हिंदी के अद्भुत किस्सागो भगवतीचरण वर्मा

प्रकाश मनु

प्रकाश मनु

भगवतीचरण वर्मा हिंदी के बड़े कथाकार हैं। बड़े कद और बड़ी सामर्थ्य वाले कथाकार। बड़ी रेंज वाले कथाकार भी। उनके कहानीकार से उनके उपन्यासकार का कद बेशक बड़ा है। उपन्यासकार के रूप में कीर्ति भी उन्हें कहीं अधिक मिली। पर भगवती बाबू की कहानियों का जादू आज भी पाठकों के सिर पर चढ़कर बोलता है। ज्यादातर किस्सागोई के अंदाज में लिखी गई उनकी कहानियों का अपना निराला रंग-ढंग, अपना खास अंदाजेबयाँ और मस्ती है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता।

भगवती बाबू की मशहूर कविता “हम दीवानों की क्या हस्ती, आज इधर कल उधर चले, मस्ती का आलम साथ चला हम धूल उड़ाते जिधर चले...!” में जिस मस्ती और फक्कड़ी का आलम है, वह कहीं-कहीं तो ऐसे उस्तादाना शिल्प में प्रकट होता है कि हम अनायास उनकी कविताओं के मुरीद हो उठते हैं। कहानियों की भाषा में भी उनका यही बाँकपन, यही टटकापन और ऐसी अजब-गजब भंगिमाएँ हैं कि पूरी कहानी एक खास फक्कड़ाना तेवर लिए नजर आती हैं। साथ ही हास्य-विनोद की ऐसी बारीक भंगिमाएँ और चटुल अर्थ-छवियाँ कि उनका रस अंदर ही अंदर घुलता जान पड़ता है। पाठक उन कहानियों को पढ़कर कुछ ऐसे रीझता है कि हमेशा के लिए बस, भगवती बाबू का ही हो जाता है। यही वजह है कि भगवती बाबू की किसी कहानी पर उनका नाम हो या न हो, आप आँख मूँदकर बता देंगे कि यह कहानी सिर्फ उन्हीं की हो सकती है।

भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर, सुमित्रानंदन पंत, तथा पं. नरेंद्र शर्मा
(चित्र सौजन्य: श्रीमती लावण्या शाह)
इधर भगवती बाबू की कहानियाँ दोबारा पढ़ते हुए मैं उनकी कहानियों के ‘उस्तादाना एक्सप्रेशंस’ से बार-बार चकित और मुग्ध हुआ। लेकिन इससे भी ज्यादा यह बात प्रभावित करती है कि भगवती बाबू की कहानियाँ जो ऊपर से बहुत हलकी-फुलकी, बेफिक्र और कभी-कभी तो बिंदास किस्म की नजर आती हैं, वे भीतर से कितनी गहरी चोट करने वाली हैं। या कि वे व्यक्ति-मन और समाज की कैसी-कैसी विसंगतियों और विडंबनाओं को उघाड़ती हैं। मैं समझता हूँ, हलके-फुलके या अगंभीर ढंग से गंभीर बातों को इस ढंग से कहना कि वे भीतर तक तिलमिला दें, यह कहीं ज्यादा बड़ी कला है। और इस कला में निपुण कथा-शिल्पियों या इस कला के सबसे बड़े महारथियों की जब-जब चर्चा की जाएगी, तो उनमें भगवतीचरण वर्मा का नाम बहुत ऊपर होगा।

भगवती बाबू की यही जिंदादिली और फक्कड़ी उनसे ‘दो बाँके’ जैसी एक अविस्मरणीय और असाधारण कहानी लिखवा लेती है, जिसे लखनवी तहजीब या कहें कि ‘लखनवी जिंदगी और अदाओं का आईना’ कहा जा सकता है। अलग-अलग शहरों की जमीन पर लिखी कहानियाँ तो हमारे यहाँ बहुत हैं। उनमें बहुत-सी मशहूर भी हुई हैं और बार-बार याद आती हैं, मगर ‘दो बाँके’ इनमें सबसे अलग है। इसलिए कि ‘दो बाँके’ महज लखनऊ पर लिखी गई कहानी नहीं है, बल्कि ऐसी कहानी है जिसमें लखनऊ का दिल है, लखनऊ की सूरत और सीरत है। जिस तरह प्रसाद जी की ‘गुंडा’ कहानी की चर्चा करें तो यह हो नहीं सकता कि समूचा बनारस एकाएक आपकी आँखों के आगे आकर खड़ा न हो जाए, इसी तरह यह हो नहीं सकता कि आप ‘दो बाँके’ की बात करें और आपको लखनऊ याद न आए, या आप लखनऊ की बात करें और आपको ‘दो बाँके’ याद न आए!

भगवतीचरण वर्मा
कहना न होगा कि हिंदी में जो कहानियाँ अपनी असाधारण जीवंतता और संपूर्णता की वजह से अमर हो गई हैं और इक्कीसवीं सदी में भी उसी धूम से उनकी चर्चा होगी, उनमें भगवती बाबू की ‘दो बाँके’ भी है। आप जितनी बार भी इसे पढ़ें, हर बार प्रभावित हुए बगैर नहीं रहेंगे। शायद इसलिए कि इस कहानी में भाषा का कसाव, जिंदादिली और ‘नाटक’ सचमुच गजब का है। ‘दो बाँके’ में लखनऊ के दो शोहदों यानी दो बाँकों की आपसी लड़ाई, मुठभेड़ और एक-दूसरे को चुनौती देना, यह सब इतने बड़े और विलक्षण अंदाज में, बल्कि लगभग युद्ध-स्तर पर होता है कि उससे सारा लखनऊ हिल जाता है।

लाठी उठाए हुए, छाती फुलाए ये दो बाँके और इनके पीछे-पीछे नारे लगाते और जय-जयकार करते उनके शागिर्दों का समूह देखकर लगता है, दो सेनाएँ आमने-सामने हैं और अभी दोनों तरफ रक्त की नदियाँ बह जाएंगी। वे दो बाँके छाती फुलाए हुए पास आते हैं तो देखने वालों की साँसें रुक जाती हैं। दोनों ओर से ऐसे-ऐसे कड़क, तुर्शी भरे संवाद कहे-सुने जाते हैं कि अच्छे-अच्छे ‘धाँसू’ फिल्मी संवाद भी उनके आगे फीके पड़ जाएँ। फिर वे दोनों बाँके उसी तरह छाती फुलाए हुए पंजा लड़ाते हैं। एक-दूसरे की तारीफ करके हाथ मिलाते हैं और फिर उसी तरह छाती फुलाए हुए विजयी भाव से अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं। दोनों ओर से शागिर्दों की जय-जयकार के बीच, भीड़ के रूप में इकट्ठे हुए और घेरा बाँधकर खड़े लोगों को यह समझ ही नहीं आता कि यह नाटक क्या हुआ? या कि आखिर यह माजरा क्या था? सबके चेहरे पर बड़ा अद्भुत-अद्भुत सा भाव है। और यह ‘अद्भुत-अद्भुत’ ही तो भगवती बाबू की वह बारीक, अति बारीक कहानी कला है, जिसे पाठकों का इस कदर प्यार मिलता रहा है कि उनकी कहानियों को आज भी ढूढ़-ढूँढ़कर पढ़ा जाता है।

अलबत्ता, बस इतनी सी कहानी में भगवती बाबू ने लखनऊ की शख्सियत, सुर और सुरूर का ऐसा चित्र बाँधा है कि ‘दो बाँके’ हिंदी की एक अमर और अविस्मरणीय कहानी बन गई है। हाँ, इसे अमर और अविस्मरणीय बनाने में इसके फड़कते हुए संवादों का भी खासा योगदान है। मसलन पुल के इस पार वाले बाँके के शब्द हैं, “उस्ताद, आज खून हो जाएगा, खून!” पुल के इस पार वाला बाँका फिर ललकारता है, “उस्ताद, आज कहर हो जाएगा, कहर!” मगर पुल के उस पार वाला बाँका भी कुछ कम नहीं, “उस्ताद, आज कयामत बरपा हो जाएगी, कयामत!” बीच-बीच में दोनों के लाठी घुमाने का अंदाज और शागिर्दों की उछलकूद!....इस सारे नाटक में जो असली बात लोगों ने भुला दी या देखकर भी जिसे नहीं कहना चाहा, उसे एक लंबा-तगड़ा लट्ठधारी देहाती अपने ठेठ अंदाज में एक बाँके से कह ही देता है, “मुला, स्वाँग खूब भरयो!” 

उस पर बाँके और उसके शागिर्दों की जो हालत हुई और उन्हें जिस तरह खून का घूँट पीकर रह जाना पड़ा, वह बता पाना मुश्किल है, क्योंकि इसे तो ‘दो बाँके’ कहानी पढक़र ही जाना जा सकता है।

यही अंदाज भगवती बाबू की इतिहास-प्रसिद्ध और कालजयी कहानी ‘मुगलों ने सल्तनत बख्श दी’ में भी देखा जा सकता है। यह मुगलिया परिवेश की बहुत हलके-फुलके ढंग से कही गई कहानी है, जिसमें हास्य और व्यंग्य के भरपूर छींटे हैं और इसे एक अच्छी व्यंग्य-कथा भी कहा जा सकता है। कहानी कितने हलके अंदाज में कही गई है, इसका पता इसी बात से चलता है कि कहानी सुनाने वाला गली का एक शोहदा है, जिसे मजाक में लोग-बाग ‘हीरो’ कहकर बुलाते हैं। मगर कहानी कहने का उसका ढंग सचमुच इतना नायाब और अनूठा है कि थोड़ी देर के लिए वह सचमुच हमें मुगलिया सल्तनत में पहुँचा देता है। यहाँ बादशाह शाहजहाँ इस बात से परेशान हैं कि उनकी बेटी का हाथ जल गया है और कोई उसे ठीक नहीं कर पा रहा। अंत में एक अंग्रेज डाक्टर आकर उसके हाथ में वैसलीन लगाता है और कुछ रोज बाद हाथ खुद-ब-खुद ठीक होने लगता है। अंग्रेज डॉक्टर अपनी दवा के प्रचार और कारोबार के लिए थोड़ी जगह माँगता है, जहाँ वह तंबू तानकर अपना काम शुरू कर ले।

फिर जैसा कि होना ही था, बादशाह खुशी-खुशी इस बात की इजाजत दे देते हैं। और अब असली खेल शुरू होता है। अंग्रेज डॉक्टर इंग्लैंड जाता है और रबर का तंबू लेकर आ जाता है। अंग्रेज कलकत्ता में अपना तंबू तानता है और उसे खींचते-खींचते इतना आगे बढ़ाता चला जाता है कि प्रजा में हाहाकार छा जाता है। इधर शाहजहाँ की अगली पीढ़ियाँ आ चुकी हैं। सैनिक, हरकारे और कारिंदे परेशान हैं कि ऐसे तो अंग्रेज पूरे भारत में छा जाएगा। तंबू के नीचे की सारी जमीन अंग्रेज को देनी होगी। मगर मुगल बादशाह भी जो शाहजहाँ की तीसरी-चौथी पीढ़ी का है— अपने कौल का पक्का है। उसका कहना है, तानने दो जहाँ तक ताने! आखिर तंबू तनता-तनता दिल्ली तक आ जाता है और अपने कौल का पक्का तैमूर का वंशज बादशाह दिल्ली छोड़कर बाहर चला जाता है। और यों सारे भारत पर अंग्रेजों का तंबू छा जाता है।

यह कहानी इतने रोचक ढंग से बुनी गई और ऐसे गजब के अंदाज में सुनाई गई है कि सुनते हुए जनता का हाहाकार भीतर बस जाता है। और देखते ही देखते यह पूरी कहानी एक अद्भुत प्रतीक-कथा में तब्दील हो जाती है। सीधे-सादे विनयी व्यापारी बनकर आए अंग्रेजों की चालाकी किस कदर बढ़ती चली गई और कैसे भारत के राजा उसके आगे आत्म-समर्पण करते चले गए, भारतीयों की थोथी आदर्शवादिता अंग्रेजों की कूटनीति और चतुराई भरे चक्रव्यूहों के आगे कैसे धराशायी होती गई, अपने कौल या वचन पर टिके रहने की जिद कैसे हमारे सर्वनाश का कारण बनी और अंग्रेज कैसे उससे फायदा उठाते चले गए—यह सारी इतिहास-कथा कोई पढ़ना चाहे तो बहुत बारीक इशारों में ‘मुगलों ने सल्तनत बख्श दी’ कहानी में दर्ज है। 

ऊपर से देखने पर एक खिलंदड़ी गप्प-कथा के रूप में यह कहानी हमें हँसाती है, पर थोड़ा अंदर झाँकें, तो इसमें लेखक के वे आँसू भी नजर आ सकते हैं जो इतिहास में भारत की गुलामी और सर्वनाश के अध्यायों को पढ़ते हुए रोके नहीं रुकते। ‘मुगलों ने सल्तनत बख्श दी’ को हिंदी की कुछ अच्छी और बेजोड़ व्यंग्य-कथाओं में भी शामिल किया जा सकता है। इसलिए कि यह सीधा-सपाट व्यंग्य नहीं, कई परतों वाला व्यंग्य है और उसमें ऊपरी हलके-फुलकेपन के बावूद, कहीं एक गहरी करुणा और अवसाद छिपा है।

यहीं भगवती बाबू की सर्वाधिक चर्चित और असाधारण कहानी ‘प्रायश्चित’ की चर्चा की जा सकती है। वह कहानी जिसे पढ़कर मैं ही नहीं, मेरी पीढ़ी के तमाम लेखक बड़े हुए हैं। यह उन कहानियों में से है जिन्होंने जाने-अनजाने हममें से बहुतों को लेखक बनाया है या कहें कि लिखने के ‘गुर’ सिखाए हैं। मुझे अच्छी तरह याद है, सातवीं या आठवीं कक्षा में जब मैंने इसे पढ़ा और इसका भरपूर आनंद लिया था, तब यह मुझे प्रेमचंद के स्कूल की-सी कहानी लगी थी। लेकिन इस कहानी में आनंद लेने का भाव यानी किस्सागोई भगवती बाबू की अपनी थी, जिससे कहानी में कुछ अलग तंज और धार आ गई थी। कहानी जिस मजेदार अंदाज में कही गई है, उससे इसके एक हलकी-फुलकी हास्य-कथा में तब्दील होने का पूरा खतरा था। लेकिन भगवती बाबू अपने बढ़िया कला-लाघव से उसे कैसे सँभालते हैं और भारत की सीधी-सादी जनता को धर्म के नाम पर किस तरह ठगा जा रहा है—इस पूरी ठग-लीला को जैसे उम्दा ढंग से अनायास उभार देते हैं, उससे उनकी कहानी-कला की ताकत पहचानी जा सकती है। कहानी का पहला वाक्य ही न सिर्फ हमें उत्सुकता से बाँध लेता है, बल्कि आगे कही जाने वाली कथा को बीज रूप में वहाँ उपस्थिति भी कर देता है, “अगर कबरी बिल्ली घर भर में किसी से प्रेम करती थी तो रामू की बहू से, और अगर रामू की बहू घर भर में किसी से घृणा करती थी तो कबरी बिल्ली से।”

रामू की बहू के हाथों बिल्ली के मर जाने की खबर से घर की डरी-सहमी औरतों की प्रतिक्रियाएँ हिंदुस्तानी जनता की धर्मभीरु मानसिकता को प्रकट करती हैं, तो परमसुख पंडित जी के लहरियेदार संवाद इस बात को बखूबी उभार देते हैं कि घर की औरतों का जो भय है, उसी के बीच से ही तो आखिर धर्म-छत्रधरी पंडित परमसुख के जिह्वा-सुख-स्वाद के रास्ते निकलते हैं। ब्राह्म मुहूर्त में बिल्ली के मरने के पाप की काट के लिए वे इक्कीस तोले की बिल्ली बनवाने के लिए कहते हैं और फिर आखिर ग्यारह तोले पर राजी हो जाते हैं। पूजा के लिए जो मनों सामग्री वे घोषित करते हैं, वह शायद उनके साल भर के राशन से कहीं अधिक है। बिल्ली के मरने के नरक और पाप पर मानो पंडित जी अपने सुख-आनंद के ऊँचे स्वर्ग का वितान तानते हैं। मगर भगवती बाबू सरीखे उस्ताद कहानीकार को पता है कि कहानी को कहाँ तक ले जाकर, कहाँ खत्म करना है।...सो होता यह है कि कहानी के अंत में बिल्ली के उठकर भाग जाने की खबर से बेचारे पंडितजी का यह तंबू किसी काँच के विशाल झाड़-फानूस की तरह झनझनाकर गिर जाता है। और परिवार के चेहरे पर आश्वस्ति लौटती है—कहानी में यह कहा नहीं गया, पर पाठक उसे बखूबी महसूस कर सकता है।

भगवती बाबू की ‘प्रायश्चित’ कहानी बड़ी नाटकीय और दिलचस्प है, लेकिन बड़े खरे अंदाज में वह यह बात भी खोल जाती है कि भारतीय समाज में सदियों से धर्म के नाम पर जो ‘भयादोहन की दुकानदारी’ चल रही है, वह सच्चा धर्म नहीं है, बल्कि समाज का एक रोग ही है। इसका इलाज हुए बगैर समाज आगे नहीं बढ़ सकता।


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भगवती बाबू की कहानियाँ खेल-खेल में मार करती हैं। उनकी बहुत कम कहानियाँ ऐसी मिलेंगी जिनमें हास्य की चुहल न हो। मानो इस चुहल और मस्ती के बगैर कहानी बुनना उन्हें पसंद ही न हो। और उनकी ‘वसीयत’, ‘छह आने का टिकट’, ‘विक्टोरिया क्रॉस’, ‘तिजारत का नया तरीका’, ‘संकट’ जैसी तमाम कहानियाँ तो हास्य-कथा होने का भ्रम भी देती है। लेकिन भगवती बाबू किस होशियारी से उनमें जीवन के मार्मिक सत्य छिपाकर रखते हैं और कैसे समय पर उन्हें प्रकट करके, कहानी का सारा प्रभाव उलट देते हैं या उसमें ऐसे अद्भुत मोड़ ले आते हैं कि पाठक हक्का-बक्का रह जाता है—यह देखने और सीखने की बात है। खासकर हिंदी के ऐसे लेखक जिनकी कहानियों में शुरू से आखिर तक उदासी और मुर्दनी छाई रहती है और जो अपनी गंभीरता के इस बुरी तरह मारे हुए हैं कि अपने ‘खोल’ से कभी बाहर आ ही नहीं सकते—वे अगर भगवती बाबू से थोड़ी-बहुत मस्ती और फक्कड़ी उधर ले लें, तो हिंदी कथा-साहित्य का सचमुच बहुत भला हो!

‘वसीयत’ कहानी को ही लें, तो इस कहानी में कथा-वस्तु कुछ खास नहीं। आचार्य चूड़ामणि मिश्र जो कि खासे विद्वान और भारतीय दर्शन के विशेषज्ञ माने जाते थे, अचानक गुजर गए। जाने से पहले वे अपने शिष्य जनार्दन जोशी को अपनी वसीयत सौंप गए। वसीयत में परिवारी जनों के बीच अपनी अपार संपत्ति के बँटवारे के साथ-साथ पत्नी, बेटों, बहुओं, बेटियों, दामादों आदि पर उनकी खरी-खरी टिप्पणियाँ भी हैं। आचार्य जी की शव-यात्रा से पहले और बाद में दसवें के दिन यह वसीयत आचार्य जी का शिष्य उनके परिवारी जनों के बीच पढ़ता है। जैसे-जैसे वसीयत पढ़ी जाती है, परिवार के लोगों के रंग और चेहरे किस तरह से बदलते हैं, आपसी ईष्र्या-द्वेष का कैसा नंगा नाच होता है, एक-दूसरे से वे कैसे उलझते हैं और कैसे स्वार्थ के चलते फिर हाथ मिला लेते हैं—यह सारा नाटक् इतना दिलचस्प और रोमांचक है कि हम साँस रोककर यह कहानी पढ़ते हैं। शायद किसी बड़े से बड़े आध्यात्मिक उपदेश से परिवारिक रिश्तों का वह छद्म और निस्सारता न प्रकट हो, जैसे यह कहानी प्रकट कर देती है। और हम मानो भौचक्के से देखते रह जाते हैं कि आदमी की मौत के साथ ही कैसे उसके साथ जुड़ा सारा आदर-लिहाज खत्म हो जाता है, और नंगी लूटपाट चल पड़ती है। टेढ़ी-सीधी फब्तियाँ और शब्दों के भीषण आक्रमण शुरू हो जाते हैं। 

ऊपर से देखने पर ‘वसीयत’ एक हलकी-फुलकी हास्य-कथा का ही भ्रम देती है, लेकिन जैसे-जैसे जीवन की विसंगतियाँ और विडंबनाएँ उभरने लगती हैं, कहानी की ‘रेंज’ बढ़ती है। कहानी का अंत इसे और अधिक मार्मिकता से उभार देता है, जब हम आचार्य चूड़ाणि के शिष्य को अपने हिस्से में आए तोते गंगाराम को उड़ाते हुए देखते हैं। वह तोता शिष्य से बार-बार, “तुम बुद्धू हो!” कह रहा था और शिष्य जर्नादन जोशी का जवाब था, “मैं बुद्धू हूँ, यह मानने से मैं इनकार करता हूँ। हे गंगाराम, मैं तुम्हें मुक्त करता हूँ।”

‘वसीयत’ कहानी बड़ी होशियारी से इस कड़वे, व्यावहारिक सत्य को भी पाठकों के आगे रख देती है कि आचार्य चूड़ामणि मिश्र अपने परिवार से चाहे कितने ही नाराज रहे हों, पर वे अपनी अपार संपत्ति उन्हीं को सौंपते हैं और शिष्य के हाथ तो सिर्फ पिंजरे में रखा तोता ही आता है।

‘छह आने का टिकट’, ‘विक्टोरिया क्रॉस’ और ‘तिजारत का नया तरीका’ कहानी में हास्य कहीं अधिक मुखर है। ‘छह आने का टिकट’ जबरदस्ती घर में घुस आए और जाने का नाम न लेने वाले अनोखे अतिथि रामखेलावन शरण नारायणप्रसाद सिंह की कहानी है जो कथा-वाचक के घर में रहकर भोजन करते हैं और लंबी तानकर सोते हैं। कलकत्ता घूमने के लिए उन्हीं से पैसे माँगकर घर से निकलते हैं और ऐसी आफत मचाते हैं कि मामला पुलिस थाने तक पहुँच जाता है। लेकिन इस सब के बावजूद वे टलने का नाम इसलिए नहीं लेते, क्योंकि उनके मामा के ससुर के बहनोई जो कि टिकट कलेक्टर हैं, अभी तक आए नहीं है। उन्हीं के साथ वे वापस लौटेंगे। कहानी का ताना-बाना खासा दिलचस्प है। खासकर घर में जबरदस्ती घुस आए मेहमान से बचने की सारी रणनीतियाँ कैसे धरी की धरी रह जाती हैं और मेहमान, मेजबान से कहीं ज्यादा मौज और मजे में है—ऐसे दृश्य कहानी में अंत तक रस और रोचकता बनाए रखते हैं।

‘तिजारत का नया तरीका’ मौज-मजे से जीने वाले खुशबख्त राय की कहानी है, जिनके पिता उनके लिए खासी संपत्ति छोड़कर गुजर गए हैं। खुशबख्त राय कल्पनाशील आदमी हैं और एक के बाद एक नए बिजनेस की प्लानिंग करते हैं जिसमें लाखों का वारा-न्यारा हो। मगर हर बारे मुँह की खाते हैं। लेकिन अंत में उन्होंने तिजारत का एक ऐसा नायाब तरीका खोज लिया जो अगर सफल हो जाए तो किसी को कुछ काम-धाम करने की दरकार ही न रहे। हाँ, इस तरीके का रहस्य जानने के लिए पाठक खुद यह कहानी पढ़ें तो बेहतर है, क्योंकि तब रहस्य जानने के साथ-साथ उन्हें जेल जाने की ‘पुण्य कथा’ तथा हास्य का भरपूर मजा भी मिलेगा।

ऐसा ही नायाब किस्म का रहस्य ‘विक्टोरिया क्रॉस’ में भी है, जिसमें हम रेस्तराँ में बैठे हुए दो फौजियों से मिलते हैं, जिनमें एक की वर्दी पर विक्टोरिया क्रॉस लगा है। अब विक्टोरिया क्रॉस लगाए हुए फौजी सुखराम कितने वीर हैं! लड़ाई के मोर्चे से डरकर अंधाधुंध भागते हुए, कैसे वे अचानक अंग्रेज अफसर विलफोर्स की नजरों में चढ़ जाते हैं और उनकी सिफारिश पर असाधारण बहादुरी के लिए दिया जाने वाला विक्टोरिया क्रॉस हासिल करते हैं, इसे अगर मैं बताने लगूँ तो शायद पाठकों को यकीन ही न आएगा। पर भगवती बाबू अपनी कहानियों में एक साथ इस कदर नाटकीयता और विश्वसनीयता ले आते हैं कि कहानी पाठक के सिर पर चढ़कर बोलने लगती है। उनका यही ‘जादू’ असल में उनकी शक्ति भी है और ‘विक्टोरिया क्रॉस’ में उसका रंग गहरा है।


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भगवती बाबू के कथा-संसार से गुजरते हुए बार-बार हम यह महसूस करते हैं कि वहाँ आकस्मिक संयोग बहुत हैं और ऐसे संयोग कदम-कदम पर देखे जा सकते हैं, जिनमें कोई कहानी अचानक ‘यू-टर्न’ लेकर पलट जाती है। उनकी बहुत सी कहानियों की प्राण-शक्ति या जादू यही है। ‘विक्टोरिया क्रॉस’ में अगर यह आकस्मिक तेज मोड़ न होता, तो वह कहानी ही न बनती। ‘सौदा हाथ से निकल गया’, ‘खिलावन का नरक’, ‘प्रेजेंट्स’, ‘इंस्टॉलमेंट’ जैसी भगवती बाबू की तमाम कहानियों में ऐसे आकस्मिक घुमाव और मोड़ हैं। इस नाते ये कहानियाँ उतनी विश्वसनीय नहीं लगतीं, जितनी नाटकीय। मगर गौर से देखा जाए तो ये आकस्मिक संयोग भी निरर्थक नहीं है और सिर्फ कहानी गढ़ने के लिए नहीं लाए गए। इनके पीछे भगवती बाबू का पूरा एक जीवन-दर्शन है, जिसे ‘नियतिवादी’ जीवन-दर्शन कहा जा सकता है। इसी नियतिवाद के सहारे वे जीवन की तमाम विडंबनाओं और विसंगतियों को अपने तईं समझते हैं, उनकी व्याख्या करते और रास्ता निकालते नजर आते हैं।

‘विक्टोरिया क्रॉस’ कहानी की शुरुआत में वे अपने नियतिवादी दर्शन को जिसे हलके-फुलके अंदाज में वे ‘धुप्पल’ कहते हैं—समझाते और मजेदार ढंग से व्याख्यायित करते हैं। स्वयं भगवती बाबू के शब्दों में, “हमारे जीवन में कभी-कभी ऐसी घटनाएँ घटित हो जाती हैं जिनकी हम कल्पना नहीं कर सकते।” और इसका कारण यह है कि संसार की रीति और विधि-विधान को चलाने वाली जिन शक्तियों को हम जानते हैं, इसके अलावा एक और शक्ति भी है—’धुप्पल’। इस ‘धुप्पल’ की अनोखी व्याख्या भगवती बाबू से ही सुनिए, “इस धुप्पल पर आप मनन कीजिए और आप उसका अध्ययन अरोचक न पाएँगे। धुप्पल का अध्ययन करने के समय आप ऐसी-ऐसी घटनाओं से परिचित हो सकेंगे कि आपको न मनुष्य की शक्ति पर विश्वास रह जाएगा और न भलाई तथा बुराई को ही आप महत्व दे सकेंगे। हाँ, आप जी खोलकर हँस सकेंगे। लेकिन शर्त यह है कि आप खुशमिजाज हों!”

शायद इसीलिए भगवती बाबू की कहानियाँ—एक वाक्य में कहें तो—खुशमिजाज कहानियाँ हैं और एक से एक आकस्मिक संयोगों और अजब-गजब चमत्कारों से भरी हुई हैं। मजे की बात यह है कि फिर भी ये अविश्वसनीय नहीं लगतीं और जिन चमत्कारों का सहारा लेकर वे चलती हैं और जिन चमत्कारों का सहारा लेकर वे चलती हैं, वे भी आपको ‘दूर की कौड़ी’ यानी झूठ नहीं लगते। आप इन कहानियों को पढ़कर कभी खिलखिलाकर हँस देते हैं तो कभी मुस्कराते हैं। और यही भगवती बाबू का इष्ट भी है। हाँ, अगर आप खुशमिजाज नहीं हैं तो न ये कहानियाँ आपके लिए हैं और न भगवती बाबू की धुप्पल की यह कल्पना! स्वयं भगवती बाबू के शब्दों का सहारा लें तो, “आपने मोहर्रम में जन्म लिया है तो इस धुप्पल की क्या मजाल, जनाब इस धुप्पल के निर्माता भी आपको नहीं हँसा सकते।”

अलबत्ता यह तो मानना ही होगा कि अगर यह धुप्पल न होता, तो लड़ाई के मैदान से जान बचाकर भागने वाला फौजी सुखराम वीरता का सबसे बड़ा पुरस्कार ‘विक्टोरिया क्रॉस’ न हासिल करता। और धुप्पल न होता तो ‘सौदा हाथ से निकल गया’ कहानी के राय इकबाल शंकर के साथ इस कदर बुरी न बीतती कि बेचारे सदमें से बेहोश होते-होते बचे! मगर यह सदमा था कैसा? और वे इसके चक्कर में फँसे कैसे, यह जान लें तो आपको भगवती बाबू के ‘दर्शन’ पर पूरा यकीन हो जाएगा। हुआ यह कि राय इकबाल शंकर के पास कहीं से असली आबनूस की लकड़ी की काले रंग की, तीन टाँग की एक मेज आ गई, जिसकी तीसरी टाँग टूटी हुई थी। उन्होंने यह मेज अपनी कोठरी में रखवा दी।

फिर एक दिन अचानक राय इकबाल शंकर की मुलाकात हुई जैसुख मीरचंदानी से, जो अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के क्यूरियो के व्यापारी हैं। मीरचंदानी उस मेज की चर्चा सुनते ही खुश होकर बोले कि हो न हो, यह मेज वही है जिसे एल्बर्ट गुंथर ने बनाया था। एक ही डिजायन की उन तीन मेजों में से एक तो अमेरिका के एक करोड़पति के पास है, दूसरी मारसाई के म्यूजियम में और तीसरी शायद यही मेज है। राय इकबाल शंकर मीरचंदानी को अपने घर दावत देते हैं, तो उनकी पत्नी रद्धो बीबी जैसे-तैसे चीजें उधार लेकर खाना बनाने के जतन में जुट जाती है। मगर गैस खत्म हो गई और खाना आधा ही बना था, तो बारिश के मौसम में घर की नौकरानी छमिया महरी जुगत लगाती है। आखिर आबनूस का वह काला भारी पाया ही काम आता है, जिससे स्वादिष्ट खाना बनता है।

मीरचंदानी खाना खाकर मगन हैं और मेज को देखकर उछल पड़ते हैं कि अरे, यह तो वही ऐतिहासिक महत्त्व की मेज है, मगर तीसरा पाया कहाँ है, जिस पर जरूर एल्बर्ट गुंथर का नाम नक्श होगा? जब उस पाए की कहानी पता चली कि यह स्वादिष्ट खाना तो उसी से बना है, तो राय इकबाल शंकर पर क्या गुजरी, इसे भगवती बाबू के ही शब्दों में सुनिए, “राय इकबाल शंकर ने अपना माथा ठोंक लिया—अरी भलीमानस, पाया नहीं जला, पाँच हजार की रकम जल गई है मेरी!” और फिर उन्होंने मीरचंदानी से कहा, “जैसुख भाई, चलो। इससे पहले कि मैं इस गम के सदमे से बेहोश हो जाऊँ, तुम्हें तुम्हारे होटल पहुँचा दूँ।”

भगवती बाबू की ‘इंस्टॉलमेंट’ और ‘प्रेजेंट्स जैसी कहानियों में भी यही अजब सा विपर्यय है। ‘इंस्टॉलमेंट’ में चौधरी विश्वंभर सहाय अपनी बुरी आर्थिक हालत के बावजूद नई गाड़ी शेवरले सिक्स खरीद लेते हैं और उसकी इंस्टॉलमेंट के लिए अपने मित्र का मुँह जाहते हैं। कारण यह है कि कुछ ही रोज पहले उनको एक ऐसे फटीचर ताँगे पर बैठना पड़ा, जिसमें कमजोर सी लस्त-पस्त घोड़ी जुती हुई थी। ताँगा चलते-चलते रुक गया था और इस कारण अपनी दो सहपाठिनों के आगे उनकी खासी किरकिरी हुई थी। जवाब में उन्होंने फौरन किस्तों में यह गाड़ी खरीद डाली और कोशिश में थे कि वे दोनों युवतियाँ किसी तरह एक बार देख लें। फिर इस ‘झंझट’ को बेचकर किसी तरह निजात पाया जाए। ‘प्रेजेंट्स’ में परमेश्वरी बाबू अपने पड़ोस में रहने वाली शशिबाला देवी की ओर आकृष्ट हैं और यह दोस्ती आशा से अधिक बढ़ती जा रही है। मगर अचानक उन्हें झटका तब लगता है, जब उन्हें पता चलता है कि शशिबाला के कमरे में दर्जनों लोगों के दिए हुए दर्जनों उपहार हैं, जिन पर बाकायदा उपहारदाताओं के नाम लिखे हैं और यह लिस्ट तेजी से बढ़ती ही जा रही है। इनमें परमेश्वरी बाबू का नंबर अठानबेवाँ हैं। 

जाहिर है, प्रेम का यह विपर्यय परमेश्वरी बाबू पर कुछ इस कदर भारी पड़ा कि उन्हें लगा, उनकी आँखों के आगे से परदा हट गया है। और फिर वे एकाएक प्रेमी से मानो दार्शनिक बन जाते हैं।


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यह न समझ लिया जाए कि भगवती बाबू की कहानियाँ सिर्फ खुशमिजाज कहानियाँ हैं और जीवन की विकल त्रासदी, दर्द और पीड़ा तक नहीं जातीं, इसलिए उनकी ‘नाजिर मुंशी’, ‘खिलावन का नाटक’, ‘पियारी’, ‘आवारे’, ‘एक अनुभव’ जैसी कहानियों का जिक्र जरूरी है, जिनके भीतर बहती करुणा भगवती बाबू के कहानीकार का एक अलग ही रूप रंग प्रकट करती हैं। इनमें ‘नाजिर मुंशी’ कहानी सबसे मार्मिक और प्रभावशाली है। कथावाचक की स्मृतियों में नाजिर मंशी का जो रूप बसा हुआ है, वह सचमुच बड़ा दिलचस्प और आकर्षक है। महफिल में नाजिर मुंशी सबसे आगे बिठाए जाते हैं। लड़कों की भीड़ उन्हें घेरे रहती है। इसलिए कि, “नाजिर मुंशी हँसमुख आदमी थे। किसी भी आदमी को बातों में उड़ा देना उनके बाएँ हाथ का खेल था। जहाँ नाजिर मुंशी थे, वहाँ हँसी का ठहाका था। हाजिर जवाबी उनका जन्मसिद्ध अधिकार था।”

कहानी की शुरुआत में बारात के मौके पर नाजिर मुंशी की जिस हाजिर जवाबी का वर्णन किया गया है, वह वाकई कमी गुदगुदाता, कभी हैरत में डालता है। लेकिन यही नाजिर मुंशी समय बीतते बीतते किस कदर दीन और दयनीय हो जाते हैं, कहानी के अंत में इसका वर्णन आँखें भिगो देता है। नाजिर मुंशी के चरित्र के जरिए भगवती बाबू जीवन के जिस कुरूप और भयानक सच पर उँगली रखते हैं, वह यह कि “हम सभी की आत्मा को धन के पिशाच ने अपने पैरों के नीचे कुचल रखा है।” ऐसा लगता है कि कहानी का अंत करते-करते खुद भगवती बाबू के शब्द भी उदास हो जाते हैं।

‘खिलावन का नरक’ और ‘पियारी’ जैसी अपेक्षाकृत छोटी कहानियों में भी इसी उदासी की छाया है। ‘खिलावन का नरक’ में हम खिलावन को रेलगाड़ी के ठसाठस भरे हुए थर्ड क्लास के डिब्बे की एक बैंच के नीचे लेटा हुआ पाते हैं। तीन साल बाद वह मुंबई से घर लौट रहा था और ये तीन साल उसने किस कष्ट और तकलीफ के साथ काटे, इसे सिर्फ वही जानता था। और फिर गाड़ी की इस नारकीय यात्रा में जैसे वह अपने को और अपने सपने को बचाकर लाया था, यह सब भी अवर्णनीय है। उसे अपने घर-परिवार और पत्नी की बेतरह याद आ रही है। लेकिन गाँव की सीमा पर पहुँचकर उसे पराए मर्द के साथ बातें करते पत्नी के जो शब्द सुनाई पड़े—और इस सत्य का ज्ञान हुआ कि किस तरह उस आदमी के दिए पाँच रुपयों से उसके भूखे परिवार के पेट में अन्न जाता है, तो आगे उससे कुछ सुना ही नहीं गया। बारिश में भीगता और भागता हुआ वह उलटे पैरों रेलवे स्टेशन की ओर चल पड़ा और वहाँ आकर वह फिर मुंबई की गाड़ी की प्रतीक्षा करने लगता है।

इसी तरह ‘पियारी’ कहानी में एक अलग नरक है। रास्ते में बैठी जिस बुढ़िया भिखारिन को देखकर मन टीस और दया से भर जाता है, उसकी जी मिचलाने वाली करूपता मन में जैसी बेचैनी भरती है, उसे देखते हुए यह कल्पना करना कि कभी यह बुढ़िया जवान थी और उसमें मनमोहक सुंदरता थी, बहुत कठिन जान पड़ता है। मगर कथावाचक को अपने बचपन और किशोरावस्था में खूब प्यार करने वाली पियारी की याद भला कैसे न आए, जिसके साथ भाग्य ने बड़ा अजब-सा खेल किया था। तब उसके आस-पास मँडराने वाले बहुत थे, लेकिन बुढ़ापे में अब उसका सहारा एक भीख ही रह गई है।
‘आवारे’ और ‘एक अनुभव’ भगवती बाबू की कुछ अलग सी कहानियाँ हैं। मगर ऊपरी बेफिक्री के बावजूद करुणा का बारीक स्पर्श और दुख का गहरा सेक यहाँ भी है। ‘आवारे’ में मुंबई में भाग्य आजमाने के लिए आए कुछ युवकों की मिली-जुली त्रासदी है। उनकी अलग-अलग कहानियाँ अलग-अलग संघर्ष-कथाएँ हैं, लेकिन कुल मिलाकर वह एक ही त्रासदी का हिस्सा है। कल के चमकदार सपने के लिए वे अपने आज को किस तरह बूँद-बूँद गला रहे हैं, दुख, अपमान और भूख के थपेड़े कैसे सह रहे हैं— यह पढ़ना किसी विपद्-कथा को पढ़ने जैसा है। यह दीगर बात है कि अकसर वे मस्ती की रौ में बहते दीखते हैं। कभी आपस में उलटे-सीधे मजाक करते हैं, कभी उधार के नाम पर एक दूसरे की चीजें हड़प लेते हैं, कभी गुस्से में एक-दूसरे से गुत्थमगुत्था हो जाते हैं और फिर निढाल होकर चारपाई पर पड़, आसमान देखने लगते हैं।

‘आवारे’ खासी लंबी कहानी है और इसकी ऊपरी काया किसी फिल्मी कथा जैसी है, लेकिन इसके अंदर बहता दर्द और करुणा इसे एक यादगार कहानी में बदल देती है। ऐसे ही ‘एक अनुभव’ कहानी में सिर्फ दस रुपए के लिए होटल में अपना जिस्म बेचने आई एक स्त्री की करुण कथा है। कहानी का नायक उसे सौ रुपए का नोट निकालकर देता है और आग्रह करता है, “यह सौ रुपए का नोट लो और एक महीने के लिए तुम अपने इस काम को छोड़ दो। एक महीने के बाद तुम्हारा जो जी चाहे, करना।” इस पर अब ‘करुणा की एक प्रतिमूर्ति’ की तरह सामने खड़ी उस स्त्री की आँखें किस तरह आँसुओं से भीग जाती हैं और उसके अंदर से जो स्त्री निकलकर आती है, कहानी के अंत में उसे देख पाना एक अविस्मरणीय अनुभव है।

भगवती बाबू की एक अन्य कहानी ‘संकट’ भी ऊपर से हास्य-कथा के बानक के बावजूद भीतर कवि और कविता की एक अजब त्रासदी छिपाए हुए हैं। यह त्रासदी झेलनी पड़ी कवि श्री हरिशंकर अभिशप्त जी को जिनकी आजीविका का एकमात्र साधन कवि-सम्मेलन ही था। इसी कवि सम्मेलन के चक्कर में वे आदिमपुर में एक जमींदार की हवेली में पहुँचे। वहाँ कवि सम्मेलन में अभिशप्त जी की कविता खूब जमी। मगर सुबह जहाँ उन्हें यात्रा-व्यय और पारिश्रमिक के रूप में 120 रुपए मिलने थे, वहाँ रुपयों की जगह सब्जी के दो झाबे पकड़ा दिए गए। एक झाबे में ढेर से टमाटर तो दूसरे में ढेर से बैगन थे। उनसे कहा गया कि इन्हें बेचकर आप मजे में अपनी फीस वसूल कर सकते हैं। अभिशप्त जी जब इस पर चौंके और परेशान हुए तो उनके मित्र धरनीधर दीक्षित इस पर गुस्से में उबल पड़े, “ससुर, रात-रात भर ऐसे महफिल माँ गला फाड़-फाड़कर चिचियात है, तो सरम नाहीं आवत! सौदा बेचै माँ नानी मरत है। निशांतगंज बाजार के दो चक्कर लगा आओ, अभी तुम्हारा संकट दूर हुआ जाता है।” कहना न होगा कि हास्य और कवि-त्रासदी का यह मेल सचमुच निराला है।

अंत में भगवती बाबू की एक विलक्षण कहानी ‘मोर्चाबंदी’ की चर्चा करना जरूरी लग रहा है। इसलिए कि यह कहानी भगवती बाबू की कहानियों की प्रांसगिकता पर विचार करते समय सबसे मौजूँ ठहरती है। इस कहानी में धर्म के उस भदेस रूप की चर्चा है जिसका इस्तेमाल दूसरे को नीचा दिखाने या आतंकित करने के लिए किया जाता है। इस कहानी के नायक लाल साहब का सिर्फ एक ही दोष था कि भद्दे सुरों में हो रहे बेसुरे कीर्तन को वे पसंद नहीं कर पाए! लेकिन उन्हें पता नहीं था कि होते-होते इससे वे एक ऐसी धार्मिक मोर्चाबंदी में घिर जाएँगे जिसमें वे अकेले दूट जाएँगे और हालत धार्मिक दंगों तक पहुँच जाएगी। ‘मोर्चाबंदी’ कहानी एक बार फिर से यह सोचने पर विवश करती है कि धर्म के जिस ताम-झाम में करुणा, सहानुभूति और इनसानियत न हो, उसे क्या सच में धर्म कहेंगे? वर्मा जी की अन्य कहानियों की तरह ‘मोर्चाबंदी’ भी हलके-फुलके अंदाज में लिखी गई कहानी है, जिसमें कीर्तन के जवाब में कव्वाली आ जाती है और लाल साहब को भरी हुई बंदूक लेकर रातभर पहरा देना पड़ता है।

भगवती बाबू की ‘मोर्चाबंदी’ कहानी बड़े सलीके से यह सच समझा जाती है कि आजकल धर्म कुछ इस कदर ‘नाजुक’ हो गया है कि अगर आप मन से कोई सीधी-सच्ची इनसानियत की बात करें, तो भी धार्मिक अखाड़ियों को आपके खिलाफ मोर्चा जमाने में देर नहीं लगती। फिर सवाल यह भी है कि इस ‘स्वत्वहीन’ धर्म की किसे जरूरत है? आखिर कोई भी धर्म मनुष्यता या इनसानियत से बड़ा नहीं है। और कोई भी धर्म इनसानियत के बगैर धर्म नहीं रह जाता। आज आधुनकिता और उत्तर-आधुनिकता के तमाम दावों के बावजूद अगर सांप्रदायिक तनाव थम नहीं रहे, तो इसके पीछे कहीं न कहीं सच वही है जिसकी ओर भगवती बाबू की ‘मोर्चाबंदी’ कहानी इशारा करती है।

यहीं शायद गौर से देखें तो वे कारण भी नजर आ सकते हैं जो भगवती बाबू के कथाकार को आज भी बेहद लोकप्रिय बनाते हैं। आज जब अधिकांश कथा-लेखक एकांतवादी गुहाओं में सिमटने नजर आते हैं और कहानी अपनी नाटकीयता और जिंदादिली ही नहीं, बल्कि ‘कहानीपन’ को भी खोकर वैचारिक लेखों और अमूर्त फैंटेसियों की सी शक्ल ले रही है, तब भगवती बाबू की बेहद जानदार भाषा में लिखी गई, बेहद जानदार कहानियाँ किसी सुकून की तरह हैं। आज के पाठकविहीनता के दौर में उनकी याद कहीं अधिक आती है।

आज जबकि साहित्य और पाठकों के बीच एक बिना पुल वाली नदी बह रही है और समाज का लेखक और साहित्य से रिश्ता कटता जा रहा है, तो इसके लिए क्या बेजान भाषा में लिखा गया हमारा ढेर सारा ‘ऊबवादी’ साहित्य जिम्मेदार नहीं है, जो अपने फैशनेबल एलीटिज्म की मुद्राओं और अनमनी तटस्थता की गुहाओं से बाहर निकल ही नहीं पा रहा? भगवती बाबू की कहानियाँ मानो आज भी गंभीरता से इसकी पड़ताल करने की चुनौती उपस्थित करती हैं।
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प्रकाश मनु
545, सेक्टर-29, फऱीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008
चलभाष: 09810602327,
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