मर्यादा पुरुषोत्तम राम एवं अहिंसा

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

पीठाचार्य, डॉ. आम्बेडकर पीठ (मानवाधिकार व पर्यावरण मूल्य) 
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लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।


अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की मूर्ति स्थापित कर प्राण-प्रतिष्ठा हुई। सनातन धर्म के उत्थान के लिए इसे एक महत्त्वपूर्ण बिंदु बताया जा रहा है। भगवान श्रीराम त्रेता युग में हुए और आज़ यह सर्वविदित है कि उन्होंने रघुकुल में जन्म लेकर पृथ्वी पर व्याप्त अधर्म का सर्वनाश किया। धर्म की स्थापना की। अपने समय को इस प्रकार जिया, कि उन्हें इस युग में सभी अपनी प्रेरणा-स्रोत मानते हैं। पूरी राम-कथा वाल्मीकि कृत रामायण में मिलती है। लेकिन सबसे अधिक यदि इसे लोकप्रियता मिली तो तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस से। उन्होंने इस रामकथा को आधुनिक लोक में पुनर्स्थापित किया। इसे दोहा, चैपाई, सोरठा, छंद और श्लोक के माध्यम से तुलसीदास ने सृजित किया और आज़ भारत की क्लासिक व सबसे अधिक पठनीय पुस्तक के रूप में इसे जाना जाता है।

भगवान श्रीराम को अनीश्वरवादी कदाचित न महत्त्व दें। हो सकता है वे उन्हें एक मिथकीय पात्र बताकर भगवान रूप में न स्वीकार करें। स्वीकृति और अस्वीकारोक्ति के बीच फिर भी राम इतने बड़े हैं कि उनकी सबके बीच उपस्थिति है। वे हमारी सनातन सभ्यता में सबसे अधिक मान्य हैं। राम सबसे अधिक वरेण्य हैं। उन्हें भगवान विष्णु के अवतार के रूप में जाना जाता है। अधर्म पर धर्म के संस्थापक के रूप में उन्हें जाना जाता है। उन्हें सत्य रूप में जाना जाता है। उन्हें अपने इष्ट के रूप में जाना जाता है किंतु सबसे अधिक उनकी जो मान्यता जो है, वह है मर्यादापुरुषोत्तम की।

हमारे देश में सनातन सभ्यता मानने वालों की बहुलता है। वैष्णव और शैव सभी भगवान श्रीराम को मानते हैं। भगवान शिव ने ही पार्वती को संपूर्ण कथा सुनाई और वही है रामायण कथा, ऐसा हमारे भारतीय वांग्मय बताते हैं। इस युग में इस अवतार की मनुज रूप में मर्यादा की एक विशेष संकल्पना प्रकट की गई है, जो रिश्तों के बीच प्रेम, करुणा, मैत्री, भ्रातृत्व व मातृत्व के सह-अस्तित्व को स्थापित करती है। हमारे भगवान श्रीराम के जीवन यात्रा में केवल मनुष्य सम्मिलित नहीं हैं बल्कि सृष्टि के जीव-जंतु, पशु-पक्षी, पेड़, पहाड़, जंगल, नदी यानी प्रकृति से लेकर समष्टि की यात्रा है। यह यात्रा है जनसामान्य की भी सुने जाने की। स्वयं पीड़ा सहकर संसार के सभी के लिए सुख के खोज की। 

वनगमन के लिए प्रस्थान करते समय वे अपने माता-पिता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। वे रावण जैसे महापण्डित के धराशायी होने पर उसे प्रणाम कर सीख देते हैं कि ज्ञानी, पण्डित को मृतशय्या पर पड़े रहने के बाद भी उससे सीखना चाहिए। भगवान श्रीराम ऋषियों, मुनियों, तपश्वियों और अपने श्रेष्ठजन का आदर करते हैं। वह विष्णु अवतारी भगवान परशुराम के लक्ष्मण संवाद के समय हुए क्रोध व असंगत संवाद को भी प्रेम के नियम पर चलकर अहिंसक होने का प्रमाण देते हैं। माता कैकेई द्वारा उनके वनगमन जैसे वरदान के पश्चात नानाप्रकार के संकटों व संघर्षों से जब लक्ष्मण, सीता सहित वह अयोध्या आते हैं, तो उन्हें प्रेम के साथ सर्वप्रथम बिना किसी द्वेष के अभिवादन मुद्रा में मिलते हैं। यह प्रेम का नियम ही अहिंसा है। यह सहन की असीम प्रकटीकरण को अहिंसा का सच्चा स्वरूप नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे? अपने भाई भरत के प्रति उद्दात्त भर्तृत्व का प्रेम राम में तो दिखता है, लेकिन भरत भी कम नहीं हैं। श्रीराम अपने वीर भरत के लिए जो स्नेह संप्रेषित करते हैं, वही प्रेम का नियम है।

कदाचित कोई उदाहरण हमारे इतिहास में मिले जो पशु-पक्षियों और भीलन शबरी जैसों से भी उद्दात्त भाव से प्रेम करता हो। उन्हें प्रेम से माँ पुकारता हो और जूठी बेर खाता हो। वह प्रभु श्रीराम हैं, जिनकी जीवन यात्रा में जटायु, शबरी, नल-नील, अहिल्या, भालू, बंदर और गिलहरी तक प्रेम से विभूषित हैं। मर्यादा से प्रेम की गहरी लकीर खींचकर भगवान श्रीराम ने इस धरा के समस्त जीवों को संदेश दिया कि सबका अपना अस्तित्व है। सबके साथ ही हमारा अस्तित्व है। हमें इसलिए सहज होकर करुणा, दया, प्रेम, भातृभाव, अपनत्व और सबमें आपने उत्सर्ग को देखना चाहिए। सबकी मर्यादा की रक्षा ही तो अहिंसा है।

वह मर्यादा का उल्लंघन करने वाली अभिमान से प्रेरित शक्तियों को भी अहिंसा के बल पर पृष्ट करते हैं। अहिंसा का नियम है कि वह शक्ति के साथ भी अपनी उपस्थिति बनाए। यथा एक उदहारण मिलता है समुद्र से अनुनय-विनय का। भगवन श्रीराम ने जब देखा कि समुद्र बिलकुल अपनी रुख में कोई परिवर्तन नहीं ला रहा है तो उन्होंने यह सन्देश दिया कि अहिंसा कोई कायर पुरुष का आभूषण नहीं है अपितु उसके शक्ति से भी अहिंसा की स्थापना संभव है। इस सन्दर्भ में एक सुप्रसिद्ध चौपाई है-

विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति।।

रामायण की कथा से हमें यह सीख मिलती है कि यदि आग्रह से जब काम न बने तो फिर भय से काम निकाला जाता है। श्रीराम ने बताया कि आत्मबल ही अहिंसा है। आत्मशक्ति ही अहिंसा है। जहाँ अहिंसा भय त्यागने से स्थापित होती है, वहाँ उसी तरह की अहिंसा हमारे लिए उत्कृष्ट है। इन सबके बाद जब समुद्र आकर अपनी गलती माँ लेता है तो उन्होंने किस भी शस्त्रास्त्र का प्रयोग नहीं किया है और वह पुनश्च मनुष्य में निर्भय क्षमा के मार्ग प्रशस्त किए। निर्भय क्षमा भी अहिंसा का सर्वोच्च अवस्था है। यह निर्भय से आगे की अवस्था है। अहिंसा का निर्भय क्षमा स्वरूप उसी से संभव है जो करुणा-दया-प्रेम के वश होकर अपनी विभिन्न शक्तियों के होते हुए भी आवश्यकता पड़ने पर अपनी पहचान के बाद भी कोई दंड नहीं देता और क्षमा का दमन थाम लेता है और किसी भी खल को क्षमा कर देता है। श्रीराम से हमें निर्भय क्षमा का एक महान स्वरूप मिला है।

‘अहिंसा के संदेशवाहक श्रीरामचन्द्र जी’ नमक आलेख में प्रियांशु सेठ ने लिखा है, ‘रामायण के अध्ययन से हमें यह उपदेश मिलता है कि श्रीरामचन्द्र जी वैदिक धर्म के मानने वाले आर्यशील पुरुष थे। बालकाण्ड सर्ग 1 श्लोक 12, 13, 14, 15, 16 में श्रीराम जी के यथार्थ गुणों का वर्णन इस प्रकार मिलता है- 'धर्मज्ञ, सत्य प्रतिज्ञा, प्रजा हितरत, यशस्वी, ज्ञान सम्पन्न, शुचि तथा भक्ति तत्पर हैं। शरणागत रक्षक, प्रजापति समान प्रजा पालक, तेजस्वी, सर्वश्रेष्ठ गुणधारक, रिपु विनाशक, सर्व जीवों की रक्षा करने वाले, धर्म के रक्षक, सर्व शास्त्रार्थ के तत्ववेत्ता, स्मृतिमान्, प्रतिभावान् तेजस्वी, सब लोगों के प्रिय, परम साधु, प्रसन्न चित्त, महा पंडित, विद्वानों, विज्ञान वेत्ताओं तथा निर्धनों के रक्षक, विद्वानों की आदर करनेवाले जैसे समुद्र में सब नदियों की पहुंच होती है वैसे ही सज्जनों की वहां पहुंच होती है। परम श्रेष्ठ, हंसमुख, दुःख-सुख के सहनकर्ता, प्रियदर्शन, सर्व गुणयुक्त और सच्चे आर्य पुरुष थे।' अयोध्याकाण्ड सर्ग 33 श्लोक 12 में भी उनकी महिमा का गायन इस प्रकार है- 'अहिंसा, दया, वेदादि सकल शास्त्रों में अभ्यास, सत्य स्वभाव, इन्द्रिय दमन करना, शान्त चित्त रहना, यह छ: गुण राघव (रामचन्द्र) को शोभा देते हैं।' (द्रष्टव्य: वैदिकट्रुथ,  अहिंसा के संदेशवाहक श्रीरामचन्द्र जी, प्रियांशु सेठ, 22 अगस्त, 2018)

भगवान श्रीराम को ‘दीन दयाल बिरिदु संभारी’ कहा गया है। यानि जो दीन, दुखी हैं, उनकी बिगड़ी बनाने वाले श्रीराम हैं। प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने प्रभु श्रीराम को दीनन के दीनदयाल बताते हुए आगे कहा है कि जीवन का ऐसा कोई पहलू नहीं है, जहां हमारे राम प्रेरणा न देते हों। भारत की ऐसी कोई भावना नहीं है जिसमें प्रभु राम झलकते न हों। भारत की आस्था में राम हैं, भारत के आदर्शों में राम हैं! भारत की दिव्यता में राम हैं, भारत के दर्शन में राम हैं! हजारों साल पहले वाल्मीकि की रामायण में जो राम प्राचीन भारत का पथ प्रदर्शन कर रहे थे, जो राम मध्ययुग में तुलसी, कबीर और नानक के जरिए भारत को बल दे रहे थे, वही राम आज़ादी की लड़ाई के समय बापू के भजनों में अहिंसा और सत्याग्रह की शक्ति बनकर मौजूद थे! तुलसी के राम सगुण राम हैं, तो नानक और कबीर के राम निर्गुण राम हैं!

भगवान श्रीराम के इस अलौकिक व सर्वशक्तिमान को सबने माना है। हर समय-काल में, हर व्यक्ति में, प्रत्येक संत की आराधना में जिस पारब्रह्म की कल्पना है उसे श्रीराम ही माना गया है और उसका सबसे अहम् गुण माना गया है उनकी दया। उनके भीतर सबके प्रति दया के भाव थे। वे कृपालु माने गए। वे शिव के भी आराध्य माने गए। ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च माने गए। ऐसे श्रीराम के बिना अहिंसा की अनुभूति भी कदाचित संभव नहीं है। अहिंसा की अनेक अभिव्यक्तियाँ भले उपनिषदों में मिलती हों। भले ही हमारे श्रुतियों व स्मृतियों में मिलती हैं लेकिन अहिंसा की श्रीराम समय-काल के जो व्याप्ति है, वह मनुष्य और प्रकृति की अनूठी प्रयोगशाला के हिस्सा थे और उससे निकली सीख श्रीराम और उनकी अहिंसा की व्याख्या हैं।

भारत में अब भगवान श्रीराम की मूर्ति स्थापना के बाद जो अहिंसक संस्कृति विकसित होनी चाहिए वह हम भारतीयों के मन में स्थापित होनी चाहिए। जैसे श्रीराम की मूर्ति व प्राण-प्रतिष्ठा में हमारी निष्ठा जुड़ी है, वैसे भगवान् श्रीराम के बताए रास्ते पर हमें चलने की आवश्यकता है। उनके द्वारा बताये गए अहिंसक व्यवहार हमारे जीवन के व्यवहार में परिलक्षित होने चाहिए। भारत में यदि किसी प्रकार की हिंसा न हो, सब सभी से प्रेम करें। सब सबका आदर करें। सह-अस्तित्व में विश्वास करें। करुणा, प्रेम, दया, परोपकार सबके जीवन का आभूषण बन जाए तो श्रीराम की असली स्थापना हम समाज की वाटिका में कर सकेंगे।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का अभीष्ट था कि सभी प्राणियों में सद्भावना हो। इसीलिए उनके समय को बहुत ही आदर के साथ स्मरण किया जाता है। लोग कहते हैं-रामराज्य हो। इसका अर्थ ही हुआ कि सबकी गरिमा की रक्षा जहाँ होती हो और जहाँ सभी खुशहाल हों। ऐसे स्वर्णिम काल को हम जीने के यदि इच्छुक हैं तो हमें यह समझना होगा कि अहिंसा ही उसकी सबसे बड़ी कुंजी है जो रामराज्य के लिए सही मार्ग प्रशस्त कर सकती है। हमें हमारी समझ से समृद्धि जिस दिन मिल जाएगी। निःसंदेह हम उस दिन भगवान श्रीराम को भी सही मायने में अपना सम्मान दे सकेंगे और अहिंसा का मार्ग अपनाकर सबके लिए अहिंसक वातावरण बना सकेंगे।

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