व्यंग्य विधा की नई उड़ानः लोकतंत्र से टपकता हुआ लोक!

विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: लोकतंत्र से टपकता हुआ लोक! (व्यंग्य संग्रह)
व्यंग्यकार: अरविंद तिवारी
मूल्य: ₹ 225/-
प्रकाशक: इंडिया नेटबुक्स, नोएडा

व्यंग्य साहित्य की प्रचलित विधा है। हिन्दी साहित्य में भी यह सर्व-स्वीकृत है, खूब प्रचलन में है, लेखक, व्यंग्यकार जोर-शोर से लिख रहे हैं और व्यंग्य की पुस्तकें लगातार छप रही हैं। व्यंग्य विमर्श में बहुत समय तक चिन्तन होता रहा, इसे स्वतंत्र विधा के रूप में माना जाए या नहीं? आज साहित्य में व्यंग्य को स्वतंत्र विधा मान लिया गया है। लेखन संगतियों-विसंगतियों की पड़ताल से जुड़ा रहता है। समाज की विसंगतियों, भ्रष्टाचार, सामाजिक शोषण अथवा राजनीति के गिरते स्तर की घटनाओं पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से तंज या व्यंग्य किया जाता है। व्यंग्यकार जीवन की हर स्थिति-परिस्थिति पर व्यंग्यात्मक दृष्टि रखते हैं और अपने अनुभवों के आधार पर व्यंग्य लेखन करते हैं। सामान्य कहानी या लघु कथा की तरह संक्षेप में घटनाओं पर व्यंग्य लिखे जाते हैं जो साहित्य में हास्य का पुट उत्पन्न करते हैं और कभी-कभी आक्रोश जगाते हैं।

विजय कुमार तिवारी
हिन्दी व्यंग्य विधा के वरिष्ठ व्यंग्यकार, साहित्यकार अरविंद तिवारी जी द्वारा लिखित नवीनतम व्यंग्य संग्रह "लोकतंत्र से टपकता हुआ लोक!" मेरे सामने है। अरविंद तिवारी जी हिन्दी साहित्य में सुपरिचित हैं, जाने-माने व्यंग्यकार हैं और उन्होंने विपुल मात्रा में साहित्य सृजन किया है। स्तम्भ लेखन, संपादन के साथ-साथ उनके काव्य संग्रह, अनेक व्यंग्य संग्रह और व्यंग्य उपन्यास प्रकाशित हैं। उन्हें नाना सम्मानों और पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। आज भी वे सतत सक्रिय हैं और व्यंग्य लेखन कर रहे हैं।

'व्यंग्य के समकाल में' भले ही भूमिका हो या लेख, प्रेम जनमेजय जी का व्यंग्य ही है। व्यंग्यकार के व्यंग्य संग्रह पर कोई व्यंग्यकार कुछ लिखे, स्वाभाविक है, वह व्यंग्य ही होगा। दोनों पहुँचे हुए व्यंग्यकारों के इस सुखद संयोग को निश्चित ही पाठक समझेंगे और इसी बहाने व्यंग्य की दशा-दिशा की पड़ताल हो जायेगी। आज सभी अपनी-अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं, पाठक भी, आलोचक भी। मित्रता निभाने की चर्चा होती है। यह सब बीमारियाँ है। समाधान खोजना है। जनमेजय जी का संकेत शायद यही है। बड़ी साफगोई से उन्होंने संग्रह के हर व्यंग्य को पढ़ा है, चिन्तन किया और अच्छी चीर-फाड़ की है। दोनों वरिष्ठ हैं, ऐसे में मुझे बहुत कुछ नहीं कहना है। बस, हर-एक व्यंग्य को पढ़ना और उनका श्रीफल, जितना समझ सकूँगा, पाठकों के सामने परोस देना है। कुल 47 शीर्षकों में अरविंद तिवारी जी ने अपने संग्रह "लोकतंत्र से टपकता हुआ लोक!" को विस्तार दिया है और प्रेम जनमेजय जी ने अपनी भूमिका को 'दो शब्दों' में समेट दिया है। शुभकामनाओं सहित दोनों को सादर नमन।

'गुमशुदा पाठक की तलाश' लेखकों, प्रकाशकों के सामने ज्वलन्त समस्या है, पाठक, आलोचक सभी जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं, साहित्य जगत का जो चित्र उभरता है, व्यंग्यकार ने वह नब्ज पकड़ लेखकों की पीड़ा व वस्तुस्थिति चित्रित की है। व्यंग्य लिखना सहज नहीं है, इसके लिए कोई भिन्न दृष्टि होती है, वह तेजी से हालात को समझता है और व्यंग्य निकाल लाता है। 'गणतंत्र दिवस और कबूतर' में प्रश्न हैं, चिन्ताएं हैं, नाना सरोकार हैं, स्वाभाविक है व्यंग्य में ही तो सच कहा जा सकता है। नेताओं के साथ कबूतरों की जुगलबंदी के ये सारे दृश्य व्यंग्यकार की समझ के परिचायक हैं और पाठकों को केवल गुदगुदाते ही नहीं, कुछ सोचने पर मजबूर करते हैं। 'सड़क की रानी से इश्क' अरविंद तिवारी ने परिवहन दफ्तर के ओल-झोल, सुविधा शुल्क, दलाल आदि के बारे में लिखा ही है, सड़क छाप इश्किया भाषा-शैली का नमूना भी पेश किया है। इश्क के सिद्धान्तों के बारे में व्यंग्यकार की पूरी पकड़ है, लिखते हैं-'इश्क करने वाले लाभ-हानि नहीं देखते' या 'इश्क त्याग और कुर्बानी माँगता है।' ट्रक का मालिक पूछता है-'तू पुलिस वालों को अपने इश्क में क्यों नहीं फाँसती?' सड़क की रानी का जवाब लेखक की गहन अनुभूति को दिखाता है-'इश्क किया नहीं जाता हो जाता है।'

'यह मौसम डूबने का है' साहित्य और बरसात को मिलाकर व्यंग्यकार ने अच्छी व्यंग्यात्मक स्थिति का चित्रण किया है। आज का पाठक सब समझता, जानता है, जिस जमीन पर खड़ा है, वही धँस जाती है और साहित्य में डूबना अलग तरह से होता है। उनके व्यंग्य लेखन में फिल्मी गानों की पंक्तियों का सदुपयोग तड़का लगाने जैसा है। 'पटाखों की दुकान' पर्व, उत्सव, सामाजिक सरोकार, राजनीति, नेता, कार्यकर्ता, पुलिस महकमा सहित सबको जोड़ते हुए व्यंग्य है। रचनाकार ने अद्भुत तरीके से पटाखों को केन्द्र में रखते हुए किसी को नहीं बख्शा है। 'हिन्दी के पिटबुल डाॅग' आज के हिन्दी साहित्य की स्थिति पर जबरदस्त व्यंग्य है, कुत्ता पालना मुहावरे की तरह लेना चाहिए। सेवाराम सेवक जी ने कुत्ता पाल लिया है, हर गोष्ठी में साथ ले जाते हैं। व्यंग्य की यह पंक्ति देखिए-हिन्दी में सेवाराम जैसे बीसियों मठाधीश हैं जो अपने कुत्ते के बल पर ही साहित्य में स्थापित हुए हैं। यह महंगा शौक है। कुछ मठाधीश अपने चेलों को ही कुत्ता समझकर पाल रहे हैं। वे मालिक के इशारे पर किसी पर भी आक्रमण कर देते हैं। व्यंग्यकार के पास कुत्तों की, मठाधीशों की और हिन्दी साहित्य में उनके उपयोग की खूब समझ है। 'सरपंच साहब की गुझिया' में व्यंग्यकार लक्षणा, अभिधा, व्यंजना सम्मत दृष्टि से शौचालयों की पड़ताल करवा रहे हैं। 'शौचालय टहलने गए हैं, 'सरपंच जी के हवाले से रामदीन इस प्रसंग को दर्ज कर लेता है। उनका माथा ठनकता है, वे गुझिया खिलाने के लिए रामदीन को घर ले जाते हैं। गुझिया का प्रभाव रामदीन पर पड़ता है, अब एक के बदले दो दिखाई देने लगा है। स्वाभाविक है, शौचालयों की संख्या दुगुनी हो गई है। उन्होंने लिखा-जो शौचालय टहलने गए थे, वापस आ गए हैं बल्कि दूसरे गाँव के कुछ शौचालयों को साथ ले आए हैं।

उनका एक व्यंग्य देखिए, 'ब्रह्माजी और बुलडोजर' में सनातन देवों को भी समेट लिया है और खूब चटकारा लेकर लिखा है। जीवन में सब कुछ व्यंग्य ही हो जायेगा तो हमारे-आपके अस्तित्व की गरिमा प्रभावित होगी और बहुत कुछ हास्यास्पद होकर रह जायेगा। बुलडोजर को व्यंग्यकार ने गहरे सन्दर्भ में लिया है और श्रेष्ठ व आवश्यक माना है। लिखते हैं-यह दंगे फसादों तक का समाधान बनता जा रहा है। अपवादस्वरूप यह कहीं-कहीं दंगे करवा भी रहा है। इस बुलडोजर ने भारत में बिल्कुल नई सियासत की इबारत रची है। 'नंगा होना आसान नहीं है' व्यंग्य में किसी अभिनेता की नंगी तस्वीर वायरल हुई है। इस बहाने उन्होंने देश, समाज, राजनीति, प्रशासन सबके भीतर के नंगे सच को साहस पूर्वक चित्रित किया है। 'कर्फ्यू को नागरिकता दो' ऐतिहासिक सन्दर्भ लिए रोचक और यथार्थ वर्णन हुआ है। कर्फ्यू को लेकर उनके मन में मार्मिक संवेदना है- कोरोना के समय पूरे देश में लगा रहा। पर उसे कहीं आत्मीयता नहीं मिली। कहीं उसे सम्मान नहीं मिला। व्यंग्य के साथ यह रचना सटीक जानकारियाँ देती है। 'व्यंग्य तो निराकार है' व्यंग्य विधा पर जरुरी चिन्तन करता हुआ सार्थक लेख है। सहज तरीके से उन्होंने सभी मुद्दों पर विचार किया है जहाँ व्यंग्य है, हो सकता है या होना चाहिए। हिन्दी साहित्य में इस विधा की स्थिति, दशा-दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है, ऐसे में निराकार प्रमाणित करके लेखक ने व्यंग्य को व्यंग्यकारों के लिए असीम संभावनाओं का द्वार खोल दिया है। 'भैया जी को टिकट चाहिए' चुनाव और टिकट को लेकर आशा-उम्मीद पर सहज व्यंग्य है। हमारी राजनीति में भैया जी जैसे लोग भरे पड़े हैं और जुगाड़ में लगे रहते हैं। व्यंग्य की कुछ पंक्तियाँ देखिए-उनकी जाति वाला इलाका होना चाहिए, भारतीय लोकतंत्र में टिकट महत्वपूर्ण है, पार्टी नहीं, टोपी महत्वपूर्ण है, रंग नहीं। नेता में गुणों पर व्यंग्य देखिए-वह पूंजीवाद में समाजवाद का अद्भुत मिश्रण है, वह सियासी सिख है, मुसलमान है और ईसाई भी, हर धर्म का सम्मान करते हैं, जरुरत पड़ने पर किसी भी धर्म का अपमान कर सकते हैं। इस तरह उनके व्यंग्य मे सम्पूर्ण दृश्य उभरते हैं, भाषा और शैली प्रभावशाली है और मारक क्षमता से भरी है।

अरविंद तिवारी जी भाषा के प्रयोग को लेकर सर्वग्राही भाव में रहते हुए, हिंदी, उर्दू, भोजपुरी, अंग्रेजी आदि भाषाओं के शब्द धड़ल्ले से उपयोग कर लेते हैं, निश्चित ही इससे व्यंग्य धारदार होता है। 'इतनी जल्दी क्यों आया रे मानसून!' या 'सर! इसे पढ़ने की इच्छा है' में लेटलतीफी व मौसम के मिजाज को राजनीति से जोड़कर व्यंग्यात्मक प्रश्न खड़ा किया है और मानसून के पहले आ जाने से समस्याओं का सही उल्लेख हुआ है। रजिस्टर्ड साहित्यकार वही है जिसने अपनी पुस्तक को सोशल मीडिया पर साझा किया है। सोशल मीडिया पर पुस्तक प्रेम ईश्वर की तरह रुहानी होता है। इस तरह पुस्तक प्रकाशन, चर्चा और पुरस्कार को लेकर उन्होंने अच्छा व्यंग्य लिखा है। 

सफल व्यंग्यकार हमेशा समाज में, शहर में, देश में बह रही बयार पर दृष्टि जमाए रखता है, कुछ दिखे या दिखने कि संभावना हो, आगे बढ़कर लपक लेता है और उनकी लेखनी दौड़ने लगती है। 'हरी झंडी दिखाने की तमन्ना' ऐसा ही करारा व्यंग्य है, आजकल खूब प्रचलन में है, हर क्षेत्र में इसकी संभावना है और संभावना ना भी हो तो कैसे बनाई जा सकती है, यहाँ व्यंग्यकार से सीखा जा सकता है। 'अब रायल्टी की कमी नहीं है' लेखक-प्रकाशक के अन्तर्सम्बन्धों, अस्तित्व और उपयोगिता पर खूब व्यंग्य किया गया है। प्रकाशक का अपना खेल है, वह लेखक पर सदैव भारी पड़ता है और हद तो तब हो जाती है जब वह लेखक को लिखने के विषयों का सुझाव देता है, भ्रमित करता है। लेखक भी सारी तिकड़में सीख रहे हैं, रायल्टी की कोई कमी नहीं है और वे कभी मजदूर थे, अब कइयों को रोजगार दे रहे हैं और देश की आर्थिक समृद्धि में सहयोग कर रहे हैं। लेखन की इन्हीं सहज स्थितियों से जुड़ा व्यंग्य है 'साहित्य का ड्रोन युग'। इसमें उन्होंने ड्रोनबाज लेखक की कलाबाजियों का उल्लेख किया है, व्यंग्य में तोपची, तर्कातीत, तोताचश्म जैसे शब्दों का आनुप्रासिकता भाव दिखाया है, पाठक लाजवाब हो रहे हैं और उनका यह आधुनिक प्रयोग अनेक तरीके से भारी पड़ रहा है।

'खादी का कारोबार' में खादी को लेकर व्यापक छानबीन हुई है और उसके कारोबार में वृद्धि के तार्किक कारण गिना, व्यंग्यकार ने खूब धमाल किया है-खादी सबको पनाह देती है, खादी एक मुहावरा है, खादी के नए वस्त्र सियासत के हलके में खप रहे हैं, सरकारी ठेकेदार भी खादी के कपड़े पहनकर टेंडर भरता है और गांधीजी के बिना खादी प्रसंग अधूरा रह जायेगा क्योंकि उन्हें सत्य और खादी दोनों प्रिय थे। वैसे ही 'चुनावी दुश्वारियाँ और हम' में चुनाव को लेकर हुई पड़ताल केवल हँसाती ही नहीं, विचलित भी करती है। अरविंद जी के पास व्यंग्य की धार है, जिधर दृष्टि जाती है व्यंग्य ही व्यंग्य दिखाई देने लगता है। 'यात्रा बनाम शोभायात्रा' में यात्रा प्रसंग को ऐतिहासिक बनाना है। इतिहास को ठहर कर उन्हें दर्ज करना होता है, व्यक्ति महत्वपूर्ण हो तो शवयात्रा भी ऐतिहासिक हो जाती है। धार्मिक यात्राओं के बाद सियासी यात्राएं महत्वपूर्ण होती हैं। अक्सर यात्राओं को शोभायात्रा बना दिया जाता है। बहुत सी यात्राओं को पुलिस रोक देती है। हमारा देश यात्राओं का देश है। इसी कड़ी में अगला व्यंग्य "नेताजी की तीर्थयात्रा" में उभरे व्यंग्य का आनंद लीजिए- जनता नाम की जो पत्नी है, वह या तो नेताजी को बाप बनने का गौरव दे सकती है या फिर उसे नपुंसक साबित कर सकती है। नेताजी की तीर्थयात्रा की एक-एक पंक्ति झकझोरने वाली है। व्यंग्यकार की दृष्टि से कुछ भी छूटता नहीं है। 'सेल्फ फाइनेंस स्कूल की सेल्फी' में ऐसे स्कूल से सभी प्रभावित होते हैं, श्रद्धा का भाव उमड़ता है और रुतबा बढ़ा होता है। यथार्थ संदेश देती व्यंग्य कथा है यह और जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित करती है। इस तरह कोई ऐसा क्षेत्र नहीं जहाँ झोल-झाल या व्यंग्य न हो और व्यंग्यकार न पकड़ पाता हो।

साहित्य में बिंब-विधान के साथ अनुभवों का व्यापक प्रभाव होता है, उनके पास दोनों है और प्रयोग की अद्भुत क्षमता भी। सबसे बड़ी बात है, वे ढू़ँढ लाते हैं, विषय-वस्तु से जुड़ी सारी संभावनाएं और रोचक तरीके से प्रस्तुत करते हैं। उनके व्यंग्य की मारक क्षमता ऐसी है, बस कसमसा कर रह जाते हैं लोग और शेष दुनिया आनंद लेती है। 'रूपए को धकियाता डाॅलर' की स्थिति वही है जैसे जबरा मारे और रोने भी न दे। गांधीजी के दोनों गाल लाल हो जाते हैं। पिटता रुपया है पर सिकुड़ता विदेशी मुद्रा भंडार है। अंत में उनका व्यंग्य देखिए-आँखें बंद करके जीरो की कल्पना करना ही मेडिटेशन है। रुपया इसी मेडिटेशन के चक्कर में जीरो की ओर लुढ़क रहा है। व्यंग्यकार का लेखन-प्रकाशन जगत का कटु अनुभव बार-बार उभर आता है। 'छपने के लिए सेटिंग", "हैसियत नहीं तो लेखक नहीं", "एक व्यंग्यकार की लांचिंग" और "उपन्यास मोटा बनाने के नुस्खे" जैसे व्यंग्य-सृजन में उनके अनुभव खूब मुखरित हुए हैं। उनकी भाषा, शैली, संवाद, चोट दिखाता प्रसंग सब कुछ रोचक है और चमत्कृत करता है।

साहित्य में यथार्थ होता है परन्तु अरविंद तिवारी जी का व्यंग्य 'उनके कुत्ते से प्रेम' अति यथार्थ की रचना है। उन्होंने समाज में, साहित्य में कुत्तों को लेकर और उन्हें चेला-चेली से जोड़कर जबरदस्त लिखा है। 'इन्द्रजी के खिलाफ शिकायत' अलग तरह का व्यंग्य है। समाधान शिविर स्वयं में हास्य का हिस्सा बन जाता है जब कोई गंभीरता नहीं दिखती। उद्देश्य यही रहता है, समस्याएं भले दूर न हों, लगना चाहिए कि समस्याएं दूर हो सकती हैं। इन्द्र के खिलाफ शिकायत अंत में फर्जी निकलती है। शब्द या वाक्य एक हो और उसके भाव या निहितार्थ भिन्न-भिन्न हों या कोई कहता कुछ है और ध्वनि कुछ और निकलती है तो व्यंग्य उभरता ही है। 'आ गई-- आ गई' में विस्तार से सारे सन्दर्भ और दृश्य दिखाई दे रहे हैं। बड़ी बात होती है, सामान्य दृश्य के पीछे के व्यंग्यात्मक रहस्य को समझना और समझाना। उन्होंने नाना संदर्भों में आ गई-- आ गई को दर्शाने की कोशिश की है।

'सही समय पर खोद लिया' पुरस्कार एवं सम्मान को लेकर व्यंग्य है। आजकल इसकी धूम मची हुई है और लाखों के पुरस्कार बाँटे जा रहे हैं। जैसे व्यापारी नमक खोद लाता है वैसे ही कुछ लोग पुरस्कार व सम्मान खोद लाते हैं। व्यंग्यकार ने अनेक संभावनाओं की चर्चा करते हुए लिखा है, अभी जिनको पुरस्कार मिल गया है, वे सचमुच सही समय पर खोद लाए हैं। अक्सर बाढ़ के दिनों में बड़े-बड़े नेता, अधिकारी हवाई सर्वेक्षण करते हैं। 'बाढ़ का हवा हवाई सर्वे' सटीक व्यंग्य है और ऐसा होता ही है। सारे दृश्य, प्रसंग चकित करने वाले हैं। 'अफसोस नहीं, शुक्रिया बोलो' साल बदलने पर साहित्यिकों को लेकर खूब चुटिला व्यंग्य उभरा है। लोग नाना तरीके से अफसोस करते हैं, व्यंग्यकार शुक्रिया जताने की सलाह देते हैं। यह रोचक सलाह है, कोई नहीं पढ़ता तो खुद पढ़ लें और पाठकों द्वारा पढ़ा हुआ मान लें। लेखक, पाठक, समीक्षक, आलोचक पर उन्होंने नायाब तरीके से व्यंग्य किया है।

'पहाड़ पर चढ़ने की कबायद' में उन्होंने बड़ी बात सहजता से कही है-अवाम और सरकार में फर्क महज दशा और दिशा को लेकर होता है। सरकार दिशा का निर्धारण करती है और उसी दिशा में चढ़ने लगती है। आवाम अपनी दशा का रोना रोती रहती है। सरकार और विपक्ष को लेकर उनके व्यंग्य की एक विशेषता यह भी है, मामला कुछ भी हो, लेखन पर आए बिना उसका अंत होने वाला नहीं है। यह पंक्ति देखिए-'महंगाई उससे जबरन जिस्मानी इश्क चाहती है, पर भूखे पेट आम भारतीय कुछ करने की स्थिति में नहीं है।' यह भी देखिए-'भूखे पेट गाड़ी में चलना लोकतंत्र का नया कंसेप्ट है, अभी हिट नहीं है, पर हिट हो जायेगा।' 'आपदा में टिप्पणी लेखन के अवसर' वर्तमान राजनीति, उद्योग, व्यवसाय और आवाम के बीच रिश्तों को लेकर व्यंग्य है।

उनके व्यंग्य के दृश्य व्यंग्य की तरह ही दिखाई देते हैं- 'सिलिकाॅन सिटी, कीचड़ सिटी हो गई। वहाँ बड़े-बड़े कारोबारी ट्रैक्टर पर बैठकर ऑफिस जाते देखे गए।' बाढ़ को लेकर अस्पताल पर व्यंग्य की पंक्ति देखिए-'अस्पताल की तमाम जांचो को समेटकर, यह बाढ़ का पानी नदी की ओर लौट जाता है।' बाढ़ का थाना को लेकर व्यंग्य हिला देने वाला है। फाइलों, गायब हुए हथियारों आदि का बाढ़ में बह जाना स्वाभाविक है, तलाश जारी है। 'लोकतंत्र और गणतंत्र की पिटाई' में पिटाई का चित्रण रोचक है, देखिए-हमारे देश का बाल मनोविज्ञान पिटाई से ओत-प्रोत है। पिटने और पीटने की संभावनाओं पर व्यंग्यकार की अनुभव-जन्य सूक्ष्म दृष्टि से कुछ भी छिपा नहीं है। वे लिखते हैं-सियासत के सौजन्य से भारतीय लोकतंत्र और गणतंत्र पिछले बहत्तर सालों से पिटता चला आ रहा है। उनकी विशेषता है, बहुत सारे प्रसंगों को अपने हर व्यंग्य सृजन में समेटकर दिखा देते हैं, उनकी दृष्टि में सब कुछ है। व्यंग्य को लेकर उनकी यह दृष्टि प्रमाणित कर देती है कि हमारे जीवन में सर्वत्र व्यंग्य है और कुछ भी नहीं।

'सियासत भी फर्जी विधवा है' व्यंग्य रचना का चिन्तन स्पष्ट है। सारा खेल परिभाषाओं का है। आज की सियासत खुद को विधवा मानकर तमाम सहूलियतों का आनंद ले रही है। उनका प्रमाणपत्र फर्जी है बल्कि उनके पास है ही नहीं ऐसा कोई प्रमाण पत्र। परिभाषा के अनुसार उनका पति वोटर है। व्यंग्यकार ने परिभाषाओं के इस खेल को खूब उजागर किया है और सटीक व्यंग्य रचा है। 'फागुन में आदमी नहीं उड़ पाता' काव्य शैली में लिखा व्यंग्य भारत के वोटरों का स्टेमिना दिखा रहा है। चिड़ा चिड़ी में दोस्ती हो गई है और फूलों ने काँटों के साथ गठबंधन कर लिया है। यह सब मौसम का असर है, फागुन का प्रभाव है। वैसे ही चुनाव नामुमकिन को भी मुमकिन बना देता है। व्यंग्यकार की पंक्तियाँ देखिए-"व्यंग्य लिखने का मूड नहीं बन रहा। हँसना आसान होता तो लोग रोने से बच जाते। धकधकाते दिल में भय कौंध रहा है।" सियासत, फागुन, आम आदमी, नेता और उड़ने की कोशिश सब कुछ है, पर आदमी फागुन में भी उड़ नहीं सकता। "लोकतंत्र से टपकता हुआ लोक!' शीर्षक है इस व्यंग्य का और इस व्यंग्य संग्रह का भी। व्यंग्य देखिए-"लोक साहित्य का हिस्सा है और संवेदना से भरा है। सियासत इस लोक में से वह हिस्सा निकालकर तंत्र में जोड़ लेती है जिसमें संवेदना नहीं है।" चुनाव के समय सबसे पहले "लोकतंत्र" ही खतरे में पड़ता है। इसे बचाने के लिए नेता दल बदलते हैं। नेताजी के जीतते ही लोकतंत्र का खतरा टल जाता है। 'लोक' में व्याप्त आँसुओं को देखकर 'तंत्र' हँसता रहता है। दल में टिकट माँगने वाला लोक होता है और आलाकमान उसका तंत्र। तंत्र की मजबूती के लिए खूब पैसा चाहिए। तंत्र मजबूत, तभी चुनाव मजबूत और विजय भी। दबंग नेता की जेब में लोक पड़ा होता है। कुल मिलाकर उन्होंने अद्भुत और सटीक व्यंग्य का दृश्य रचा है।

उनके व्यंग्य में चौहद्दी होती है, चारों ओर से घेरने की कोशिश करते हैं और पटक-पटक मारते हैं। सूरदास की पंक्ति-'खेलत में को काको गुइयाँ' से शुरु करके देश की राजनीति के खेल को समझा देते हैं-खेलने में कोई किसी का दोस्त नहीं होता या गलत खेलने की स्थिति में खेल-भावना की दुहाई देते हैं। राजनीति के खेल में नैरेटिव को समझना होता है। ये सारे व्यंग्य-भाव उभरते हैं उनके लेखन में चाहे विषय कोई भी हो और यह उनकी अद्भुत क्षमता है। "प्रेरणा की डाउनलोडिंग" बड़े रचनाकार या किसी गाडफादर के पीछे आँख मूँदकर भागते चेलों को लेकर जबरदस्त व्यंग्य है। नये लोगों द्वारा स्थापित लोगों से प्रेरणा लेना चमत्कृत करता है। लेखकों, शिक्षकों, गाडफादरों की सर्व-सुलभ प्रेरणा का विस्तार इस व्यंग्य की धार है और उसका डाउनलोडिंग चल रहा है। विषय कोई भी हो तिवारी जी मानो उसके नस-नस से परिचित हैं और उसमें से हास्य-व्यंग्य निकाल लाते हैं। लेखन की दुनिया पर उनके कटाक्ष सही हैं और जरुरी भी। हैसियत नहीं तो लेखक नहीं या एक व्यंग्यकार की लांचिंग बेजोड़ उदाहरण हैं। वैसे ही देश की सियासत उनका प्रिय चरागाह है, व्यंग्य कहीं से शुरु हो, सियासत और राजनीति से जोड़ देते हैं।

'बुरी नजर वालों सावधान' नेताओं की अकूत सम्पत्ति पर दृष्टि रखने वालों को सावधान करता व्यंग्य चित्र है। राजनीति सर्वाधिक लाभ वाला धंधा है क्योंकि बाकी हर धंधे के नीचे नेताजी का कंधा है। यदि कोई उनकी सम्पत्ति की ओर निहार रहा है तो वह आत्महत्या के मार्ग पर जा रहा है। चुनाव जीत जाने के बाद नेताजी का खर्च नाम मात्र का रह जाता है, उनका सारा खर्च जनता उठाती है। व्यंग्यकार ने उनके आय के स्रोतों की पूरी जानकारी दी है और सियासत के खेल में जनहित याचिका डालने वालों के कूच कर जाने या अवसाद में पड़े रहने के उदाहरण देखे जा सकते हैं। वैसे ही 'एट होम में शर्मसार शर्म' जिलाधिकारी या बड़े पदाधिकारियों के घर होने वाले 'एट होम' के आयोजन को लेकर जबरदस्त व्यंग्य है। इन व्यंग्य रचनाओं को पढ़ते हुए लगता है, हमारा जन-मानस पतित हो चुका है, किसी में नैतिकता नहीं है, सभी लूटना चाहते हैं, जिसको जैसा अवसर मिलता है, वह लूटने में लग जाता है। ये सारे व्यंग्य के चित्र झकझोरने वाले हैं। तिवारी जी हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी शब्दों और स्थानीय मुहावरों के साथ सटीक व्यंग्य रचते है। उनके पास अनुभव है, उपयुक्त भाषा-शैली है और उनके व्यंग्य की दूर तक मारक क्षमता है।

सियासत, नेता, दबंग नेता, चुनाव में जीत, मीडिया, राइफल, तलवार आदि को लेकर व्यंग्यकार प्रमाणित कर देता है कि चिलमन बनाम दीवार में बहुत कुछ समझने की जरुरत है। पंक्ति देखिए-कद्दावर नेता के घर से निकला गधा भी हाथी लगने लगता है। हाथी और गधे पर लिखे निबंध सहजता से तब्दील किए जा सकते हैं। चिलमन को दीवार समझने वाले लोगों की स्थिति रोचक हो उठती है, बांस की बाँसुरी और लाठी का गणित समझा जा सकता है। दबंग के घर में चिलमन के पार बंदूकें, भद्दी गालियाँ और लहू की नालियाँ दिखाई देती हैं। इस तरह हर एक व्यक्ति चिलमन को अभेद्य दीवार समझने लगता है। बल्कि चिलमन के पार देखना और उस पर लिखना जोखिम भरा होता है। 'हमारा डिप्रेशन जिंदाबाद' को लेकर व्यंग्य देखने-समझने लायक है। अफसरों के यहाँ छापे पड़े है, उन्हें नेता से कम समझने की भूल न करें। डिप्रेशन को लेकर मनोचिकित्सक पर सटीक चिन्तन हुआ है। यह पंक्ति देखिए-"आप इजीनियरों और ठेकेदारों के यहाँ कितने ही छापे मारें, वे डिप्रेस नहीं होते। वे गीता के उपदेशों पर चलने वाले लोग हैं। तू क्या लाया था और क्या लेकर जायेगा।" यह भी देखिए-"ईमानदार सियासत हमेशा डिप्रेशन से भरी होती है।" "अहा! चीतामय देश हमारा" व्यंग्य विधा का नवीनतम दृश्य है-इन दिनों देश चीता-चीता हुआ पड़ा है। बुलेट ट्रेन आने में देर है, इसलिए चीते का आनंद लीजिए। चीते के भारत में आने को लेकर अरविंद तिवारी जी ने जिन-जिन बिन्दुओं पर कटाक्ष किया है, उनकी दूर-दृष्टि, गहन दृष्टि का उदाहरण है। चीता लाए जाने को उत्सव की तरह मनाया गया है, और चीता बहुत दिनों तक जनमानस में छाया रहा।

इस तरह देखा जाए तो व्यंग्यकार की दृष्टि में सब कुछ व्यंग्य मय है, नेता, सियासत, राजनीति, पुलिस-प्रशासन, चमचे, दलाल, पंडित-पुजारी, धरती-आसमान जो भी आँखों के सामने है, सभी उनके व्यंग्य की सीमा में है। सरकार, सत्ता-पक्ष पर उनकी गहरी दृष्टि है, सत्ता के ताम-झाम, खेल, बुलडोजर, सत्ता का अर्थ-व्यवस्था चिन्तन कुछ भी छूटता नहीं है। उनकी भाषा में हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, अवधी और भोजपुरी के शब्द भरे पड़े हैं। व्यंग्य की धार में खास तरह का प्रवाह कोई उनकी अपनी शैली लगती है। फिल्मी गाने, मुहावरे व्यंग्य को रोचक बनाते हैं। एक ही विषय बार-बार उभरता है, इसे साहित्य में पुनरुक्ति की समस्या मानी जा सकती है। यह आज के समाज की अति-सच्चाई है, इसलिए बार-बार चित्रित होना जरुरी भी है। थोड़ा हँसने के भाव में लगता है, वर्तमान में व्यंग्यकारों ने सम्पूर्ण सामाजिक जीवन को व्यंग्यमय कर दिया है, जीवन की गम्भीरता मानो खत्म हो गई है। कुछ तो रहने दो भाइयों, संस्कृतनिष्ठ, सभ्यता-संस्कृति प्रधान, गम्भीर और हमारे-आपके जीवन के लिए जरुरी। सर्वत्र दोष ही नहीं है, सब कुछ हास्य और व्यंग्य ही नहीं है, कोई सीमा रेखा तय करनी ही चाहिए, हास्य-व्यंग्य की।

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