सूफ़ीवाद की चौहद्दी और जायसी

- प्रभात उपाध्याय

व्याख्याता, हिंदी
राजकीय इंटर कॉलेज, बरेली
ईमेल: prabhatupadhyay30@gmail.com
चलभाष: 9719971108



हिंदी साहित्य में भक्तिकाव्य एक तरफ साहित्य के इतिहास का प्रस्थान बिंदु है तो दूसरी तरफ साहित्य के चरमोत्कर्ष का भी युग है। ऐसे में यह जरूरी है कि उस युग की चिंतनशीलता को बार-बार परखा जाए। इस चिंतन क्रम में भक्तिकाल के प्रमुख कवियों (कबीर, जायसी, सूर, तुलसी और मीरा) पर बहुत लंबी बहस चली है। इस बहस के केंद्र में कभी किसी की जाति रही है तो किसी का धर्म/संप्रदाय। लेकिन इस बहस के साथ एक अच्छी बात यह रही कि कुछ लोगों ने उनके काव्य को चिंतन का केंद्र बनाया। मलिक मुहम्मद जायसी की आलोचना इसी का परिणाम है। जायसी संबंधी आलोचना में आचार्य रामचंद्र शुक्ल को प्रस्थान बिंदु माना जाता है। आचार्य शुक्ल के बाद के अनेक आलोचकों ने जायसी पर काम किया है लेकिन उनकी आलोचना में कमोबेश आचार्य शुक्ल की बातों का ही दुहराव दिखाई पड़ता है। लेकिन विजयदेवनारायण साही ने अपने पूर्व की चिंतन पद्धति से अलग रास्ता अपनाया। जिस समय विजयदेवनारायण साही ने जायसी संबंधी अपना चिंतन प्रस्तुत किया था लगभग उसी समय वैश्विक चिंतन में फ्रांसीसी दार्शनिक जॉक देरिदा की चिंतन पद्धति ने हलचल मचा दी थी। यह वही समय है जब अंतर्पाठीयता (Intertextuality) की चर्चा जोरों पर थी। साही जी ने अपने समय के तथाकथित आलोचना के मानक से अलग समाजशास्त्रीय पद्धति का सहारा लिया। इस पद्धति के द्वारा उन्होंने जायसी के वंशावली (Genealogy) संबंधी विवेचन को केंद्र से निकालकर परिधि पर धकेल दिया तथा उनके काव्य-तत्व एवं रचना-कौशल को केंद्र में स्थापित करने का स्तुत्य प्रयास किया।

जायसी संबंधी आलोचना में सबसे ज्यादा इस बात पर बल दिया गया कि, ‘वे एक सूफी कवि थे’। सूफ़ीवाद का घेरा उनके चारों तरफ गार्सा-द-तासी के समय से ही बरकरार है। यह घेरा तब और मजबूत हो गया जब हिंदी साहित्य में विधेयवादी आलोचकों ने उसे प्रामाणिक ठहराया। यह सूफीवाद का घेरा उनके चारों ओर एक ऐसा मजबूत शिकंजा की तरह बैठा दिया गया जिसे आसानी से तोड़ा नहीं जा सकता था। चूंकि उस युग के सूफियों के कई ऐसे कार्य भी थे जिसे न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता है। जिस प्रकार ईसाई बहुल देशों में पादरियों की स्थिति मजबूत थी ठीक उसी प्रकार सूफियों की यहाँ थी। यह बात जगजाहिर है कि जायसी सूफी संप्रदाय से सम्बद्ध थे लेकिन उनके भीतर मौजूद तत्व को बने-बनाए मानदंड से बाहर निकलकर देखना होगा। प्रेमशंकर ने लिखा है कि, “जायसी सूफी संप्रदाय से सम्बद्ध थे, यह निर्विवाद है क्योंकि रचनाओं के भीतर उसके वैचारिक तत्व मौजूद हैं। इसी के साथ यह भी ध्यान में रखना होगा कि वे खेती-किसानी के व्यक्ति थे, जिस अनुभव का प्रयोग उन्होंने अपने काव्य में किया है। जायसी को केवल सूफी कवि के रूप में विवेचित करने से उनकी प्रतिभा के साथ पूर्ण न्याय नहीं हो पाता।”[1] यह स्वाभाविक ही है कि जब किसी कवि के काव्य को किसी विशेष संप्रदाय से जोड़कर देखा जाता है तब उस काव्य की उपेक्षा करके उनमें निहित संप्रदाय संबंधी बातों का उल्लेख सबसे अधिक किया जाता है। ऐसे में यह संभव है कि उस काव्य का मूल्यांकन दोषपूर्ण हो। इसलिए जायसी को सूफीवाद के चश्मे से देखने की बजाय उनकी कविता का मूल्यांकन निष्पक्ष भाव से करने की आवश्यकता है।

जायसी के ‘पद्मावत’ की भाषा और उसकी कथा-योजना को ध्यान में रखते हुए साही जी ने उन्हें हिंदी का पहला व्यवस्थित कवि माना है। उन्होंने लिखा है कि, “एक अर्थ में जायसी हिंदी के पहले विधिवत कवि हैं। मैं यह नहीं कहता कि कबीरदास ने कविता के द्वारा एक अत्यंत कठिन समय में अभिव्यक्ति की समर्थ और शक्तिशाली राह नहीं बनाई। कबीरदास के पथ-प्रदर्शन और क्षमता के बिना शायद जायसी के लिए ‘पद्मावत’ को लिख पाना भी संभव न हो पाता। परंतु कबीर अपनी प्रतिभा के सहारे भाषा को ठेल - ठेलकर आगे बढ़ाते हैं। उनकी कविता में इस प्रयास के चिह्न बराबर दिखते हैं। लेकिन जायसी में पहली बार हिंदी भाषा सहज काव्य-प्रवाह में बहने लगती है। हिंदी का अवधी रूप, जिसे जायसी ने अपने काव्य-माध्यम के लिए चुना, समूचा-का-समूचा काव्यमय हो जाता है। कवि का प्रयास कहीं दिखता नहीं। लगता है कि समूची अवधी भाषा कविता ही है जो जायसी की कलम से अपना स्वरूप ग्रहण करती चलती है।”[2] जायसी के इस प्रयास के बाद अवधी में सबसे बड़ा प्रबंध काव्य ‘रामचरितमानस’ लिखा गया। यह जायसी की बड़ी देन है कि आगे के लगभग सभी प्रमुख कवियों ने उनकी शैली एवं काव्य-विधान को अपनाया। भक्तिकाल में रामभक्ति-शाखा तक केवल अवधी में ही साहित्य रचा गया। जायसी की कविता का संबंध केवल ‘इश्क हक़ीक़ी’ और ‘इश्क मजाज़ी’ तक ही नहीं है। उनको कवि के रूप में देखने अथवा उनकी कविता का समाजशास्त्रीय विवेचन करने की पद्धति पर विजयदेवनारायण साही जी ने सर्वाधिक बल दिया है। जायसी ने अपने कवि होने का प्रमाण कई जगह दिया है। ‘पद्मावत’ के ‘स्तुति खंड’ में उन्होंने लिखा है –

“एक नयन कवि मुहम्मद गुनी। सोई विमोह जेहि कवि सुनी ॥

अथवा

चार मीत कवि मुहम्मद पाए। जोरि मिताई सिर पहुँचाए ॥

अथवा

जायस नगर धरम अस्थानु। तहाँ आई कवि कीन्ह बखानू॥
औ बिनती पंडितन भजा। टूट संवारहु, नेरवहु सजा ॥
हौं पंडितन केर पछलगा। किछु कहि चला तबल देइ डगा॥

अथवा

मुहमद कवि जौ बिरह भा ना तन रकत न माँसु।
जेइ मुख देखा तेइ हँसा, सुनि तेहि आयउ आँसु ॥

अथवा

कवि बियास कँवला रस पूरी। दूरी जो नियर, नियर सो दूरी ॥
नियरे दूर फूल जस काँटा। दूरि जो नियरे, जस गुड़ चाँटा ॥”[3]

जायसी की ये पंक्तियाँ उनके सचेत कवि होने की सूचना देती हैं। कवि सगर्व घोषित कर रहा है कि मैं विरह का कवि हूँ, मेरी कविता को जो भी पढ़ेगा वह रो देगा। जायसी ने जिस बात पर सबसे अधिक बल दिया वह है ‘सुनि तेहि आयउ आंसु’। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि, आधुनिक युग का विख्यात कवि पी. बी. शेली ने भी इसी बात पर बल दिया है, “हमारे सबसे सुंदर और मधुर गीत वो हैं जो दुःख की घड़ी में लिखे गए हैं अथवा विरह वेदना को व्यक्त करते हैं।”[4] तब जायसी का यह उस समय में कहना कितना प्रासंगिक होगा इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

मलिक मुहम्मद जायसी की विचारधारा और उनकी चिंतन पद्धति को लेकर काफी लंबी बहस चली है। इस बहस का आधार भी सूफी संबंधी चिंतन को लेकर ही है। इतिहासकार सतीशचंद्र ने ‘दक्षिण एशिया में भक्ति और सूफी आंदोलनों का प्रभाव’ की चर्चा करते हुए सूफियों की चिंतन पद्धति और उनकी प्रतिबद्धता के विषय में लिखा है कि, “सूफियों में से लोकप्रिय वे सूफी थे जिन्होंने ‘सिलसिला’ के माध्यम से सिद्धान्त अथवा आचरण की किसी विचारधारा को संगठित नहीं किया था और जो अक्सर तुलनात्मक रूप से दूर-दराज के देहाती इलाकों (क़सबों) और गाँवों में रहते थे और उस क्षेत्र के लोगों की भाषा, मुहावरों और रीति-रिवाजों को भी अपनाकर उनसे संवाद कायम करते हैं।”[5] साहित्य में वही व्यक्ति अपना वजूद कायम रख सका है जो सत्ता के मोह-माया से विरत है। यही कारण है कि रीतिकालीन कवियों की चर्चा बहुत कम होती है जबकि उससे पहले के भक्तिकालीन कवियों को साहित्य का प्रस्थानबिंदु माना जाता है। जायसी के संबंध में भी कुछ ऐसी ही स्थिति की चर्चा मिलती है। विजय देव नारायण साही ने जायसी को सूफीवाद के घेरे से निकालने का भरपूर प्रयास किया है। उन्होंने लिखा है कि, “इतना तो कहा ही जा सकता है कि जायसी यदि सूफी थे भी, तो न सरकारी सूफी थे, न मठी। अगर डॉक्टर लोहिया की शब्दावली का इस्तेमाल करें तो कुजात सूफी रहे हों, तो हों।”[6] साही जी ने सूफियों की तीन श्रेणी बनाई है – 
1. सरकारी सूफी, 2. मठी सूफी और 3. कुजात सूफी।

मध्यकालीन समाज-व्यवस्था में जायसी जैसे कवि का उद्भव एक नई घटना थी। इन्होंने लोक में व्याप्त कथानकों के माध्यम से जनता के दुःख-दर्द को को आधार बना कर अपना महाकाव्य लिखा। विजयदेव नारायण साही ने कबीर की शब्दावली से इनकी तुलना की है। उन्होंने लिखा है कि, “कबीर की शब्दावली चूंकि हिन्दू-तुरक, दोनों को काटती है, अतः उसमें अर्थ के फैलने की तुलना में एक नए संप्रदाय और फलतः नयी रूढ़ पारिभाषिक शब्दावली के निर्मित होने की संभावना अधिक है। कबीरदास में शब्दावली का विद्रोह है और नए संदर्भों की खोज है। जायसी में शब्दावली की अद्भुत स्थानांतरणशीलता है और द्विधा भक्त संदर्भों को एक कर देने की क्षमता है।”[7] यह कोई आश्चर्यजनक नहीं है कि ‘जायसी ग्रंथावली’ के आरंभिक अध्याय ‘मलिक मुहम्मद जायसी’ को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसी बात से आरंभ किया है। उनकी भी चिंता कुछ इसी तरह की थी। उन्होंने लिखा है कि, “सौ वर्ष पूर्व कबीरदास हिन्दू और मुसलमान दोनों के कट्टरपन को फटकार चुके थे। पंडितों और मुल्लाओं की तो नहीं कह सकते पर साधारण जनता ‘राम और रहीम’ की एकता मान चुकी थी। साधुओं और फकीरों को दोनों दीन के लोग आदर की दृष्टि से देखते थे।”[8] तात्पर्य यह है कि लोग कबीरदास की बानी को बहुत सुन चुके थे। उनके भीतर एक तरह से सहिष्णुता का भाव पैदा हो गया था। ऐसे समय में ही जायसी के होने की जानकारी मिलती है।

मध्यकालीन कवियों ने अपने विषय में बहुत कुछ नहीं लिखा है। कहीं-कहीं इसके छिट-पुट प्रयास दिखाई देते हैं लेकिन उनके भीतर अपनी कविता के उद्देश्य और कवि होने का एहसास पूर्ण रूप में विद्यमान है। आधुनिक कविता में कविता का उद्देश्य प्रायः सिरे से गायब रहता है। फिर भी मध्यकालीन कवियों के भीतर इस व्यक्तित्व को लेकर कहीं घमंड मौजूद नहीं है। साही जी ने इसी बात का आभास जायसी में पाया है। उन्होंने लिखा है कि, “अपने कवि व्यक्तित्व का बारंबार उद्घोष, कवि सुलभ गर्वोक्तियाँ, विविध मित्रों की मंडली, पास के लोगों द्वारा जायसी की प्रतिभा का अनभिज्ञान, आहत स्वाभिमान की यत्किंचित झलक और ‘आखिरी कलाम’ में संकेतित विचित्र अनुभव, समकालीन या परवर्ती सूचियों में जायसी का कहीं उल्लेख भी न होना – ये साक्ष्य केवल एक ही अनुमान हमारे लिए संभव छोड़ते हैं कि जायसी का व्यक्तित्व एक सामान्य किन्तु भावप्रवण मनुष्य, दिल मिलाने वाले दोस्त और अत्यंत प्रतिभाशाली कल्पनाशील और बौद्धिक कवि का है, सूफी संत का बैरागी बाबा का नहीं।”[9] जायसी की कविता किसी संत या पहुंचे हुए फकीर की अभिव्यक्ति नहीं लगती है। यह किसी चिंतनशील तथा हृदयग्राही व्यक्ति की रचना लगती है। जिसे लोक की समझ नहीं होगी वह इस तरह का काव्य नहीं रचा पाएगा।

भक्तिकाव्य पर जिन विद्वानों ने विचार किया उनमें से अधिक लोगों ने जायसी को सिद्ध फकीर ही माना है। डॉ. मुंशीराम शर्मा ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘भक्ति का विकास’ में जायसी संबंधी चिंतन प्रस्तुत किया है। उन्होंने लिखा है कि, “जायसी सिद्ध फकीर थे। हिन्दू संतों से भी इन्होंने बहुत कुछ ग्रहण किया। अद्वैतवाद की झलक तो इनके प्रत्येक ग्रंथ से प्रकट हो रही है।”[10] यह कहीं न कहीं आचार्य रामचंद्र शुक्ल के चिंतन का विकासक्रम है। इसी चिंतन पद्धति के मानकीकृत रूप को तोड़ने की बात विजयदेव नारायण साही ने कही है। आलोचना के स्वरूप को इस विकासक्रम के माध्यम से समझा जा सकता है। साही जी ने लिखा है कि, “वे (जायसी) दुहरे अन्याय और उपेक्षा के शिकार भी हुए हैं। विडम्बना यह है कि सोलहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी तक जब दिल्ली और मुगल साम्राज्य में तसव्वुफ़ और विभिन्न सूफी संप्रदायों का बोलबाला था, तब जायसी की उपेक्षा इस कारण हुई कि वे सूफी या किसी अन्य संप्रदाय में प्रतिबद्ध नहीं दिखते थे और बीसवीं शताब्दी में जब तसव्वुफ़ का महात्म्य नगण्य होने लगा तब जायसी सूफी घोषित कर दिए गए और धीरे-धीरे केवल भाषा संबंधी शोधकर्ताओं, जायसी विशेषज्ञों और प्राचीन संप्रदायों में रमने वाले अध्यापकों के लिए पुराने दस्तावेज़ की तरह रह गए।”[11] अब तो स्थिति यह हो गई है कि भक्तिकालीन साहित्य में केवल कबीर के अलावा जो कवि अस्मितावादी विमर्श के करीब नजर आते हैं उसी के साहित्य का अध्ययन और मनन किया जा रहा है। यह कितनी दुःखद बात है कि उसी युग के अन्य कवि केंद्र में दिखाई पड़ते हैं जबकि जायसी में सम्पूर्ण साहित्यिकता (literariness) होने के बावजूद भी वे परिधि पर ही मौजूद रहते हैं। उनको सूफ़ीवाद के दायरे में बांधने के लिए उनकी एक पंक्ति को बारंबार उद्घृत किया जाता है। हालांकि उस पंक्ति को आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद के आलोचकों ने प्रक्षिप्त माना है। वह पंक्ति है –

“तन चितउर मन राजा कीन्हा। हिय सिंघल बुधि पदमावती चीन्हा ॥
गुरु सुआ जेइ पंथ देखावा। बिनु गुरु जगत को निरगुन पावा ॥
नागमती यह दुनिया धंधा। बाँचा सोई न एहि चित बंधा ॥
राघव दूत सोइ सैतानू। माया अलाउदीं सुलतानू ॥
प्रेम कथा एहि भाँति बिचारहु। बूझि लेहु जौ बूझै पारहु ॥”[12]

यही एक ऐसी चाबी है जिसके सहारे जायसी के ‘पद्मावत’ को सूफीकाव्य कहा गया है। शुक्लोत्तर जायसी ग्रंथावली के संपादकों ने इस समूचे कड़वक को प्रक्षिप्त माना है तथा इसका उल्लेख भी नहीं किया है। इसकी अंतिम पंक्ति में यह बातें कही गयी हैं कि इस प्रेम को जो इस पद्धति से समझेगा वही इसका मर्म समझ पाएगा। कविता के साथ एक दुर्घटना कही जाएगी कि कोई कवि कम से कम अपनी कविता को समझने के लिए अपनी तरफ से कोई दृष्टि नहीं देता है। किसी कविता को समझने के लिए जो दृष्टि विकसित की जाती है वह किसी टीकाकार अथवा आलोचक द्वारा ही विकसित की जाती है। इस तरह के ऊहापोह वाली स्थिति से निकलने के लिए विजयदेव नारायण साही ने दो रास्ते सुझाए हैं। उन्होंने लिखा है कि, “या तो जायसी को सतर्क कवि मानकर पूरी कथा को इस तरह पढ़ा जाए कि समूचे कृतित्व की एकता खंडित न हो और यत्र-तत्र बिखरे हुए तसव्वुफ़ की झलकियों को अंशी न मान कर अंश ही माना जाए, या यह समझा जाए कि जायसी का मूल कथ्य सूफीवाद है, लेकिन कविता लिखते समय वे बह गए और जो करने चले थे, न कर सके।”[13] ज़ोर इसी बात पर है कि उन्होंने कविता बहुत अच्छी लिखी है, सिद्धांत कुछ पीछे छूट गया है। यह एक विश्वसनीय तथ्य है कि जायसी का जुड़ाव आंशिक ही सही लेकिन सूफी-दर्शन से था। इसे एकदम सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है। लेकिन कविता की प्रबलता उनके सूफीवाद को गौण बना देती हैं।

भक्तिकाव्य के मूल्यांकन की अनेक पद्धतियाँ मौजूद हैं। इन पद्धतियों में समाजशास्त्रीय पद्धति की चर्चा बहुत ज़ोरों पर रही है। इसके माध्यम से कवि व्यक्तित्व से ज्यादा कवि-कृतित्व का मूल्यांकन किया गया है। विजयदेव नारायण साही ने इसी पद्धति के सहारे जायसी के काव्य का मूल्यांकन प्रस्तुत किया है। इस मूल्यांकन में उन्होंने जिस बात पर सर्वाधिक बल दिया, वह है जायसी के दर्शन-पक्ष को गौण मानकर उनके कवि-व्यक्तित्व की विवेचना करना। उन्होंने लिखा है कि, “जायसी एक आत्मसजग, आत्म-विश्वासी और अत्यंत संवेदनशील कवि थे एक सशक्त, किन्तु अलीक विचारक थे। उनकी अनुभूतियों में वह गहरी तीव्रता थी जो सृजनशीलता को मनुष्य के प्राणतत्व से जोड़ती है। इसकी संभावना बहुत कम है कि वे साधु बाबा या सूफी फकीर भी रहे हों, बल्कि जो भी संकेत मिलते हैं, वे इस संभावना के विरुद्ध जाते हैं। यह भी संभव है कि जायसी न केवल किसी मठ से नहीं जुड़े, बल्कि किसी दरबार से भी नहीं जुड़े। इसके कारण उन्हें उपेक्षा और संभवतः गलतफहमी का भी शिकार होना पड़ा।”[14] जायसी सहित सभी भक्तिकालीन कवियों में दरबार का निषेध दिखाई पड़ता है। उस युग के प्रमुख कवियों ने दरबार के प्रति अपनी उपेक्षा ही दिखाई है। उनकी दृष्टि में वह शोषण का केंद्र था जो गरीबों तथा किसानों को अपना निवाला बनाता था। ऐसे राजा से उनका कोई सरोकार नहीं था।

भक्तिकाव्य में जायसी सांस्कृतिक समन्वय के प्रतीक के रूप में हमारे समक्ष उपस्थित होते हैं। जायसी की प्रेम कल्पना, आध्यात्मिक संकेत, रहस्यवादी दृष्टि का आधार भले ही सूफी दर्शन हो लेकिन उसकी प्रकृति लोकोन्मुख है। पात्रों को सहज मानवीय भूमि पर उतारकर उनका चित्रण करने के मूल में जायसी की सांस्कृतिक चेतना निश्चित रूप से सक्रिय है। वह न तो ज्ञानी और पंडित होने का दावा ही करते हैं और न ही शास्त्र की दुहाई देते हैं। उन्होंने तो केवल प्रेम के मार्ग का अनुसरण किया है जिसके सहारे उस युग के आम जनमानस के दुःख और वेदना को अभिव्यक्ति मिली है। यदि साहित्य केवल अपने समय का कोरा अनुवाद नहीं होता है तो जायसी के काव्य में अभिव्यक्त सांकेतिकता को लक्षित किया जा सकता है, जहाँ सीधा-सीधा तो कुछ नहीं मिलता लेकिन उसे पुनः अलग ढंग से निर्कूट करने पर उसका एक नया अर्थ खुलता है। जायसी के काव्य में मौजूद लोक तथा उसकी संवेदन क्षमता बहुत व्यापक है। यह किसी सूफी बाबा अथवा फकीर के लिए संभव नहीं है कि वह किसी लोक संस्कारों का इतनी गहराई से ज्ञान रखता हो। इसका ज्ञान उसे ही हो सकता है जो इसके भौतिक धरातल पर जुड़ा हुआ हो। ग्राम जीवन, विशेषतया किसानों और दासों के जीवन को उन्होंने निकट से देखा था, क्योंकि गाँव के असंख्य दृश्य संकेत उनके यहाँ मौजूद है। किसान जीवन किसी बाबा अथवा संत के समझ से बाहर की वस्तु है। मध्यकालीन कृषक वर्ग की स्थितियों का वर्णन करते हुए डॉ. इरफान हबीब ने लिखा है कि, “कृषक वर्ग पर वास्तविक बोझ इतना अधिक हो जाता था कि उनके जीवन जीने के साधनों में भी हस्तक्षेप होने लगता था। किसान, जिनके पास अलग से कोई संपत्ति नहीं थी, से इतनी बड़ी मात्रा में राजस्व वसूली की प्रक्रिया परिष्कृत नहीं हो सकती थी। रैयत जब मालगुजारी नहीं अदा कर पाते थे तो उन्हें बुरी तरह से मारा-पीटा जाता था और उनके साथ बुरा व्यवहार किया जाता था। यह कह कर कि मेरे पास धन नहीं है, कर भुगतान करने से किसान मना कर देते थे। इसके विरुद्ध सजा और प्रताड़ना काफी कठोर थी। और भूखे प्यासे भी रखा जाता था। इस यातना से कभी-कभी वे मर भी जाते थे। लेकिन इसके बाद भी उन्हें कोई राहत नहीं प्रदान की जाती थी।”[15] कृषक वर्ग की ऐसी स्थिति को देखकर किसी सूफी बाबा या फकीर का हृदय द्रवित हो या न हो एक सामान्य अथवा संवेदनशील कवि का हृदय तो जरूर द्रवित होगा। इसी कारण जायसी की मूल चिंता उसी वर्ग की थी जिसमें किसान, शिल्पी तथा अन्य लोग शामिल हैं।

जायसी के भीतर व्याप्त संवेदनशीलता को विजयदेव नारायण साही ने ठीक ढंग से पहचाना है। जायसी को जिस घेरे से बार-बार निकालने के लिए वे कह रहे हैं वह सिद्धान्त का घेरा है। इस घेरे से निकालकर उन्हें लोक - मानस की भाव-भूमि पर प्रतिष्ठापित करने का प्रयास ही समाजशास्त्रीय आलोचना की मांग है। उन्होंने लिखा है कि, “किसी एक तथाकथित गुह्य साधना को जायसी के मत्थे मढ़ देना जायसी की आंतरिकता को एक ऐसे खूँटे से बांध देना होगा जिससे बंधने के लिए जायसी तैयार नहीं हैं।”[16] जायसी के काव्य पर सूफ़ीवाद के प्रभाव को खारिज नहीं किया जा सकता है लेकिन ‘पद्मावत’ और जायसी का लेखन केवल सूफीवाद की अभिव्यक्ति है यह स्वीकार भी नहीं किया जा सकता।

विजयदेवनारायण साही ने ‘पद्मावत’ को एक महाकाव्यात्मक त्रासदी की संज्ञा दी है। त्रासदी की सर्वमान्य व्याख्या दुखांतक के रूप में बताई जाती है। लेकिन यह दुखांत क्या केवल रत्नसेन, अलाउद्दीन, नागमती और पद्मावती तक ही सीमित है? इस दुखांत को साही जी ने विभिन्न परिप्रेक्ष्य में देखा है। उन्होंने लिखा है कि, “पद्मावत की कथा केवल अलाउद्दीन, रत्नसेन और पद्मिनी की व्यक्तिगत ट्रेजडी नहीं है – जिन शर्तों पर जायसी का समाज उलट-पुलट रहा है, उनके चलते समूची पृथ्वी के झूठी पड़ जाने की ट्रेजडी है।”[17] यह वही समाज है जहाँ न कोई किसान सुखी हैं और न ही कोई शिल्पी। ऐसे समाज की सामाजिक संरचना का क्या महत्त्व है जहाँ किसी विशेष तबका को ही सारी सुविधाएं प्राप्त हो तथा अन्य सभी रोटी के लिए तरसते हों। ‘पद्मावत’ की इस ट्रेजडी को साही जी ने विभिन्न स्तरों पर परिलक्षित किया है। उन्होंने लिखा है कि, “प्रेम की कसौटी पर उन्होंने अपने युग को कसा और उनकी अनुभूति में वह गहरी विषाद दृष्टि उत्पन्न हुई जिसमें एक तरफ आदमी बैकुंठ भी हो जाता है, दूसरी तरफ एक मुट्ठी खाक भी रह जाता है। ‘पद्मावत’ की ट्रेजडी इन दोनों अवस्थाओं में एक साथ प्रज्वलित हो जाने की ट्रेजडी है। जितना प्रेम है उतना ही युद्ध है; जितना मन के भीतर दीपता हुआ सिंहल लोक है, उतना ही टूटे हुए दुर्गों की धूल उड़ती हुई विरानगी है ; जितनी अपने हाथ में सिर उतारकर जमीन पर रख देने की तड़प है उतना ही वैभव का प्रदर्शन है ; सत है, साका है।”[18] ‘पद्मावत’ के विषाद/ दुखांत दृष्टिकोण की विवेचना केवल एक आधार पर नहीं हो सकती है। इसके विभिन्न स्वरूपों की चर्चा से इसके व्यापकत्व का पता चलता है।

जायसी ने अपने समय में प्रचलित कर्मकांड में लिप्त व्यक्तियों का मखौल उड़ाया है। यह उस युग के लिए कोई साधारण घटना नहीं थी। जायसी से पहले कबीर ने पंडे-पुरोहितों और मुल्लों पर इसी तरह से तंज़ कसा था। इसी का उत्तरोत्तर विकास जायसी के यहाँ दृष्टिगोचर होता है। जायसी की चिंतन पद्धति को किसी एक खेमे में बांधकर देखना अन्यायपूर्ण होगा। साहित्यकार अपने समाज का सबसे संवेदनशील व्यक्ति होता है। जायसी इसके अपवाद नहीं हैं। उनके यहाँ एक तरफ अध्यात्म का बोलबाला है तो दूसरी तरफ भौतिकवादी चेतना का। इन दोनों दृष्टियों के समन्वय के आधार पर उनका चिंतन विकसित होता है। यह अध्यात्म और भौतिकता आपस में इतने उलझे हुए हैं कि इसे सुलझा पाना संभव नहीं है। यह किसी सामान्य कवि के बस की बात नहीं है कि इतना जोखिम भरा कार्य कर सके। लेकिन जायसी ने यह काम अपने ढंग से किया है। उन्होंने जिस तरह से धार्मिक पाखंड को उजागर किया, उसकी आलोचना की, वह कोई सामान्य बात नहीं है। उन्हें केवल सूफी कवि मान लेने से खतरा बढ़ जाता है और उन्हें सूफ़ीवाद से अलग करते ही उनके अस्तित्व का धुंधला संकट दिखाई पड़ता है। लेकिन उनके काव्य को केंद्र में रखकर मूल्यांकन करने पर निस्संदेह उनकी कांति बढ़ जाती है।

 

संदर्भ:

[1] भक्ति काव्य का समाजदर्शन – प्रेमशंकर, पृष्ठ संख्या 111, सं. – 2000, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
[2] जायसी – विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ संख्या 1, सं. – 2012, हिंदुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद
[3] जायसी ग्रंथावली – आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पृष्ठ संख्या 195, सं. – 2012, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद
[4] We look before and after,
And pine for what is not:
Our sincerest laughter
With some pain is fraught;
Our sweetest songs are those that tell of saddest thought.
- PERCY BYSSHE SHELLEY
[5] मध्यकालीन भारत में इतिहास लेखन, धर्म और राज्य का स्वरूप – सतीशचंद्र, पृष्ठ संख्या 104, सं. – 2013, ग्रंथ शिल्पी प्रकाशन, नई दिल्ली
[6] जायसी – विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ संख्या 5, सं. – 2012, हिंदुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद
[7] जायसी – विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ संख्या 13, सं. – 2012, हिंदुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद
[8] जायसी ग्रंथावली – सं. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पृष्ठ संख्या 17, सं. – 2012, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद
[9] जायसी – विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ संख्या 22, सं. – 2012, हिंदुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद
[10] भक्ति काव्य का विकास (वैदिक भक्ति एवं भागवत भक्ति तथा हिन्दी के भक्तिकालीन काव्य में उसकी अभिव्यक्ति) – डॉ. मुंशीराम शर्मा, पृष्ठ संख्या 462, सं. – 1979, चौखंभा विद्याभवन प्रकाशन, वाराणसी
[11] जायसी – विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ संख्या 23, सं. – 2012, हिंदुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद
[12] जायसी ग्रंथावली – सं. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पृष्ठ संख्या 462, सं. – 2012, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद
[13] जायसी – विजयदेव नारायण साही, पृष्ठ संख्या 29, सं. – 2012, हिंदुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद
[14] जायसी – विजयदेव नारायण साही, पृष्ठ संख्या 40, सं. – 2012, हिंदुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद
[15] भारतीय इतिहास में मध्यकाल – इरफान हबीब, पृष्ठ संख्या 257, सं. – 2013, ग्रंथ शिल्पी प्रकाशन , नई दिल्ली
[16] जायसी – विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ संख्या 77, सं. – 2012, हिंदुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद
[17] जायसी – विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ संख्या 88, सं. – 2012, हिंदुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद
[18] जायसी – विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ संख्या 89, सं. – 2012, हिंदुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद

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