते हैं कि वे उससे मजे में अपना जीवन गुजार सकते हैं। इस लिहाज से बेशक हिंदी में स्थिति अच्छी नहीं है। हाँ, ऐसा क्यों है और कैसे इसे दूर किया जा सकता है, फिलवक्त इस बारे में कुछ भी कहने से मैं बच रहा हूँ।

प्रीति प्रसाद: जी, मैं खुद इसी सवाल पर आ रही थी। अन्य भाषाओं की तुलना में हिंदी में बाल साहित्य की उपस्थिति हाशिए की ओर संकेत करती है, आपके अनुसार इसका कारण क्या है?
प्रकाश मनु: एक वाक्य में कहना हो तो मैं कह सकता हूँ प्रीति जी, कि यह लोगों की नादानी है, असंवेदनशीलता भी। इसे और क्या कहा जाए, मैं समझ नहीं पाता। आज इसमें कोई संदेह नहीं रह गया कि बच्चे के संपूर्ण विकास के लिए सबसे जरूरी है अच्छा बाल साहित्य। वह बच्चे के लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि उसे पढ़कर उसके पैर भटकेंगे नहीं और उसके भीतर एक अच्छा इनसान बनने की तड़प पैदा होगी। पर वह बच्चों के साथ-साथ बड़ों के लिए भी उतना ही जरूरी है, खासकर बच्चों के माता-पिता और अभिभावकों के लिए, यह बात भी समझनी चाहिए। क्योंकि बाल साहित्य पढ़कर वे अपने बच्चे के मन, सुख-दुख और उसकी छोटी-बड़ी समस्याओं को ज्यादा अच्छे ढंग से समझ पाएँगे। बच्चे को क्या पसंद है, क्या नहीं या कि बच्चे की क्या समस्याएँ हैं, उसके मन की गुत्थियाँ वगैरह...इसे जाने बगैर आप बच्चे को समझ नहीं सकते। और इस लिहाज से बच्चों के लिए लिखी गई अच्छी कहानियाँ, कविताएँ, उपन्यास या नाटक हमें बहुत कुछ बता देते हैं। पर लगता है कि माता-पिता और अध्यापकों के पास बच्चों के लिए समय ही नहीं है तो भला अच्छे बाल साहित्य का महत्त्व वे क्यों समझेंगे, कैसे समझेंगे!
हालाँकि इसके लिए बच्चे के माता-पिता, अध्यापक और किसी हद तक प्रकाशक भी जिम्मेदार हैं, जो बाल साहित्य छाप तो देते हैं, पर उसके प्रचार-प्रसार के लिए कानी कौड़ी भी खर्च नहीं करना चाहते। किसी तरह का प्रयास भी नहीं करते। इन सबके कारण न लोगों का ध्यान अच्छे बाल साहित्य की ओर जाता है, और न अच्छे और प्रमुख बाल साहित्यकारों की ओर। और शायद इसी कारण यह भ्रांत धारणा लोगों के मन में बनती है कि बाल साहित्य दोयम दर्जे का साहित्य है। हालाँकि जो बड़े और सच में बड़े साहित्यकार हैं, वे जानते हैं कि बच्चों के लिए लिखना कितना कठिन है। इस संबंध में मेरी रघुवीर सहाय, विष्णु खरे समेत साहित्य के कई बड़े दिग्गजों से बात हुई है। सबका यही कहना था कि प्रकाश जी, बच्चों के लिए लिखना सच में बहुत कठिन है, और हम कितना भी चाहें, वैसा साहित्य नहीं लिख सकते, जो बच्चों के दिल में उतर जाए, या जो उनको बड़ा अपना सा लगे।...निराला जी ने तो और भी आगे बढ़कर यह बात कही कि किसी साहित्यकार को तब तक अमरता नहीं मिलती, जब तक कि उसका लिखा हुआ बच्चों के दिल में न उतर जाए। उनका कहना था कि जो रचनाएँ बच्चों को पसंद आती हैं और उनके दिल में रहती हैं, वे सच में अमर हो जाती हं।
यानी, प्रकारांतर से निराला बाल साहित्य की अमरता की बात ही कह रहे थे। यह बात बड़ों के साहित्य में नहीं है और बाल साहित्य में है, तो क्या इसका यह अर्थ नहीं कि बाल साहित्य में कुछ तो ऐसा विशेष है, जो दुर्लभ है, अप्राप्य है। बड़ों का साहित्य और साथ ही बड़े साहित्यकार जिस चीज के लिए तरसते हैं, वह सहज ही बाल साहित्य में मौजूद है, और यह बाल साहित्य की शक्ति भी है, अमरता भी।
एक बात और। निराला यहाँ वही बात कह रहे हैं जो बांगला साहित्य में प्रायः कही जाती है कि कोई लेखक तब तक मुकम्मल साहित्यकार नहीं हो सकता, जब तक कि उसने बच्चों के लिए न लिखा हो। यानी बाल साहित्य एक तरह की कसौटी है बड़ा साहित्यकार होने की। निराला इस बात को कुछ अलग ढंग से कहते हैं। उनका मानना है कि अगर किसी साहित्यकार को अमर होना है तो इसका एक ही रास्ता है कि वह बच्चों के लिए कुछ न कुछ जरूर लिखें। बच्चों के लिए लिखा गया वह साहित्य ही आपको अमर बनाएगा। क्योंकि जो बच्चों के दिल और स्मृतियों में है, वह उनके बडे होने तक धुँधला नहीं पड़ेगा, और यही किसी लेखक की अमरता है। मैं समझता हूँ, निराला ने जिस बात को गहराई से महसूस किया और मुक्त मन से कहा था, उसे दूसरों को भी समझना चाहिए।

प्रीति प्रसाद: मनु जी, इन दिनों बाल साहित्य की सभी विधाओं में काफी काम हो रहा है। बहुत से नए और संभावनापूर्ण बाल साहित्यकार भी दिखाई देते हैं। लेकिन फिर भी उसमें गंभीर आलोचनात्मक काम का अभाव दिखाई पड़ता है। आपके विचार से इसके पीछे क्या कारण है?
प्रकाश मनु: हाँ, आपकी यह बात ठीक है प्रीति जी, कि बाल साहित्य की प्रगति को देखते हुए उसमें जितना गंभीर आलोचनात्मक काम होना चाहिए था, उतना नहीं हुआ। या कि बाल साहित्य जिस तेजी से आगे आ रहा है, उससे तुलना करें तो हम देखते हैं कि आलोचना उसका साथ नहीं दे पा रही, या फिर कहीं बहुत पीछे हाँफती नजर आ रही है। यह स्थिति सचमुच अच्छी नहीं है। पर ऐसा भी नहीं कि इस क्षेत्र में अच्छा काम बिल्कुल हुआ ही न हो। आपने मेरा लिखा बृहत् ग्रंथ ‘हिंदी बाल साहित्य का इतिहास’ तो पढ़ा ही होगा। यह हिंदी बाल साहित्य का पहला इतिहास ग्रंथ है। पर इसके साथ ही यह हिंदी बाल साहित्य की व्यापक आलोचना भी है। अपने इतिहास ग्रंथ में मैंने बाल साहित्य की कोई पाँच-छह पीढ़ियों की रचनाएँ शामिल की हैं। पर मैंने आँख बंद करके तो यह इतिहास लिखा नहीं है कि जो भी रचना मिली, उसे शामिल करते चले गए। बल्कि जो रचनाएँ उपलब्ध हैं, उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण और उत्कृष्ट रचनाएँ कौन सी हैं, जो उस लेखक के साथ-साथ बाल साहित्य की किसी विशिष्ट धारा का प्रतिनिधित्व करती हों, यह विचार बराबर मन में रहा। इस लिहाज से बाल साहित्य के इतिहास लेखन के पीछे केवल इतिहास दृष्टि नहीं, बल्कि आलोचना दृष्टि भी बराबर विद्यमान रही, जिसे आप इस इतिहास ग्रंथ के शुरू से अंत तक देखेंगी।
इसी तरह बाल साहित्य की रचनाओं का परिचय देते हुए भी एक आलोचनात्मक विवेक वहाँ हमेशा उपस्थित रहा है कि जिस कविता, कहानी, नाटक या उपन्यास का यहाँ उल्लेख किया जा रहा है, वह बाल साहित्य आलोचना की कसौटी पर कितना खरा उतरता है या उसका रचनात्मक मूल्य और महत्त्व कितना है। बीच-बीच में अऩ्य लेखकों की रचनाओं से उसकी तुलना भी है। मैं समझता हूँ यह मूल्य मीमांसा एक तरह से बाल साहित्य आलोचना ही है, जो मेरे सतर्क इतिहासकार के कंधे से कंधा मिलाकर साथ चलती नजर आती है।
मेरे लिखे अन्य ग्रंथों में भी, जिनमें ‘हिंदी बाल साहित्य के शिखर व्यक्तित्व’ और ‘हिंदी बाल साहित्य के निर्माता’ के अलावा ‘हिंदी बाल साहित्य : नई चुनौतियाँ और संभावनाएँ’ पुस्तक भी शामिल है, बाल साहित्य आलोचना का काफी विकसित और निथरा हुआ रूप आपको देखने को मिल सकता है।
इसी तरह शकुंतला कालरा जी का भी बाल साहित्य आलोचना में काफी व्यापक और उल्लेखनीय काम है। वे चुपचाप अपने काम में लगी रहने वाली लेखिका हैं, और उन्होंने बाल साहित्य आलोचना के कई अभावों को भरने का बड़ा महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। नई पीढ़ी के लेखकों को देखें तो नागेश पांडेय संजय और अशोक बैरागी ने भी इस दिशा में अच्छा और उल्लेखनीय काम किया है। हालाँकि यह बात आपकी सही है कि नई पीढ़ी में बड़े उत्साह से आलोचना के क्षेत्र में आगे बढ़ने वाले लेखक का नाम पूछा जाए, तो सचमुच बता पाना मेरे लिए मुश्किल होगा। कविता, कहानी, उपन्यास आदि लिखना आसान है, इसलिए हर कोई यही करना चाहता है। आलोचना लिखने के लिए बहुत पढ़ना पड़ता है, बहुत अध्ययन और मीमांसा की जरूरत पड़ती है और श्रम भी बहुत अधिक करना पड़ता है। इसलिए कोई इधर आना नहीं चाहता।

प्रीति प्रसाद: वर्तमान में सक्रिय बाल साहित्यकारों में किसके लेखन से आप संतुष्ट है और अपेक्षा करते हैं कि वे सदैव इसमें सक्रिय रहें? साथ ही यह भी बताएँ कि उनके लेखन का क्या वैशिष्ट्य है?
प्रकाश मनु: वर्तमान में सक्रिय बाल साहित्यकारों में मुझे रमेश तैलंग, श्याम सुशील, प्रभुदयाल श्रीवास्तव, फहीम अहमद और प्रदीप शुक्ल की कविताएँ अच्छी लगती हैं। उनमें एक नयापन है और ताजगी भी। साथ ही अपनी हर कविता में वे लीक से हटकर कुछ न कुछ नयापन लाने की कोशिश करते हैं। इसी तरह शादाब आलम की कुछ कविताएँ मुझे प्रिय हैं। पिछले दिनों नागेश पांडेय संजय की भी कुछ अच्छी बाल कविताएँ मैंने पढ़ी हैं, जिनमें बड़ी ताजगी है। लिहाजा वे मन को मोहती हैं और स्मृतियों में रह जाती हैं। दिविक रमेश जी की कविताओं की प्रयोगात्मकता भी मुग्ध करती है। पर उनकी कई कविताओं में छंद और लय की असावधानी खीज पैदा करती है।
ऐसे ही कहानी और उपन्यासों की बात करें तो देवेंद्र कुमार, विनायक, उषा यादव और मंजुरानी जैन आदि पुरानी पीढ़ी के कथाकार हैं, पर बहुत अच्छा लिख रहे हैं। अपेक्षाकृत युवा पीढ़ी के लेखकों में साजिद खान और अरशद खान की कहानियाँ मुझे अच्छी लगती हैं। उनमें एक तरह का किस्सागोई का जादू है, जो किसी छोटी सी बात में भी जान डाल देता है। यह चीज मुझे खासकर आकर्षित करती है। दिविक जी की लू लू की कहानियों भी मुझे अच्छी लगती हैं। उनमें खासा नयापन और ताजगी है।  मैं चाहूँगा कि ये लेखक बराबर लिखते रहें, और अपनी सुंदर कृतियों से बाल साहित्य का भंडार भरें।
साथ ही मैं यह भी चाहूँगा कि इनके मन में अपने लिखे को लेकर कोई अभिमान न आए, क्योंकि अभिमान रचनाशीलता को नष्ट करता है। यह बात मैं खासकर युवा लेखकों को लेकर कह रहा हूँ। मैंने अकसर यह देखा है कि थोड़े ही समय में बहुत कुछ पा लेने का अभिमान किसी लेखक की जिज्ञासा वृत्ति को खत्म कर देता है। लेकिन बिना जिज्ञासा के तो कुछ भी नहीं लिखा जा सकता। और इतना ही नहीं, कुछ नया कहने की लेखक की तड़प या सृजन की गहन अनुभूतियों के सहारे पूरे धैर्य के साथ रचना का पीछा करने की कशिश—यह सब भी लेखक के अभिमान से खुद-ब-खुद नष्ट हो जाती है। ऐसा लेखक चाहकर भी कुछ अच्छा नहीं लिख पाता, या नया सृजन नहीं कर पाता। उम्दा सृजन के लिए लेखक के भीतर सरलता और विनय हो, यह जरूरी है, जबकि मैं देखता हूँ, आज की नई पीढ़ी इनसे विमुख होती जाती है। इसके बजाय घमंड और बड़बोलापन कहीं अधिक दिखाई देता है। फेसबुक सरीखे मंचों पर इसकी भद्दी बानगियाँ नजर आ सकती हैं। मैं समझता हूँ, किसी लेखक की रचनाशीलता के लिए यह अच्छी बात नहीं है।

प्रीति प्रसाद: बाल साहित्य लेखन के दौर में जेंडर के प्रति आपकी क्या दृष्टि रहती है?
प्रकाश मनु: प्रीति जी, मेरी यह निरंतर कोशिश होती है कि मेरे कथा साहित्य में—फिर चाहे वे कहानियाँ हों, नाटक या उपन्यास, बालक और बालिकाएँ, दोनों की खासी उपस्थिति हो। ऐसा नहीं कि लड़के ही ज्यादातर कहानी, नाटक या उपन्यासों के नायक हैं, लड़कियाँ नहीं। इस लिहाज से मेरी कहानी, नाटक और उपन्यासों में जेंडर के हिसाब से एक सहज संतुलन आपको मिलेगा। और यह कोई सायास नहीं हुआ, बल्कि खुब-ब-खुद, या कहें, अनायास ही होता रहा है। इसलिए कि लड़के और लड़की में कोई फर्क है, यह बात कभी मेरे मन में आती ही नहीं।
मेरी दो बेटियाँ हैं, और वे सचमुच बेटों से बढ़कर हैं। वे इतना ज्यादा हमारे सुख-दुख और परेशानियों को समझती हैं, और इतना कुछ करना चाहती हैं, कि हमारे मन में कभी यह बात आती ही नहीं कि हमारे यहाँ बेटियाँ हैं, बेटे नहीं। यह फर्क हम जानते ही नहीं, और इसे जानने की कभी जरूरत भी नहीं पड़ी। बेटियों ने इस कदर हमारा घर भर दिया है कि उनके होने से लगता है, हमारा परिवार एकदम भरा-पूरा है, और उसमें कोई कमी नहीं है। इसलिए बच्चों की कोई समस्या जेहन में आती है या बचपन का कभी खयाल आता है, तो लड़के-लड़कियाँ दोनों ही ध्यान में आते हैं, और फिर वे स्वतः मेरी कहानी, उपन्यास या नाटकों के खुले कैनवास पर चले आते हैं। और तब वे केवल लड़के या लड़कियाँ नहीं, बल्कि बचपन के सच्चे प्रतिनिधि होते हैं।
अगर मेरे बाल उपन्यासों को आप देखें तो ‘गोलू भागा घर से’ और ‘एक था ठुनठुनिया’ बालक केंद्रित उपन्यास हैं, पर ‘चीनू का चिड़ियाघर’, ‘नन्ही गोगो के अजीब कारनामे’ तथा ‘पुंपू और पुनपुन’ में बालिकाएँ केंद्र में हैं और अपनी शख्सियत से खासा प्रभाव छोड़ती हैं। इसी तरह ऐसी दर्जनों कहानियाँ आपको मेरे कथा-संसार में मिल जाएँगी, जिनमें बालिकाएँ बड़ी प्रमुखता से उपस्थित हैं। ऐसी कुछ कहानियों के नाम लेने हों तो मैं खासकर ‘पिंकी का जन्मदिन’, ‘खुशी को मिला मकई का दाना’, ‘खुशी की अनोखी सैर’, ‘मैं टीचर बनूँगी’, ‘छत पर कबूतर’, ‘मीशा की दावत’, ‘एक स्कूल मोरों वाला’, ‘जानकीबाई है एक परी का नाम’, ‘हेमा दीदी का स्कूल’ तथा ‘डाक बाबू का प्यार’ कहानियों का जिक्र करना चाहूँगा, जो मुझे खासी प्रिय हैं और मेरे पाठकों ने भी इन्हें खूब सराहा है।
अगर इस दौर में लिखने वाले कुछ अन्य लेखकों के नाम लेने हों तो उषा यादव, क्षमा शर्मा, दिविक रमेश, अरशद खान, साजिद खान समेत बहुत से कथाकारों का नाम लिया जा सकता है, जिनकी कहानियों में बालिकाओं की खासी उपस्थिति है। और कुछ पहले के उपन्यासकारों की बात की जाए तो मस्तराम कपूर का ‘नाक का डाक्टर’ बड़ा गजब का उपन्यास है, जिसकी नायिका एक कल्पनाशील बालिका है, और उसके जरिए बहुत कुछ नया और आश्चर्यजनक उद्घाटित होता है। फिर भी अगर कुल मिलाकर हिंदी कहानी का पूरा परिदृश्य देखें तो मुझे लगता है प्रीति जी, कि अभी इस दिशा में बहुत कुछ किया जाना बाकी है। ताकि हिंदी बाल कहानी के समूचे परिदृश्य में बालिकाओं की खासी विविधता भरी और महत्त्वपूर्ण उपस्थिति हो।

प्रीति प्रसाद: मनु जी, आपके बाल साहित्य में परंपरा और आधुनिकता दोनों के ही अक्स हैं, और वे परस्पर विरोधी भी नहीं जान पड़ते। तो मैं जानना चाहती हूँ कि बाल साहित्य के संदर्भ में परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व को आपका मानस कैसे समायोजित करता है?
प्रकाश मनु: इसका जवाब तो यही हो सकता है प्रीति जी, कि जैसा मेरे जीवन में है, ठीक वैसा ही मेरे साहित्य में है, फिर चाहे वह बच्चों का साहित्य हो या बड़ों का साहित्य। मेरा मानना है कि परंपरा हो या आधुनिकता, अगर हम उन्हें अपने विवेक की कसौटी पर कसें और उनकी अच्छी और वरेण्य बातें ही ग्रहण करें, नकारात्मक चीजें छोड़ दें, तो परंपरा और आधुनिकता परस्पर विरोधी नहीं रह जातीं, और दोनों को साथ लेकर चलने में कोई कठिनाई भी नहीं होती। इस लिहाज से, जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं किसी किस्म का पूर्वाग्रह नहीं पालता। यानी, न तो मैं अंधा होकर परंपरा का अनुसरण करता हूँ और न आधुनिकता का। अज्ञेय हिंदी के बड़े लेखक हुए हैं, उनकी एक बात मैं आपको बताता हूँ जो मुझे बहुत अच्छी लगती है। हो सकता है, आपको भी लगे। वे कहते हैं कि परंपरा कोई सामने रखी हुई भारी गठरी नहीं है कि मैं उसे सिर पर उठाऊँ और चल दूँ। बल्कि परंपरा मेरे लिए रोज के जीवन में अपनाने की चीज है, और अगर मैं उसे अपनाता नहीं हूँ तो फिर परंपरा है या नहीं, इससे क्या फर्क पड़ता है?
मैं इसी चीज को आधुनिकता पर भी लागू करता हूँ कि आधुनिकता मेरे लिए कोई भारी गठरी नहीं है, कि मैं उसे सिर पर उठाऊँ और चल दूँ। आधुनिकता तो वही हो सकती है न, जिसे मैं सहज ही अपने जीवन में अपनाऊँ। मेरे रोज-रोज के सुख-दुख और जीवन संघर्षों में वह कितनी मेरे काम आती है, या नहीं—इससे उसका महत्त्व पता चलेगा। और अगर वह मेरे किसी काम नहीं आती, या फिर उससे मुझे कोई वैचारिक संबल, कोई भावनात्मक सहारा या शक्ति नहीं मिलती, तो उस आधुनिकता का मैं क्या करूँगा? कोई बड़े भारी शब्दों में उसका बखान करता चाहे तो करता फिरे, पर मेरे लिए उसके होने न होने के कोई मानी नहीं। अच्छा, आप ही बताइए, आधुनिकता अगर अच्छी है, सुंदर है तो क्या मैं उसे कोई नुमाइशी चीज बनाकर अपनी नाक या कान पर लटका लूँ? यह अच्छा लगेगा? नहीं न, इसलिए कि हमारा जीवन ही उसकी सच्ची कसौटी है। उसे अपनाकर ही पता चलेगा कि वह सच में उपयोगी है या नहीं।
तो जाहिर है, परंपरा हो या आधुनिकता, दोनों की एक ही कसौटी है—हमारा जीवन। उसे वे बाहर-भीतर से कितना सुंदर, समृद्ध और रचनात्मक बनाती हैं। और यहाँ दोनों के जो तीखे विरोधमूलक कोने-कुचोने हैं, वे खुद-ब-खुद घिसकर खत्म हो जाएँगे, और ऐसे पक्ष जिनमें परस्पर सामंजस्य हो, वे ही सामने रहेंगे। तो मेरे लिए वे दो अलग चीजें न रहकर एकमेक हो जाएँगी। और वास्तव में, मेरे जीवन में ऐसा ही हुआ है। फिर जो कुछ जीवन में है, वह ठीक उसी तरह खुद-ब-खुद मेरे साहित्य में भी उतर आता है। और यह एकदम अनायास होता है।
वैसे भी प्रीति जी, मेरा मानना है कि जो सच्ची आधुनिकता है और सच्ची परंपरा है, उनमें आपस में कोई विरोध है ही नहीं। परंपरा के बिना आधुनिकता टिक ही नहीं सकती। या जिस परंपरा में अच्छी चीजें गहण करने और पुरानी घिसी-पिटी, निरर्थक चीजों को छोड़ने का साहस न हो, वह परंपरा भी नहीं हो सकती। मुश्किल तब पैदा होती है, जब परंपरा केवल एक लीक पीटने वाली चीज हो जाती है और आधुनिकता एक बौद्धिक नकचढ़ेपन या प्रदर्शन की हड़बड़ी के रूप में सामने आती है। तभी कुछ न कुछ गड़बड होती है। वरना इनका सहमेल तो खुद-ब-खुद होता ही है, और आगे भी होता ही रहेगा।
मैं समझता हूँ कि मार्क्सवाद का वाद, विवाद और संवाद भी यही है। मानव की समूची विकास-यात्रा में हजारों बरसों से यह चलता आया है, और आगे भी चलता रहेगा। हम तुलसीदास जी को पढ़ें या प्रेमचंद को पढ़ें, तो समझ में आएगा कि परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व के समायोजन के लिए कितना बड़ा वैचारिक पुल इन बड़े साहित्यकारों ने बनाया है। इसी तरह हमारे और भी कई बड़े साहित्यकारों ने निरंतर यह कोशिश की है। इस सिलसिले में मुझे अपने गुरु देवेंद्र सत्याथी का ध्यान आता है, जिन्होंने लोकगीतों की खोज में अपना पूरा जीवन लगा दिया। पर लोकगीतों के साथ जुड़ी परंपरा और हमारी आज की आधुनिक जीवन दृष्टि—दोनों के समायोजन में उन्हें कोई कठिनाई नहीं आती। ऐसे ही एक और बड़े साहित्यकार विष्णु प्रभाकर का नाम मैं लेना चाहूँगा, जिनके यहाँ परंपरा और आधुनिकता का बड़ा खूबसूरत सामंजस्य देखने को मिलता है।
मैंने थोड़ा बहुत इन दिग्गज रचनाकारों को पढ़कर, या इनके चरणों में बैठकर सीखा है। लिहाजा परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व का समायोजन कभी मेरे लिए कोई बड़ी समस्या नहीं रही। वह तो जैसे अनायास और खुद-ब-खुद होता चलता है। अगर आपका ध्यान परंपरा और आधुनिकता दोनों के अतिवाद या सनसनी फैलाने वाले तत्त्वों की ओर है, तो आपको विरोध वहाँ भी नजर आएगा, जहाँ वह नहीं है, वरना तो अविरोध उनके स्वभाव में है। अगर सच्चे अर्थ में परंपरा या सही अर्थ में आधुनिकता की बात करें, तो विरोधों का सामंजस्य खुद-ब-खुद होता चलता है। इसीलिए कुल मिलाकर हमारे समाज में दोनों का सामंजस्य आपको नजर आएगा।
आप देखिए कि हमारे पारंपरिक ग्रामीण समाज में धीरे-धीरे आधुनिकता आ रही है, पर वह पारंपरिकता को पूरी तरह विस्थापित कर रही है, यह कहना गलत होगा। इसी तरह हमारे आधुनिक शहरी समाज का आकर्षण फिर से धीरे-धीरे परंपरा की ओर हो रहा है, पर वहाँ आधुनिकता खत्म हो रही है, यह कहना भी ठीक नहीं है। यानी, मोटे तौर से गाँव हों या शहर, दोनों जगह परंपरा और आधुनिकता का सामंजस्य बना हुआ है और वह बना रहेगा। यही बात साहित्य के लिए भी सच है। हमारे साहित्य में कुछ अतिवादों को छोड़ दें तो कुल मिलाकर यही सामंजस्य की स्थिति आपको हर जगह दिखाई देगी। खासकर बाल साहित्य में तो यह सर्वत्र है, और मुझे उम्मीद है, आगे भी बनी रहेगी।

प्रीति प्रसाद: बाल साहित्य में अलौकिक पात्रों की उपस्थिति आपको कितनी प्रासंगिक एवं अनिवार्य लगती है?
प्रकाश मनु: देखिए प्रीति जी, मैं अलौकिक जैसी कोई चीज नहीं मानता और न वह मेरे जीवन में या साहित्य में है। हाँ, मैं कल्पना और फंतासी की बात जरूर करता हूँ, जो बच्चे हों या बड़े, दोनों के लिए एक किस्म का भावनात्मक या बौद्धिक खेल ही है, जो उन्हें रचनात्मक रूप से समृद्ध करता है, और इससे उन्हें बड़ा भावनात्मक संबल और शक्ति भी मिलती है। यानी कुल मिलाकर तो परियों आदि के सहारे हम इस दुनिया के भीतर एक और समांतर दुनिया बसाते हैं, जो वास्तविक नहीं है, पर वास्तविक सरीखी लगती जरूर है। उसका रूप-विन्यास, नियम, कायदे सब कुछ इस दुनिया से अलग है, पर फिर भी लेखकीय कौशल के कारण वह सचमुच की लगती है। मानो हमने कल्पना की एक बहुरंगी सृष्टि रच दी हो, जिसका आकर्षण दूर से लुभाता है। और इस आकर्षण का असली कारण भी यही है कि वह वास्तव से भिन्न है, पर कुछ-कुछ वास्तव जैसी भी है। यानी एक पहेली सी उसके साथ जुड़ी है, और यह पहेली ही उसके प्रति मन में एक कौतूहल पैदा करती है।
तो कुल मिलाकर यह फंतासी भी एक तरह का दिलचस्प खेल है, लेकिन इस खेल के बहुत रंग, बहुत रूप हैं। कभी वह हास्य-विनोद बनता है तो कभी मन की उड़ान और कभी-कभी हमारे मन की अकूत जिज्ञासा और रोमांच भी। हालाँकि कभी-कभी उसके साथ हमारे भीतर का कोई संजीदा हिस्सा भी जुड़ जाता है, और तब वह खेल खेल न रहकर, एक तरह से जिंदगी का पर्याय ही हो जाता है।
आप चाहें तो गुड्डे-गुड़िया के खेल से इसकी तुलना कर सकती हैं। जो बच्चे गुड्डे-गुड़िया का खेल खेलते हैं, वे कितने ही अबोध सही, पर यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि ये गुड्डे-गुड़िया असली नहीं हैं। पर फिर भी वे असली प्राणियों की तरह ही उन्हें बड़े प्यार से नहलाते-धुलाते हैं, नए-नए सुंदर कपड़े पहनाते हैं, यहाँ तक कि अपने हाथ से खाना खिलाते हैं, पानी पिलाते हैं, उनसे मीठी-मीठी बतकही करते हैं और कभी-कभी तो मीठी लोरी गाकर उन्हें प्यार से सुला भी देते भी हैं। इस तरह गुड्डा-गुड़िया भले ही असली न हों, पर उन्हें असली मानने के साथ ही इस खेल के नए-नए रंग-रूप सामने आते जाते हैं और खेल रोमांचक हो जाता है। उसमें बड़ा अनोखा रस भर जाता है, और फिर उससे जो आनंद उपजता है, वह कैसा तो अद्भुत है! संसार में वैसा आनंद भला और कहाँ?
यहाँ तक कि गुड्डे-गुड़िया के विवाह के समय जो हलवा, पूरी, खीर और तमाम तरह की स्वादिष्ट मिठाइयाँ बनती हैं, वे भी तो ज्यादातर मिट्टी की ही होती हैं न। यानी मिट्टी के लड्डू, बरफी, मिट्टी का रसगुल्ला और बालूशाही। खीर-पूरी सब कुछ मिट्टी के ही। और यही नहीं, खेल को और सजीव बनाने के लिए बच्चे मजे-मजे में इन मिठाइयों को थोडा सा चखते भी हैं और ‘आहा, बड़ा स्वादिष्ट है’ कहकर मन की प्रसन्नता व्यक्त करते हैं, तो खेल में कैसा रंग, कैसी भंगिमाएँ आ जाती हैं—इसे मैंने खुद अपने बचपन में महसूस किया है। प्रेमचंद की ऐसी एक बड़ी खूबसूरत बाल कहानी भी है, जिसका नाम शायद ‘खेल’ है।
यों देखा जाए तो प्रीति जी, साहित्य भी तो एक प्यारा सा, मनमोहक खेल ही है न, जिसमें तमाम रंग-रूप और छटाएँ हैं। हम कुछ कल्पित पात्रों को लेकर कोई किस्सा-कहानी या कोई और बात कहते हैं और फिर उनके आसपास सुख-दुख की एक दुनिया बसाने लगते हैं तो होते-होते उसमें सचमुच जान पड़ जाती है, और उसमें इतना रस आने लगता है कि हम यह वाकई भूल जाते हैं कि हम कोई कल्पित कहनी कह या सुन रहे हैं। वे पात्र भले ही काल्पनिक सही, पर उनके साथ जुड़ी घटनाएँ और सुख-दुख तो वास्तविक ही होते हैं, जो हमें अपने आसपास के जीवन के सुख-दुख और तकलीफों से बहुत गहराई से जोड़ देते हैं। यही कारण है कि वे पात्र भले ही काल्पनिक हों, पर उनके दुख से हम दुखी और उदास होते हैं और उनकी खुशी और उल्लास के क्षणों में हमारे चेहरे पर भी एक मीठी सुकून भरी मुसकान आ जाती है। यहाँ तक कि हम खुद भी उनके साथ-साथ ठहाके लगाने लगते हैं।
यानी हमने एक खेल शुरू किया और उसमें जान पड़ गई। वे कल्पित पात्र वास्तव के से हो गए। वे काल्पनिक कथाएँ जीवन का स्थानापन्न बन गईं। इस कदर कि आज हम प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ कहानी के हामिद की बात ऐसे करते हैं कि जैसे वह कोई वास्तविक बच्चा हो।...और फिर  हम सोचने लगते हैं कि जब और बच्चों ने अपने पैसों से सुंदर-सुंदर खिलौने खरीदे तो क्या उसका जी न ललचाया होगा? और फिर जब उसने अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदा तो क्या-क्या भाव उसके मन में आए होंगे? यानी हामिद और उसके दोस्त, उनके खेल-खिलौने, हामिद का चिमटा सब कुछ जिंदा हो गया और एक कल्पित कहानी एक वास्तविक जिए गए जीवन की तरह हमारी आँखों के आगे साकार हो उठती है। वह हमारे जीवन से किसी तरह कम यथार्थ और वास्तविक दुनिया नहीं है।
तो साहित्य में यह खेल चलता है और अगर यह खेल न हो तो साहित्य भी गणित का एक सवाल बन जाए कि दो जमा दो मिलकर चार हो गए। पर हम जानते हैं, कि साहित्य में बहुत बार जादू भी होता है, यानी वहाँ एक जमा एक मिलकर ग्यारह हो जाते हैं। इसलिए कि साहित्य खेल है कल्पना का, साथ ही मनोभावों का भी, जिसे करीने से खेला जाए तो उसमें जान पड़ जाती है। इसीलिए उर्दू के एक बड़े कहानीकार जोगिंदर सिंह अकसर यह कहा करते थे कि कहानी लिखी नहीं जाती, बल्कि कहानी तो बसाई जाती है। अगर हम केवल कहानी लिखते हैं और उसे लोगों के दिलों में बसा नहीं पाते, तो वह महज शब्दों का एक ढेर है, कुछ और नहीं। और जब हम उसे हर दिल में बसा देते हैं तो उसमें वाकई जान पड़ जाती है। देखते ही देखते कहानी जिंदा हो जाती है, हमारे आसपास की असली दनिया की तरह। और हमें अपनी आँखों के आगे ठीक-ठीक वैसा ही नजर आने लगता है कि अच्छा, यह एक धुनी किस्म का दुबला-पतला सा लड़का है, जो हमेशा कुछ न कुछ सोचता रहता है...अच्छा, ये उसके सीधे-सादे से कसबाई माँ-बाप है...अच्छा, मोहन नाम का यह लड़का इस स्कूल में पढ़ने जाता है...अच्छा, ये चश्मा लगाए बड़ी-बड़ी मूँछों वाले मास्टर जी हैं, जो उसे बहुत प्यार करते हैं...यानी हर चीज हमारी आँखों के आगे जिंदा हो जाती है।
इसी तरह हम कल्पना और फंतासी की बात करते हैं, परियों और बौनों की बात करते हैं तो वे वास्तविक जीवन में होते हैं या नहीं, यह दीगर बात है। मुख्य बात तो यह है कि हम उनके सहारे एक बड़ा ही अनोखा खेल खेलते हैं और उस खेल के साथ ही हमारा मन कल्पना की बड़ी ऊँची सी उड़ान भरने लगता है। हमारी सोच के अनंत दरवाजे और खिड़कियाँ खुलती हैं, और हम किसी उन्मुक्त पंछी की तरह हलके-फुलके होकर नए-नए क्षितिजों की सैर करने लगते हैं। इस लिहाज से देखें तो हम भले ही खूब अच्छी तरह जानते हों कि परियाँ नहीं हैं, पर बच्चों को प्यार करने वाली किसी अच्छी और सुंदर परी की कहानी हम पढ़ते हैं तो हमारा मन कहानी में इस कदर खो जाता है कि हमें उन क्षणों में वह परी एकदम असली और वास्तविक ही लगने लगती है।...
तो यह लगने लगना ही महत्त्वपूर्ण है, और साहित्य में यह होता है कल्पना और फंतासी के जरिए। इसके साथ ही एक तरह की मुक्ति का अहसास हमें होता है और हमारी कल्पना दूर-दूर न जाने कितनी दुनियाओं की सैर कर आती है। तो परियाँ चाहे असली हैं या नहीं, पर उनके किस्से-कहानियाँ पढ़कर मन में उमगने वाला यह जो आनंद और रोमांच है, यह असली है, एकदम असली, और इसीलिए कहानी पढ़ते हुए बच्चों के होंठों पर एक मीठी हँसी खेलने लगती है।...और ये परियाँ सुंदर होती हैं, अच्छी होती हैं और बच्चों को बहुत प्यार करती हैं, इससे बच्चों के जीवन में एक आनंद और रोमांच सा भर जाता है, जिससे उन्हें अपने आसपास की सब चीजें बड़ी सुंदर और प्यारी लगने लगती हैं। साथ ही खुद उनका मन भी सुंदर और उदार बनता है।
इस लिहाज से कहानी, उपन्यासों में परियाँ और अन्य कल्पित पात्र आते हैं तो यह कोई बुरी बात नहीं है। प्राचीन काल के कथा साहित्य में देवी-देवलाओं या अप्सराओं की उपस्थिति भी कुछ ऐसी ही थी, हालाँकि उनके साथ तो एक अलौकिकता भी जुड़ी थी। परियों आदि की कहानियों के साथ मैं समझता हूँ, अलौकिकता जैसी कोई चीज नहीं है, और उसकी दरकार भी नहीं है।
हालाँकि बहुत से लोग प्रीति जी, बच्चों के लिए लिखी जाने वाली परीकथाओं या फंतासी कथाओं को पसंद नहीं करते। वे यह कहकर इन पर नाक-भौंह सिकोड़ते हैं कि इससे बच्चा यथार्थ का सामना नहीं कर पाता और पलायनवादी बनता है। पर यह बात ठीक नहीं है। मेरा मानना है कि बच्चों से परीकथाएँ छीनना तो एक तरह की हिंसा है। आप उससे एक कोमल संसार छीन लेना चाहते हैं, जिससे उसे सहारा मिलता है। क्यों भला? जबकि आज तो बड़ों की कहानियों में भी फंतासी बहुत तरह के रूपों में आ रही है, और यह माना जाता है कि यथार्थ और फंतासी में आपस में कोई विरोध नहीं है, बल्कि फंतासी के जरिए यथार्थ जीवन की पीड़ा, त्रासदी या संवेदना कहीं अधिक मार्मिक ढंग से व्यक्त की जा सकती है।
तो जब बड़ों के साहित्य में कल्पना और फंतासी पर आजकल जोर दिया जा रहा है तो बच्चों के साहित्य में भला फंतासी क्यों न हो, जबकि बच्चों का इनसे कहीं ज्यादा और स्वाभाविक लगाव होता है। तो बाल साहित्य में अलौकिक पात्र अलौकिक नहीं होते, बल्कि एक अच्छी और कल्पनापूर्ण बाल कहानी या उपन्यास लिखने की एक तरकीब के तौर पर वे सामने आते हैं, और बाल साहित्य को रस, उल्लास और आनंद से भर देते हैं। इसके बिना तो बच्चों का जीवन और बाल साहित्य दोनों ही बड़े फीके और निरानंद हो जाएँगे। उनके तमाम रंग, रूप और मस्ती गायब हो जाएगी, और ऐसे रूखे-सूखे साहित्य को जिसमें खाली टीन के डब्बे की तरह यथार्थ की खड़खड़ाहट हो, बच्चा पढ़ने से इनकार कर देगा। इस लिहाज से आप देखें तो परियों सरीखे पात्रों, जिन्हें आप अलौकिक पात्र कह रही हैं—का कितना महत्त्व सामने आता है।
इसी सिलसिले में मैं हिंदी की सुप्रसिद्ध नाट्यकर्मी रेखा जैन जी की बात आपको बताना चाहूँगा। वे बड़ी अद्भुत नाट्यकर्मी थीं, जो झुग्गी-झोंपड़ी के बच्चों या ऐसे ही दूसरे साधारण घर-परिवार के बच्चों के बीच नाटक करती थीं, और उन्हीं के साथ खेल-खेल में नाटक बनाती भी थीं। बड़ा अद्भुत तरीका था उनका नाटक लिखने का। वह मैं आपको फिर कभी बताऊँगा। पर उनके नाटकों की एक बात बताता हूँ मैं आपको, कि उनमें बहुत से गरीब तबके के पात्र आते हैं, उनके दुख-दर्द, परेशानियाँ आतीं हैं। साथ ही आम बच्चों की और भी बहुत सी समस्याएँ वे अपने नाटकों में उठाती हैं। यों वे बड़े यथार्थवादी किस्म के नाटक हैं, पर उनके नाटकों में परियाँ और इस तरह के कल्पित पात्र बहुत आते हैं। देखकर आपको बड़ा अचरज होगा कि अरे, यह कैसे?
खुद रेखा जी से भी बहुतों ने पूछा कि अरे, आप ऐसे नाटक लिखती हैं और बच्चों से कराती हैं जो यथार्थ जीवन से इस कदर गहराई से जुड़े हैं। पर एक बात समझ में नहीं आती कि आप उनमें परियाँ वगैरह क्यों ले आती हैं, सीधे-सीधे क्यों नहीं लिखतीं? तो इस पर उनका उत्तर था कि अगर मैं सीधे-सीधे यथार्थ स्थितियों के बड़े गंभीर किस्म के नाटक लिखूँ तो न कोई बच्चा उन्हें करना चाहेगा और न कोई उन्हें देखना चाहेगा। बच्चे चाहते हैं कि नाटक खूब रोचक हो, रंग-बिरंगी कल्पनाओं से भरा हो, और उसमें कोई न कोई जादू या करिश्मा भी हो। कोई न कोई अजब कौतुक सा हो उनमें, तब उन्हें मजा आता है। और फिर नाटक मजेदार हो तो उसमें जो यथार्थ मैं दिखाना चाहती हूँ, उससे वे कहीं अधिक करीबी तौर से जुड़ जाते हैं और खेल-खेल में बात उनके दिल में घर कर जाती है।...
तो प्रीति जी, मेरा मानना है कि आप बच्चों के लिए नाटक या कुछ और लिखना चाहती हैं तो उसमें एक तरह का कौतुक जरूरी है, वरना बच्चे मन से उससे जुड़ते ही नहीं है, और एक बार जुड़े तो फिर वे उसके साथ बहते चले जाते हैं और जो बात आप कहना चाहती हैं या जो संदेश आप देना चाहती हैं, उसे भी कहीं अधिक गहराई से ग्रहण करेंगे।

प्रीति प्रसाद: अच्छा मनु जी, मानवेतर पात्रों के चरित्र गठन में आदर्शात्मक मूल्यबोध का प्रयोग क्यों होता है? कहीं कोई मानवेतर पात्र नकारात्मक भूमिका में भी चित्रित हुआ है?
प्रकाश मनु: प्रीति जी, मानवेतर पात्रों के आदर्श चरित्र गठन के पीछे जीवन में कोई अच्छा और प्यारा संबल ढूँढ़ने की हमारी स्वाभाविक कोशिश होती है। कोई लेखक भी लिखते समय उसी मनुष्य स्वभाव का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है। आप अपने आसपास का जीवन देखिए तो आपको लगेगा कि जीवन में बहुत दुख, बहुत टूटन और निराशाएँ हैं। हममें से हर किसी के जीवन में कमोबेश ऐसा ही है। तो ऐसे में मानवेतर पात्रों के सुंदर और प्रीतिकर चरित्र से बेशक हमें हौसला मिलता है। इसीलिए जिन पशु-पक्षियों का चरित्र कहानी और उपन्यासों में गढ़ा जाता है, वह ज्यादातर सुंदर और मन को लुभाने वाला होता है। उनकी सुंदरता कहीं न कहीं हमें भी सुंदर बनाती है। उनकी अच्छाई कहीं न कहीं हमारे दिल में उतरकर, हमें भीतर से अच्छा और भला बनाती है। हालाँकि पशु-पक्षियों में किसी दुष्ट किस्म के भेड़िए, कपटी सियार, चालाक लोमड़ी, या क्रूर और अहंकारी शेर की कल्पना भी आपको बहुत सारी कहानियों में मिल जाएगी। यहाँ तक कि पंचतंत्र में भी पशु-पक्षियों के नकारात्मक चरित्र आपको काफी मिल जाएँगे। मेरी पुस्तक ‘मातुगा जंगल की अचरज भरी कहानियाँ’ अगर आपने पढ़ी हो, तो आपको जंगल के अच्छे और बुरे सभी तरह के जीव मिल जाएँगे। और कहीं-कहीं तो ऐसा भी हुआ है कि जो आज बुरा है, उसने थोड़ा आगे चलकर अपनी गलती महसूस की, और पिर उसका चरित्र एकदम बदल गया। लेकिन यह बात सही है कि सामान्यतः हम अच्छे और नेक पात्र ही गढ़ना चाहते हैं। हमारा मन उन्हीं में रमता है।
और अगर मानवेतर पात्रों से आपका आशय परियों आदि की कल्पना से है तो भी मेरा यही जवाब होगा कि ये कल्पित चरित्र अकसर मन को लुभाने और हिम्मत देने के लिए गढ़े जाते हैं, जिससे हमारा जीवन और अधिक अच्छा, सुंदर और रसमय हो जाए। इसीलिए खराब या दुष्ट किस्म की परियाँ आपको बहुत कम मिलेंगी। हालाँकि ऐसा भी नहीं है कि ऐसे नकारात्मक चरित्र बिल्कुल नहीं हैं। हमारे यहाँ परीकथाओं में ऐसी कई कहानियाँ भी हैं, जिनमें कोई दुष्ट और गुस्सैल परी नाराज होकर किसी पात्र को परेशान करती है, लेकिन कोई साधु बाबा या दूसरी परियाँ उसकी मदद के लिए आ जाती हैं।
फिर मानवेतर पात्रों में तो प्रीति जी, राक्षस और बौने भी हैं। बौने आम तौर से अच्छे और दयालु ही दर्शाए गए हैं, पर खराब किस्म के बौनों के प्रसंग भी कुछ परीकथाओं में पढ़ने को मिल जाते हैं। ऐसे ही राक्षस और दैत्य भी तो मानवेतर पात्र ही हैं, पर उन्हें तो अकसर बुरा और दुर्दांत ही दिखाया जाता है। हालाँकि आपको यह बात बड़ी मजेदार लगेगी कि मैंने ऐसे क्रूर कृत्य करने वाले राक्षसों में भी संभावना ढूँढ़ने की कोशिश की, और एक हँसने वाले राक्षस का चरित्र गढ़ा जो बच्चों का दोस्त है और बच्चे भी उससे बहुत प्यार करते हैं। तो देखिए, यह मानव प्रकृति ही है जो बुराई के ढेर में भी कुछ न कुछ अच्छा ढूँढ़ लेती है। शायद यही मनुष्य की दुर्दम्य जिजीविषा या हर हाल में जीने की लालसा है। आप अच्छे बनकर ही हँसी-खुशी के साथ जी सकते हैं और अपनी सुंदर परंपरा और उपलब्धियों को अगली पीढ़ियों तक पहुँचा सकते हैं। यह मनुष्य का शाश्वत स्वभाव है, जो उसके साहित्य में भी झलकता है। फिर बच्चे तो स्वभाव से ही कोमल और प्यारे होते हैं। उनके लिए मानवेतर चरित्रों की गढ़ते समय अगर लेखक की नजर थोड़ी आदर्शवादी हो जाए, तो इसमें कोई बुराई तो नहीं है न प्रीति जी। उम्मीद है, आप मेरी बात को समझ गई होंगी।

प्रीति प्रसाद: मनु जी, एक सवाल और। मैं जानना चाहती हूँ कि बाल यौन-शोषण और बाल उत्पीड़न, विशेष रूप से किशोर-किशोरियाँ के प्रति हमारे समाज में हो रही अमानवीय हिंसा के समसामयिक मुद्दों पर बाल साहित्य क्यों मौन है?
प्रकाश मनु: एकदम मौन तो नहीं, पर हाँ, प्रीति जी, मैं मानता हूँ कि इस विषय को केंद्र में रखकर जितना लिखा जाना चाहिए, उतना नहीं लिखा जा रहा। असल में यह ऐसा संवेदनशील मुद्दा है, जिस पर बात बड़े संतुलन और समझदारी के साथ कही जानी चाहिए, नहीं तो अर्थ का अनर्थ होते देर नहीं लगती। इसलिए खासी सतर्कता के साथ यह मुद्दा उठाया जाना चाहिए, और यहाँ शब्द-चयन और अभिव्यक्ति में खासे संयम की दरकार है, ताकि विषय की गंभीरता और संवेदनीयता बनी रहे। वह केवल एक सनसनीखेज प्रसंग बनकर न रह जाए, जैसा कि कई बार अखबारी खबरों और सोशल मीडिया पर नजर आता है।
अलबत्ता, बच्चों की इस समस्या को बड़े सहज तरीके से उठाने वाली दिविक रमेश की एक कहानी ‘सॉरी लू लू’ मुझे याद आ रही है, जो उनकी पुस्तक ‘लू लू का आविष्कार’ में शामिल है। इस कहानी का नायक लू लू अपनी दोस्त नयना के साथ स्कूल में एक अंकल का बड़ा खराब किस्म का व्यवहार देखता है, तो उसे बहुत बुरा लगता है। खूब गुस्सा भी आता है। पर वह सोचता है, मैं तो छोटा सा हूँ, तो भला मैं क्या कर सकता हूँ? तभी उसे कुछ सूझा। वह दौड़कर खेल के मैदान में गया, जहाँ उसे एक टीचर मिल गए। लू लू उन्हें सारी बात बताता है। टीचर फौरन उसके साथ चल पड़ते हैं, और फिर लू लू की होशियारी से वह बुरा काम करने वाला शख्स पकड़ा जाता है।
असल में लू लू ने टीवी का एक कार्यक्रम देखा था, जिससे उसने अच्छे स्पर्श और बुरे स्पर्श के बारे में काफी कुछ जान लिया था। उसने इसे याद रखा और आखिर इसी से उसके मन में स्कूल में एक अंकल के बुरे इरादों को लेकर संदेह पैदा हुआ। वह समझ गया कि उसकी दोस्त नयना के साथ कहीं कुछ गलत हो रहा है। आखिर उसकी सतर्कता और समझदारी से सही समय पर चीजों का पता चल गया, और उस शख्स को कड़ी सजा मिली।
तो हिंदी के बाल साहित्य में इस मुद्दे पर लिखा तो गया है प्रीति जी, पर मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ कि आज के समय में जब ऐसी चीजें बहुत हो रही हैं और अखबारों में हम अकसर बाल यौन शोषण की अमानवीय घटनाओँ के बारे में पढ़ते रहते हैं, तो बाल साहित्य में भी इस संवेदनशील विषय पर ज्यादा लिखा जाना चाहिए, ताकि लू लू की तरह ज्यादातर बच्चे सचेत हों और किसी तरह के दैहिक शोषण या उत्पीड़न के शिकार न हो जाएँ। साथ ही वे दूसरे बच्चों को भी सतर्क कर सकें।

प्रीति प्रसाद: मनु जी, आपने बड़ों के लिए भी लिखा है और बच्चों के लिए भी। कृपया बताएँ कि बड़ों के लिए लेखन करते समय आपको ज्यादा प्रयास करना पड़ता है या फिर बच्चों के लिए लिखने में?
प्रकाश मनु: वैसे तो प्रीति जी, मुझे किसी के लिए भी विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता, चाहे वह बड़ों का साहित्य हो या फिर बाल साहित्य। जो कुछ लिखता हूँ, वह सहज ही लिखा जाता है। हाँ, लिखने के बाद उसे फिर-फिर पढ़कर अच्छी तरह संपादित करने और सँवारने में मेरी रुचि है, पर वह तो मैं बड़ों के लिए लिखे गए साहित्य में भी करता हूँ और बाल साहित्य में भी। कई बार एक ही रचना को आठ-आठ, दस-दस बार सँवारता हूँ, और जब तक मुझे पूरी तसल्ली न हो जाए, उसे कहीं छपने के लिए नहीं भेजता। हर रचना मुझे अपनी संतान की तरह प्रिय है, तो उसे मैं विकलांग रूप में कैसे सामने ला सकता हूँ? लिहाजा मेरी बहुत शक्तियाँ रचना को फिर-फिर माँजने में लगती हैं, ताकि जो कुछ मैं कहना चाहता हूँ, वह ठीक उसी रूप में सामने आए।
तो जहाँ तक लिखने के तरीके या रचना-प्रक्रिया की बात है, उसमें कम से कम मेरे तईं कोई फर्क नहीं है। फिर चाहे वह बड़ों का साहित्य हो या बाल साहित्य। हाँ, फिर भी इतना तो मैं जरूर कहूँगा कि बच्चों के लिए लिखने में मुझे कहीं अधिक रस मिलता है और मन आनंद से भीगता है। अंदर से जैसे मेरा समूचा व्यक्तित्व उमड़ उठा हो। और शायद यही कारण है कि बाल साहित्य खासकर बाल उपन्यास लिख रहा होऊँ तो मेरी कलम इस तरह दौड़ती है, जैसे कभी रुकेगी ही नहीं। ऐसे क्षणों में लगता है, जैसे भीतर से कोई अजस्र झरना बह रहा है, और कलम उसकी बूँद-बूँद को सँजोकर किसी किस्से या कहानी में ढाल देने के लिए बेसब्र हो।

प्रीति प्रसाद: बहुत से लोग मानते हैं कि बच्चों को प्यार से नहीं, डरा-धमकाकर ही ठीक रास्ते पर लाया जा सकता है। इसके लिए वे एक पुरानी कहावत भी दोहराते हैं कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते। एक संवेदनशील साहित्यकार के रूप में आप इस संदर्भ में बच्चों के प्रति सख्ती बरतने को किस रूप में देखते हैं?
प्रकाश मनु: देखिए प्रीति जी, यह तो छोटे-छोटे मासूम बच्चों के प्रति सरासर जुल्म और अन्याय है और इसे जुल्म और अन्याय के सिवा मैं कुछ और नहीं कह सकता। बच्चे को पीटने और बुरी तरह डाँटने-डपटने वाले लोग उनकी कोमल भावनाओं और व्यक्तित्व को बुरी तरह कुचल देते हैं, और यह ऐसा गुनाह है, जिसे किसी भी तरह माफ नहीं किया जा सकता। यह सीधे-सीधे एक मासूम बच्चे के साथ अमानुषिक और बर्बर व्यवहार है, जिसके लिए बड़ी से बड़ी सजा भी कम है। खासकर जो अभिभावक और अध्यापक एक पुरानी कहावत की आड़ में यह काम करते हैं, वे अपराधी तो हैं ही, पर साथ ही मैं उन्हें मानसिक रूप से अस्वस्थ भी मानता हूँ। उनके इस कृत्य के लिए बड़ी से बड़ी सजा भी छोटी है।
और मेरा तो यह कहना है कि ऐसी हिंसा करने वाले लोग ‘लातों के भूत बातों से नहीं मानते’ कहकर अपनी इस मानसिक क्रूरता को किसी भी तरह उचित नहीं ठहरा सकते। इसलिए कि वे असल में अपनी असमर्थता और मानसिक रुग्णता पर परदा डालकर अपना बचाव करना चाहते हैं, और भूल जाते हैं कि बच्चे लातों के भूत नहीं हैं। बल्कि बच्चा तो प्रेम का भूखा है। उसे स्नेह-प्यार देकर जो काम हम करा सकते हैं, वह न तो डाँट-डपट या मारपीट से संभव है और न इसे किसी भी तरह उचित कहा जा सता है। मैं कई बार सोचता हूँ, ईश्वर अगर है तो वह यह देखकर किस कदर कुपित और नाराज होता होगा कि उसकी सृष्टि के सबसे सुंदर और सुकोमल फूल को इस कदर निर्दयता से पैरों के नीचे कुचला जा रहा है।
सच पूछिए तो प्रीति जी, बच्चों को मारना ऐसा गनाह है, जिसके लिए हर सजा छोटी है। मुझे ऐसे लोग सिर्फ क्रूर ही नहीं, बल्कि इनसान और इनसानियत के दुश्मन जान पड़ते हैं। जब बच्चे को मार पड़ती है तो मुझे लगता है, इस सृष्टि का नियंता ईश्वर भी दुखी होकर रो पड़ता होगा, और उसके आँसू टप-टप टपकने लगते होंगे। हाँ, उसे कितने लोग देख और महसूस कर सकते हैं, यह अलग बात है।

प्रीति प्रसाद: मनु जी, आपने और कई अन्य साहित्यकारों ने भी समय-समय पर यह बात स्पष्ट की है कि बाल साहित्य केवल बच्चों के लिए ही नहीं है, बल्कि वह बड़ों के लिए भी उतना ही जरूरी और महत्त्वपूर्ण है। खासकर तरुणों और युवाओं के लिए तो उसकी उपयोगिता असंदिग्ध है। तो फिर क्या कारण है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में, खासकर स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में बाल साहित्य को स्थान नहीं दिया जाता? आप इसे किस रूप में देखते हैं?
प्रकाश मनु: आपका यह प्रश्न बड़ा महत्त्वपूर्ण है प्रीति जी। निस्संदेह, स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं में बाल साहित्य अवश्य पढ़ाया जाना चाहिए। अगर नहीं पढ़ाया जाता, तो मैं समझता हूँ कि यह बाल साहित्य और साहित्यकारों के प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार तो है ही, पर साथ ही यह स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं में पढ़ने वाले छात्रों के साथ भी अन्याय है, जिन्हें बहुत अच्छी सृजनात्मक कृतियों से वंचित कर दिया गया है, जिन्हें पढ़कर वे बच्चे और बचपन को बेहतर ढंग से समझ सकते थे और अपने आप को भी। बाल साहित्य पढ़कर बेशक वे अधिक सहज और संवेदनशील बनते, और एक बच्चे की तरह सीधे-सरल और अभिमान रहित होकर जीवन जी सकते थे। और सच पूछिए तो यह बड़ी नेमत है। बच्चे जैसा सीधा-सरल जीवन जीने से बड़ा कोई सुख नहीं। फिर यह बात भी समझ लेनी चाहिए कि बाल साहित्य की अवमानना एक अर्थ में बालक और बचपन की भी अवमानना है, और यह किसी भी तरह से उचित नहीं कही जा सकती।
लिहाजा प्रीति जी, मैं भी आपके स्वर में स्वर मिलाकर कह सकता हूँ कि भला बड़ी कक्षाओँ के छात्रों को बाल साहित्य क्यों नहीं पढ़ाया जाता? और कि यह तो सरासर अन्याय है। यों मैं इसके पीछे के कारणों पर विचार करता हूँ तो लगता है, कि बाल साहित्य को लेकर एक बड़ी भ्रांति लोगों के मन में है, जिसकी ओर आपने भी इशारा किया है। बहुत से लोग मानते हैं कि बाल साहित्य केवल बच्चों के लिए है। जबकि सही बात तो यह है कि बाल साहित्य बच्चों के लिए जितना जरूरी है, उतना ही बड़ों के लिए भी, ताकि बड़े लोग, जिनमें बच्चे के माता-पिता, अभिभावक और अध्यापक भी हैं, बच्चे को अच्छी तरह समझ सकें। साथ ही जो बड़े या प्रौढ़ लोग हैं, उनकी अपनी कोमल संवेदनाएँ भी बची रहें, जो उन्हें उदार बनाती हैं। इस तरह जब बड़े लोग बाल साहित्य पढ़ते हैं तो उनके व्यक्तित्व का भी सर्वांगीण विकास होता है। इस संबंध में बाल साहित्य निश्चित रूप से एक बड़ी भूमिका निभा सकता है, और निभा रहा है।
हालाँकि एक अच्छी बात यह है प्रीति जी, कि पिछले कोई दो दशकों से बाल साहित्य पर शोध बहुत अधिक हो रहे हैं, जिससे बाल साहित्य पर अध्ययन-मनन और चिंतन के लिए नई दिशाएँ खुली हैं। अगर अपनी बात कहूँ तो मैं देखता हूँ कि मेरे बाल साहित्य पर बहुत से छात्रों ने शोध की इच्छा जताई और वे काफी गंभीरता से काम कर रहे हैं। इस समय मेरे बाल साहित्य की विविध विधाओं—कविता, कहानी, उपन्यास और नाटकों आदि पर कोई दो दर्जन से अधिक शोधार्थी शोध कर रहे हैं। यहाँ तक कि ऐसा भी हुआ है कि एक ही विश्वविद्यालय में अगर एक शोधार्थी मेरे बाल कथा साहित्य पर काम कर रहा है तो दूसरा कविता पर, और तीसरा नाटकों पर। और ऐसा केवल हिंदी भाषी राज्यों में ही नहीं, बल्कि गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु सरीखे अहिंदीभाषी राज्यों मे भी बड़ी प्रचुरता से हो रहा है।
अब यही देखें कि प्रीति जी, कि आप सिक्किम सरीखे अहिंदीभाषी राज्य के विश्वविद्यालय से इतनी धुन और गहरी लगन के साथ मेरे बाल साहित्य पर काम कर रही हैं। ऐसे दूरस्थ स्थानों पर भी हिंदी बाल साहित्य और साहित्यकारों पर गंभीर शोध हो रहा है, इसे मैं निश्चय ही, एक शुभ लक्षण मानता हूँ।

प्रीति प्रसाद: मनु जी, हिंदी बाल साहित्य के लिए आपने बहुत काम किया है, और अब भी निरंतर कर रहे हैं। कृपया बताएँ कि हिंदी बाल साहित्य के भविष्य को आप किस रूप में देखते हैं?
प्रकाश मनु: निस्संदेह उज्ज्वल, प्रीति जी, निस्संदेह बहुत उज्ज्वल और उम्मीदों भरा भी! मैं अपनी बूढ़ी आँखों से साफ देख रहा हूँ कि आज हिंदी का बाल साहित्य अपनी विजय पताकाएँ फहराता हुआ आगे, बहुत आगे बढ़ता जा रहा है। वह दूर-दूर के क्षितिजों को छूने की चुनौती से भरा हुआ है और खासा ऊर्जापूर्ण भी, जिसके सामने संभावनाओं का एक पूरा आकाश है। इक्कीसवीं सदी तक आते-आते हिंदी बाल साहित्य का मानो सर्वांगीण विकास हुआ है। अपवाद के रूप में किसी एकाध विधा को छोड़ दें, तो सच तो यह है कि प्रायः हिंदी बाल साहित्य की प्रत्येक विधा में बहुत काम हुआ है, और हो रहा है। खासकर बाल कविता और बाल कहानी में तो अपरंपार काम हुआ है। बाल साहित्य की ये दोनों बड़ी महत्त्वपूर्ण विधाएँ हैं, और अपनी लंबी विकास यात्रा के बाद ये आज कहाँ से चलकर कहाँ आ पहुँची हैं, यह सोचना ही मुझे रोमांच से भर देता है।
‘नंदन’ के संपादक जयप्रकाश भारती जी अकसर कहा करते थे कि इक्कीसवीं सदी बालक और बाल साहित्य की सदी होगी। तब उनकी बातों पर हमें यकीन नहीं होता था, पर आज लगता है, वे बिल्कुल सही बात कह रहे थे। आज न सिर्फ चतुर्दिक बाल साहित्य की दुंदुभी बज रही है, बल्कि हर क्षेत्र में बाल साहित्य के महत्त्व और हमारे समाज व जीवन के उन्नयन में उसकी रचनात्मक भूमिका की व्यापक चर्चा हो रही है। इतना ही नहीं, आज प्रकाशक बड़े उत्साह से बाल साहित्य की पुस्तकें छाप रहे हैं और बहुत प्रसन्नता से यह बात कहते भी हैं कि बाल साहित्य की पुस्तकें बहुत बिकती हैं। यह अकुंठ स्वीकृति बहुत मायने रखती है, और हमारे दिलों में बाल साहित्य के लिए आस्था और विश्वास पैदा करती है। बाल साहित्य के एक अदने लेखक के रूप में मैं यह सब देखता हूँ, तो काश, बच्चों के लिए कुछ और अच्छा लिख पाऊँ, यह इच्छा और आकांक्षा कहीं अधिक बढ़ जाती है। साथ ही भीतर बड़ी हिम्मत और हौसला पैदा होता है।
तो प्रीति जी, बाल साहित्य की अपार संभावनाओं के साथ-साथ उसकी स्वीकार्यता तो इसी बात से समझी जा सकती है कि किसी ने आज तक मुझसे यह नहीं कहा कि बाल साहित्य की पुस्तकें बिकती नहीं हैं। जबकि बड़ों के साहित्य के बारे में अकसर यह बात सुनने को मिल जाती है। फिर एक विपर्यास और देखें। बड़ों के साहित्य में कविताएँ अकसर नहीं बिकतीं और प्रकाशक कविता संगह छापने के प्रति सबसे अधिक उदासीन या अनिच्छुक नजर आते हैं। लेकिन बाल साहित्य में देखें तो बच्चों के लिए लिखी गई कविता हो, कहानी, नाटक या उपन्यास—सभी पुस्तकें खूब बिकती हैं। और प्रकाशक उन्हें उत्साह से छापने के लिए तैयार हो जाते हैं। बच्चे भी अपने लिए लिखी गई कविताओं को खूब पढ़ते हैं और बड़े मजे में झूम-झूमकर गाते हैं। बाल कविताओं के प्रति उनकी लगभग वैसी ही रुचि और उत्साह देखने को मिलता है, जैसा कहानी, उपन्यास, नाटक और जीवनियों आदि को पढ़ने में रहता है। मैं तो इसे भी कहीं न कहीं बाल साहित्य के महत्त्व का स्वीकार ही मानता हूँ।
कहना न होगा कि इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक तक आते-आते बाल साहित्य का कारवाँ बड़ी तेज गति से आगे बढ़ रहा है और मैं समझता हूँ जल्दी ही हम और आप भारती जी की इस बात को अपनी आँखों के आगे साकार होते देखेंगे, कि इक्सीसवीं सदी बालक और बाल साहित्य की सदी है। और कोई आश्चर्य नहीं कि थोड़ा आगे चलकर ऐसी स्थिति भी देखने को मिले कि बाल साहित्य को बड़ों के साहित्य से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण और जरूरी समझा जाए। यह असंभव नहीं है, बल्कि यह यकीनन होगा और हम अपनी आँखों से देखेंगे।

प्रीति प्रसाद: मनु जी, बाल साहित्य के क्षेत्र में आपने बहुत काम किया है। बच्चों के लिए विविध विधाओं में एक से एक सुंदर रचनाएँ लिखने के अलावा बाल साहित्य विमर्श और इतिहास लेखन में भी आपका बड़ा योगदान है। बाल कविता का इतिहास लिखने के अलावा संपूर्ण बाल साहित्य का पहला इतिहास भी आपने लिखा है, और अब भी निरंतर लिख रहे हैं। इस समय आप किन कार्यों में व्यस्त हैं और आपकी भावी योजनाएँ क्या हैं, कृपया इस बारे में भी थोड़ा बताएँ।
प्रकाश मनु: प्रीति जी, बाल साहित्य के क्षेत्र में मेरी योजनाओं में सबसे प्रमुख और कहना चाहिए, अव्वल है इक्कीसवीं सदी के बाल साहित्य पर आने वाला मेरा बृहत् ग्रंथ। इन दिनों इसी काम में लगा हूँ। काफी हिस्सा इस पुस्तक का तैयार हो गया है, पर अभी काफी कुछ और लिखना है। इसी तरह बाल साहित्य की नींव रखने वाले बड़े साहित्यकारों पर लिखी गई मेरी दो पुस्तकों की खासी चर्चा हुई है, ‘हिंदी बाल साहित्य के शिखर व्यक्तित्व’ और ‘हिंदी बाल साहित्य के निर्माता’। इस क्षेत्र में मैं निरंतर काम कर रहा हूँ और जल्दी ही इसी शृंखला में एक या दो पुस्तकें अभी और आएँगी।
ऐसे ही बाल साहित्य पर आलोचना, चिंतन, विमर्श और इतिहासपरक अध्ययन की दृष्टि से मेरे बहुत से लेख हैं, जो अभी पुस्तकाकार आने हैं। बहुत सा और भी महत्त्वपूर्ण लेखन है, जिसे थोड़ा कमबद्ध और व्यवस्थित करके, मैं सामने लाने का जतन कर रहा हूँ। पर मैं चाहता हूँ कि उन पर थोड़ा और काम करूँ, तब वे पुस्तकाकार आएँ, ताकि वे कहीं अधिक अधुनातन रूप में और अपेक्षाकृत पूर्णता के साथ पाठकों तथा बाल साहित्य के अध्येताओं तक पहुँचे। इन काम में मैं लगा हूँ, और अभी काफी समय इसमें जाएगा। अगले दो-तीन वर्षों में मैं समझता हूँ, ऐसी कुछ महत्त्वपूर्ण कृतियाँ पाठकों के आगे आएँगी।
इसके अलावा मेरा मन है कि बाल पाठकों के लिए अपनी आत्मकथा को थोड़ा संक्षेप में, और काफी रुचिकर रूप में प्रस्तुत करूँ, जिससे छोटे बच्चे और किशोर पाठक भी उनका आनंद ले सकें। साथ ही बच्चों के लिए अपने जीवन के कुछ रोचक प्रसंगों को लेकर, सीधी-सरल भाषा में संस्मरण लिखने का भी मन है, जो हर बच्चे को लुभाएँ। इससे उन्हें मेरे जीवन और साहित्य के बारे में बहुत कुछ नया और महत्त्वपूर्ण जानने को मिलेगा।
हालाँकि यह भी सच है प्रीति जी, कि अब मैं थकने लगा हूँ। बीच-बीच में हिम्मत भी टूटती है। शरीर साथ नहीं देता। कह नहीं सकता, कि कितनी साँसें अभी बाकी हैं। पर जब तक मैं जिऊँ, अंतिम साँस तक बस लिखता-पढ़ता ही रहूँ, और जब इस दुनिया से जाऊँ तो मेरे हाथों में किताब हो या फिर कलम, जिससे लिखते-लिखते मेरे प्राण निकलें। बस, इससे अधिक मैं कुछ नहीं चाहता।

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प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
चलभाष: 09810602327
ईमेल: prakashmanu334@gmail.com
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प्रीति प्रसाद
परिचय: प्रीति प्रसाद

सिक्किम विश्वविद्यालय, गंगटोक के हिंदी विभाग से शोधकार्य कर रहीं प्रीति प्रसाद काफी सजग और अध्ययनशील शोधार्थी हैं, जो हर काम पूरी लगन और समर्पण के साथ करने में यकीन करती हैं। बचपन से ही मेधावी छात्रा रहीं प्रीति प्रसाद की लिखने-पढ़ने में गहरी रुचि। खासकर बाल कथा साहित्य उन्हें शुरू से ही मोहता था। प्रेमचंद, शरत और रवींद्रनाथ टैगोर सरीखे दिग्गज साहित्यकारों की कहानियों के साथ-साथ समकालीन साहित्यकारों की ढेरों बाल कहानियाँ और उपन्यास पढ़े। बाल कहानियों में अपने समय के बच्चों के अक्स उन्हें दिखाई देते तो अच्छा लगता। इससे बच्चों के संपूर्ण विकास की दृष्टि से बाल साहित्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका को उन्होंने जाना। इसीलिए हिंदी में एम.ए. के बाद सिक्किम विश्वविद्यालय से शोध के लिए उन्होंने विषय चुना, ‘प्रकाश मनु के बाल कथा-साहित्य में युगबोध’। उनकी शोध-निर्देशिका हैं सिक्किम विश्वविद्यालय की असिस्टेंट प्रोफेसर डा. चुकी भूटिया।
बाल साहित्य पर केंद्रित प्रीति प्रसाद के लगभग एक दर्जन शोधपत्र देश भर के प्रतिष्ठित शोध जर्नल्स में छपे हैं। इसके अलावा प्रकाश मनु के साहित्य पर गंभीर आलोचनात्मक लेख और समीक्षाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। वे एक स्कूल में बच्चों को पढ़ाती हैं, और बच्चों में कथा-कहानियों के जरिए मानवीय संवेदना और सुरुचियों के विकास के लिए प्रयत्नशील हैं।

संपर्क: प्रीति प्रसाद, शोधार्थी, सिक्किम विश्वविद्यालय, गंगटोक, पिन-737102
चलभाष: 09832015966
ईमेल: prit.kr13@gmail.com

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