साक्षात्कार: प्रख्यात बाल-साहित्यकार डॉ दिनेश पाठक 'शशि'

दिनेश पाठक ‘शशि’

-प्रियंका खंडेलवाल


बाल-साहित्य मानव मन की सुंदर एवं श्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। जन्म के साथ ही मानव का जिज्ञासु मन अपने आस-पास की प्रकृति तथा वातावरण के अनसुलझे रहस्यों को समझने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहता है,पर इससे भी उसके मन की जिज्ञासु प्रवृत्ति शमित नहीं होती,वह अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति के शमन के लिए सदैव शोध में लगा रहता हैI शोध प्राय:खोज के अर्थ में प्रयुक्त एक प्रवाहमान क्रिया है। जिस प्रकार पेड़-पौधे,जीव-जंतु,ईश्वर आदि अनेक विषयों पर शोध कार्य चलता रहा है, उसी प्रकार बाल-स्वभाव भी साहित्यकारों के शोध का विषय बना रहा है।

देश के लिए ‘रीढ़ की हड्डी’ कहे जाने वाले बालकों के भविष्य को सँवारने का प्रयास वर्तमान में शांत, सरल एवं निश्चल स्वभाव से पूर्ण बाल-साहित्यकार डॉक्टर दिनेश पाठक 'शशि' द्वारा किया जा रहा है बालकों के मन में उठने वाली जिज्ञासाओं को शांत करने का प्रयास उन्होंने गद्य एवं पद्य साहित्य के माध्यम से किया है। उन्होंने बच्चों के लिए बहुत सरल और सुबोध भाषा में बाल-साहित्य लिखा है। बाल साहित्य को लेकर उनकी दृष्टि क्या है, आइये जानते हैं।

 
प्रियंका खंडेलवाल
प्रियंका खंडेलवाल: आपके अनुसार बाल-साहित्य की परिभाषा क्या है?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: ऐसा साहित्य जिसे सुनकर अथवा पढकर बच्चे का हृदय आल्हादित हो उठे। उसे प्रसन्नता का अनुभव हो। जिसमें बच्चों का बचपन झलकता हो। उसकी रुचि की शरारतों, उसके मनोभावों, अपेक्षाओं का जिक्र हो, साथ ही जिसके माध्यम से सीधे-सीधे कोई उपदेश न दिया गया हो अपितु कोई सीख, कोई अच्छी बात इस तरह रचना में पिरोई गई हो कि बच्चे को पता भी न चले और उस रचना को सुनकर अथवा पढ़कर उसके अन्दर स्वतः ही अच्छे संस्कारों, आदतों और स्वभाव का प्रादुर्भाव हो। बाल साहित्यकार के लिए बाल मनोविज्ञान की समझ के अभाव में यह सब सम्भव नहीं है। जिसका हृदय निर्मल है। जिसके अन्दर का बच्चा अभी भी जीवित है यानि जिसे अपने बचपन के खेलकूद, सैर-सपाटा, शरारतें आज भी याद हों और लुभाते हों वही मनोरम बाल साहित्य की रचना कर सकता है।

ऐसा बाल साहित्य जो बच्चे के सर्वांगीण विकास में सहायक बने। जो खेल खेल में बच्चे के अन्दर एकता, त्याग, शौर्य, स्वाभिमान व मानव मूल्यों के प्रति, अपने घर परिवार, समाज और देश के प्रति उत्तरदायित्व बोध पैदा करे।

प्रियंका खंडेलवाल: बाल साहित्य की ओर आपका झुकाव कब और कैसे हुआ?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’:
मेरा ऐसा मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर ईश्वर प्रदत्त लेखन प्रतिभा होती है। बात सिर्फ इतनी है कि कुछ की भावुकता और संवेदनशीलता, आस-पास की परिस्थितिओंवश इतनी अधिक प्रबल हो उठती हैं कि ईश्वर प्रदत्त उसकी लेखन प्रतिभा प्रकट होने लगती है। मेरे साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही हुआ। जब में कक्षा 6-7 का विद्यार्थी था तभी मुझे प्रख्यात साहित्यकारों की सभी तरह की रचनाएँ, बाल साहित्य सहित, प्रचुर मात्रा में पढ़ने का सुअवसर अपने एक सहपाठी नरेन्द्र सिंह राघव के भाई - जो सस्ता साहित्य मण्डल दिल्ली में नौकरी करते थे - के माध्यम से सुलभ हो गया।

वे अपने भाई के लिए अच्छी-अच्छी पुस्तकें लाते थे किन्तु नरेन्द्र सिंह की उन पुस्तकों में अधिक रुचि न होने के कारण मैं ही उनका मालिक था। इस प्रकार रवीन्द्र नाथ टैगोर, रांगेय राघव, फणीश्वर नाथ रेणु, गौरीशंकर राजहंस, अमृता प्रीतम, शिवानीजी के साथ-साथ ओमप्रकाश शर्मा, कर्नल रंजीत आदि के जासूसी उपन्यास भी मैंने प्रचुर मात्रा में पढ़ लिये थे। इतना ही नहीं पिताजी ज्योतिष एवं कर्मकाण्ड के विद्वान थे। आये दिन वी.पी.पी. से उनकी पुस्तकें आती रहती थीं जिन्हें व्यवस्थत रूप में बक्से में रखने के साथ-साथ मैं पढ़ भी लिया करता था। इस तरह मेरे बालमन पर विविध विषयों की पुस्तकों ने अपना-अपना प्रभाव एकत्रित कर दिया जिससे मेरी संवेदनशीलता में वृद्धि हुई।

शायद यही कारण था कि कक्षा ग्यारह में पढ़ने के लिए अपने गाँव से 12 किलोमीटर दूर कस्बा डिबाई में, मैं पहली बार जब किसी बड़ी पुस्तकालय में घुसा और वहाँ मैंने पराग, गुड़िया, नन्दन, चन्दामामा, लोटपोट, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान आदि सभी तरह की पत्र-पत्रिकायें पढ़ीं तो मुझे लगा कि ऐसा तो मैं भी लिख सकता हूँ।
ये बात सन् 1973 की है। मैंने घर आकर एक कहानी जैसा कुछ लिखा और उसे लोटपोट पत्रिका के पते पर भेज दिया। पन्द्रह दिन बाद वह रचना लौटकर आ गई लेकिन उसके साथ संपादक महोदय ने रचना भेजने के जो नियम संलग्न करके भेजे तो बस... मुझे रास्ता सूझ गया।

दरअसल मैं जब कक्षा छह का विद्यार्थी था तब मैं अपनी पुस्तकें लेकर खेत पर चला जाता था। खेत से चिपका हुआ एक आम का बाग था जिसमें बगीचे के मालिक की एक चारपाई भी पड़ी रहती थी। मैं उस चारपाई पर बैठकर ही पढ़ता रहता था। चारपाई के पास से ही बगीचे में एक पगडंडी थी जिसपर होकर साईकिल सवार एवं पैदल आने-जाने वालों आते-जाते रहते थे। उस पगडंडी पर चलने वालों को देखकर मेरे मन में विचार आते रहते थे। उसी विचार के आधार पर मैंने एक कहानी लिखी “सजा” जो सन् 1978 में चंपक में चालीस रुपये के मानदेय के साथ प्रकाशित हुई। उसने मुझे इतना प्रोत्साहित किया कि मैंने तुरन्त ही एक और कहानी लिख डाली जिसका प्रकाशन 60 रुपये के मानदेय के साथ भूभारती में हुआ और इस प्रकार मेरा लेखन चल निकला।

प्रियंका जी वैसे मैं आपको बता दूँ कि मेरा लेखन बाल साहित्य का और बड़ों के लिए भी, दोनों का लेखन एक साथ ही शुरू हुआ था। शुरू से ही मेरी एक रचना किसी बाल पत्रिका में प्रकाशित होती थी तो वहीं दूसरी रचना कादम्बिनी या नवनीत जैसी किसी बड़ी पत्रिका में भी।

प्रियंका खंडेलवाल: पुराने समय में परी कथाएँ, जादुई कहानियाँ,राजा-रानी की कहानियाँ बच्चे पढ़ते और सुनते थे आज के समय में यह कहानियाँ कितनी लाभप्रद हैं?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: चाहे परी कथाएँ हों, जादुई कहानियाँ हों या फिर राजा-रानी की कहानियाँ, बच्चों को तो सुनने में इस सभी में खूब आनन्द आता है। पहले के बच्चे तो इन सबको सुन-सुनकर ही बड़े हुए फर्क सिर्फ इतना है कि अब युग परिवर्तन बहुत तेजी से हो रहा हैं। ऐसे में आप कुछ भी लिखिए बच्चे वर्तमान से स्वयं ही जुड़कर जीना सीख रहे हैं।

जहाँ तक इन कहानियों से लाभ की बात है तो बालमन तो निश्छल होता है। वह इन कहानियों से भी शिक्षा ग्रहण कर सकता है यदि इन काल्पनिक कहानियों को उद्देश्यपरक रूप में प्रस्तुत किया जाये। उदाहरण के लिए मेरे बाल कहानी संग्रह ‘अनुपम बाल कहानियाँ’ की पहली कहानी ‘अनोखा दण्ड’ को लिया जा सकता है जिसमें एक परी कहानी के पात्र सुधीर को नियमित रूप से पढ़ाई किए जाने के महत्व को प्रतिपादित करके सुधीर की आदतों में सुधार करती है।

प्रियंका खंडेलवाल: बच्चे पंचतंत्र,हितोपदेश,विक्रम बेताल जैसी पुस्तकें पढ़ना पसंद करते हैं जबकि वर्तमान में लिखे बाल-साहित्य को पढ़ना कम पसंद करते हैं, क्यों?

डॉ. दिनेश पाठक ’शशि’: प्रियंका जी ऐसा नहीं है पंचतंत्र,हितोपदेश,विक्रम बेताल वही बच्चे उठाते हैं जिन्हें इन पुस्तकों के क,ख,ग के बारे में थोड़ा-बहुत किसी से जानकारी मिली होती है या फिर इनके अन्दर के चित्रों के प्रति आकर्षित होकर उठाते हैं।

वर्तमान में लिखे बाल-साहित्य में कोई कमी नहीं है, बस कमी है तो यह कि यथार्थ साहित्य का प्रचार-प्रसार इन उक्त तीनों पुस्तकों की तरह नहीं हो पा रहा। साथ ही सहज उपलब्ध सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों, वाट्सअप आदि ने बच्चों को उस तरफ मोड़ दिया है। जो मनोरंजन उन्हें वीडियो के रूप में सहज ही में मिल रहा है तो फिर पुस्तक और पत्रिकाओं में आँख गड़ाकर क्यों मेहनत की जाये।

प्रियंका खंडेलवाल: बच्चों को बाल साहित्य से कैसे जोड़ा जाए?

डॉ. दिनेश पाठक ’शशि’: आज के बच्चों को बाल साहित्य से जोड़ना हो तो घर में अभिभावकों को और विद्यालयों में अध्यापकों को ऐसा माहौल पैदा करना होगा कि अधिक नही तो कम से कम एक घंटे के लिए बच्चा बाल साहित्य की पत्र-पत्रिकाओं को जरूर पढ़े।

इसके लिए अन्य कार्यो की भाँति ही घर पर बच्चे की समय-सारणी में पत्र-पत्रिकाओं के पढ़ने का समय निर्धारित करें और उन्हें प्रेरित करने के लिए स्वयं भी उनके साथ बैठे। आप चाहें कि खुद तो मोबाइल पर फेसबुक और वाट्सअप चलाते रहें और बच्चा पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ने लगे तो यह एकदम नामुमकिन है। अभिभावकों को पहले स्वयं के व्यवहार पर नियंत्रण रखना होगा। पत्र-पत्रिकाओं के महत्व से उनको अवगत कराना होगा।
इसी तरह विद्यालय की पुस्तकालय में भी आवश्यक रूप से एक घंटे का समय तय किया जाना चाहिए जिसमें पुस्तकालय अध्यक्ष भी इस कार्य में रुचि लेने वाला होना चाहिए।

प्रियंका खंडेलवाल: बाल साहित्यकार बनने के लिए कौन सी सामग्री का अध्ययन आवश्यक है?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: बाल साहित्यकार वही बन सकता है जिसके अन्दर भावुकता, संवेदना और बाल मनोविज्ञान की पकड़ हो। कल्पना की उड़ान भरना अच्छा लगता हो। आप किसी भी उम्र के हों, अगर आपको अपने बचपन की अच्छी-बुरी बातें और अपनी शरारतें आज भी लुभाती हैं। अकेले में मुस्कराने पर मजबूर करती हैं तो निश्चित ही आप अपने छोटे पुत्र-पुत्री या नाती-पोते , अथवा पड़ोस के बच्चे की शरारतों, उसके खेलने कूदने और विशेष बातों को सूक्ष्मता से पकड़ पायेंगे और आपकी लेखनी से बाल साहित्य का सृजन होने लगेगा। अच्छे साहित्यकारों की रचनाएँ पढ़ना इसमें उत्प्रेरक का काम करती हैं।

प्रियंका खंडेलवाल: बच्चों के बहुमुखी विकास में वर्तमान बाल-साहित्य की भूमिका को आप किस प्रकार देखते हैं?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: बहुमुखी विकास की बात तो तब हो न जब बच्चे बाल साहित्य पढ़ें। आज संचार क्रान्ति के इस युग में स्थिति इतनी भयानक है कि बाल साहित्यकार जो लिखता है उसके लिखे को पढ़ना बाल पत्रिकाओं के संपादक की मजबूरी है। उसके बाद अधिकांशतः साहित्यकार ही पढ़ते हैं या समीक्षक या फिर साहित्यिक आयोजन करने वाली संस्थाएँ। बच्चों को वाट्सअप, फेसबुक और अन्य मीडिया साधनों द्वारा जुटाये गये मनोरंजनों से ही फुर्सत नहीं है। वर्तमान में बच्चों द्वारा पढ़े जाने का प्रतिशत निकाला जाये तो न के बराबर ही बैठेगा।

प्रियंका खंडेलवाल: आज के समय में प्राथमिक शिक्षा में बाल- साहित्य की स्थिति कैसी है?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: प्राथमिक शिक्षा में बच्चों के पाठ्यक्रम में जो कहानी, कविता या एकांकी आदि समाहित किए जाते हैं, उन्हें अधिकांश अध्यापक केवल कोर्स पूरा कराने के उद्देश्य से पढ़ाते हैं क्योंकि उन्हें भी उसमें कोई दिलचस्पी नहीं होती और बच्चे भी केवल पास होने के उद्देश्य से ही उसे ग्रहण करते हैं। जो अध्यापक स्वयं भी लेखन कार्य से जुड़े हैं , उनके द्वारा ही बच्चों को बाल साहित्य में रुचि पैदा करने की उम्मीद जगती है।

प्रियंका खंडेलवाल: वर्तमान बाल साहित्य में संस्कार, संस्कृति और चारित्रिक विकास पर कितना ध्यान दिया जा रहा है?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: बच्चे के भावों की प्रवणता उसके लालन-पालन और पारिवारिक परिवेश पर निर्भर करती है। जहाँ तक बाल साहित्य की बात है, साहित्यकार का ध्येय हमेशा से ही बच्चे को अपनी संस्कृति से जोड़कर संस्कारित करने का और चरित्र निर्माण का रहा है और आज भी है। जो साहित्यकार ऐसा नहीं करते वे अपने लेखकीय दायित्वों का निर्वहन करने में असफल कहलाएंगे।

प्रियंका खंडेलवाल: शिक्षा की बढ़ती व्यवसायिकता में बाल साहित्य की स्थिति कैसी है?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: शिक्षा की व्यवसायिकता के तले दबकर रह गया है बच्चों का बचपन। स्कूल में पढ़ाई फिर होम वर्क और उसके बाद ट्यूशन, बच्चों का सारा समय बंधुआ मजदूर की भाँति ही बीत जाता है। माता-पिता सोचते हैं कि उनके  लाड़ले  एक दिन में ही कलक्टर बन जाएँ। न खेलने-कूदने का समय और न बाल साहित्य को पढ़ने का ही। रही सही कसर मोबाइल और टी.वी. ने पूरी कर दी है। बच्चे के वजन से अधिक बस्ते का वजन है जिसे ढोते-ढोते बच्चे की कमर और कंधे दर्द करने लगते हैं।

बच्चा दो-ढाई वर्ष का होते ही सब माता-पिता उम्मीद करने लगते हैं कि उनका बच्चा इतना योग्य हो कि उसका नाम तुरन्त गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज हो जाये।

पहले के बच्चे अपने बचपन को स्वतंत्र होकर जीते थे। अन्य बच्चों के साथ मिलकर कबड्डी, खो-खो, लुका-छुपी, इकटंगा, कंचा, गुल्ली-डंडा, खेलना-कूदना, पैता कूदना आदि उनके खेल हुआ करते थे किन्तु आज टी.वी. और मोबाइल ने बच्चों को घर के अन्दर कैद कर दिया है।

इस तरह अगर सही मायने में कहा जाय तो आज का बच्चा बहुत सारे दबावों के बीच अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। निश्चित ही इसके लिए शिक्षा नीति में भी परिवर्तन की आवश्यकता है। 

प्रियंका खंडेलवाल: आपको बाल कविता, कहानी, उपन्यास, लोरी, पहेली आदि में से कौन सी विधा पसंद है और क्यों?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: अगर लिखने की बात करें तो मुझे बाल कहानी एवं बाल उपन्यास लिखना रुचिकर लगता है। जहाँ तक पढ़ने की बात है, मैं सारी विधाओं की पुस्तकें पूरे मनोयोग से पढ़ता हूँ क्योंकि पुस्तकों की भूमिका लेखन और समालोचना हेतु मेरे पास सभी विधा की पुस्तकें प्रचुर मात्रा में आ जाती हैं जिनको पढ़कर मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलता है।

जहाँ तक आपकी “क्यों” का सवाल है तो आपको बता दूँ कि मैं प्रारम्भ से ही विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूँ। इंजीनियरिंग करते ही रेलवे में आ गया जहाँ चौबीसों घन्टे बन्धन और तनाव की नंगी तलवार लटकी ही रहती है। काव्य का सृजन चाहे बड़ों के लिए हो या बच्चों के लिए, मेरी समझ से वह मेरे जैसी परिस्थितियों के व्यक्ति के लिए बहुत कठिन है। या फिर कह सकते हैं कि पद्य लेखन में माँ सरस्वती की कृपा से मैं वंचित सा ही रहा हूँ। कुल 41 पुस्तकें मूल और 17 पुस्तक मेरे द्वारा सम्पादित हैं किन्तु पद्य विधा में मात्र दो ही पुस्तक मैंने लिखी हैं।

प्रियंका खंडेलवाल: बाल साहित्य में बाल गजल,बाल लघुकथा,बाल व्यंग्य आदि नये प्रयोग कितने उचित हैं?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: सच तो यह है कि बच्चों को गजल,व्यंग्य और लघुकथा का भेद तो पता होता नहीं। वे तो कहानी जानते हैं या फिर कविता। बच्चों को जो रचना रुचिकर लगे, वही पास। बाकी की सब फेल फिर चाहे आप बड़े-बड़े ख्याति प्राप्त साहित्यकारों और विशेषज्ञों से उसका उल्लेख करायें या समीक्षा में लम्बे-चौड़े पुल बंधवायें।

प्रियंका खंडेलवाल: क्या कारण है कि आज बच्चे अपना अधिकांश समय टी.वी. को देखने और कंप्यूटर पर खेल खेलने में निकाल देते हैं?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: टी.वी. हो या इण्टरनेट, दोनों ही जगह अच्छी और बुरी, सभी तरह की सामग्री भरपूर है। बच्चेां का मस्तिष्क चूंकि इतना परिपक्व नहीं होता कि बुरे और अच्छे का भेद कर सके तो ऐसी स्थिति में जो चीज उन्हें आसान सी लगती है और जिसमें उन्हें हवाई किले बनाने की पूर्ण स्वतंत्रता मिलती है, वे उसी ओर झुक जाते हैं। बहुत सारे टी.वी. सीरियल बच्चों को वास्तविक जिन्दगी से दूर हवाई किले बनाने की मानसिकता प्रदान करते हैं तो वहीं मोबाइल, इण्टरनेट पर बहुत से गेम बहुत-बहुत खतरनाक चल रहे हैं जिनके आदी होने पर बच्चे बहुत बड़ी संख्या में आत्महत्या तक कर रहे हैं।

प्रियंका खंडेलवाल: बाल साहित्य में आलोचनात्मक लेखन की स्थिति पर आपके क्या विचार हैं?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: ऐसा कहा गया है कि जिस भाषा के साहित्य में बाल-साहित्य का अभाव हो अथवा वह हीन कोटि का हो; तो उस राष्ट्र एवं उस भाषा के साहित्यकारों को जागरूक नहीं माना जा सकता। 
क्योंकि बच्चे ही देश के भावी कर्णधार होते हैं। स्वस्थ बाल साहित्य केवल बच्चों का मनोरंजन ही नहीं करता अपितु उनकी मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी करता है और उन्हें एक अच्छा देशभक्त नागरिक बनाने में सहायक सिद्ध होता है।

विश्व-कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे अतल-स्पर्शी रहस्यवादी महाकवि ने भी बाल-साहित्य लिखा है फिर भी जाने क्यों अन्य विधाओं की तुलना में बाल साहित्य में आलोचनात्मक लेखन का नितान्त अभाव सा महसूस किया जाता रहा है।

प्रियंका जी जाने क्यों बाल साहित्य के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता रहा है। पुरस्कारों के क्षेत्र में भी अगर देखें तो बाल साहित्यकारों को केवल उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के सबसे बड़े बाल साहित्य पुरस्कार “बाल साहित्य भारती” पुरस्कार की राशि ढाई लाख रुपये है उसके अलावा कोई भी संस्था बड़ा पुरस्कार नहीं देती। पत्र-पत्रिकाओं में एवं गोष्ठियों आदि में भी आलोचनात्मक कार्य की महती आवश्यकता है।

हाँ, अच्छी बात यह है कि अब बाल साहित्य के शोधार्थियों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। यहाँ तक कि प्रख्यात साहित्यकार पद्मश्री डॉ. उषा यादव जी की सुपुत्री डॉ. कामना सिंह ने बाल साहित्य पर पहली डी.लिट् की उपाधि प्राप्त करके कीर्तिमान स्थापित किया है।

प्रियंका खंडेलवाल: आज के समय में पत्र-पत्रिकाओं में बाल साहित्य की स्थिति पर आपका क्या कहना चाहेगे?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: पत्र-पत्रिकाओं में बाल साहित्य की बात करें तो सम्पादक के पास जो रचनाएँ पहुँचती हैं, उसे उन्हीं में से अपनी पत्रिका के प्रत्येक अंक की सामग्री का चयन करना होता हैं। ऐसे में कुछ बाल पत्रिकाएँ हैं जो किसी तरह का समझौता नहीं करतीं। उन्हें वही साहित्य प्रकाशित करना है जो उनकी पत्रिका के फ्रेम में फिट बैठता हो। कुछ ऐसी बाल पत्रिकाएँ भी हैं कि जो मिल गया सो प्रकाशित कर दिया।

यद्यपि व्यवसायिकता के चलते पराग, नन्दन, बालहंस, बालक, बाल नगर, बाल मंच, बाल पताका और बाल साहित्य की धरती, जैसी कई उत्कृष्ट बाल पत्रिकाओं का प्रकाशन बन्द हो जाना तथा अनेक दैनिक पत्रों के रविवासरीय से बाल साहित्य का समाप्त हो जाना सोचनीय है तो भी उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ से ‘बालवाणी’, पटना बिहार की बाल पत्रिका ‘बाल किलकारी’, बस्ती से प्रकाशित हो रही बाल पत्रिका ‘बाल किरण’, रामसमंद से प्रकाशित ‘बच्चों का देश, इन्दौर से ‘देवपुत्र’ , चिरैया, दिल्ली से बाल भारती, चंपक, आदि जैसी बाल पत्रिकाएँ और भोपाल बाल शोध केन्द्र का पत्र ‘अपना बचपन’ आदि आश्वस्त करते हैं।

प्रियंका खंडेलवाल: आपके अनुसार बालक और बाल साहित्य के प्रति सरकारी संस्थाओं का दृष्टिकोण क्या है?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: मैं पहले भी कह चुका हूँ कि बालक और बाल साहित्य दोनों के प्रति ही सरकारी संस्थाओं का सौतेला व्यवहार चला आ रहा है। वे बाल साहित्य को बड़ों के साहित्य की श्रेणी में रखकर देखने से कतराती हैं। 

प्रियंका खंडेलवाल: आपके बाल साहित्य रचनाकर्म के आरम्भ से आज तक में आप बाल साहित्य में क्या परिवर्तन देखते हैं?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: मैंने सन् 1973 के आस-पास अपना लेखन-प्रकाशन प्रारम्भ किया था। उस समय की बाल पत्रिकाओं जैसे नन्दन, पराग, गुड़िया, चंदामामा, बालक, आदि में प्रकाशित होने वाली रचनाओं का एक विशेष गुण यह होता था कि इन सबमें किसी की भी रचनाएँ मिश्रित जैसी नहीं होती थीं। मेरे कहने का आशय हैं कि प्रत्येक पत्रिका की रचनाओं में कुछ विशिष्ट होता था। आजकल ऐसा नहीं देखने में आता। आज लगभग एक से ही पैटर्न पर कई पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो रही है।

दूसरी बात यह कि आज कम्प्यूटर और लैपटाप, मोबाइल के युग में रचनाओं का स्वरूप पहले से बहुत कुछ बदल चुका है। पहले जहाँ राजा-रानी, पेड़-पौधे और जानवरों को पात्र बनाकर बहुतायत में कहानियाँ लिखी जाती थीं। आज वैज्ञानिक यंत्रों, कम्प्यूटर, लैपटाप, मोबाइल आदि से सम्बन्धित रचनाएँ प्रमुखता से लिखी व प्रकाशित की जा रही हैं।

प्रियंका खंडेलवाल: बाल साहित्य के उन्नयन में आपके द्वारा किया कौन सा कार्य है जो आपको संतुष्टि प्रदान करता है?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: मुझे बाल साहित्य की अपनी रचनाएँ तो संतुष्टि प्रदान करती ही हैं, साथ ही बाल साहित्य के उन्नयन के लिए मैंने अपने पिताश्री की स्मृति में 25 वर्ष पहले एक समिति का गठन किया था, ”पडित हरप्रसाद पाठक स्मृति बाल साहित्य पुरस्कार समिति मथुरा“ जिसके माध्यम से गत 25 वर्ष से प्रत्येक वर्ष बाल साहित्य में अच्छा लेखन करने वाले एक साहित्यकार को पुरस्कृत तथा 8-9 बाल साहित्यकारों को सम्मानित करने का कार्य किया जा रहा है।

इस समिति की जो विशिष्ट बात जो मुझे संतुष्टि देती है वह यह कि इसमें छोटे या बड़े साहित्यकार का नाम देखकर सम्मानित नहीं किया जाता बल्कि प्रविष्टि के रूप में आई सभी पुस्तकों को बच्चे ही पढ़ते हैं तथा बच्चे ही स्तरीय पुस्तकों का चयन कर निर्णायक की भूमिका निभाते हैं। अन्य अनेक स्वनामधन्य संस्थाओं की तरह नहीं कि बच्चे के लिए लिखे गये साहित्य की गुणवत्ता के निर्णायक मण्डल में बड़े-बड़े ख्याति प्राप्त साहित्यकारों को रखा जाता है जो चयन करते समय बड़े-बड़े नामधारी और पुरस्कार प्राप्त साहित्यकारों के नाम का ही चयन करते हैं।

प्रियंका खंडेलवाल: आपके अनुसार साहित्यकारों को बाल-साहित्य लिखते समय किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: बच्चे को आप जबरदस्ती कुछ नहीं पढ़वा सकते। बच्चा वही साहित्य पढ़ना पसंद करता है जिसमें उसे उपदेशों की भरमार नहीं लगती। ऐसी रचनाएँ जिनमें बच्चे का मनोरंजन भी हो और परोक्ष रूप से कुछ शिक्षा भी निहित हो, सहज, सरल, छोटे-छोटे वाक्यों में बच्चों के मनोविज्ञान को समझते हुए जो कहानियाँ लिखी जाती हैं जिनमें शिक्षा तो होती है किन्तु सीधे-सीधे उपदेश नहीं होते, बच्चे सहज ही पढ़ डालते हैं।
यही बात बाल कविताओं व बाल साहित्य की अन्य विधाओं पर भी लागू होती है। आजकल बाल कविता के नाम पर जाने क्या-क्या लिखा जा रहा है। बाल मन को भाने वाली छोटे-छोटे लुभाते वाक्यों वाली कविताएँ अब बहुत कम हो गई हैं।

प्रियंका खंडेलवाल: विज्ञान बाल साहित्य के बारे में आपका सुझाव?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: तस्लीम संस्था के महामंत्री डॉ. जाकिर अली रजनीश के अनुसार, ”हिन्दी विज्ञान कथा की शुरुआत हुए सौ वर्ष से अधिक हो गये हैं लेकिन इसके बावजूद यह विधा अपनी पहचान के संकट से ग्रस्त हैं।” 
लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता। बाल साहित्य में कई साहित्यकार हैं जो बहुत अच्छी-अच्छी विज्ञान कथाएँ लिख रहे हैं। श्री देवेन्द्र मेवाड़ी जी की तो ‘मेरी विज्ञान कथाएँ’, विज्ञान और हम,‘सौर मण्डल की सैर’ आदि एक दर्जन से अधिक लोकप्रिय विज्ञान कथाओं की पुस्तकें तथा 1500 से अधिक विज्ञान कथा सम्बन्धी आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। श्री संजीव जायसवाल संजय की “मानव फैक्स मशीन” और “फिर सुबह होगी”, डॉ.शकुन्तला कालरा जी का बाल विज्ञान कथा संग्रह ‘चमत्कार का रहस्य’, श्रीमती शशि पाठक का बाल उपन्यास ‘ग्रहों की अनोखी दुनिया’, श्री राजीव सक्सेना जी की ‘प्रेाफेसर खुराना का क्लोन’, सॉफ्टवेयर रेनबो, स्टोरी मशीन जैसे विज्ञान बाल कथा संग्रह और ‘पैरा टाइम पुलिस’, शालोक की टाइम मशीन’ तथा एलियन’,‘रोबो सिटी’ जैसे प्रसिद्ध विज्ञान बाल उपन्यास’,श्री रमाशंकर जी की “मिशन ब्लू प्लैनेट” ‘अन्तरिक्ष का स्वप्निल लोक’,‘मिशन इम्पॉसिबल’ उपन्यास,‘नदी की पुकार’ एकांकी,‘एन्थिक्स का हमला’ लघु बाल उपन्यास, श्री विजय कुमार विसा ‘चन्द्र’ की ‘अंतरिक्ष की सैर’, साबिर हुसैन की ‘पीली पृथ्वी’ सभी विज्ञान आधारित पुस्तकें हैं और सुश्री कल्पना कुलश्रेष्ठ की ‘साइगा का ग्रह’ और स्वयं जाकिर अली रजनीश जी की ‘समय के पार’, ‘गणित का जादू’, ‘चमत्कार’, ‘विज्ञान की कथाएँ’, ‘ह्यूमन ट्रान्समिशन और अन्य विज्ञान कथाएँ’, ‘चाकलेट’, ‘मिशन आजादी’ आदि कई कहानी संग्रह एवं उपन्यास आये हैं।

मेरे विचार से विज्ञान बाल साहित्य बच्चों के मस्तिष्क को काफी सक्रियता प्रदान करता हैं।

प्रियंका खंडेलवाल: साहित्य या बाल साहित्य में क्या अन्तर है?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: मेरे विचार से बाल साहित्य साहित्य का ही हिस्सा है किन्तु प्रत्येक साहित्य बाल साहित्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है।

प्रियंका खंडेलवाल: अब आपकी अनुमति से, एक-दो व्यक्तिगत प्रश्न भी आपसे पूछना चाहूंगी कि आप शुरू से ही विज्ञान के छात्र रहे। रेलवे में भी विद्युत इंजीनियर के बहुत जिम्मेदारी वाले पद पर रहे तथा मेरी जानकारी में आया है कि आपकी पत्नी लम्बे समय से अस्वस्थ रही हैं, ऐसे में आपका साहित्य की ओर झुकाव और पारिवारिक विषम परिस्थितियों के बावजूद लेखन का निर्वाह,कैसे सम्भव हुआ?

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: प्रियंका जी मैंने प्रारम्भ में ही यह बात कही थी कि प्रत्येक प्राणी के अन्दर ईश्वर प्रदत्त लेखन प्रतिभा होती है, निर्भर करता है उसके पारिवारिक परिवेश और स्थितियों पर कि जिनके कारण उसकी भावुकता और संवेदना का स्तर इतना हो जाये कि वह लेखन की ओर प्रवृत्त हो। फिर चाहे वह विज्ञान विषय का व्यक्ति हो या कला का।

 यद्यपि विज्ञान क्षेत्र का होते हुए भी मैंने रेलवे की नौकरी करते हुए, अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ने के चौदह वर्ष बाद स्नातक किया फिर स्नातकोत्तर की परीक्षा दी और फिर सन् 2002 में श्री छत्रपति शाहू जी महाराज विश्व विद्यालय कानपुर से पी.एचडी. भी की। 

दूसरी बात रेलवे की तकनीकी विभाग की नौकरी बहुत ही तनावपूर्ण होती है। चौबीस घंटे में न जाने कब रेलगाड़ियाँ सेक्शन में खड़ी हो जायें। उसी समय स्टाफ को लेकर आपको जाना ही पड़ेगा फिर चाहे वर्षा हो रही हो, ओले पड़ रहे हों या कुहरे की रात में कुछ भी दिखाई न दे रहा हो।

तीसरी बात कि विवाह के चार वर्ष बाद ही पत्नी का सीधा भाग सिर से पैर तक लकवाग्रस्त हो गया। ऐसी स्थिति में अस्पतालों के आइ.सी.यू. कक्ष में बैठ-बैठ कर मैंने बहुत सा कार्य किया तो कभी रात के दो बजे से चार बजे के बीच लिखता रहा हूँ। लेखन प्रकाशन तो सन् 1975 से ही प्रारम्भ हो गया था। इन परिस्थितियों में भी किसी न किसी प्रकार सामंजस्य बैठाकर लिखता ही रहा हूँ भले ही अधिक न सही, थोड़ा ही सही। दरअसल मैं गॉडफेथ यानि ईश्वर में प्रगाड़ श्रद्धा वाला व्यक्ति हूँ। अपने जीवन में मैंने जो कुछ भी किया है ईश्वर की कृपा से ही सम्भव हुआ है और सच तो यह है कि यदि मैं साहित्य लेखन से न जुड़ा होता तो अपने जीवन में जिन विषमताओं से जूझा हूँ उनमें आगरा के पागलखाने में भर्ती हो गया होता। साहित्य व्यक्ति को बहुत बड़ा सम्बल प्रदान करता है। ऐसा मेरा अनुभव है।

प्रियंका खंडेलवाल: अब एक आखिरी प्रश्न, आपके साहित्यिक प्रदेय के लिए भारत सरकार का प्रेमचंद पुरस्कार, श्री लाल बहादुर शास्त्री पुरस्कार और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ के अमृतलाल नागर बाल कथा सम्मान, श्रीधर पाठक नामित पुरस्कार साथ ही उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ से बाल साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार ‘बाल साहित्य भारती’ प्रदान किया गया था। 25 जुलाई 2023 को मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी भोपाल से गजानन माधव मुक्तिबोध पुरस्कार मिला था तो अनेक साहित्यिक संस्थाओं ने आपको पुरस्कृत सम्मानित किया है। जब कोई ऐसा पुरस्कार मिलता है तो आप कैसा महसूस करते हैं।

डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि’: प्रियंका जी, पुरस्कार या सम्मान मिलने पर हर्ष होना तो मनुष्यमात्र का स्वाभाविक गुण है। मैं भी उन्हीं में से एक साधारण सा इंसान हूँ इसलिए हर्ष तो होता ही है लेकिन प्रत्येक पुरस्कार/सम्मान और अधिक दायित्वबोध भी कराता है कि अपनी लेखनी से ऐसा सृजन करो जो देश हित में हो। जिससे सामाजिक सौहार्द में वृद्धि हो। जो मानव मात्र को सद्मार्ग का पथप्रदर्शन करे। देश के भावी नागरिक यानि बच्चों के सर्वागींण विकास में सहायक हो।
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