सुशील स्वतंत्र की कविताएँ

सुशील स्वतंत्र
1. घर-बाज़ार

जैसे-जैसे मुहल्ले में
भीड़ बढ़ती गई
बाज़ार को जगह देने के लिए
घर सिमटने लगे
पता ही नहीं चला
कब दबे-पाँव घरों में
घुस आया बाज़ार 

शहर के तंबू में
पनाह लिए हुए
गाँव सोचता है
कि कोई और गाँव आए
तो दुआ-सलाम हो।
***


2. सलीब


दिशाओं के अहंकार को

ललकारती भुजाएँ
और
चीखकर बेदर्दी की इन्तहाँ को

चुनौती देतीं
हथेलियों में धसीं कीलें

एक-एक बूँद टपकता लहू
जो सींचता है उसी जमीन पर
लगे फूल के पौधों को
जहाँ सलीब पर खड़ा है सच

जब भी लगता है कि
हार रहा है मेरा सच
सलीब को देखता हूँ

लगता है कोई खड़ा है मेरे लिए
झूठ के खिलाफ।
***


3. नास्तिक

यही बात उसे सबसे अच्छी लगती
कि आदमी की तरह
अलग-अलग नहीं होता है
खून का रंग
जिसे भी होती थी जरूरत
वह सहर्ष साल में चार बार
करता था रक्तदान

उसके पास सब कुछ था
बस ईश्वर नहीं था

जब ईश्वर नहीं था
तो कोई प्रार्थना भी नहीं थी
नरक का भय भी नहीं
न कोई अनसुनी फ़रियाद थी
न बिन माँगी कोई मुराद

जब ईश्वर नहीं था
तो कोई चमत्कार भी नहीं था

वो त्योहारों को ऐसे पहचानता था
होली मतलब गुजिया
ईद मतलब सेवई
गुरु पर्व मतलब लंगर
क्रिसमस मतलब केक
वगैरह-वगैरह
आत्मा में छिपे परमात्मा को भोग लगाते हुए
वह पूजा का मतलब समझता था
बस ‘पेट-पूजा’

बचपन में उसने सुन लिया था कहीं
‘नर ही नारायण है’
और अपने आस-पास सबको
ईश्वर मानने लगा था

फिर किसी दिन सुना
‘अप्प दीपो भवः’
उस दिन से अंतर्मन ही उसका गुरु हो गया

अब उसने ‘वन इन क्राइस्ट’ सुना
उसने देखा कि
कोई पराया था ही नहीं आस-पास

फिर दो शब्द कानों से टकराए
‘इक ओंकार’
उसने पाया कि
उससे खालिस कोई है ही नहीं

ऐसे ही एक दिन उसने सुना
‘अहम् ब्रह्मास्मि’
और वह सर्वव्यापी चेतना से भरकर
सबमें एकाकार हो गया

न माला, न कंठी, न आरती, न घंटी,
नमाज़, अरदास, प्रार्थना कुछ नहीं
फिर एक दिन उसने सुना
मीनारों, गुम्बदों, मेहराबों
और ऊँचे पताकों वाले भवनों से
लोग उसे एक ही नाम से पुकार रहे थे

‘नास्तिक’।
***


4. खिड़की

एक खिड़की
जिसके उस पार है
अजनबिय्यत से भरी
एक पूरी दुनिया
इस पार है दोराहे का वह मोड़
जहाँ से तुमने अपनी राह
बदलने का फैसला किया था

इस मोड़ पर वर्षों से
कोई आवाजाही नहीं है
तुम्हारे पैरों के निशान को
पथरीली आँखों से तकता
बस खड़ा रहता हूँ मैं
तुम्हारी पीठ को ओझल हुए
अब तो एक ज़माना बीत गया
इतने सालों में ये मानने लगा था
कि सदाओं की भी
अपनी उम्र होती होगी
उनकी भी कोई सरहद होती होगी
अपनी उम्र जी लेनें के बाद
दम तोड़ देतीं होंगीं बैरन सदाएँ

तभी एक दिन
ये खिड़की मिल गई
जिसको खोलते ही जान पाया
कि इस पथरीले दोराहे का रास्ता
जहाँ तक जाता है
उसके पार खुलती है यह खिड़की

इस मोड़ से मुड़ते ही
बहुत दूर निकल गए तुम
जब-जब खोलता हूँ यह खिड़की
दिखती है तुम्हारी नई दुनिया
किलकारियों-कहकहों से भरी हुई
अब ओढ़नी नहीं,
तुम आँचल ओढ़ती हो
थिरकन विदा हो चुकी है
तुम्हारे होंठों से
पेशानी की सिलेट पर
सिलवटों के हर्फ़ उग आए हैं
पढ़ी जा सकती है साफ़-साफ़
इस मोड़ से उस दुनिया तक की कहानी
मेरे आलिंगनों ने जिसे
साँचे में ढाला था
नई दुनिया की परतें
चढ़ गईं हैं उस देह पर
चुम्बनों से दमकने वाले होंठो को
अब सुर्ख़ करना पड़ता है तुम्हें
सब कुछ नया है
तुम्हारी दुनिया में
सिवाय इसके कि
बहुत करीने से
संभाल रखा है तुमने
चेहरे पर मासूमियत

मैं भी संभाल लूँगा
इस खिड़की को
मन के छालों की तरह
थोड़ा-थोड़ा खोल लेना है
थोड़ा-थोड़ा जी लेना है

उनको ढूँढ पाना इतना भी मुश्किल नहीं है
फुसफुसाकर जैसे कोई कानों में कहता है
तुमसे बिछड़कर अब वह
फेसबुक पर रहता है।
***


5. सैलाब

सपनों की दुनिया
सपनों सी मासूम थी
उसमें आँसूओं के लिए
जगह नहीं थी
बंजर ज़मीन भी नहीं थी वहाँ
परीकथाओं सी रंगीनियाँ
तैरती रहती थीं
हरे बागानों में
रंग बिखेरती फूलों
की क्यारियाँ थीं
बहुत जतन से
सजाया गया था
इस दुनिया का
एक-एक सामान
हवाओं में रहती थी
उम्मीद की ख़ुशबू
भरोसे की चटक धूप से
नहा रही थी पूरी दुनिया

मैंने बार-बार समझाया था
कि उनके होने से ही है
यहाँ की सारी रौनकें
किया था आगाह
कि उजड़ जाएगा
ये परीलोक
उनके जाने से

मैं सफल रहा
उन्हें यह बताने में
कि उनके रुख़्सत होते ही
आँसूओं के सैलाब में
बह जाएगी ये दुनिया

लेकिन मैं असफल रहा
किसी भी तरह
उन्हें रोक पाने में।
***


6. दायरे में युद्ध

तय चालों के बलबूते
चौसठ खानों के रणक्षेत्र में
दी जाती थी शै और मात
राजा करते थे दायरे में युद्ध
इसीलिए मटियामेट हो गया राजतंत्र
तय दायरों में होती थी
जीत या शिकस्त
सिपाही से मंत्री तक
सबकी हदें तय होती थीं
और यह सच छिपाया जाता था
कि जिसकी रक्षा के लिए
जान की बाज़ी लगाई जा रही है
प्यादों की रक्षापंक्ति के पीछे खड़ा
वह राजा स्वयं एक मोहरा है

वजीर, हाथी, बिशप, घोड़ा
अपनी-अपनी चालों के कैदी होते
एक कदम आगे की चाल वाला प्यादा
आत्मरक्षा के अधिकार से वंचित होता
काले-सफ़ेद राजाओं को
अपने पराक्रम से लड़ने का भ्रम होता
हर बार विजयी वही होता
जो बिसात बिछाता

अपनी चालों की परिधि को
एक बार भी लांघने का
मोहरों को ख़याल नहीं आया
शतरंज के इतिहास में इसीलिए
कभी इंकलाब नहीं आया।
 ***


7. हल्का लाठी चार्ज

पीठ पर दर्ज़
लाल-लाल लकीरें
मिटने से पहले
उस समय का
दस्तावेज लिख देतीं हैं
जब प्रतिरोध के लिए
सिकुड़ती जगहों में
मुट्ठी बंद किये ज़िंदा लोग
सड़क पर उतरते थे

वायरलेस पर प्रसारित
‘स्थिति नियंत्रण में है’ वाला सन्देश
दमन और शांति
की दो स्थितियों के बीच की
संकरी गली का पता होता है
सीलन और अँधेरे में जहाँ
साँस लेता है वह भ्रूण
जिसकी पीठ
नर्म चमड़ी की चादर नहीं होती
शिलापट्ट होती है
जिस पर उकेरा जाता है
उसके समय का इतिहास।
***


8. कुछ अंधेरा बचा रहने दो


रोशनदान से रिसता हुआ अंधेरा
जब दाखिल होता है कमरे में
सहेजो उसे

उजास से भरी सुबह की चाह
अपनी जगह जरूरी है मगर
चुम्बन के बाद होठों पर
बची हुई थिरकन की तरह,
भींचे हुए आलिंगन के बाद
एकलय हुई धड़कन की तरह,
प्रेम के चरम पर बंद हुई
आँखों की तरह,
पलकों के कंबल तले
कुछ अंधेरा बचा रहने दो

जब तक यह न समझ सको
कि तुम्हारी कलाई घड़ी में
समय नहीं, तुम बीत रहे हो
अंधेरे का मुखौटा ओढ़े
उन लम्हों को बचा रहने दो
जो कभी बीतते नहीं
साथ-साथ चलते हैं
मन की अलमारी में
गर्द बनकर जमते हैं
किताब में सूख चुकी
पंखुड़ियों की तरह
तुम उन्हें पड़ा रहने दो

एक उजली सुबह के लिए
कुछ अंधेरा बचा रहने दो।
***

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