कहानी: राख में छिपे आखर

प्रकाश मनु

प्रकाश मनु


जाते दिसंबर की कड़ी ठंड के बावजूद साहित्य-सभा के प्रांगण में उस दिन भारी भीड़ थी। बहुत से जाने-माने लेखक, कवि, चिंतक और पत्रकार वहाँ मौजूद थे। सभी को खुशी थी कि शहर के सबसे वरिष्ठ और स्वनामधन्य लेखक सरस्वती बाबू को आज सम्मानित किया जा रहा है। सभी का उत्साह उमड़ा पड़ रहा था।
साहित्य-सभा के हाल में मंच के आसपास खूब चहल-पहल थी। कैमरामैन अपने कैमरे लिए उपस्थित दर्शकों के फोटो खींच रहे थे। पत्रकारों के लिए अलग कतार थी, जहाँ वे कागज-कलम लिए बैठे थे। कुछ टीवी के लोग भी आए थे, जो बड़े-बड़े कैमरे लेकर सभा की रिकार्डिंग कर रहे थे।
ठीक समय पर कार्यक्रम शुरू हुआ। मंच संचालक ने साहित्य-सभा के प्रमुख आशुतोष महोपाध्याय तथा कार्यक्रम के अध्यक्ष पद्मधर जी को मंच पर बुलाया। साथ ही सरस्वती बाबू को भी बड़े सम्मान और आदर के साथ आमंत्रित किया। 
आशुतोष जी, पद्मधर जी और सरस्वती बाबू ने मिलकर दीप प्रज्वलित किया। फिर आशुतोष महोपाध्याय बोलने के लिए खड़े हुए। उन्होंने सरस्वती बाबू की प्रशंसा करते हुए, बड़ा भावपूर्ण भाषण दिया। सरस्वती बाबू को उन्होंने सच्चा सरस्वती-पुत्र बताया, जिन्होंने कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, सभी कुछ लिखकर साहित्य का भंडार भरा। साहित्य की तीन पीढ़ियाँ उनसे प्रभावित हुईं। 
इसके बाद पद्मधर जी बोले। अपने धाराप्रवाह व्याख्यान में उन्होंने सरस्वती बाबू के लेखन की बहुत सी विशेषताएँ गिनाईं। उनकी पचास बरस लंबी अनवरत साधना का जिक्र किया। उनकी सीधी-सरल, प्रवाहयुक्त भाषा-शैली की तारीफ की, जो उन्हें आम आदमी से जोड़ती है। फिर उन्होंने सरस्वती बाबू को शाल ओढ़ाकर श्रीफल और प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया। गले में गेंदे और गुलाब के फूलों की माला।
आँखों में गहरी श्रद्धा लिए लोग अपने प्रिय लेखक का यह सम्मान देख, गद्गद् थे। अब महोपाध्याय जी ने सरस्वती बाबू से अनुरोध किया कि वे मंच पर आकर अपनी लंबी साहित्य साधना और जीवन के अनुभवों के बारे में कुछ कहें।
सरस्वती बाबू माइक पर आकर खड़े हुए, तो उपस्थित दर्शकों ने तालियाँ बजाकर उनका स्वागत किया। कैमरे वालों के लैंस उधर घूम गए। पत्रकार उनका भाषण नोट करने के लिए सँभलकर बैठ गए। सभी को उत्सुकता थी कि इस खुशी और सम्मान के मौके पर सरस्वती बाबू क्या कहेंगे?
सरस्वती बाबू ने हाल में सब तरफ निगाहें घुमाईं। कुछ कहना चाहते थे। होंठ थोड़े खुले, फिर एकाएक वे चुप हो गए। उनके मुँह से एक शब्द तक नहीं निकला। 
जैसे शब्द होंठों तक आकर पीछे लौट गए हों। कुछ सकुचाकर।
क्यों भला?
सब हैरान! सरस्वती बाबू को आज हो क्या गया है? सरस्वती बाबू कुछ कह क्यों नहीं रहे?
सब जानते थे कि सरस्वती बाबू बहुत अच्छे वक्ता हैं। उनके उद्गार सीधे हृदय में उतर जाते थे, और लोग कई-कई दिनों तक सरस्वती बाबू की कही हुई बातों की चर्चा करते थे। पर आज लगता था, जैसे वे बोलना ही भूल गए हों।
पूरे हाल में अजीब सा सन्नाटा था। एकाएक लोगों को सरस्वती बाबू का डूबा-डूबा सा स्वर सुनाई दिया।
“उपस्थित सज्जनो! मैं आप सभी का शुक्रगुजार हूँ कि आप यहाँ आए और मुझे सम्मान के योग्य समझा। लेकिन क्षमा करें, आज मैं ज्यादा कुछ बोल नहीं पाऊँगा। मेरा गला रुँधा हुआ है। क्यों...? किसलिए? यह भी नहीं बता पाऊँगा।”
कहते-कहते फिर एक पल की चुप्पी। जैसे किसी तरह अपने भीतर के आवेग को सँभाल रहे हों। फिर बड़े संजीदा स्वर में उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाया—
“बस, इतना ही समझ लीजिए, मुझे पुराने दिन याद आ रहे हैं।...अपना बचपन याद आ रहा है। बचपन की अपनी गुरु याद आ रही हैं।...वे यहाँ नहीं हैं। वे अब इस धरती पर भी नहीं है। लेकिन मुझे बनाने वाली वही थीं। मैं तो कायर था, हार गया था और मैदान छोड़कर भाग निकला था, पर वे नहीं हारीं।...
“अगर वे इतनी कोशिश न करतीं, अपना पूरा बल न लगा देतीं, तो आज मैं यहाँ आपके सामने खड़ा न होता। लेखक होना तो दूर, मैं शायद अनपढ़, उजड्ड ही रहता। मेरी वे बचपन की गुरु थीं, मेरी माँ। वे अब गुजर चुकी हैं। हाँ, गंगा काका जरूर हैं, जो इस पूरी कहानी को जानते हैं। मुझे खुशी है कि वे मेरे सामने बैठे हैं। उनका चेहरा देखते ही, बस मुझे अपना बचपन याद आ गया। आज मैं उसी बचपन की एक छोटी-सी कहानी आपको सुनाऊँगा।...”
कहते-कहते सरस्वती बाबू ने थोड़ी देर के लिए आँखें बंद कर लीं। लगा, जैसे वे उड़कर सचमुच अपने बचपन के दिनों तक पहुँच गए हैं।
फिर वे जैसे थाह पा गए हों। बहुत भीगे हुए स्वर में वे बता रहे थे :
मित्रो, आज से कोई पचास बरस पहले की बात है। तब मैं अपने गाँव हिरनापुर में पहली कक्षा में पढ़ता था। पढ़ने में ज्यादा होशियार नहीं था और रोज मेरी पिटाई होती थी। हमारे स्कूल में कक्षा एक में पढ़ाने के लिए एक ही अध्यापक थे, मास्टर कमलाकांतजी। पढ़ाते तो ठीक थे, पर गुस्सा उनका तेज था। उनके गुस्से के मारे मैं थर-थर काँपता था और जो कुछ आता था, वह भी भूल जाता था। कभी गलत वर्णमाला लिखने के लिए मेरी पिटाई होती तो कभी गिनती-पहाड़े याद न करने के लिए। 
हालत यह थी कि वे मेरा नाम लेकर पुकारते, “सरू...!” तो मुझे लगता, जैसे मेरे अंदर की सारी ताकत निकल गई है। मैं जूड़ी के बुखार की तरह थर-थर काँपने लगता। हाथ में पकड़ी कलम मेरे हाथ से छूटकर नीचे जमीन पर गिर पड़ती और एक तेज भौंकार के साथ मैं रो पड़ता।
पर मास्टर जी को इस पर भी दया न आती। वे एक के बाद एक गाल पर तीन-चार थप्पड़ जड़ देते। मुझे लगता, मुझसे ज्यादा अभागा इस दुनिया में कोई और नहीं है। और जितने देवी-देवताओं के नाम याद थे, मैं सबको नाम लेकर पुकारता कि वे इस आफत से मेरा पिंड छुड़ाएँ।
“हे भगवान श्रीरामचंद्र जी!...हे मुरली वाले किशन कन्हैया!...हे हनुमान जी! हे पीपल वाले देवता!...हे तालाब वाले देवता! सब जल्दी से आकर मुझे बचाओ।” पुकारते-पुकारते मेरा कंठ सूख जाता।
घर में कोई और तो था नहीं, जो मेरी मदद करता। बस, एक माँ थीं जो अनपढ़ थीं और सारे दिन खेत में काम किया करती थीं। उन्हें भला मैं अपनी परेशानी कैसे बताता? अंदर ही अंदर मैं रोता-बिसूरता रहता था। और मुझे लगता था, मैं जीवन में कभी पढ़-लिख नहीं पाऊँगा। और एक दिन जब कक्षा में मेरी बुरी तरह पिटाई हुई, मैंने तय कर लिया कि अब कल से स्कूल जाना बंद, एकदम बंद!
घर आते ही मैंने तख्ती एक ओर फेंकी, बस्ता दूसरी ओर। और माँ को अपना फैसला सुना दिया, “माँ, मैं स्कूल नहीं जाऊँगा।”
सुनकर वे तो जैसे हक्की-बक्की रह गईं। उनका उस समय का चेहरा मुझ अब भी याद है। एकदम म्लान। स्याह। मेरी बात सुनते ही उनके चेहरे पर दुख की गहरी छाया दिखाई पड़ने लग गई। 
बहुत देर तक उऩके मुँह से कोई आवाज ही नहीं निकली। फिर वे जैसे अंदर का पूरा जोर लगाकर बोलीं, “बेटा, तो क्या तू अनपढ़, उजड्ड ही रह जाएगा?”
‘अनपढ़...उजड्ड...!’ सुनकर मुझे बुरा लगा। पर मैं क्या कहता? मेरे मुँह से बस इतना ही निकला, “अम्माँ, न मुझे वर्णमाला आती है, न गिनती, न पहाड़े। तो...तो फिर...!” कहते-कहते मैं बुरी तरह रो पड़ा।
माँ ने झट मुझे छाती से लगा लिया। खूब लाड़-प्यार करके बोलीं, “अरे सरू बेटे, तू रोता क्यों है? कुछ न कुछ हो जाएगा। तू पढ़ेगा, तू जरूर पढ़ेगा।”
उऩकी आवाज में एक निश्चय था। विश्वास।
“पर कैसे, अम्माँ...? घर में कोई मुझे पढ़ाने वाला नहीं है। और स्कूल में मास्टर जी की कोई बात मुझे समझ में नहीं आती।...तो मैं कैसे पढ़ूँ? कुछ भी मुझे याद नहीं होता।...” मैंने अपनी लाचारी बताई।
माँ कुछ देर मुझे अपलक देखती रहीं। अपने भीतर की सारी शक्ति जैसे वे मुझमें भर देना चाहती हों। फिर पूरे यकीन के साथ, एक-एक अक्षर पर जोर देकर उन्होंने कहा, “मैं हूँ न!...मैं तुझे पढ़ाऊँगी।”
मैं चकित रह गया। पूछा, “अम्माँ, तुम पढ़ाओगी?”
माँ के चेहरे पर दृढ़ता थी। बोलीं, “हाँ बेटा, मैं पढ़ाऊँगी। जरूर पढ़ाऊँगी। मेरा बेटा अनपढ़ नहीं रहेगा।”
माँ खुद अनपढ़ थीं, पर शायद थोड़ी-सी गिनती और वर्णमाला उन्होंने बचपन में सीख ली थी। बस, पहाड़े नहीं आते थे। उन्होंने कहा, “तू चिंता मत कर। गिनती और अक्षर-ज्ञान मैं करा दूँगी। पहाड़े गंगा काका से सीख लेना। पड़ोस में ही तो हैं।”
मुझे माँ की बात पर यकीन नहीं हो रहा था। सच कहूँ तो उनकी बात मुझे किसी किस्से-कहानी जैसी लगी। बात सुनने में अच्छी थी, पर जीवन तो किस्से-कहानी से अलग होता है न!
फिर भी माँ का दिल न दुखे, इसलिए मैंने हाँ कह दी।
छोटा था, पर इतना जानता था, माँ के चेहरे पर चमक देखकर मुझे खुशी होती है। बहुत खुशी।
माँ ने सच ही बहुत दुख झेले थे।
*

हम लोग गरीब थे। इतने गरीब कि चाक और खड़िया भी नहीं जुटा सकते थे। कच्चा आँगन था। माँ वहाँ एक कोने में चूल्हे में उपले जलाकर खाना बनातीं। खाना खाने के बाद चूल्हे की राख ठंडी होती, तो माँ वहीं एक फटा-पुराना बोरा बिछा लेतीं। उस पर बड़े इत्मिनान से पालथी मारकर बैठ जातीं और साथ में मुझे भी बैठा लेतीं।
एक छोटी सी लकड़ी से वे राख को अपने सामने फैला लेतीं। फिर उसी हलकी गरमाई लिए राख पर उँगलियाँ फिराकर पहले खुद क, ख, ग लिखतीं, फिर उँगली पकड़कर मुझसे लिखवातीं। 
इतना सहज था यह सब, कि जैसे मैं कुछ लिख नहीं रहा। ये सारे आखर तो जाने कब से राख में छिपे बैठे थे। शायद युगों-युगों से। और अब माँ की और मेरी उँगलियों के स्पर्श से वे खुद-ब-खुद उभरकर सामने आते जा रहे हैं। किसी जादू की तरह।
हाँ, जादू ही तो। शायद दुनिया का सबसे बड़ा जादू था यह, जिससे मेरे देखते ही देखते राख में अक्षरों का उजाला फैलने लगा। और फिर होते-होते मेरे मन और आत्मा में भी।  
मैं जैसे पल भर में ही कुछ बदल सा गया। भीतर-बाहर से। लगा, चीजें मेरे भीतर और बाहर भी जगमग-जगमग सी हो रही हैं। अँधेरा छँट रहा है। कालिख बिला सी गई है।
ऐसे ही मैंने थोड़ा-थोड़ा सीखा तो बस, सीखता ही गया। हिम्मत आई। लगा, अरे, इसमें तो कुछ भी मुश्किल नहीं है, कुछ भी। आदमी चाहे तो क्या नहीं कर सकता?
और फिर जो लड़के मेरी क्लास के सबसे होशियार बच्चे हैं, वे भी तो आखिर मेरे जैसे ही हैं न। तो फिर क्या कमी है मुझमें? वे पढ़ सकते हैं तो मैं क्यों नहीं पढ़ सकता!  
फिर तो मैं कोयले से जगह-जगह घर में क, ख, ग लिखने लगा। माँ नाराज होने के बजाय उलटे खुश होतीं कि उनका बेटा लिखना सीख रहा है। खूब प्यार से मेरी पीठ थपथपातीं। फिर कहतीं, “अब मेरे साथ बोल न बेटा, क से कबूतर ख खरगोश...!”
मुझमें जाने कैसी उमंग भर जाती। “क से कबूतर...ख खरगोश...प से पतंग, भ भट्टी...!” जो कुछ याद था, उसे छलक-छलककर गाता। और जो याद नहीं था, उसे बार-बार दोहराकर याद करने की कोशिश करता।
होते-होते वर्णमाला पूरी हो गई। जैसे माँ की सुबह-सुबह सुमरन वाली माला हो।
इसी तरह गिनती उन्होंने मुझे सिखाई। उन्हें पता था, मैं आमों का शौकीन हूँ। गंगा काका का आमों का बगीचा था। उनसे माँगकर छोटे-छोटे आम या अमियाँ ले आतीं। उनकी अलग-अलग ढेरियाँ बनाकर समझातीं, “देख बेटा, यह एक है, यह दो, यह तीन, यह चार...! अब यह जो आम की ढोरी मेरे पास रखी है, उसमें कुल कितने काम हैं? ठीक-ठीक गिनकर बता दे, तो ये सारे आम तुझे खाने को मिलेंगे।”
मैं झटपट बता देता। कहता, “पाँच आम...पाँच आम...! माँ, पाँच आम हुए। अब झटपट खिलाओ मुझे पाँच आम!”
और यों गिनती सीखने का सिलसिला शुरू हुआ। दस तक सीख गया, तो फिर आगे झटपट सीखता गया। 
मन में पहली बार मैंने ऐसा उत्साह महसूस किया। लग रहा था, अगर हम सीखना चाहें तो कुछ भी मुश्किल नहीं है।
फिर गंगा काका से पाँच तक पहाड़े भी सीख लिए। गंगा काका का अंदाज अनोखा था। वे ऐसे पहाड़े याद करा देते, जैसे पहाड़े न हों, कोई बढ़िया सा गाना हो। बीच-बीच में खूब हँसाते। पहाड़े सही-सही सुना देता तो खूब सारे आम खिलाते। साथ ही सिर पुचकारकर कहते, “तू तो बड़ी तरक्की करेगा, बचुवा। बड़ा आदमी बनेगा। हम सच्ची कह रहे हैं।”
फिर वे माँ के पास जाकर भी मेरी खूब बड़ाई करते। कहते, “बचुवा होनहार है। देखना, एक दिन बड़ा नाम कमाएगा। हम कहे देत हैं।”
सुनकर माँ के उदास, थके चेहरे पर मुसकान आ जाती। उनकी आँखों में भी वह नजर आती।
मैं सोचता था, जैसे माँ पढ़ाती हैं, जैसे गंगा काका पढ़ाते हैं, वैसे मास्टर जी क्यों नहीं पढ़ाते? ये लोग अनपढ़ हैं, मगर कैसे प्यार से पढ़ाते हैं। कितना आनंद आता है पढ़ने में।
आसपास चिड़ियों की चह-चह सुनाई देती तो मैं आनंद के अतिरेक में अपनी याद की हुई वर्णमाला, गिनती और पहाड़े बोल-बोलकर उन्हें भी याद कराने लगता।
मन में अलग ही जोश था, बरसाती नदी जैसा। उद्दाम।
*

कोई पंद्रह दिन के अंदर ही मैं वर्णमाला, गिनती, पहाड़े सब सीख गया। माँ ने एक बार सुना, दो बार सुना। दस बार सुना। फिर बोलीं, “अब भूलेगा तो नहीं, सरू? सच-सच बता।”
“नहीं भूलूँगा, अम्माँ। बिल्कुल नहीं भूलूँगा।” मैंने उन्हें यकीन दिलाया।
“तो चल मेरे साथ...!” कहकर माँ ने मेरी उँगली पकड़ी और मुझे अपने साथ स्कूल ले गईं। 
वे सीधे मास्टर कमलाकांत जी के पास जा पहुँचीं। बोलीं, “मास्टर जी, यह सरू स्कूल आने से डर रहा था। मैं अनपढ़ ही हूँ, फिर भी कोशिश करके इसे थोड़ा-थोड़ा पढ़ाया है। अब आप इससे वर्णमाला, गिनती, पहाड़े कुछ भी पूछ लीजिए। यहीं, मेरे सामने। मारिएगा नहीं। मारने से यह सब कुछ भूल जाता है।”
मास्टर जी थोड़ा असमंजस में नजर आए। पर उन्होंने पूछा तो मैं वर्णमाला, गिनती-पहाड़े सब झटपट सुनाता चला गया। कहीं भी मुझे अटकना नहीं पड़ा। सुनकर मास्टर जी खुश हुए। थोड़े शर्मिंदा भी, कि जो काम वे नहीं कर पाए, गाँव की एक अनपढ़ औरत ने कैसे कर दिखाया...?
मुसकराते हुए बोले, “ठीक है चाची, ठीक है...अब यह चल जाएगा।”
“कुछ कसर है मास्टर जी, तो बताइए। मैं इसे थोड़ी और तैयारी करवा के लाती हूँ। पर...इसे मारिएगा नहीं मास्टर जी। बच्चे का दिल कोमल है, मारने से यह सब भूल जाता है।” माँ का प्यार आँखों से झर रहा था।
“नहीं-नहीं, चाची। मारूँगा क्यों? अब तो यह खूब चल निकला है। आपने तो जैसे जादू कर दिया...!” कहते-कहते मास्टर कमलाकांत जी की खुशी छिप नहीं रही थी।
और फिर बचपन की वह रुकी हुई कहानी आगे बढ़ी। धीरे-धीरे आगे बढ़ती ही गई! कोई मुश्किल उसे रोक नहीं पाई। अक्षरों का उजाला दिल में फैलता गया, और लगा, अब भीतर कहीं अँधेरा नहीं है, कहीं अँधेरा नहीं...!
जैसे नदी के प्रवाह को किसी बड़ी चट्टान ने रोक रखा हो। और माँ ने पूरी शक्ति, पूरी हिम्मत से उसे परे धकेल दिया हो। नदी फिर अपने कल-कल संगीत और उद्दाम वेग के साथ बहने लगी।
माँ क्या होती है, यह तभी मैंने जाना। माँ में कितनी शक्ति होती है, यह मैंने जाना। और माँ क्या कर सकती है, यह मैंने जाना। और यह मैं कभी भूल नहीं पाया कि यह माँ ही थी, जिसने मुझे दो-दो बार जीवन दिया। पहले यह शरीर, और उसके बाद आखरों के उजाले के रूप में...!
हाँ, आखरों के उजाले के रूप में।...वही उजाला, जिसने मेरी आत्मा को प्रकाशित किया। भीतर हिये में दीए जलाए। एक नहीं, लाखों-लाख दीए। उन्हीं दीयों ने भीतर का सारा अँधेरा खत्म किया, और मैं जैसे ज्ञान की धारा में नहा उठा।
फिर मैं कब, कैसे लेखक हुआ, कुछ याद नहीं। लेकिन बस, इतना याद है कि मुझे लेखक बनाने वाली तो मेरी अनपढ़ माँ थीं, जिनके मुखमंडल पर मैंने सचमुच माँ सरस्वती का सा आलोक देखा।
उसी दिव्य आलोक में चलता हुआ मैं आगे बढ़ा तो बस, बढ़ता ही चला गया, बहता ही... !
*

सरस्वती बाबू बोल रहे थे, बोल रहे थे और बस बोलते ही जा रहे थे—अपनी रौ में। जैसे वे जमीन पर न हों, किसी तेज हवा के झोंके या अंधड़ में उड रहे हों और शब्द खुद-ब-खुद उनके भीतर से निकलकर हवा में घुलते जा रहे हों। सुच्चे मोती की लड़ियों की तरह।
बातों में इतनी गहराई कि उसकी थाह लेता मुश्किल। पर वे मर्म को छूती थीं, इसलिए उस सभाकक्ष में जितने लोग थे, वे सब भी जैसे सरस्वती बाबू के साथ बह रहे हों, बस, बहते ही जा रहे हों।   
बोलते-बोलते अचानक रुके सरस्वती बाबू। जैसे अपने आपको सँभाल रहे हों। एक नजर उन्होंने सभा कक्ष में मौजूद लोगों के चेहरों पर डाली। जैसे जानना चाहते हों कि वहाँ कुछ दर्ज हुआ या नहीं!                                                                                       
एक क्षण के बाद, मानो लंबी उड़ान पूरी करके. फिर से धरती की सतह पर आते हुए उन्होंने कहा :
उस साल मैं अपनी पूरी क्लास में फर्स्ट आया और आगे भी हमेशा मेरे अंक क्लास में सबसे ज्यादा आते। हाईस्कूल में तो मेरी सातवीं पोजीशन थी और मुझे स्कॉलरशिप मिलने लगा था। 
उसके बाद मैं कभी हारा नहीं। गाँव की मिट्टी में पले एक सीधे-सरल और धुनी जिज्ञासु की तरह आगे ही बढ़ता चला गया। लेकिन...उस दिन अगर माँ सँभाल न लेतीं, तो आज मैं वाकई अनपढ़ होता। 
मैं अकेला बेटा था। घर में घोर गरीबी थी, पर माँ को मेरे स्कूल से भागने का पता लगा, तो एक ही बात उनके मुँह से निकली थी, “नहीं, मेरा बेटा अनपढ़ नहीं रहेगा। मैं उसे पढ़ाऊँगी। चाहे जैसे भी हो, पढ़ाऊँगी!” वही माँ मेरी पहली गुरु थीं। आज वे नहीं है, पर उनका चेहरा याद करके आज भी मेरी आँखें भर आती हैं। 
पर हाँ, गंगा काका जरूर सामने बैठे हैं। इस उम्र में यहाँ तक आने के लिए उन्हें कितना कष्ट करना पड़ा होगा। मुझे इजाजत दीजिए कि मैं उनके चरणों की धूल लेकर, उन्हीं के पास बैठूँ।...
कहकर सरस्वती बाबू मंच से उतरे और तेजी से चलते हुए, गंगा काका के पास जाकर उनके चरणों पर जा गिरे। गंगा काका ने उन्हें छाती से लगा लिया और सिर पर हाथ फेरने लगे।
सभा में तालियों की गड़गड़ाहट होने लगी। सभी यह दृश्य देखकर भाव-विभोर हो उठे थे।
इसके बाद सभा के अध्यक्ष पद्मधर जी एक बार फिर उठे और उन्होंने सरस्वती बाबू के साहित्य और उनकी अपूर्व सफलता की जी भरकर प्रशंसा की। कहा, “सरस्वती बाबू की सच्ची महानता यही है कि उनका हृदय एक बच्चे की तरह सरल है।”
*

सभा समाप्त होने पर सरस्वती बाबू ने गंगा काका को अपनी कार में बैठाया और कार हिरनापुर गाँव की ओर चल पड़ी।
सरस्वती बाबू ने मन ही मन तय कर लिया था कि वे अपने गाँव में ही माँ की याद में एक पाठशाला खोलेंगे और वहाँ नन्हे-मुन्ने बच्चों को प्यार से पढ़ाया करेंगे।
यह निश्चय करते ही उन्हें लगा, मानो फिर से वे अपने बचपन में पहुँच गए हैं और माँ मुसकराती हुई, प्यार से उनके सिर पर हाथ फेर रही हैं।
***

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1 comment :

  1. कितनी भावपूर्ण कहानी है...मन तृप्त हो गया।

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