मानवीय मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति - 'मेरी कहानियाँ'

समीक्षक : प्रो. अवध किशोर प्रसाद

मेरी कहानियाँ (कथा संग्रह)
लेखक: डॉ. रमाकांत शर्मा
प्रकाशक: इंडिया नेटबुक्स, नोएडा – 201301
मूल्य: ₹ 300/- रुपये


डॉ. रमाकांत शर्मा ने अब तक नब्बे से ऊपर कहानियाँ लिखी हैं। समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनकी कहानियों के नौ संग्रह सामने आ चुके हैं और उन्हें पाठकों का अच्छा प्रतिसाद भी मिला है। प्रस्तुत कहानी संग्रह इंडिया नेटबुक्स, नोएडा द्वारा “कथामाला श्रृंखला” के अंतर्गत प्रकाशित कहानी संग्रह है। इस श्रृंखला का उद्देश्य चुनिंदा साहित्यकारों की चयनित कहानियों का गुलदस्ता प्रस्तुत करना है। इसके अंतर्गत डॉ. रमाकांत शर्मा का कहानी संग्रह प्रकाशित होना स्वयं में इस बात का प्रमाण है कि वे सशक्त और लोकप्रिय कथाकार हैं।

रमाकांत शर्मा
इस संग्रह में उनकी पंद्रह कहानियों का आनंद लिया जा सकता है। विशेष बात यह है कि हर कहानी बिना प्रवचन दिए कोई ना कोई ऐसा संदेश देती है, जिसमें मानवीय मूल्य निहित हैं। सरल भाषा और रोचक शैली में लिखी गई डॉ. रमाकांत शर्मा की कहानियों की विशेषता उनकी पठनीयता है जो पाठक को शुरू से अंत तक बांधे रखती है। उन्होंने इतनी सारी कहानियाँ लिखी हैं, पर कहीं दोहराव नजर नहीं आता। उनकी कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता उन्हें विश्व प्रसिद्ध कहानीकार ओ’हेनरी के समकक्ष ला खड़ा करती है और वह है, लगभग हर कहानी का चौंकाने वाला अंत।
संकलन की पहली कहानी “खारा पानी-मीठा पानी” मायानगरी मुंबई की जिंदगी, इस शहर की संस्कृति और उसकी छवि पर लिखी गई अनगिनत कहानियों में सबसे अलग हट कर बेहतरीन कहानी है। शुरुआत में यह कहानी एक शहर की जिंदगी का चित्र खींचने भर का अहसास कराती है, पर अंत तक आते-आते पाठक को इतना भावुक कर जाती है कि वह खुद को भीतर तक भीगा हुआ महसूस करने लगता है। वह कहानीकार की इस बात से सहज ही सहमत हो जाता है कि खुद के और दूसरों के कड़वे-मीठे अनुभव किसी शहर की छवि तो बना सकते हैं, पर उसकी अस्मिता नहीं।
अवधकिशोर प्रसाद

“शायद आसिफ भी यही सोच रहा होगा” कहानी सेवानिवृत्त प्रिंसिपल अमान और एक मुशायरे में उन्हें मिले शायर आसिफ की कहानी है। आसिफ के व्यक्तित्व और कलाम से वे इतना प्रभावित हुए कि उसे घर आने का निमंत्रण दे बैठे। अनजान आसिफ उनके घर का सदस्य जैसा बन गया। विदेश में रहने वाले उनके बेटों ने अनजान आदमी को घर में आने देने के खतरों के प्रति उन्हें खबरदार भी किया, पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। अचानक आसिफ ने आना-जाना बंद कर दिया तो मियाँ-बीवी ने खुद उसके घर जाने की सोची। पर, आसिफ ने तो अपना पता भी नहीं दिया था। इत्तफाक से मिले उसके घर के पते पर पहुँच कर उन्होंने जो कुछ देखा, उसने उन्हें खुद की नजरों में अपराधी बना दिया। उसके बाद से वे आसिफ के आने का अंतहीन इंतजार कर रहे हैं। वे सोच रहे हैं कि अगर वह आया तो उससे नजरें मिलाने के लिए खुद को कैसे तैयार कर पाएंगे। क्या पता, शायद आसिफ भी यही सोच रहा हो। मानवीय संवेदनाओं को छूती यह कहानी पाठक को द्रवित कर जाती है।

कहानी “बोलती रहो माँ” के बारे में बस इतना ही कहना काफी होगा कि हर समय लगातार बोलती रहने वाली माँ जब इस वजह से बेटे के उस पर बरस पड़ने के बाद यकायक चुप हो जाती है तो उसकी यह चुप्पी एक ऐसी कहानी बुन जाती है जो मन में भावनाओं का ज्वार उठा देती है। पाठक को अनायास यह अहसास होने लगता है कि साधारण सी लगने वाली कितनी असाधारण कहानी से वह अभी-अभी गुजरा है।

‘बहू जी और वह बंद कमरा’ कहानी पढ़ते हुए शुरू में ऐसा लगता है जैसे पाठक को रहस्य और रोमांच की दुनिया में ले जाया जा रहा हो। पर, यह कहानी ऐसी औरत की कहानी में तब्दील हो जाती है जिसने आदर्श पत्नी और मर्यादित प्रेमिका की भूमिका में जीवन भर संतुलन बनाए रखा। पाठक बहूजी के इस रूप को जानने के बाद उनसे विरत होने के बजाय उनकी संवेदना में उनके साथ हो लेता है, यह इस कहानी की बुनावट और उसके निर्वहन की बड़ी सफलता है।

इस संग्रह की दो कहानियाँ, “तूफान थमने की वजह” और “ड्रेस कोड” व्यंग्यात्मक कहानियाँ हैं। “तूफान थमने की वजह” जहां सरकारी कार्यालयों और बैंकों में कामकाज के प्रति उदासीनता और ग्राहकों को हेय समझने की प्रवृत्ति पर व्यंग्य करती है, वहीं “ड्रेस कोड” हमारे जीवन के हर क्षेत्र में विदेशी संस्कृति की भौंडी नकल करने पर आमादा हमारी युवा पीढ़ी की मानसिकता पर करारा व्यंग्य करती है।

“भाई साहब की डायरी” उन दो भाइयों के बीच के रिश्ते की कहानी है, जिसमें बड़ा भाई अपने छोटे भाई को माँ-बाप की कमी महसूस न होने देने के लिए कृतसंकल्प है, इसीलिए वह शादी भी नहीं करता। अपनी क्षमता से बढ़कर वह उसकी हर इच्छा पूरी करता है, उसे ऊंची शिक्षा पाने के लिए दूसरे शहर भी भेजता है। पर, एक बार जब वह छोटे भाई की बहुत छोटी सी जरूरत को पूरा करने के प्रति भी बेरुखी दिखाता है तो छोटे भाई को बहुत बुरा लगता है और उसके दिल में एक फांस सी चुभी रह जाती है। बड़े भाई की असमय मौत के बाद जब उनकी डायरी उसके हाथ लगती है और जो भेद खुलता है, उससे वह हतप्रभ होकर रह जाता है और उसके दिल में चुभी फाँस उसके आँसुओं के साथ बह निकलती है।

‘गहरे तक गढ़ा कुछ’ कहानी  जवान विधवा के प्यार, उसके किशोर बेटे की मानसिकता और अपराधबोध की कहानी तो है ही, उस उम्र की अकेली विधवा औरत का दर्द समझने का एक गंभीर प्रयास भी है। विधवा होने में उसका क्या कसूर? क्या उसे प्रेम करने और सहज जीवन जीने का अधिकार नहीं है? प्रश्न गंभीर हैं और इस कहानी का अंत इन प्रश्नों पर गंभीरता से सोचने को विवश कर देता है।

कहानी “एक पैसे की कीमत” गये जमाने के एक पैसे और उसके मुकाबले आज के रुपयों की कीमत की तुलना करती एक मासूम और रोचक कहानी है। कहानी की बुनावट ऐसी है कि  लगता है जैसे मुंशी प्रेमचंद की कोई कहानी पढ़ रहे हों।

“हर सवाल का जवाब नहीं होता”, कहानी इस बात को शिद्दत से रेखांकित करती है कि जिंदगी में कुछ सवाल ऐसे उभर आते हैं, जिनका ढूंढ़ने पर भी कोई जवाब नहीं मिलता। शुरुआत में यह कहानी रोमांस और अधूरे प्रेम की कहानी लगती है, पर बाप और बेटे के बीच रिश्ते के उलझाव की यह कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, प्रेम के उफनती नदी-से उस रूप को सामने ले आती है जो अपने उतावलेपन में अच्छे—बुरे सबको समेटकर चलते हुए किनारों के बंध तोड़ देती है। कहानी का अंत कल्पना से परे तो है ही, मन को छूने वाला भी है।

संग्रह के पन्ने पलटते हुए जैसे ही हम कहानी “मोना डार्लिंग” पर पहुँचते हैं, मन में अनायास यह विचार उठता है कि हम एक और प्रेम कहानी पढ़ने जा रहे हैं, पर यह हमारे सामने एक ऐसी वृद्धा की मार्मिक कहानी के रूप में सामने आती है जो बिलकुल अकेली रहती है। उसका इकलौता बेटा अपने परिवार के साथ विदेश में बस गया है और वह पराए लोगों में अपनापन ढूंढ़ती फिरती है।

संकलन की अगली कहानी “रामलखन दु:खी नहीं हो पा रहा”, मानव मन का बारीकी से विश्लेषण करती जबरदस्त कहानी है। खुद और अपने परिवार के सुख-दुख को नजरअंदाज करके अपने अफसरों की दिन-रात खिदमत करने और फिर भी उनकी डाँट-डपट खाने के लिए अभिशप्त रामलखन अपने मन की खीज और उबाल को मन में ही दबाए रखने के लिए मजबूर है। पर, जब जंगल में एक पिकनिक के दौरान हुए हादसे में अफसरों और उनके परिवारों पर  आफत टूट पड़ती हैं, तब उनकी दशा देख कर रामलखन चाह कर भी दु:खी नहीं हो पाता। शायद वह शोषित आदमी अफसरों और उनके परिवार के लोगों को प्रकृति की तरफ से दिए गए दंड में अपने प्रतिशोध को पूरा होते देख रहा होता है।

बढ़ती उम्र मनुष्य के भीतर शारीरिक कमजोरियों के साथ मानसिक कमजोरियाँ भी बढ़ाती जाती है और यहां तक कि उसकी दृढ़ मान्यताओं को भी खंडित कर जाती है। कहानी “कमजोर आदमी” इस सत्य को बहुत सलीके से उद्घाटित करती है। यह कहानी जीवन के यथार्थ को तो सामने लाती ही है, वृद्धावस्था में अकेलेपन और उससे उपजे डर का सजीव और दिल छू लेने वाला चित्रण भी करती है।

कहानी “फटा बस्ता” छोटी सी कहानी है, पर बड़ा प्रभाव उत्पन्न करती है। छोटे बच्चे का बस्ता इतना फटा हुआ है कि उसे स्कूल ले जाते उसे शर्म आती है। उसके संगी-साथी फटे बस्ते को लेकर उसे चिढ़ाते रहते हैं। वह अपनी माँ से उसे सिल देने के लिए कहता है, पर अपनी व्यस्तता के चलते वह उसे सिर्फ आश्वासन ही दे पाती है। फटे बस्ते की सिलाई के बहाने यह कहानी विशेषकर गरीब घरों में महिलाओं की दयनीय स्थिति का बड़ा मुद्दा उठाती है। हमेशा दबी-दबी रहने वाली घरेलू महिला समय आने पर तन कर खड़ा होने का साहस भी रखती है, यह इस कहानी का केंद्रबिंदु नजर आता है।

संग्रह की अंतिम कहानी “माँ के चले जाने के बाद” डॉ. रमाकांत शर्मा की बहुचर्चित कहानियों में से है। उन्होंने इस कहानी संग्रह की “अपनी बात” में लिखा है कि कथाबिंब में कहानी “माँ के चले जाने के बाद” प्रकाशित होने पर गुजराती-हिंदी के जाने माने साहित्यकार और कार्टून कोना ढब्बू जी के सर्जक आबिद सुरती जी ने उन्हें फोन किया और कहा, “आजकल मैं कहानियाँ पढ़ना शुरु करने के बाद ज्यादातर उन्हें अधूरा छोड़ देता हूँ, लेकिन आपकी यह कहानी मैं पूरी पढ़ गया। आपको फोन इसलिए किया कि जिस शख्स ने अपनी पूरी कहानी मुझे पढ़वा दी, उसे मैं कम से कम फोन पर तो बधाई दे दूं।“ वस्तुत: यह कहानी मां के चले जाने के बाद की स्थिति में पुत्र और पिता के बीच के रिश्ते की ऐसी कहानी है जो पाठक के मन पर अपना प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहती।

डॉ. रमाकांत शर्मा कृत्रिम भाषा का प्रयोग किए बिना सीधी-सच्ची और सरल भाषा-शैली में अपनी बात रखते हैं। उनकी यह विशेषता और कहानी का जबरदस्त कथ्य कहानीकार और पाठक के बीच का भेद सहज ही मिटा देता है। इस संग्रह में शामिल सभी कहानियाँ रिश्तों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करती हैं और पाठक को बांधे रखने की अद्भुत क्षमता रखती हैं। जरूर पढ़ें और इनका आनंद लें।
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प्रो. अवध किशोर प्रसाद
WZ, 143/4 D, ग्राउंड फ्लोर, न्यू महावीर नगर, नई दिल्ली- 110018
चलभाष: 9599794129
ईमेल: akpdkundhur1940@gmail.com

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