सहज जीवन, दार्शनिक चिन्तन और प्रेम की गहरी भावनाओं से भरी कविताएँ

विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: टोह (कविता संग्रह)
कवयित्री: अनीता सैनी 'दीप्ति'
मूल्य: ₹ 150/-
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर


लेखन का सम्बन्ध जीवन से है, जीवन से जोड़कर ही देखा जाना चाहिए और प्रायः सभी रचनाकार अपना जीवनानुभव ही लिखते हैं। हम जिस समाज में रहते हैं, वहाँ बहुत कुछ हमारे जीवन को प्रभावित करता रहता है। लेखक उन विसंगतियों, विकृतियों, जटिलताओं व सुखद संगतियों की चर्चा करते हैं और सावधान, सचेत करते रहते हैं। कविता केवल आनंद की वस्तु नहीं है बल्कि वह हमारे हृदय में संवेदना जगाती है और आलोक फैलाती है। कोई अपने दुख से पीड़ित होता है, स्वाभाविक है, साथ ही साहित्य हमें दूसरों की पीड़ा के साथ खड़ा होना सिखाता है। वह हमारे भीतर की प्राण-चेतना को स्पंदित करता है और हमें उत्साहित करके जीवन्त बनाता है। श्रेष्ठ काव्य के पीछे मनुष्य और उसकी संवेदनाएँ होती हैं। सहमति/असहमति के बावजूद हर लेखक, कवि अपना धर्म निभाते हुए मनुष्य और उसके जीवन की उत्तम, सार्थक व्यवस्था के लिए लिखता है। हर रचनाकार के लेखन पर सहजता से विचार करना चाहिए, उसके लेखन की भाव-भूमि और उसके संघर्ष को समझना चाहिए परन्तु किसी भी परिस्थिति में सिरे से खारिज करने की प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए।

विजय कुमार तिवारी
अभी जयपुर, राजस्थान की कवयित्री अनीता सैनी 'दीप्ति' का दूसरा काव्य संग्रह "टोह" मेरे सामने है। इस संग्रह में गीत, नवगीत के साथ-साथ उनकी कुल 78 कविताएँ संग्रहित हैं। कवि, लेखक, समीक्षक राजाराम स्वर्णकार ने इस संग्रह को लेकर विस्तृत विवेचना की है। उन्होंने लिखा है-'कवयित्री ने मन की अनेक परतें इन कविताओं में खोली हैं और पाठकों की आँखों में उल्लास और उजास भरने का प्रयत्न किया है।' उन्होंने यह भी माना है- 'ये कविताएँ प्रेम से सनी हुई हैं, पर प्रेम के नाटक से नहीं। देह-तृष्णा से इनका कुछ भी लेना देना नहीं है। इनमें कुछ कविताएँ आध्यात्मिक मन की उपज हैं, पर उनमें पाखण्ड का अध्यात्म नहीं है। ये मन की छटपटाहट से उपजती हैं न कि मन की वायवीय तरंगों से।' डा० ऋचा शर्मा ने ''अनंत संभावनाओं की कविताएँ'' शीर्षक से सहज, सटीक टिप्पणी की है। वैसे ही कल्पना मनोरमा ने ''माटी की खुशबू और पीढ़ियों के दर्द की कविताएं'' शीर्षक के अन्तर्गत इन कविताओं पर सम्यक चिन्तन किया है। रवीन्द्र सिंह यादव ने लिखा है- ''स्त्री विमर्श, किशोर वय के अन्तर्द्वन्द्व, आध्यात्मिक चेतना से लेकर प्रकृति चित्रण तक कविताओं में गहन भावों और टोही दृष्टिकोण की प्रधानता है।'' इस तरह इतने सम्यक और पर्याप्त विवेचनाओं के बाद और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है।

'बुद्ध' कविता में ममता के पदचाप, मानवता की छाप, पंछी के आलाप और समता के हर जाप में बुद्ध निर्विकार, प्रबुद्ध, मौन व करुणा से भरे हुए दिखाई देते हैं। 'टोह' प्रेम भरी प्रबल भावनाओं को विस्तार देते हुए नायिका के साज-श्रृँगार और मधुरतम समर्पण भावों को दिखाती है। कवयित्री के पास हर भाव-विचार के लिए सम्यक शब्द हैं, शैली और रस, छन्द, अलंकार हैं। 'कैसे लिखूँ?' प्रेम के गहनतम चिन्तन भाव की कविता है जिसे व्यक्त कर पाना सहज नहीं है। उनकी कविताओं में बिंब चमत्कृत करते हैं, कोई आलोक फैलाते हैं और पाठक मन को बाँधते हैं। वह इसे बोधगम्यता कहना चाहती हैं और चित्र खींचती है, गहराई तक बेधने वाला। 'सुन रहे हो न तुम!' कविता में व्यापक चिन्तन करते हुए कविता को परिभाषित करने का प्रयास उनकी गहरी समझ प्रदर्शित करती है-कविता साधना है/तपस्या, तप है किसी का/भूलोक पर देह छोड़/भावों के अथाह सागर में/ मिलती है कविता/ भाव उलझते हैं देह से/देह सहती है असहनीय पीड़ा/तब बहती है कविता। कविता प्राण है, किसी की आत्मा, किसी का प्रेम, किसी का स्वप्न, किसी का त्याग और किसी की वर्षों की तपस्या की देह है। वह विष का प्याला पीती मीरा है, कान्हा के संग थिरकती राधा है और बार-बार अग्निपरीक्षा से गुजरती सीता है। उनकी सहज भावनाएँ देखिए-तुम रौंदते हो वह रो लेती है/तुम सहारा देते हो वह उठ जाती है/तुम प्रेम करते हो वह खिलखिला उठती है। यह बिंब भी देखिए-कविता/कोकून में लिपटी तितली है/उड़ती है/बस उड़ती ही रहती है।

हर वर्ष हमारे लिए नए-नए संदेश लाता है, कवयित्री के साथ वर्ष 2022 कहता है- "मैं उल्लास लाया हूँ, साहस का पता, कटोरा भर उजास लाया हूँ और स्वयं प्रीत का लिबास पहनकर आया हूँ।" 'विरह' प्रतीक्षारत विरही जीवन की वस्तुस्थिति से ओतप्रोत कविता है। वह नाना तरह की अनुभूतियों से गुजरती रहती हैं और नाना दृश्य बिंबों में उन भावनाओं को 'दिल की धरती पर' कविता में संजो देती हैं। 'संकेत' कविता पीड़ादायक स्थितियों की ओर इंगित करती है-प्रकृति का असहनीय पीड़ा को/भोगी बन भोगते ही जाना/संकेत है धरती की कोख में/मानवता की पौध सूखने का। उनके पास बिंब भरे पड़े हैं, वे जीवन के नाना प्रसंगों से जोड़ती रहती हैं, प्रश्न करती हैं, उत्तर तलाशती हैं, भीतर ही भीतर बेचैन होती हैं और गहन अनुभूतियों के साथ 'मरुस्थल' कविता लिखती हैं। प्रबल भावनाएँ अक्सर दायरे में बँध नही पातीं, यह उनका भटकाव नहीं बल्कि उड़ान है जिसे पाठक एक कविता को दूसरी से जोड़कर समझ सकते हैं। 'हूँ' देखने में सहज संवाद, सीधी-सादी बातचीत की कविता लगती है परन्तु भाव बहुत गहरे हैं जिसे प्रेमी, प्रतीक्षारत मन ही समझ सकता है। 'निमित्त है तू' जीवन में हौसला भरती, आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती, दार्शनिक चिन्तन की कविता है। कवयित्री के मन की परतें खुलती हैं इन कविताओं में, उनके जीवन में धैर्य और प्रतीक्षा है, भावनाओं का उबाल है। 'तर्कशील औरतें' की पंक्तियाँ देखिए- तर्कशील औरतों ने/भटकाव को पहलू में/बिठाना छोड़ दिया है/लीक पर चलना/सूरज के इशारे पर/छाँव की तलाश में/पेड़ की परिक्रमा करना/सामाजिक वर्जनाओं को/धारण करना भी छोड़ दिया है। यह एक तरह का विरोध या बगावत है। यह पंक्ति बहुत कुछ कह देती है-उपेक्षाओं के परकोटे को तोड़/रिक्तता की अनुभूति उन्हें/ऊर्जावान/और अधिक ऊर्जावान बनाती है। गहन बेचैनी, पीड़ा के नाना उदाहरणों से भरी कविता है 'उसके तोहफे' और शायद कवयित्री का मन किसी व्यंग्य भाव से भरा हुआ है। उनकी कविताओं का आसमान बड़ा है, बहुत कुछ समेट लाता है-संगतियों-विसंगतियों के अनेकों दृश्य। 'कैसा करतब है साहेब?' या 'बोलना चाहिए इसे अब' जैसी कविताओं का विस्तार बहुत कुछ खोलकर रख देता है। भाव-संवेदनाओं से भरी कविता है 'ममतामयी हृदय'। 'उस रोज' में स्वीकार भी है और गहन पीड़ा भी, पंक्तियाँ देखिए-उस रोज/घने कोहरे में/भोर की बेला में/सूरज से पहले/तुम से मिलने/आई थी मैं/लैंप पोस्ट के नीचे/तुम्हारे इंतजार में/घंटों बैठी रही/एहसास का गुलदस्ता/दिल में छुपाए। कवयित्री आगे लिखती हैं-पहनी थी उमंग की जैकेट/विश्वास का मफलर/गले की गर्माहट बना/कुछ बेचैनी बाँटना/चाहती थी तुमसे। ऐसी सहज कविताएँ बहुत कुछ कह देती हैं सरलता से, सहजता से।

वे वर्तमान में जीती हैं और बेचैनी बाँटना चाहती हैं, 'आज' में लिखती हैं-हवाओं में छटपटाहट/धूप में अकुलाहट है। यह कोई बेचैन मन ही अनुभव कर सकता है। 'अबोलापन' त्रासद स्थितियों का मनोविज्ञान बताती है और मौन के पीछे की बेचैनी भी। श्रृँगार के साथ उल्लसित मन-भाव लिए कविता 'मेहँदी के मोहक पात' किन्हीं सुखद क्षणों का दर्शन करवाती है। ऐसा कम ही होता है पर जब होता है तो खूब होता है। 'समय दरिया' उल्लास, कर्तव्य-निष्ठा और किंचित जीवन-दर्शन लिए जीवन बोध की कविता है। 'शब्द' सुखद बिंबों से भरी प्रेम-यात्रा की कविता है। ऐसे भाव की रचना साहित्य की धरोहर तो है ही, कवयित्री के शुद्ध मन की सुखद उड़ान भी है। सच ही कहा गया है, संयोग से अधिक वियोग के क्षण जीवन को सार्थक गति देते हैं। उन्होंने प्रश्न की शैली को अपनी कविताओं में अपनाया है, जब भी कोई प्रश्न पूछती हैं साथ में उभरता है कोई व्यंग्य भी। 'हे कवि!' पूरी की पूरी कविता में यह भाव-प्रवणता और अन्तर्विरोध अनुभव किए जा सकते हैं। अजन्मा एक गीत, घुट्टी और धूलभरे दिनों में जैसी कविताएँ पाठकों को किन्हीं अबूझ भावनाओं में सहजता से उतार लाती हैं। कवयित्री को भीतर प्रश्रय प्राप्त भावनाओं की समझ है और वे सहजता से कविता में रच देती हैं। उनके पास शब्दावली है, शैली है और दृश्य चित्रित करने की कला भी। वे कुछ भी छिपाना नहीं चाहती, सहजता से स्वीकार करती हैं अपना प्रेम, अपनी पीड़ा और पाठकों के मन को सहला देती हैं। उनकी विशेषता यह भी है, वे जीवन-दर्शन का पाठ पढ़ाती चलती हैं। 'एक यथार्थ' कविता के सारे बिंब जीवन-दर्शन समझाते हैं, वीभत्स दृश्य झकझोरते हैं और सच्चाई लहूलुहान करती है।

इस संग्रह में प्रेम, विरह, प्रतीक्षा जैसी भाव-संवेदनाओं की अनेक कविताएँ हैं मानो उनके जीवन के ये स्थायी भाव हैं और भीतर उथल-पुथल मचाए रहते हैं। सहज नहीं होता इनसे बच निकलना। उन्होंने सहजता से स्वीकार किया है और साथ जीना सीख लिया है।

'कुछ पल ठहर पथिक' उम्मीद जगाती, दुनियादारी सिखाती और सहजता के साथ कुछ ठहर कर विश्राम का संदेश देती कविता है। हिन्दी, उर्दू, राजस्थानी शब्दों के साथ उनकी कविताएँ गहरे अनुभवों में ले जाती हैं और अंतस में आलोक फैलाती हैं। 'मैं और मेरा अक्स' स्वयं का स्वयं के साथ कोई मूल्यांकन परक संवाद है। हम नाना अन्तर्विरोधों, संयोगों में जीते हैं और उलझते-सुलझते रहते हैं। 'समझ के देवता' स्वतः स्पष्ट कविता है, सब कुछ व्यक्त कर रही है। ऐसी अनुभूतियाँ तभी होती हैं जब हमारी प्राण-चेतना जगी रहती है और सब कुछ देख पाती है। 'माँ कहती है' कविता नाना बिंबों के साथ औरत का कोई विराट मानवीय स्वरूप चित्रित करती है जहाँ प्रेम है, करुणा, सौन्दर्य और पीड़ा से भरी संवेदनाएँ हैं, पंक्तियाँ देखिए-परन्तु मां कहती है/औरतें गमले में भरी मिट्टी की तरह होती हैं/खाद की पुड़िया उनकी आत्मा की तरह होती है/जो पौधे को पोषित कर हरा-भरा करती है। ऋतु वसंत, साथी, प्रेम, समर्पण, दुछत्ती और यथार्थ जैसी कविताएँ प्रकृति, मौसम और मानवीय भावनाओं को सहजता से बुनती हुई दिखाई दे रही हैं। कवयित्री सर्वत्र जीवन सूत्र पकड़ लाती हैं और भिन्न अनुभूतियों से भर देती हैं। यथार्थ को लेकर कविता का व्यंग्यात्मक दृश्य देखिए-हर कोई यथार्थ के चंगुलों में/यथार्थ खाते हैं, यथार्थ पहनते हैं/यथार्थ संग सांसें लेते हैं/यथार्थ के आगोश में बैठी/जिंदगियाँ हिपनोटाइज हैं/जिन्हें समझ पाना बहुत कठिन/समझा पाना और भी कठिन है।

'31 दिसंबर' का मानवीकरण स्वरूप, उसके साथ व्यवहार और संवाद अद्भुत है। किसी के चुपचाप चले जाने के प्रभाव का मार्मिक चित्रण हुआ है इस कविता में। 'सुराही पर' प्रेम की गहन भावनाओं से भरी प्रतीक्षारत नायिका की विरह-व्यथा, उत्साह और उम्मीदों की अद्भुत कविता है। कवयित्री ने बहुत ही सहज, स्वाभाविक और सच्चाई से भरा दृश्य लिखा है। वह प्रियतम बड़भागी है जिसे ऐसी प्रियतमा मिली है। शब्द, कैसे?, बहुत बुरा लगता है जैसी कविताओं में उनके प्रश्न और स्थिति-परिस्थिति का चित्रण झकझोरते हैं, विह्वल और दुखी करते हैं। 'बहुत बुरा लगता है' कविता की पंक्तियाँ हर स्त्री के मन की आवाज है-परन्तु बहुत बुरा लगता है तुम्हारे द्वारा/पुकारे जाने की आवाज को अनसुना करना। 'देखो, तुम अपने पैरों की तरफ मत देखो' सहज, सकारात्मक भाव-चिन्तन की कविता है। उसी की अगली कड़ी है 'चलिए कुछ विचार करते हैं'। संदेश यही है, हमें दुखों में पड़े रहना नहीं है, यह दुनिया बड़ी खूबसूरत है, हमें इसके साथ सुखद जीवन जीना है। 'एक साया' जीवन में व्याप्त अतृप्ति, सुषुप्तावस्था, कुंठा, लिप्सा, तृष्णा, कलुषता, असंख्य रोगों से भरा, चिंता रूपी ज्वरों से ग्रसित, मानवीय मूल्यों का हनन करता, संकीर्णता, कुकर्म करता आदि के दृश्य दिखाती यथार्थ कविता है। पिता और पति की अनुपस्थिति में बेटी का जन्मदिवस मनाने के सहज, प्रेमिल भावनाओं से भरे दृश्य किसी को भी भावुक कर सकते हैं, कवयित्री के भाव देखिए-भेंट नहीं मन्नत में मांगी थी दुआ/अगले जन्मदिवस पर हो/शीश पर तुम्हारा हाथ। 'कौन हूँ मैं?' हर माँ की ओर से पूछा गया प्रश्न है। हर स्त्री जिसका पति कहीं दूर किसी सीमा पर है या किसी दूसरे शहर में, ऐसा ही करती है-वह कभी पिता बनती है, कभी मूर्तिकार और कभी माँ ताकि बच्चों के प्रति सारी जिम्मेदारियाँ निभा सके। स्त्री का विराट व्यक्तित्व उभरा है इस कविता में और उन्होंने सहज भाव से समर्पित, श्रमशील स्त्री का चित्रण किया है जिसे मान-सम्मान, मर्यादा सबका ध्यान है। ऐसी रचनाएँ सहज, सुलझे मन से ही निःसृत हो सकती हैं। अनीता सैनी 'दीप्ति' परिपक्व, समझदार और प्रेम से भरे मन की उम्मीदों वाली कवयित्री हैं।

'सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए' स्मृतियों के सहारे सहज स्वीकार की कविता है। 'आँखोड़ा' रथ में जुते घोड़े की पीड़ा अनुभूति करती मार्मिक रचना है-आँखों पर आँखोड़ा/खुरों में लोहे की नाल को गढ़ा/दौड़नेवाले की पीड़ा का आकलन नहीं/दौड़ानेवाले को प्राथमिकता थी। यहाँ प्रश्न हैं, उत्तर और पीड़ित मन की भाव-संवेदनाएँ भी हैं। 'तुम्हारी याद में' और 'जब भी मिलती हूँ मैं' कविताएँ स्मृतियों के सहारे सुखद क्षणों को मार्मिकता के साथ मूर्त करती हैं। भीतरी पीड़ा से निजात पाने की अद्भुत कला है कवयित्री के पास और बिंबों के साथ विस्तार पाता सृजन चमत्कृत करता है। 'परिवर्तन सब निगल चुका था', 'वर्तमान की पीर' और गुजरे छह महीने कोरोना काल की दुःसह स्थितियाँ चित्रित करती रचनाएँ हैं जिसमें मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन प्रभावित हुआ था। 'क्षितिज पार दूर देखती साँझ' प्रतीक्षारत आँखों में भावशून्यता के बोध की कविता है। बिंब यहाँ भी चमत्कृत करते हैं और पीड़ित मन की व्यथा चित्रित हुआ है इन पंक्तियों में। 'मैं और मेरा मन' कविता सहज स्वीकारती है-आँखों में आसुरी शक्ति का सार/वैचारिक द्वन्द्व दिमाग पर हावी/भोग-विलास में लिप्त इच्छाएँ अतृप्त। वह मनुष्य की दशा पर मार्मिक दृश्य रचती हैं-मन सुबक-सुबककर रोया/आँख का पानी आँख में सोया। 'मर्तबान' और 'यादें' कविताएँ उन्हें स्मृतियों में ले जाती हैं-मर्तबान को सहेज रखती थी रसोई में/मखमली यादें इकट्ठा करती थी उसमें/जब भी ढक्कन हटाकर मिलती उनसे/उसी पल जुड़ जाती अतीत के लम्हों से। यादें कविता का भाव देखिए- विहग दल की भाँति/डैने फैलाए लौट आती हैं यादें। उनकी हर कविता में बिंब धमाल मचा देते हैं और अद्भुत दृश्य चित्रित करते हैं। यह कवयित्री के व्यापक अनुभव और गहन अनुभूतियों के चलते ही सम्भव होता है।  

विरह उनकी कविताओं में चतुर्दिक पसरा हुआ है फिर भी उनके मनोभाव सब कुछ सम्हालने के ही हैं, बिछुए कविता में लिखती हैं-जीवन मूल्यों की धनी/जबान पर सुविचार रखती/संस्कार महकते देह पर/अपेक्षा की कसौटी पर सँवरती/सत्कर्म हाथों में पहन/मृदुल शब्दों का दान करती/उलझनें पल्लू में दबा/आँगन में चिड़िया-सी चहकती/कोने-कोने से बटोरती प्रीत/कभी पेट पकड़ भूखी सो जाती। ये सारे बिंब किसी वियोगिनी के बिछुए-सा उनकी अंगुलियों में उलझे रहते हैं। 'घर से भागा लड़का' वस्तुस्थिति और सच्चाई व्यक्त करती कविता है। ये सारे अनुभव यथार्थ हैं और किसी को आसपास देखे हुए हैं। नागफनी और बादल के टुकड़े की मार्मिक स्थितियाँ उभरी हैं इस कविता में-बादल की प्रीत में खोई-खोई बौराई/बरसा न गरजा जीवन पर रोई नागफनी/नुकीले कांटे हेय दृष्टि का भार बढ़ा/ सजी न सँवरी न आँगन का मान मिला। कलम की व्यथा, जिंदगी और सरहद जैसी कविताएँ वेदना की गहन अनुभूति रचती हैं। 'वह देह से एक औरत थी' हमारे समाज में अस्तित्वहीन होती औरत की स्थिति पर सटीक चित्रण है, कवयित्री की स्थिति देखिए-मैंने भी अपने अंदर की औरत को/आहिस्ता-आहिस्ता खामोश किया/पूर्णरूप से स्वयं का जामा बदला/उस औरत को मिटते हुए देखने लगी। 'इंसानियत' कविता में उनकी सोच का व्यापक विस्तार हुआ है। अतीत की ओर से 'एक चिट्ठी वर्तमान के नाम' लिखी गई है, कवयित्री द्वारा यह कोई साहित्य का नूतन प्रयोग है और कविता का विस्तार आँखें खोलने वाला है। भूत, भविष्य और वर्तमान की स्थितियों का सटीक चित्रण हुआ है, बिल्कुल ऐसा ही होता है। उपदेशात्मक कहानी की तरह यह कविता ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख करती है और भूत से वर्तमान और भविष्य की जीवन यात्रा का सच बताती है।

कवयित्री को शायद नागफनी की एकांतिकता सहज प्रिय है, कहीं कोई साम्यता का भाव जागता है, लिखती हैं-नितांत निर्जन नीरस/सूखे अनमने/विचारशून्य परिवेश में/पनप जाती है नागफनी/जीवन की तपिश/सहते हुए भी/मुस्करा उठती है/महक जाते हैं/देह पर उसके भी/आशा के सुंदर सुमन। यह प्रसंग देखिए-जीवन जीने की ललक में/पनप जाते हैं/कांटे कोमल देह पर। यह उम्मीद जगाती, संघर्ष का संदेश देती कविता है। सालों बाद मुझे 'पन्ना धाय' पर कुछ पढ़ने को मिला है। बचपन में कोई पुस्तक पढ़ी थी जिसमें पन्ना धाय के विराट चरित्र पर कहानी थी। अक्सर उनके त्याग की कथा पढ़ते हुए भावुक हो रो पड़ता था। यह भी याद है मुझे, बार-बार पढ़ता था और बार-बार विह्वल होता था। मेरा बाल मन दूसरे विकल्पों पर बार-बार विचार करता और दुखी हो उठता था। तब कर्तव्यनिष्ठा, संकल्प, देशप्रेम और त्याग की अवधारणाओं से परिचित नहीं था। इस कहानी ने मुझे बहुत बदल दिया और बाद के दिनों में जो कुछ भी हूँ, सहज मन से पन्ना धाय का प्रभाव मानता हूँ। बीज तो पड़ ही चुके थे। पन्ना धाय के अपूर्व बलिदान के समकक्ष कोई दूसरी कहानी नहीं है संसार में। उनकी पंक्तियाँ देखिए-चित्तौड़ के किले की ऊँची सूनी दीवारों में/गूँजता तुम्हारा कोमल कारुणिक रुदन/सिसकियों में बेटे चंदन की बहती पीड़ा/दिलाती याद अनूठी स्वामीभक्ति की। मीँ की ममता जनित उस पीड़ा को उन्होंने अपनी पंक्तियों में सहेजने, समझने और अनुभव करने की कोशिश की है। प्रेम के गहन भाव की कविता है 'दुआ में'। सारी तैयारियाँ गहन समर्पण के साथ तरंगित करने वाली और  सारे मनोभाव आनंद देने वाले हैं।'सफेदपोशी' वर्तमान दौर की सच्चाई है, उनकी प्रार्थना देखिए-सौन्दर्यबोध के सिकुड़ रहे हों पैमाने/दूसरों का भी हड़पा जा रहा हो आसमां/तब खुलने देना विवेक के द्वार/ताकि पुरसुकून साँस मानवता लेने लगे। मीराबाई के कान्हा-प्रेम और उदात्त जीवन की कहानी पर 'मीराबाई थी वह' कविता है। नाना बिंबों में कवयित्री ने उनके कथ्य-कथानक को अपनी कविता की सहज पंक्तियों में सहेजा है।

'निर्वाण(मनस्वी की बुद्ध से प्रीत)' संग्रह की सशक्त, बड़ी कविता है जिसमें कवयित्री ने अपनी सम्पूर्ण अनुभूतियों को समर्पित किया है और मन के नाना भाव चित्रित हुए हैं। इस कविता में 'टोहती' शब्द है जिसके आधार पर अनीता सैनी 'दीप्ति' ने अपने संग्रह का नामकरण "टोह" किया है। यहाँ बिंब हैं, प्रसंग हैं, भाव-संवेदनाएँ हैं और संवाद भी है। बुद्ध की स्वयं की खोज और तत्वज्ञान की समझ ही इसके मूल में है, पंक्तियाँ देखिए-बुद्ध तत्व की अन्वेषणा, मनस्वी कानन-कानन डोले/बुद्ध छाँव बने, बुद्ध ही बहता झरना बन बोले/हे प्रिय! पहचानो नियति जीवनपथ की/कंकड़-पत्थर, झाड़-झंखाड़ गति जीवनरथ की। यह भाव देखिए-हे प्रिय! तुम करुणा के दीप जलाना/दग्ध हृदय पर मधुर शब्दों के फूल बरसाना/अंकुरित पौध सींचना स्नेह के सागर से/प्रेम-पुष्प खिलेंगे छलकाओ सुधा मन गागर से। उन्होंने अपनी सम्पूर्ण दार्शनिक चेतना का बुद्ध तत्व में विस्तार देते हुए किंचित जटिल भावों के साथ सृजन किया है। 'नेम प्लेट' कविता बहुत कुछ कहती है और सारी स्थितियाँ स्पष्ट हैं। घर का मुखिया कहीं दूर परदेश में रहता है, कभी-कभार आता है पर घर के दरवाजे पर उसके नाम 'नेम प्लेट'लगा हुआ है। अद्भुत भाव-चिन्तन उभरा है इस नेम प्लेट के साथ। 'कैसी हवा बुन रहे हो साहेब?' भिन्न भाव-दृश्य लिए झकझोरने वाली कोई व्यंग्य-सी कविता है। कभी-कभी उनके मन की उड़ान को समझ पाना सहज नहीं लगता, शायद स्वयं में या उनके जीवन में, चिन्तन में कोई भटकाव, बेचैनी, व्यथा, पीड़ा स्थायी रूप से बिखरा हुआ है। यह भी हो सकता है, मनुहार के साथ, प्रेम से, मुस्कराते हुए आत्मीय क्षणों में पूछती हों-'कैसी हवा बुन रहे हो साहेब?' उन्होंने बहुत पहले से सब कुछ पढ़ना सीख लिया था जब कोई नही पढ़ पाता था, 'मौन से मौन तक'' कविता की पंक्तियाँ देखिए-बुजुर्गों का जोड़ों से जकड़ा दर्द/उनका बेवजह पुकारना/पिता की खामोशी में छिपे शब्द/माँ की व्यस्तता में बहते भाव/भाई-बहनों की अपेक्षाएं/वर्दी के लिबास में अलगनी पर टंगा प्रेम। यह शिक्षा जीवन के अनुभवों से मिलती है। कवयित्री की यह पंक्ति व्यथित करने वाली है-उस समय जिंदा थी वह/स्वर था उसमें/हवा और पानी की तरह। यह गहन मौन हो जाने की कविता है। संग्रह की अंतिम कविता है 'ग्रामीण औरतें' जिसमें स्त्री के अस्तित्व को लेकर समान चिन्तन दिखता है। कवयित्री खुलकर कहना चाहती हैं, ग्रामीण औरतों के लिए सब कुछ वैसा ही होता है-माताएँ होती हैं इनकी/ये खुद भी माताएँ होती हैं किसी की/इनके भी परिवार होते हैं/परिवार की मुखिया होती हैं ये भी। अंत की पंक्तियाँ देखिए-सावन-भादों इनके लिए भी बरसते हैं/ये भी धरती के जैसे सजती-सँवरती हैं/चाँद-तारों की उपमाएँ इन्हें भी दी जाती हैं/प्रेमी होते हैं इनके भी, ये भी प्रेम में होती हैं। अद्भुत भाव-चिन्तन है इस कविता में।

इस तरह देखा जाए तो अनीता सैनी 'दीप्ति' के अनुभव का दायरा व्यापक है, प्रकृति के सारे बिंब उन्हें काव्य रचना में सहायक हैं, विरह-वियोग से भरा प्रतीक्षारत जीवन उनकी रचना में स्वतः उभरता है। वे रुकती नहीं, सक्रिय होती हैं, कोई सकारात्मक राह तलाशती हैं और अपना दायित्व निभाती हैं। उनकी शैली आकर्षित करती है, भाषा में सहजता और चिन्तन में दार्शनिकता है। विरह-वियोग में भटकाव की संभावना को उनकी कविताएँ नकारती हैं और मान-सम्मान, मर्यादा की रक्षा करना उनका उद्देश्य है।
 

3 comments :

  1. बहुत ही सुंदर

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  2. सरल सहज भावों से भरी बहुत सुंदर कविताओं का संग्रह उतनी ही सुंदर उन कविताओं की समीक्षा।
    कवयित्री व समीक्षक दोनों को बधाई।

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  3. सरल सहज भावों से भरी बहुत सुंदर कविताओं का संग्रह उतनी ही सुंदर उन कविताओं की समीक्षा।
    कवयित्री व समीक्षक दोनों को बधाई।

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