भारत के इतिहास के तथ्यात्मक एवं तर्कपूर्ण शोध का दस्तावेज

समीक्षकः प्रदीप उपाध्याय

प्राग्महाभारतकालीन राजनैतिक इतिहास 
(आदिकाल से महाभारत युद्ध तक का राजनैतिक इतिहास)
लेखक: डॉ एस. पी. गुप्ता 
प्रकाशक:  नित्या प्रकाशन, भोपाल
मूल्य: ₹ 600.00

विगत दिनों सद्यप्रकाशित शोधपरक महत्वपूर्ण एवं रूचिकर ग्रंथ  'प्राग्महाभारतकालीन राजनैतिक इतिहास' हस्तगत हुआ। यह ग्रंथ पूर्वकालीन वृहत् भारत के राजनीतिक इतिहास के  गहन और व्यापक शोध अध्ययन  के आधार पर लिखा गया है। वेद, पुराण, प्राचीन धर्मग्रंथों, आख्यान , व्याख्यान के अलावा विदेशी संदर्भों के गहन अध्ययन के पश्चात् तर्कपूर्ण और व्यवहारिक दृष्टिकोण से मूल उद्धरण के साथ लेखक ने अपनी बात रखी है। संभव है अन्य इतिहासकार इन व्याख्याओं से पूर्ण सहमति व्यक्त न करें तथापि डॉ गुप्ता ने अपने तर्क एवं तथ्यों से एक दृष्टि अवश्य दी है जो प्राचीन भारतीय इतिहास के शोध को एक नई दिशा की ओर अग्रसर करने में सहायक होगी। डॉ गुप्ता ने अपने ग्रंथ के प्राक्कथन में लिखा भी है कि - “भारतीय इतिहास के पाठ्यक्रम में महात्मा बुद्ध तथा महाराज बिम्बिसार से पूर्व अवधि के सांस्कृतिक इतिहास का अध्ययन-अध्यापन तो होता है लेकिन राजनीतिक इतिहास का कोई उल्लेख नहीं रहता है। किसी भी देश का सांस्कृतिक इतिहास उसके राजनीतिक इतिहास के बिना अधूरा है। इसी अधूरेपन की पूर्ति हेतु यह ग्रन्थ एक लघु प्रयास है।”

इतिहास लेखन आसान कार्य  नहीं है। जब इतिहास लिखा जाता है तब इतिहासकार को उस युग,उस काल,उस परिस्थिति का पात्र बनकर घटनाओं से तादात्म्य स्थापित करना होता है। इस स्थिति में वर्तमान से पूरी तरह से निस्पृह भाव रखकर स्वयं को रखना होता है तभी यथार्थ एवं तथ्यपूर्ण इतिहास लेखन संभव होता है और आप इसमें पूर्णरूपेण सफल रहे हैं। यह आपके इस शोध ग्रंथ से परिलक्षित होता है। वैसे भी इतिहास लेखन एक मानसिक क्रिया है जिसमें इतिहासकार अतीत की घटनाओं के अध्ययन के बाद अपने मन में एक छवि निर्मित करता है ।  अतीत के प्रतिबिम्ब की छवि को इतिहासकार  अपने मस्तिष्क में पुनर्निर्मित करता है जिसमें यदि उसके कोई पूर्वाग्रह,उसकी कोई विचारधारा सम्मिलित  होती है तो वह इतिहास को विकृत कर सकती है। उसे तटस्थ भाव से ही अतीत की घटनाओं पर अपनी दृष्टि और दृष्टिकोण रखना होता है। लेखक ने  महत्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथ में इस बात का विशेष ध्यान रखा है। निश्चित ही घटनायें तो अतीत की होती हैं किन्तु  इतिहासकार स्वयं और उसका परिवेश वर्तमान युग का होकर भी तात्कालिक युग का ही हो जाता है।

प्रदीप उपाध्याय
चूंकि इतिहास मानव जीवन की समस्त क्रियाओं पर प्रकाश डालने वाला एक कथ्य या कहानी है जिसमें मानव जीवन की समस्त क्रियाओं तथा उत्थान पतन की झाँकी दृष्यमान होती हैं। इसमें समस्त कृत्यों को क्रमवार, निष्पक्ष रुप से प्रस्तुत करने की क्षमता रहती है। इस परिप्रेक्ष्य में भारत के इतिहास के संदर्भ में बात करें तो तुलनात्मक रूप से प्राचीन यूनान , रोम तथा यहूदी एवं ईसाई धर्मों ने युरोप से शक्तिशाली इतिहास बोध विरासत में पाया हैं जबकि प्राचीन भारत में इतिहास बोध को देखा जाए तो इस सम्बन्ध में भारतीय और विदेशी इतिहासकार  एकमत नहीं है। संभवतः इसका कारण यह भी रहा हो कि विदेशी आक्रांताओं ने प्राचीन साहित्य को नष्ट भ्रष्ट करने में कोई कमी नहीं रखी। यह भी एक कारण है कि विद्वानों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि प्राचीन भारत में भारतीयों को इतिहास लेखन की समझ नहीं थी। संभवतः इसके मूल में यह रहा हो कि महाभारत काल से पूर्व का इतिहास मॉयथोलॉजी माना जाकर सांस्कृतिक इतिहास के रूप में ही व्याख्यायित होता रहा है जिसमें अतिशयोक्तिपूर्ण एवं चमत्कारिक वर्णन, अप्राकृतिक एवं असंभाव्य घटनाएं तथा हजारों-लाखों वर्षों की आयु -राज्यकाल के वर्णनों की बहुतायत है। यहाँ लेखक ने वैज्ञानिक एवं वैदिक दृष्टि से सृष्टि रचना का विवरण विभिन्न मिथकों का विश्लेषण करते हुए महाभारत काल तक ऐतिहासिक काल गणना कर समग्र राजनीतिक इतिहास लिखने का प्रयास किया है। इसमें प्राचीन विश्व की विभिन्न जातियों,देव, दैत्य, दानव, नाग, गरूड़, गंधर्व, पितृ, यक्ष, राक्षस को सप्रमाण ऐतिहासिक संदर्भों के साथ उल्लेखित किया है।

देखा जाए तो महाभारत काल से पूर्व के राजनीतिक इतिहास पर बहुत कम सिलसिलेवार लिखा गया है।इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो इस ग्रंथ में सृष्टि रचना से लेकर महाभारत काल तक के इतिहास का तथ्यान्वेषण के साथ तर्कपूर्ण विश्लेषण किया गया है। पुस्तक के विभिन्न अध्यायों में प्राचीन भारत के महान सम्राटों का क्रमवार गौरवशाली इतिहास से परिचित कराने का प्रयास लेखक ने किया है।इन सम्राटों में विशेष रूप से ययाति, मान्धाता, भरत, हरिश्चंद्र, सहस्त्रार्जुन, सगर, भगीरथ, दिलीप, राम, कृष्ण का सप्रमाण ऐतिहासिक उल्लेख किया गया है।

डॉ गुप्ता ने इस दिशा में बहुत ही सार्थक एवं सराहनीय प्रयास किया है जिसके द्वारा प्राग्महाभारतकालीन राजनैतिक इतिहास की स्पष्ट कालावधि के निर्धारण की, क्रमवार, तथ्यपूर्ण, तर्कपूर्ण एवं व्यवहारिक दृष्टि दिग्दर्शित होती है। उन्होंने भारतीय इतिहास के मिथकों यथा महाराज पृथु के समय में गौ रूपी पृथ्वी का दोहन, दैत्येन्द्र राजा बलि के समय में हुए समुद्र मंथन और अन्य अनेक ऐसे मिथकों का तर्कसंगत और तथ्यपूर्ण विश्लेषण किया है। हालांकि इनपर और अधिक सिलसिलेवार अध्ययन के साथ शोध और अनुसंधान की आवश्यकता है।

मैं उन्हें हार्दिक बधाई देते हुए शुभकामनाएं ज्ञापित करता हूँ। ग्रंथ का आवरण पृष्ठ विषयानारूप होकर बहुत ही सुन्दर एवं आकर्षक है। निश्चित ही यह ग्रन्थ  इतिहास की समझ रखने वाले प्रत्येक पाठक, अध्येता एवं शोधार्थी द्वारा पसंद किया  जाएगा और भारतीय इतिहास को समझने की एक नई दृष्टि और दिशा  प्रदान करने में सहायक होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

मुझे यह भी उम्मीद है कि डॉ गुप्ता इस ऐतिहासिक  शोध कार्य पर निरन्तर रहकर और भी तथ्यपूर्ण  अनुसंधान जारी रखते हुए शीघ्र ही विस्तृत इतिहास ग्रंथ से हमें परिचित कराएंगे।

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