व्यंग्य: सारा टैक्स जाता कहाँ है

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

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मैं गणित में कमज़ोर हूँ पर मेरी सरकार गणित में महाकमज़ोर है। सरकार को गणित नहीं आता तो भी वह बड़े-बड़े जोड़ लगाती है। बिलियनों डॉलर के जोड़ लगाती है और उसमें हमेशा लोचा मारती है। पाँच-दस बिलियन तो घटाना ही भूल जाती है। फिर किसी दिन ऑडिटर जनरल की रिपोर्ट आती है, वे सरकार की पोल खोलते हैं। पोल खुलती है सरकार को शर्मिंदगी नहीं होती, दुनिया की अन्य सरकारों की तरह वह भी बेशर्म हो जाती है। उसके सीने में सैकड़ों राज दफ़न हैं, एक-दो लीक हो जाए तो उसे फ़र्क नहीं पड़ता। आज़ाद देश की जनता और प्रेस को इतना जानने का हक़ होना भी चाहिए। जब प्रेस ब्रेकिंग न्यूज़ चलाती है तब मिनिस्टर फॉरेन टूर पर होते हैं, इसलिए बजट विभाग का नन्हा-सा प्यादा तटस्थ भाव से बयान जारी कर देता है। 'इतनी बड़ी डेमोक्रेसी है, छोटी-मोटी गलतियाँ होती रहती हैं। फिर, ये गलती हमारी गलती नहीं है। जब विरोधी पार्टी की सरकार थी तो उन्होंने यह गड़बड़ मारी थी। ये उनका ही किया-धरा है।’ सरकार पर दो ट्रिलियन डॉलर का कर्ज है, उसमें दस-बीस बिलियन बढ़ भी गए तो क्या! सरकार का सूत्र है - घर भाड़े, दुकान भाड़े, अपने बच्चे लड्डू झाड़े।

सरकार का गणित सरकार जाने पर मैं अपने गणित से बहुत डरता हूँ। गणित में सर जी ने हमें इक्वेशन हल करना सिखाया था। कितनी भी कठिन समीकरण हो अंत में जा कर बराबर हो जाती थी। दस बराबर दस। असल ज़िंदगी में कभी कोई इक्वेशन बराबर नहीं हुई। मेरी इनकम का पलड़ा हमेशा ऊपर उठा रहा और ख़र्चे का पलड़ा नीचे झुका रहा। मैं इस दृश्य को एकटक देखता रहा हूँ। मेरी सरकार भी यही करती है, हमेशा घाटे में रहती है पर ढंग से खाती-पीती है और मौज करती है। दूध की कीमत एक डॉलर प्रति बैग बढ़ जाए तो सरकार डीज़ल की कीमत एक सेंट प्रति लीटर कम कर देती है। पोलिटिक्स, इकॉनॉमिक्स का कितना अच्छा बैंड बजा सकती है आप इस उदाहरण से समझ सकते हैं। आँकड़ों के ऐसे जादू-मंतर से वह तीन-चार साल तंदुरुस्त रह लेती है तो बाकी का जुगाड़ ऑटोमेटिक हो जाता है। मैं भी अपनी सरकार की घाटा नीति फॉलो करता हूँ। डेमोक्रेसी वाला प्रजातंत्र हो तो सब ऐसे ही ठाठ से रहते हैं। बड़ी-बड़ी घोषणाएँ फेंके जाओ, नए-नए नोट छापे जाओ और जी लो अपनी ज़िंदगी।

सरकार की नकल करते-करते मेरा घाटा खूब बढ़ गया तो पिछले हफ़्ते मैंने हिसाब लगाया। मैं पैंतीस परसेंट इनकम टैक्स देता हूँ, तेरह प्रतिशत जीएसटी (एचएसटी), सात प्रतिशत से अधिक पेंशन प्लान में और छः प्रतिशत मैचिंग अंशदान सरकार को सौंप देता हूँ। घर के लोन पर तीस प्रतिशत ईएमआई और कार की लीज़ पर बारह प्रतिशत बैंक ले लेता है। इसके ऊपर प्रॉपर्टी टैक्स और हेल्थ प्रीमियम भी देता हूँ। आपका गणित अच्छा हो तो जोड़ लगाना और मुझे ख़र्चे का टोटल बताना, क्योंकि सरकार अब भी कह रही है जनता को पैसे बचाना चाहिए। आपका गणित मेरे जैसा या मेरी सरकार जैसा कमज़ोर हो तो हिसाब लगाने की ज़रूरत नहीं है। मेरी और मेरे देश दोनों की नियति घाटे में चलना है। खाने-पीने और कपड़ों का ख़र्च मैंने कभी अपनी जेब से दिया नहीं। ये सब ख़र्चे मेरे क्रेडिट कार्ड वाले देते हैं। मैं उनका मिनिमम पेमेंट करता रहता हूँ और वे लिमिट बढ़ाते रहते हैं।

बावजूद इस सबके हमारी अर्थव्यवस्था दुनिया की टॉप अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जाती है। दिवालिया लोग हमेशा सोसायटी में टॉप माने जाते हैं। काम-धंधे न हों, सारे देश में बर्फ़ फैली हो तो भी शरणार्थियों के जत्थे के जत्थे हमारे देश में घुसे चले आते हैं। सरकार बाँहे फैलाए उनका स्वागत करती है और कहती है, चलो तुम हमारा वोट बैंक बढ़ाओ। कर्मचारी यूनियनें कहती हैं - ऐ सरकार तनख़्वाह बढ़ाओ। अस्पताल कहते हैं बिस्तरों की तादाद बढ़ाने के लिए पैसा दो। पुलिस और मिलेट्री वाले अपनी यूनिफार्म उतारने के बाद गोपनीय तरीके से सरकार से ज़्यादा पैसा मांगते हैं। स्कूल वाले खुले आम रोते-रोते कहते हैं और पैसा लाओ। सबको पैसा चाहिए। एक दोस्त ने मुझसे पूछा – ‘हम ख़ुद घाटा सह-सह कर इतना टैक्स देते हैं, ये सारा पैसा जाता कहाँ हैं। हमारी सरकार इतना टैक्स लेकर भी घाटे में चलती है।’ मैंने यही बात मिनिस्टर से पूछी। वे तब से हँस रहे हैं और हँसे जा रहे हैं। प्रजातंत्र में यही होता है, आम जनता और देश परिणाम भुगतते हैं और राजनेता ऐश करते हैं।

(‘दिमाग़ वालो सावधान’ से साभार)

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