जैसे सांता उपन्यास के शब्द-शब्द में साँस लेता हो!

समीक्षा: अशोक बैरागी


पुस्तक: सांता क्लाज का पिटारा (बाल उपन्यास)
लेखक: प्रकाश मनु
प्रकाशक: अद्विक प्रकाशन, नई दिल्ली
संस्करण: 2023
पृष्ठ: 48
मूल्य: ₹ 160 रुपए

बच्चों के चहेते दोस्त और वरिष्ठ साहित्यकार, आदरणीय प्रकाश मनु जी साहित्य जगत में अपनी किस्सागोई की विशिष्ट शैली के लिए प्रतिष्ठित हैं। वे किसी परिचय के मोहताज नहीं है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व में अनोखा आकर्षण है, जो पाठकों को लुभाता है।

प्रकाश मनु
अभी हाल ही में छपा उनका बाल उपन्यास ‘सांता क्लॉज़ का पिटारा' पढ़ा, तो मन किसी निराली दुनिया में पहुँच गया, जहाँ शुरू से अंत तक सांता क्लाज के अनोखे करतब ही नजर आते हैं। आवरण पृष्ठ का मनमोहक चित्र ही बता देता है कि बच्चों के प्यारे दोस्त सांता क्लॉज़ ने कितने उपहार बच्चों को बाँटे होंगे और बदले में बच्चों ने क्या संकल्प लिया होगा। यानी हर बच्चा ही सांता क्लॉज़ बन गया है।

चलिए, शुरुआत भूमिका से ही करते हैं और मनु जी क्या कहते हैं, पहले यह देखते हैं, “तो भाई, ‘सांता क्लॉज़ का पिटारा' भी ऐसा ही रोमांचक उपन्यास है, जिसमें तुम्हारी मुलाकात अपने सबसे प्यारे दोस्त सांता से होती है, जो हर साल क्रिसमस पर लाखों नन्हे, नटखट बच्चों को चुपके से एक से एक सुंदर रंग-बिरंगे उपहार दे जाता है और उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। वही सांता यहाँ मौजूद है, उपन्यास की शुरुआत से लेकर अंत तक। उसके मन में कितनी सारी बातें हैं, कितने सारे सपने, यह इस उपन्यास में खुलकर सामने आता है। ऐसे अनोखे किस्से-कहानियों की शक्ल में ढलकर, जिन्हें शायद तुम पहली बार पढ़ोगे।...तुम्हें यह भी पता चलेगा कि सांता का दिल कितना बड़ा है और उसमें सुख-दुख की कैसी अनोखी कहानियाँ छिपी हैं, जिन्हें पढ़कर कहीं तुम्हारे चेहरे पर हँसी खिल उठेगी, तो कभी मन उदास होगा।”

अशोक बैरागी
भूमिका से पता चलता है कि मनु जी ने बाल मनोविज्ञान और समाज के वास्तविक स्वरूप को बड़ी बारीकी से समझा है। समय और समाज की जरूरत के हिसाब से अनूठे किस्से गढ़े हैं। और उन्हें चित्रों सहित बच्चों के लिए बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है।

पाठक जब बच्चों की मन:स्थिति, घर-परिवार के हालत और आधुनिक समाज के बनते-बिगड़ते स्वरूप को देखते हैं, तो मन दुख और पीड़ा से भरकर उदास हो जाता है। लेकिन जब सांता की अनोखी धुन, दृढ़ संकल्प, परोपकार भावना और उसके आत्मविश्वास को देखते हैं तो मन में आशा का संचार हो जाता है। साथ ही उपन्यास के सभी बाल पात्र बड़े ही अनूठे कलाकार और आस्थावान हैं, जो दुख, गरीबी, अभाव, अशिक्षा, उत्पीड़न, शोषण, भेदभाव और उपेक्षा के शिकार हैं, पर अपनी हिम्मत नहीं छोड़ते। यथार्थ के कुरूप धरातल पर अडिग प्रहरी से खड़े ये पात्र आस्था और विश्वास का सूत्र पकड़े हुए हैं। ये किसी भी दशा, किसी भी स्थिति-परिस्थिति में मानवता की राह से विचलित नहीं होते।

जॉन के पापा की नौकरी छूट जाने पर उसकी मम्मी और पापा का एक संवाद देखिए, “कोई नहीं देता सूजी, कोई नहीं...! बल्कि जो बड़े नजदीकी दोस्त बनते थे, नौकरी छूटते ही उन सबने भी मुँह फेर लिया।” जॉन के पापा जैसे अंदर ही अंदर रो रहे थे।

“पर फिर होगा कैसे...? कुछ तो करना होगा। हिम्मत रखो...हिम्मत से बात बन जाती है।” जॉन की मम्मी घोर अँधेरे में भी रास्ता टटोल रही थीं। पात्रों का यों अँधेरे में भी रास्ता टटोलना, बहुत बड़ी बात है। यह उनका आत्मविश्वास है, जो उन्हें हर प्रकार के संकट से मुक्ति का रास्ता दिखाएगा। मनु जी ने कथा में शुरू से अंत तक अपने मन के भाव-संवेदन को शब्दश: इस ढंग से पिरोया है कि पाठक उसमें बँध जाता है। उसमें आगे क्या हुआ...? और आगे क्या होगा...? यह जानने की ललक और अधिक बढ़ती ही जाती है। इसके कथा-प्रसंगों में उत्सुकता इतनी गहरी समाई है कि आप इसे बीच में नहीं छोड़ सकते। उपन्यास में भाषा की सहजता असल में पात्रों की सादगी, सरलता, निर्मलता और उनके जीवन की सच्चाई से जुड़ी हुई है। एक भी शब्द ऐसा नहीं है, जिसका अर्थ खोजना या किसी से पूछना पड़े। भाषा में एक आंतरिक लय है। पात्रों से भाषा का आत्मीय जुड़ाव है। कथ्य के भाव-संवेदन में, कहानी कहने में और भाषा में कहीं कोई बनावटीपन नहीं। ये सभी चीजें एक-दूसरे में अभूतपूर्व ढँग से गुँथी हुई हैं। आगबबूला होना, फूटी आँख न सुहाना, सुर में सुर मिलाना, आँसू पोंछना, परचम लहराना, आँखों का तारा जैसे अनेक व्यावहारिक मुहावरों के साथ ही विभिन्न प्रकार के आम बोलचाल में आने वाले तत्सम, तद्भव, देशज और अंग्रेजी शब्दों का प्रसंगानुकूल सुंदर प्रयोग किया गया है।

कहानी का मुख्य पात्र सांता भले ही काल्पनिक पात्र हो, पर उसके कार्य, हाव-भाव, सोच-विचार, उसका चिंतन, सरोकार एकदम आम आदमी जैसे हैं। वास्तव में सांता के रूप में ये स्वयं लेखक की सामाजिक चिंताएँ, विचार और सरोकार हैं। मनु जी समाज में फैली इन समस्याओं का सम्यक समाधान भी प्रस्तुत करते हैं। ऐसा लगता है, खुद मनु जी सांता के रूप में जगह-जगह दौड़ रहे हैं। वे सभी बच्चों की समस्याएँ जान लेना चाहते हैं। और वे खाली दौड़ नहीं रहे, अपितु सभी को दोनों हाथों से खुशियाँ बाँट रहे हैं। उन्हें आदर्श जीवन का संस्कार दे रहे हैं। उनके सपनों को ऊँचाइयाँ दे रहे हैं। हताश-निराश बच्चों को नेकी की राह पर आगे बढ़ने का हौसला दे रहे हैं। उनके भविष्य को टिकाऊ और उज्ज्वल बनाने का सुदृढ़ आधार दे रहे हैं। उनके घर-आँगन में, उनके हृदय में प्यार का खुशबूदार पौधा रोप रहे हैं।

अभाव और गरीबी में भी सेवा और संस्कार की एक बानगी देखिए। हैरी के पास कोई अच्छा खिलौना नहीं है, और पास-पड़ोस के बच्चे उसे अपने खिलौनों से खेलने नहीं देते। तब उसकी माँ का समझने का कौशल देखिए, “तो इसी बात पर रो रहा है तू? पागल कहीं का! इसमें रोने की क्या बात है? जिनके पास पैसे नहीं है, उन्हें भी तो जीने का हक है। फिर तू पढ़-लिखकर लायक बनेगा तो खूब कमाएगा और मम्मी-पापा को भी सुख से रखेगा। बोल, रखेगा ना? तब तक तो हम भी बूढ़े हो चुके होंगे, तेरे पुराने वाले एलीफेंट (खिलौना) की तरह। कहीं ऐसा तो नहीं कि तब तुझे हम भी बुरे लगने लगें, जैसे तुझे अपना एलीफेंट लगता है...?” मम्मी ने हँसते हुए कहा।

इस पर बालक की संवेदना और उसका जवाब लाजवाब है। “नहीं-नहीं मम्मी, ऐसा मत बोलो। मैं आप दोनों की खूब सेवा करूँगा। आप लोग इतनी मेहनत करके मुझे पढ़ा-लिखा रहे हैं, तो क्या मेरा कोई फर्ज नहीं है? मैं उसी पुराने वाले एलीफेंट से काम चला लूँगा मम्मी और और आपसे कोई शिकायत नहीं करूँग।...प्रॉमिस मम्मी!” हैरी कह रहा था। हैरी की भावना गजब की है। वह केवल अपने माँ-बाप के प्रति दायित्व को ही नहीं निभाता, बल्कि कम संसाधनों में भी रहना सीखता है। और उसे अब किसी से शिकायत भी नहीं है।

उपन्यास की कथावस्तु फंतासी जैसी लगती है, प्रतीकात्मक भी है लेकिन बड़े ही अनोखे ढंग से वह समाज का सच बयाँ करती है। आज क्या घटित हो रहा है, समाज में? हैरी जैसे लाखों-लाख बच्चे हैं, जिनके पास अच्छे कपड़े नहीं है, किताबें और खिलौने नहीं हैं। उन्हें अपनी गरीबी के कारण उपहास का पात्र बनना पड़ता है। अमीरों और गरीबों के बीच भेदभाव की खाई गहराती जा रही है। चारों ओर बेरोजगारी के कारण पीड़ा और निराशा का माहौल है। कंपनियाँ अपने कर्मचारियों की छँटनी करके उन्हें निकाल रही हैं, जिसके कारण अभिभावक अपने बच्चों की फीस तक नहीं दे पा रहे हैं। 21वीं सदी में ज्ञान-विज्ञान और दूसरे क्षेत्रों में उन्नति के बाद भी आज परिवारों में लड़कियाँ भेदभाव, अशिक्षा और अपेक्षा की शिकार हैं। उन्हें लड़कों की तुलना में हीन माना जाता है। पिंकी रोज-रोज की पिटाई से तंग है, ऐसे भयावह परिवेश में जरा बच्चों की मनोदशा दखिए, उसकी कराह सुनिए, “पता नहीं मैंने क्या कसूर किया है, कि सुबह से शाम तक बस पिटाई...पिटाई...पिटाई! इससे तो अच्छा होता कि मैं पैदा ही न हुई होती।”

वहीं बंगड़-झंगड़ देश की नीलू पढ़ना चाहती है, पर उसे अवसर नहीं दिया जा रहा। रमजानी जैसे बहुत से बच्चे माता-पिता की आपसी लड़ाई में पिसते हैं। उन्हें समय पर अच्छी शिक्षा, संस्कार, सुरक्षा, खान-पान और देखभाल नहीं मिल पाती। वहीं इसी समाज में बीनू और सत्ते जैसे बच्चे भी हैं, जिन्हें अपनी मजबूरी के कारण दूसरों के घरों में काम करना पड़ता है। ये दोनों एक-दूसरे का सहारा बनते हैं। एक-दूसरे को हिम्मत बँधाते हैं। बर्तन माँजते हुए दोनों की बातचीत सुनिए, 
“...भला मुझ जैसे गरीब बच्चों से मिलने की उसे कहाँ फुरसत...? मेरे तो मम्मी-पापा दोनों ही नहीं है, दुनिया में कोई नहीं। एक पुरानी-सी कोठरी है बस, रहने के लिए...। वह भी ऐसी जगह कि सांता पहुँच ही नहीं सकता।” कहकर बीनू सिसकने लगा।
“तुमने ऐसा क्यों कहा बीनू कि दुनिया में तुम्हारा कोई नहीं है? क्या मैं भी तुम्हें अच्छा नहीं लगता...!” सत्ते ने दुखी होकर पूछा।
“नहीं-नहीं, तुम तो अच्छे हो...बहुत अच्छे। हमेशा मुझे हिम्मत बँधाते हो। नहीं तो पता नहीं मेरा क्या होता...!” रोकते-रोकते भी बीनू की रुलाई छूट गई।

जॉन, हैरी, पिंटू, नीलू, विकी, पिंकी, बीनू और सत्ते—ये सभी पात्र अपने-अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। और ऐसा नहीं है कि ये आखिरी बच्चे हैं और ऐसे बच्चे हैं ही नहीं, बल्कि अपने चारों ओर ऐसे लाखों-लाख बच्चे हैं, जिन्हें किसी ने किसी रूप में सहायता की आवश्यकता है। पर वे बेबस हैं, उन्हीं हालात में जीने के लिए। हाँ, इन पात्रों की अच्छी बात यह है कि ये किसी भी स्थिति में कुंठित नहीं है, कुमार्ग पर नहीं चलते, व्यसनी नहीं हैं और न ही अपराध की ओर मुड़ते हैं। ये प्रत्येक स्थिति में आशावादी हैं।

यह सारी भाग-दौड़ समाज को बहुत सुंदर और बेहतर बनाने के लिए महात्मा यीशु के संदेशवाहक के रूप में सांता की और सांता के रूप में लेखक की आत्मा की आवाज है। उनका हृदय परोपकार की भावना से भरा है, जिसमें समाज के लिए कुछ अच्छा करने की पीड़ा है। जरूरतमंद बच्चों के अभावों को दूर करने की ललक है। वास्तव में ये एक सच्चे सर्जक के सामाजिक या यों कहे मानवीय सरोकार हैं, जिन्हें वह समाज में पूरी तरह फलीभूत होते देखना चाहता है। अब नेकी की इस राह में बाधाएँ भी तो कम नहीं आती। ऊबड़-खाबड़ रास्ते, अँधेरा, तंग गलियाँ, घरों के रास्ते न मिलना, कुत्तों का पीछे पड़ना, आँधी-तूफान और लोगों द्वारा हँसी का पात्र बनना। ये तमाम बाधाएँ, इस रास्ते में आती हैं। लेकिन जिसका संकल्प दृढ़ हो, जिसकी आस्था, जिसका ध्येय समाज हित हो, ऐसी बाधाएँ उसका रास्ता नहीं रोक पातीं।

उपन्यास के बीच-बीच में आने वाले गीत सामान्य गीत या कविताएँ नहीं है, बल्कि ये अद्भुत प्रेरणा, उत्साह, उमंग और प्रेम उपजाने वाले उद्बोधन गीत हैं। एक मानी में नवचेतना के वाहक क्रांति गीत हैं। ये गीत बच्चों को केवल आने वाले कल को बेहतर करने के लिए प्रेरित ही नहीं करते, बल्कि समाज का सच भी सामने रखते हैं। देशराग और बालमन की प्रीति से भरे ये प्रेरणा गीत अद्भुत शक्ति और उत्साह का संचार करते हुए संकल्प को दृढ़ता प्रदान करते हैं। सांता क्लॉज की अनोखी यात्राएँ वास्तव में देश के वास्तविक हालात को जानने का अनूठा प्रयास है। वह समाज में फैली गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, भेदभाव, अन्याय, शोषण, उपेक्षा और हिंसा की प्रवृत्तियों का विस्तार देखता है। कोमल बालमन पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को देखता है। मनु जी का कौशल देखिए, ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी पात्र हृदय की उज्ज्वलता नहीं छोड़ते, अपितु साहस और हिम्मत दिखाते हैं।

उपन्यास में एक कमाल की बात यह है कि खिलौने नाच-गाकर केवल मनोरंजन ही नहीं करते बल्कि स्वभाव, आदत और रुचियों का परिष्कार करते हैं। यानी खेल-खेल में शिक्षा और संस्कार भी देते हैं। यहाँ पाठक बच्चों के परस्पर संवादों से दिखावे, प्रदर्शन की प्रवृत्ति, अहंकार, ईर्ष्या-द्वेष आदि से दूर रहकर प्यार, सहयोग और विश्वास करना सीखते हैं। मनु जी के छोटे-छोटे वाक्य सूक्तियों जैसा गहरा असर करते हैं। आप खुद ही देखिए—
“बच्चे इस दुनिया में ईश्वर का रूप ही तो हैं, ईश्वर का सबसे भोला और निर्मल रूप!”
“खुशी एक ऐसी मिठाई है कि जितनी बाँटो, उतनी बढ़ेगी। वह बाँटने से कम नहीं होती, बल्कि बढ़ती है।” 
“सिर्फ प्यार बाँटने से ही दुनिया के दुख कम होते हैं।”

सांता अपने कार्य, व्यवहार, शैली और भावना से बिल्कुल सामान्य मनुष्य जैसा है, पर उसकी बुद्धिमत्ता, कौशल, साहस, कार्य की तत्परता और बच्चों की चिंताएँ बहुत असाधारण, जरूरी और अनुकरणीय हैं। काश! ऐसा चिंतन समाज के अन्य लोगों का भी हो, तो पूरी दुनिया बहुत सुंदर बन जाएगी। रास्तों का भूल जाना, कुत्तों का पीछे पड़ना, किसी बच्चे को उपहार देने के लिए पाइप के सहारे ऊपर चढ़ना, ईटों का गिरना, आँगन में पौधा लगाना और उसमें पानी डालना। ये प्रसंग आम आदमी के वास्तविक जीवन की झलक देते हैं। सांता द्वारा घर-आँगन में प्यार का पौधा लगाना भले ही प्रतीकात्मक हो, लेकिन जीवन की सच्चाई है। सांता के मन की भावना देखिए, “बस पिंकी, अब तुम्हारी मुश्किलें खत्म। इसलिए कि यह गुलाब का पौधा असल में प्यार का पौधा भी है। इसकी खुशबू दिलों में बस जाती है और सारी बुराई खत्म कर देती है। इसके आसपास रहने वाला कोई किसी को डाँट ही नहीं सकता। यानी अब तुम्हारी मम्मी या घर के लोग तुम्हें नहीं डाँटेंगे। खुश रहो पिंकी, खुश और अलमस्त!”

वास्तव में सच्चाई यही है कि हर प्रकार की समस्या और बुराई का अंत प्यार से ही संभव है। परस्पर प्रेम और विश्वास मनु जी के जीवन का मूल मंत्र है, जो कहानी में अनेक रूपों में आया है। मनु जी शिक्षा का अलख जगाते हैं। सांता के हाथों खिलौने, चॉकलेट, मिठाई और वस्त्र आदि बाँटने की कहानियाँ खूब सुनी थी, पर मनु जी का सांता रंग-बिरंगी किताबें, कलर बॉक्स, पैन-पेंसिल और थैले भी बाँटता है। यह एक नए प्रयोग की तरह है, जिससे उपन्यास की कथावस्तु अंत तक आते-आते बहुत ही जानदार हो जाती है। मनु जी का कमाल देखिए, यहाँ पुस्तकें बच्चों को हाथ हिला-हिलाकर बुलाती हैं। उन्हें पढ़ने के लिए उत्साहित करते हुए कहती हैं कि, “हमसे दोस्ती करो, हम तुम्हें आगे बढ़ने का रास्ता दिखाएँगी।”

आज के इस इंटरनेट, फैक्स, एस.एम.एस., वाट्सअप और मेल के इस दौर में चिट्टी-पत्र लिखना बीते जमाने की बात हो गया है। लेकिन मनु जी का प्रयास यह भी रहा है कि सुख-दुख बाँटने वाली इस जीवंत कला को, या कि निजी स्पर्श से जुड़ी इस साहित्यिक विधा को सहेजा जाए, संरक्षित किया जाए। सांता द्वारा या सांता को लिखी चिट्ठियाँ यही दिखाती हैं। पत्र को वास्तविक स्वरूप में रखना, उसकी लिखावट कथानक को रोचक, प्रभावी और आकर्षक बनती है। वास्तव में चिट्ठी में एक खास तरह का अपनापन, स्नेह, अपनों की चिंता और खुद को औरों में बाँट देने की भावना झलकती है। सांता क्लाज़ अपनी चिट्ठी में नील के प्रति संवेदनाएँ और प्यार लिखता है। वहीं बंगड़-झंगड़ देश की नीलू अपनी व्यथा-कथा सांता को सुनाती है। नीलू रोते हुए टूटे-फूटे अक्षरों में अपना दर्द लिखती है—
“हमारा देश अजीब है सांता। यहाँ सिर्फ लड़कों को ही पढ़ने की इजाजत है। लड़कियों के हाथों में कोई किताब देख ले, तो वह आज-बबूला हो जाता है...। सच कहूँ, तो इस देश के लोगों को पढ़ने-लिखने वाली लड़की ‘नालायक’ लगती है। उसे वे फूटी आँख नहीं देख सकते थे। इसलिए बंगड़-झंगड़ देश की लड़कियाँ दिन-रात रोती हैं और किताबों के लिए तरसती हैं।” 

सांता भी नीलू की आवश्यकता अनुसार विभिन्न प्रकार की कविता-कहानी की रंग-बिरंगी किताबें और सुंदर-सा बस्ता उसके सिरहाने रखकर उसकी मदद करता है।

यों उपन्यास अपनी उदात्त भावना, उत्कृष्ट शैली और भाषाई सहजता के कारण सार्थक और सुंदर बन पड़ा है। वह साधारण पाठक को भी कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित करता है। सांता के अथक प्रयास और प्रेरणा से उस जैसे अनेक नन्हे सांताओं का तैयार हो जाना इस उपन्यास और उसके लेखक की सफलता है। सांता के मन में बार-बार एक ही बात गूँज रही थी, “अगर हर बच्चा सांता बन जाए तो यह दुनिया सुंदर बनेगी, सचमुच सुंदर।” तभी सांता को अनंत दिशाओं में गूँजती हुई आवाज सुनाई दी, “हम बनेंगे, हम बनेंगे...हम बनेंगे सांता! हम सांता के कामों में मदद करेंगे।”

सांता को खुशी है कि वह अब अकेला नहीं है। बच्चों का अपने स्तर पर एक-दूसरे की सहायता करना, प्रेम बाँटना और हौसला देना—यह बहुत बड़ी बात है। यहाँ बच्चों के माध्यम से पूरी दुनिया को खुशहाल बनाना, बच्चों के सपने पूरे करना, उनके दुख, गरीबी, लाचारी और भेदभाव मिटाकर समाज को सुंदर और शक्तिशाली बनाना उपन्यास का बहुत ही सबल एवं सकारात्मक पक्ष है। इसी आशा, विश्वास और संकल्प के साथ उपन्यास का समापन वास्तव में असल जीवन की सच्ची कहानी की शुरुआत है। ऐसी रचनाएँ पाठकों की सोच बदलने की क्षमता रखती हैं।

सच पूछिए तो ‘सांता क्लॉज का पिटारा’ नाम से मनु जी ने बच्चों के लिए एक ऐसा उपन्यास रच डाला है, जिसके शब्द-शब्द में हम सांता को साँस लेते देखते और महसूस करते हैं। इस उपन्यास में मनु जी ने सात बालगीत प्रस्तुत किए हैं। सभी गीतों का तेज और तेवर बहुत ही उत्प्रेरक है। गीत कुछ लंबे भले ही हों, पर इतने सहज और रोचक हैं कि पाठक के मन में बहुत गहरे उतर जाते हैं। कह सकते हैं कि ये एक से बढ़कर एक लाजवाब कविताएँ हैं। मैं अपनी मनपसंद पंक्तियों को यहाँ उद्धृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा—
इस बदली दुनिया के तुम ही राजदुलारे,
तुम राजा, तुम रानी, तुम आँखों के तारे,
मेहनत से कल ऊँचा अपना नाम करोगे,
कोई जिसको कर ना पाया, काम करोगे।
ऊपर-ऊपर उठना है अब तुमको प्यारे,
ऊँचे-ऊँचे चढ़ना है अब तुमको प्यारे,
कल मुट्ठी में चंदा को ले आओगे तुम,
धरती पर खुशियों की फसल उगाओगे तुम।...

इस सुंदर, कलात्मक प्रेरणा गीत की पंक्तियों के साथ ही, ‘सांता क्लॉज का पिटारा’ जैसे सुंदर और भावपूर्ण उपन्यास के सृजन के लिए आदरणीय मनु जी को बधाई और शुभकामनाएँ।
***

अशोक बैरागी
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, टयोंठा, 
तहसील पुंडरी, जिला कैथल (हरियाणा), पिन-136026
चलभाष: 09466549394

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