विश्व पुस्तक मेले में प्रकाश मनु की पुस्तकों का लोकार्पण एवं परिचर्चा

प्रस्तुति: शाहीन


हर बार की तरह ही इस बार भी दिल्ली में लगा विश्व पुस्तक मेला लेखकों और उनकी लिखी पुस्तकों का साहित्यिक कुंभ ही था, जिसे पुस्तक लोकार्पण के साथ ही विभिन्न परिचर्चाओं और साहित्यिक गोष्ठियों ने भी खासा संपन्न किया। पुस्तक मेले का महत्त्व और आकर्षण तो इससे बढ़ा ही।  
दिल्ली में लगे विश्व पुस्तक मेले में सुप्रसिद्ध साहित्यकार, संपादक और बच्चों के प्रिय लेखक प्रकाश मनु की किताबों के लोकार्पण की धूम रही। बाल मन के चितेरे प्रकाश मनु साहित्य अकादेमी के पहले ‘बाल साहित्य पुरस्कार’ से सम्मानित लेखक हैं और उन्होंने बाल साहित्य को भारतीय साहित्य के परिदृश्य में व्यापक पहचान दिलाई है। लीक से हटकर लिखे उपन्यासों ‘यह जो दिल्ली है’, ‘कथा सर्कस’ और ‘पापा के जाने के बाद’ के अलावा कहानियों और कविताओं में भी इनके द्वारा किए गए प्रयोग आज भी मानक की तरह लिए जाते हैं। मनु जी ने हिंदी में बाल साहित्य का पहला बृहत इतिहास ‘हिंदी बाल साहित्य का इतिहास’ लिखा है, जो स्वयं में मील के पत्थर सरीखा ऐतिहासिक कार्य है। 
विश्व पुस्तक मेले में 15 फरवरी 2024 को प्रकाश मनु द्वारा रचित बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं में रचित पुस्तकों का साहित्य अकादेमी, नयी किताब प्रकाशन समूह और लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस की ओर से लोकार्पण एवं परिचर्चा का आयोजन किया गया। सर्वप्रथम साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित बाल साहित्य शृंखला के अंतर्गत प्रकाश मनु की चार नई बाल पुस्तकों का लोकार्पण किया गया। इन पुस्तकों के शीर्षक हैं—‘लो नाव चली कुक्कू की’, ‘आहा रसगुल्ले’, ‘तुम भी पढ़ोगे जस्सू?’ और ‘आओ मिलकर खेलें नाटक’। इनमें ‘लो नाव चली कुक्कू की’ में बच्चों के लिए लिखी गई मनु जी की बड़ी सरस कविताएँ हैं। ‘आहा रसगुल्ले’ तथा ‘तुम भी पढ़ोगे जस्सू?’ में बच्चों के लिए लिखी गई रोचक कहानियाँ हैं तो ‘आओ मिलकर नाटक खेलें’ में मनु जी के खेल-खेल में सीख देने वाले मजेदार बाल नाटक हैं।

बच्चों के लिए लिखी गई अपनी कविता, कहानी और अन्य रचनाओं के बारे में बोलते हुए प्रकाश मनु कहते है, “सच कहूँ कि मैं लिखे बगैर रह ही नहीं सकता। जैसे आप साँस लेते हैं, वैसे ही मैं लिखता हूँ। बचपन में जो कहानियाँ मेरी माँ और नानी सुनाया करती थीं और उन कहानियों से जुड़े जो सपने मुझे आया करते थे, उन्हीं को मैंने नए रंग-रूप में ढालकर अपनी बाल रचनाओं में उतारा है।” 
आज के बदले हुए समय और परिस्थितियों के मुताबिक मनु जी की बाल रचनाओं के कथ्य में बहुत बदलाव और विस्तार आया है। इस बारे में वे कहते हैं, “कहानियाँ बच्चों को खेल-खेल में बहुत कुछ सिखाती है। जो काम गूढ़ बातों और उपदेशों से भरे बड़े-बड़े पोथे नहीं कर पाते, उसे नन्ही-नन्ही रोचक कहानियाँ बड़े मजे से कर दिखाती हैं। आज के जमाने के बच्चों की समस्याओं को मैंने बहुत रोचक और कौतुकपूर्ण ढंग से सामने लाने की कोशिश की है। इन रचनाओं के बाल पात्र बिना कुछ कहे बच्चों को कहीं-न-कहीं बड़ी सीख दे जाते है।”
इस अवसर पर वक्ता के रूप में मंच पर उपस्थित प्रसिद्ध साहित्यकार दिविक रमेश जी ने भी बाल साहित्य के क्षेत्र में प्रकाश मनु की उपलब्धियों और इन पुस्तकों की विषय-वस्तु पर बात की। सुनीता मनु, शकुंतला कालरा, श्याम सुशील, अलका सत्यार्थी तथा अनिल जायसवाल आदि अनेक सुधीजन वहाँ उपस्थित थे। कार्यक्रम का सुंदर संचालन कुमार अनुपम ने किया। 
इसके बाद नयी किताब प्रकाशन समूह की ओर से दोपहर 2 बजे प्रकाश मनु की बाल पुस्तकों का लोकार्पण एवं परिचर्चा का आयोजन किया गया। इसमें प्रकाश मनु जी की बच्चों के लिए लिखी गई कहानियों के चार संग्रहों ‘जानकीपुर की रामलीला’, मुनमुनलाल ने बनाई घड़ी’, चिड़ियाघर में चुनमुन’ तथा ‘नटखट कुप्पू और दादी माँ’ का लोकार्पण हुआ। साथ ही बाल साहित्य से जुड़े मुद्दों पर रुचिकर परिचर्चा हुई। प्रकाश मनु जी के इन कहानी संग्रहों में बाल मनोविज्ञान के साथ-साथ बाल मन की निर्मल झाँकी दिखाई पड़ती है। 
मनु जी ने अपनी इन कहानियों के विषय के बारे में विस्तार से बात करते हुए कहा, “कहानी के साथ मेरा एक अलग सा रिश्ता है। मन का रिश्ता। बचपन से ही मैं जो कहानी सुनता था, उस कहानी के नायक के साथ मेरा अजीब सा जुड़ाव हो जाता था। उसके दुख-तकलीफों के बार में मैं सुनता तो आँखों में आँसू आ जाते थे। और उससे जुड़ा कोई हँसी-खुशी का पल होता तो मधुरता के साथ खूब हँसी आती, मन में अजीब सा तमाशा होने लगता। जब बच्चों के लिए मैंने कहानियाँ लिखनी शुरू कीं, तो पहले पहल जो बात मन में आई, वह यह कि मेरी कहानियों के नायक ऐसे ही होने चाहिए, जो बच्चों के दिल में उतर जाएँ। उन्हें बिना कुछ कहे, अच्छा और भला इनसान बनाएँ।” 
आगे बच्चों के विषय में मनु जी कहते है, “सच कहूँ तो मैंने कहीं ईश्वर के दर्शन नहीं किए। मैं सब जगह गया, लेकिन मुझे ईश्वर कहीं नहीं मिला। वह मिला तो बस, छोटे-छोटे बच्चों में, उनकी भोली मुसकानों में। हर बच्चा जैसे ईश्वर का ही रूप हो।”
मनु जी की इन बाल कहानियों में आज की समस्याओं के साथ-साथ बच्चों के अंतर्मन की उलझनें भी बखूबी सामने आती हैं। आसपास के वातावरण से किस प्रकार बच्चों के व्यक्तित्व में परिवर्तन आता हैं, यह भी पता चलता है। ये कहानियाँ ऐसी हैं कि बच्चे पढ़ेंगे तो पढ़ते ही चले जाएँगे, और एक बार पढ़ने के बाद कभी भूलेंगे नहीं। साथ ही बाल कहानी की ये पुस्तकें बड़े सुंदर कलेवर में छपी हैं। 
इस अवसर पर प्रकाश मनु जी की शख्सियत और उनकी रचनाओं के विषय में बोलते हुए अलका सत्यार्थी जी ने कहा, “यह जो प्रकाश मनु नाम वाला भोला-भाला शख्स हमारे सामने बैठा है, अभी यह बच्चा ही है। तभी तो बच्चों के अंतर्मन तक पहुँचकर उनकी आशा, निराशा, खुशी, खिलखिलाहट और नादानी को उकेर पाता है। प्रकाश मनु बच्चों के नायक है। बाल साहित्य के प्रणेता। आज के डिजिटल युग में भी बच्चों के हाथ उनका साहित्य देने वाले हमारे इस बालनुमा भाई को सलाम!” आगे उन्होंने कहा, “मनु जी ने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में कलम चलाई है। चाहे बाल साहित्य हो, संस्मरण हो, कहानी, उपन्यास हो या फिर साक्षात्कार। उनकी भाषा इतनी सरल और मधुर-मनोरंजक है, जैसे सामने बैठे बातचीत कर रहे हैं। निश्छल मन से कही गई ये बातें मनु जी को और अधिक बाल मन की ओर ले जाती हैं।” 
शकुंतला कालरा, श्याम सुशील, समीर गांगुली, प्रेमपाल शर्मा, अखिलेश श्रीवास्तव चमन और अनिल जायसवाल आदि वक्ताओं ने भी प्रकाश मनु जी से जुड़े अपने अनुभवों और मधुर स्मृतियों को साझा करते हुए, उनके बाल रचनाकर्म पर दृष्टि डाली। बाल पत्रिका ‘नंदन’ के संपादन से जुड़े प्रकाश मनु जी के अवदान को भी वक्ताओं ने प्रेम से याद किया। इस कार्यक्रम का संचालन शाहीन ने सफलतापूर्वक किया।
इसके बाद लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस के स्टॉल पर प्रकाश मनु जी की ‘यादें घर आँगन की’, ‘उस शहर में हमारा घर’, ‘बड़े साहित्यकारों के साथ’, ‘चुनी हुई कविताएँ’, ‘बच्चों के तीन उपन्यास’ तथा ‘प्रकाश मनु की श्रेष्ठ बाल कहानियाँ’ के अलावा प्रकाश मनु एवं पुष्पेंद्र सिंह चौहान द्वारा संपादित ‘श्रीनाथ सिंह की श्रेष्ठ बाल कविताएँ’ पुस्तक का लोकार्पण किया गया। इनमें ‘यादें घर आँगन की’ पुस्तक में लेखक ने अपने बचपन के साथ-साथ लेखक होने की पूरी कहानी कही है। ‘उस शहर में हमारा घर’ उनकी पचास बरस लंबी कथा-यात्रा में से चुनी हुई ऐसी ग्यारह कहानियाँ का संकलन है जिन्हें साहित्य जगत में भूरि-भूरि प्रशंसा मिली। ‘बड़े साहित्यकारों के साथ’ पुस्तक के संस्मरणों को स्वय मनु जी ने ‘मेरी लंबी साहित्यिक यात्रा के पड़ाव’ कहा है। इसमें सत्यार्थी जी, रामविलास जी, नामवर जी, त्रिलोचन, रामदरश मिश्र, बाबा नागार्जुन, मटियानी, रघुवीर सहाय, विष्णु खरे, डॉ, माहेश्वर और हरिपाल त्यागी से जुड़ी मर्मस्पर्शी संस्मृतियाँ हैं। जैसे किसी बिरवे को काट-छाँट कर अच्छा खाद-पानी देकर उसे बड़ा किया जाए, वैसे ही ये सारी विभूतियाँ प्रकाश मनु के जीवन में प्रकाश स्तंभ की तरह रहीं। इसी तरह प्रकाश मनु की ‘चुनी हुई कविताएँ’ विराट आख्यान का सूक्ष्म स्पंदन हैं। ‘बच्चों के तीन उपन्यास’ और ‘श्रेष्ठ कहानियाँ’ पुस्तकें बच्चों के भावलोक से गहरे जुड़ी हैं। इनमें बाल मनोविज्ञान की सरस बयानी है और बच्चों की दुनिया का खूबसूरत इंद्रधनुष है। 
‘श्रीनाथ सिंह की श्रेष्ठ बाल कविताएँ’ भी बहुत महत्त्वपूर्ण पुस्तक है, जिसमें पहली बार हिंदी के इस दिग्गज बाल साहित्यकार की श्रेष्ठ कविताएँ एक साथ सामने आ रही हैं। सन् 1901 में जनमे श्रीनाथ सिंह बच्चों के अत्यंत प्रिय लेखक हैं, जिन्होंने हिंदी जगत की कई पीढ़ियों के बचपन को सँवारा। उन्होंने हिंदी की कालजयी साहित्यिक पत्रिका ‘सरस्वती’ के संपादन के साथ ही ‘शिशु’, ‘बालसखा’ और ‘बालबोध’ सरीखी बाल साहित्य की श्रेष्ठ पत्रिकाओं का संपादन किया था। पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी उनकी सौ से अधिक बाल कविताओं का प्रकाश मनु तथा पुष्पेंद्र सिंह चौहान ने अथक श्रम और तन्मयता से संचयन और संपादन किया है।
इन पुस्तकों के लोकार्पण से पूर्व लिटिल बर्ड की निदेशक कुसुमलता सिंह ने सभी उपस्थित साहित्यकारों का अंगवस्त्र से सम्मान किया। 
अपनी इन पुस्तकों में विशेष रूप से ‘बड़े साहित्यकारों के साथ’ पुस्तक की भावभूमि और उसे लिखे जाने की कहानी बताते हुए, प्रकाश मनु जी ने कहा कि बचपन से ही उनके नायक तो साहित्यकार ही थे। वे उन्हें भगवान लगते थे, और उन जैसा हो पाना ही अपने जीवन का सबसे बड़ा सपना लगता था। बाद में बड़े होने पर संयोग से वे दिल्ली आए तो उन्हें हिंदी के बड़े से बड़े दिग्गज साहित्यकारों का सान्निध्य मिला। उन्हें निकट से देखने-जानने का अवसर भी। इसे वे अपने जीवन का सबसे अनमोल खजाना मानते हैं। मनु जी ने बड़े साहित्यकारों से जुड़ी कुछ अविस्मरणीय यादों का जिक्र करते हुए कहा कि ‘बड़े साहित्यकारों के साथ’ पुस्तक में हिंदी के दिग्गज साहित्यकों से जुडी उनकी ऐसी यादें हैं, जो पाठकों को भी एक नई दुनिया में ले जाएँगी। 
इस अवसर पर उपस्थित वक्ताओं में शकुंतला कालरा, सुनीता मनु, अलका सत्यार्थी, प्रेमपाल शर्मा, अखिलेश श्रीवास्तव चमन, श्याम सुशील आदि ने प्रकाश मनु जी के रचना-कर्म के महत्त्व और इसके विविध पहलुओं की चर्चा की तथा उसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया। साथ ही वहाँ उपस्थित प्रायः सभी साहित्य प्रेमियों ने प्रकाश मनु के रचनाकर्म की इस विशेषता को लक्षित किया कि इन पुस्तकों के नाम से ही यह अंदाजा लग जाता है कि प्रकाश मनु के लेखन में बड़ी आश्चर्यजनक विविधता है।
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 एफ-21, अबुल फजल, शाहीन बाग, ओखला, नई दिल्ली, 110025
चलभाष: 7678391587

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