चुनार की एक गुमनाम महिला और उनके भारतीय मूल के वंशज

प्रवीण कुमार मिश्र

प्रवीण कुमार मिश्र 'वशिष्ठ'

शोध छात्र, इतिहास विभाग, सामाजिक विज्ञान संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, पिन .221005
ईमेल: praveenishra@gmail.com
चलभाष: 9026473425

इतिहास जब अपना अस्तित्व खोजने लगता है, तब उसे अतीत की उन अंधेरे गलियों की यात्रा करनी पड़ती है, जिन रास्तों का शफ़र बड़ा ही दुर्गम होता है। मुझे याद है, बचपन में हमारे गांव में दक्षिण अफ्रीका से कुछ लोग भारत सरकार की मदद से अपने पूर्वजों को खोजते-खोजते आए थे। उनके चेहरे की मुस्कान और अपने अस्तित्व को पाने का जो संतोष था, वह बड़ा ही करुण था। भारतीय प्रवास पर आज भी करोड़ो भारतीय मूल के लोग दुनिया भर में रहते हैं। उनके दिलों में अपनी माटी के लिए जो प्रेम और लगाव है, वह लगाव किसी भाषा का मोहताज नहीं है। उनकी भावुकता व प्रेम अपने जन्मभूमि के लिए हमेशा से रहा है। आज भी कुछ लोग हैं, जो भारत में अपने अतीत का वह अध्याय खोजने की कोशिश कर रहे हैं, जिसकी कहानी भी अब विलुप्त होने के कगार पर है। ऐसी ही एक अधूरी कहानी मेरे जन्मभूमि चुनार से जुड़ी जमयिका के एक परिवार की है।

एक रात मुझे जमयिका से एक मेल आया। यह 2018 की बात है। 

कैरिबियन सागर स्थित जमयिका देश वैस्ट इंडीज़ का एक आंग्लभाषी द्वीप राष्ट्र है। वह मेल किसी एडविन टलौच नामक व्यक्ति का था। उन्होंने मुझे अपना परिचय लिखा था और मेरे बारे में उन्हें बीएचयू के जिस प्रोफेसर ने बताया था उनका भी नाम उन्होंने लिखा था। श्रीमान एडविन के बारे में मुझे उनसे इतना ही पता चल पाया है कि वो जमयिका में एक प्रोफेसर हैं। उन्होंने मुझसे अपने पत्नी के पूर्वजों (ancestor) के बारे में जानकारी के लिए मदद मांगा। उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी के दादा का नाम जेम्स लैम्सडन था और परदादा का नाम जॉन लैम्सडन था। जॉन लैम्सडन ने एक भारतीय महिला से विवाह किया था। वह महिला मूल चुनार की रहने वाली थी। जॉन को दो बच्चे हुए, जेम्स लैम्सडन और ऐनी लैम्सडन। एडविन के अनुसार जेम्स भारतीय मूल के थे। उन्होंने मुझे इस संदर्भ में अभिलेखीय प्रमाण भी भेजा जो इस बात की पुष्टि करता है कि डॉ. जेम्स लैम्सडन अंग्रेजों द्वारा भारतीय चिकित्सा सेवा में नियुक्त किये गये पहले मूल भारतीय डॉक्टर थे। यह एक बड़ा ही रोचक ऐतिहासिक प्रमाण है। इसका मतलब यह हुआ कि पहला भारतीय मूल का डॉक्टर चुनार का रहने वाला था। मैंने एडविन महोदय को एक दस्तावेज भेजा, दस्तावेज़ जॉन लैम्सडन को 1795 में बनारस कमिश्नरेट का रेसिडेंट नियुक्त किये जाने के संदर्भ में था। उनका तबादला बाद में लखनऊ रेसिडेंट में हो गया। शायद, इसी दौरान उन्होंने चुनार की उस भार्टी महिला से विवाह किया होगा, क्योंकि चुनार उस समय ब्रिटिश सेना का हेडक्वार्टर हुआ करता था। चुनार में एक ऐतिहासिक दुर्ग स्थित है। इस ऐतिहासिक दुर्ग पर वर्षों तक अंग्रेजों का एकाधिकार 1765 से 1947 तक रहा। अंग्रेजों के समय में यहाँ स्थित ऐतिहासिक दुर्ग पर रिटायर आर्मी के सोल्जर्स भी रहते थे। क्योंकि, बहुत से रिटायर सैनिक यहीं अपना जीवन बिता रहे थे तो उन्होंने स्थानीय महिलाओं से विवाह करने की सोची और सेटलमेंट एरिया में जीवन यापन करने लगे। 'ब्रिटिश टेरिटरी अंडर द रूल्स' में चुनार के बारे में लिखा है कि यहाँ जो रिटायर आर्मी के लोग रहते थे, वे यहाँ के देशी महिलाओं से विवाह करते थे और उनसे जो काले बच्चे पैदा होते थे, उनको कम्पनी में आसानी से काम मिल जाता था । एडविन महोदय ने जेम्स लैम्सडन के चचेरे भाई विलियम लम्सडन की एक भारतीय उपपत्नी हेरिंजी खानुमल उर्फ फोएबे डोरेन के बारे में भी दस्तावेज मुझे दिए। विलियम को स्कॉटिश कानून के अनुसार हेरिंजी से विवाह के रूप में मान्यता नहीं प्राप्त हुई, इसीलिए वो आस्ट्रेलिया चले गए, जहाँ उन्हें 5 बच्चे हुए।

एडविन महोदय की पत्नी के पूर्वजों को खोजने के लिए मैंने बहुत प्रयास किया, लेकिन मुझे इस संदर्भ में पूरी सफलता प्राप्त नहीं हुई। चुनार से लेकर विभिन्न अभिलेखागारों में बहुत प्रयास किया कि कहीं तो जॉन लैम्सडन के बारे में जानकारी मुझे प्राप्त हो, लेकिन मुझे कुछ खास नहीं मिला। तब मैंने चुनार में स्थित स्थानीय ब्रिटिश कब्रगाहों के ऊपर लिखित नामों को पढ़ना शुरू किया, लेकिन इस सन्दर्भ में न तो जॉन लैम्सडन और न ही उनके गुमनाम पत्नी के बारे में कोई जानकारी मिली। फिर, मुझे एक दिन चुनार स्थित तीनों ब्रिटिश सेमेट्री में दफ़न लोगों की पूरी सूची मिली। उस सूची में कहीं भी जॉन लैम्सडन और उनकी पत्नी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। चुनार में पहले, सेटलमेंट एरिया और नोटिफाइड एरिया हुआ करता था। अंग्रेज इन्हीं सेटलमेंट एरिया में अपने परिवारों के साथ रहते थे। यहीं मिशनरी स्कूल और चर्च भी हुआ करता था। चुनार में आज भी 1838 में स्थापित सेंट थॉमस पब्लिक स्कूल स्थित हैं। यहाँ के फ़ादर ने मुझे बहुत से दस्तावेज दिए, लेकिन उनमें भी जेम्स लैम्सडन के परिवार के बारे में जानकारी प्राप्त नहीं हुई।

जॉन लैम्सडन रिटायरमेंट के बाद स्काटलैंड चले गए, लेकिन उनकी पत्नी उनके साथ नहीं गयी, ऐसा एडविन महोदय ने बताया। इसका तात्पर्य यह हुआ कि उनकी पत्नी की मृत्यु चुनार में ही हुई। जेम्स का जन्म भी चुनार में ही हुआ, यह बात तो लिखित है। ऐसे में उनके शादी और उस भारतीय गुमनाम महिला के बारे में जो रहस्य है, वह रहस्य ही बना हुआ है।

आज भी उनसे जुड़ाव है और मेल के माध्यम से बात होती है। मैं बड़ा ही सम्मान करता हूँ, श्रीमान एडविन महोदय का जिनका लगाव आज भी अपनी पत्नी के पूर्वजों को खोजने का रहा है। यही एक भावना है,जो विदेश में बैठे भारतीय मूल के लोगों के स्व:बोध को भारत के साथ जोड़ती है। यह जान कर और भी खुशी है कि चुनार के मूल लोग आज भी जमयिका में रहते हैं, और अपने पूर्वजों को खोजने व अपनी मातृभूमि चुनार को देखने की इक्षा रखते हैं।

(यह आलेख श्रीमान एडविन टलौच द्वारा दिए गए सूचनाओं और हमारे द्वारा उनके पूर्वजों को खोजने के असफ़ल प्रयास पर आधारित है। लेखक चुनार के रहने वाले हैं, और चुनार, मिर्ज़ापुर पर इतिहास विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से शोध कर रहे हैं)

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