कहानी: टैक्सी ड्राइवर रामलाल दुआ की सच्ची कहानी

प्रकाश मनु

प्रकाश मनु

545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008
चलभाष: 981 060 2327,
ईमेल: prakashmanu334@gmail.com


यह एक संयोग ही था कि अपने कलकत्ते वाले भतीजे आशु की सगाई के समारोह में जिस टैक्सी से मैं सपरिवार दिल्ली गया, वह टैक्सी ड्राइवर रामलाल दुआ की थी। यह हमें बाद में पता चला कि वही उसका मालिक था और ड्राइवर भी।
यह संयोग एक सुखद संयोग इसलिए था कि वह दिन, जैसा कि हम घर से ही आशंका लेकर चले थे, हमारे जीवन के तमाम-तमाम ‘बोझिल’ दिनों में से एक था। बात शायद कुछ गड़बड़झाले में फँसी जा रही है। तो मैं साफ कर दूँ कि सगाई तो सगाई की तरह ही हुई थी और ठीक उसी ‘पंप एंड शो’ के साथ हुई थी, जैसी होती ही है हमारे जैसे मध्यवर्गीय घरों में। और जिसमें भीतर के तमाम दाग-धब्बे ऊपर की चमकदार पालिश-आलिश से छिपा लिए जाते हैं।...यों भी आशु कलकत्ते की किसी बड़ी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, तो उसका ‘कद’ और ‘कीमत’ भी ऊँची ही हुई! फिर भला ‘शो-शा’ क्यों न होती?
तो बहरहाल जिस सगाई के लिए हम गए थे, वह हुई और वहाँ तमाम किस्म के नफीस पारिवारिक नाटकों के बीच, जहाँ हैसियतों के हिसाब से सबका अलग-अलग किस्म का स्वागत हो रहा था, ज्यादा अपमानित हुए बगैर हम किसी तरह खुद को बचाकर वापस ले आए, यही शायद उस दिन का सबसे बड़ा सौभाग्य था। अब आपको कैसे समझाऊँ कि इस काम में टैक्सी ड्राइवर रामलाल दुआ ने हमारी काफी मदद की—मेरा मतलब उसकी कहानी ने। और कहानी की ओट में छिपे उसके संजीदा चेहरे ने, या हमारी ‘सभ्य’ दुनिया से अछूती उसकी भोली बातों ने...जिससे अगर कोई अपमान-वपमान हुआ होगा, जो हमारे जैसे ‘मिसफिट’ लोगों का होता ही है समाज में, तो हमें कुछ खास वो महसूस नहीं हुआ।
हम उसकी टैक्सी से उतरकर जब होटल के भीतर खुशबूदार फूल-फाल, लटुटुओं और झाड़-फानूसों से सजे लकदक हॉल में दाखिल हुए, तब भी उसमें और उसकी दुखभरी कहानी में इस कदर खोए रहे कि हमारे साथ क्या-कुछ हुआ...कैसे बारीक आत्मीयता में लपेटकर हमारा वध किया गया और उस फंक्शन में दूसरों के बच्चों की चटक-मटक, चुस्ती की तुलना में हमारी और हमारे बच्चों की मामूली हैसियत और मामूली कपड़ों के कारण कैसी उपेक्षा भरी नजरें हम पर पड़ीं, इस सबकी ओर हमारा ध्यान ही नहीं गया। इसलिए कि हमारे भीतर तो ‘कुछ और’ था और हम उसमें पूरी तरह लीन थे।
रामलाल...! रामलाल दुआ की संजीदा कहानी, जिसका दर्द हमारी कहानी से कई गुना बड़ा और भीतर तक सिहरा देने वाला था।

[2]
यह भी संयोग ही था कि रामलाल दुआ की उस नीली मारुति वैन में, उसकी बगल की सीट पर मैं बैठा था। 
भीषण गरमियाँ थीं, पसीने से लथपथ कर देने वाली। आसमान मुहावरे में नहीं, सचमुच लपटें उगल रहा था और जमीन अंगारा बनी हुई थी। लिहाजा वह मारुति वैन भी लूओं के गरम उच्छ्वास से तप रही थी। छोटी बेटी नन्ही मेरी गोद में थी और मैं लगातार उससे बातें करता जा रहा था। ये बातें करना इसलिए जरूरी था, क्योंकि पेट्रोल की गंध उसके लिए नागवार थी। कोई बस हो, कार या फिर टैक्सी—किसी में भी उसकी यात्रा यातनादायक है। बैठते ही उसे उलटी होती है और मेरी इधऱ-उधर की गपशप शुरू, ताकि उसका ध्यान किसी तरह मेरी बातों और किस्सों में उलझ जाए। 
बीच-बीच में मैं उसे सुझाव देता, “बेटी, नाक को बाहर निकालो, ऐन हवा की सीध में! और हाँ, शाबाश, लंबी साँस लो! अब धीरे-धीरे छोड़ो...!” और छुटकी कभी हँस पड़ती, कभी सीरियसली मेरी बात मानकर वैसा ही करने लगती।
रामलाल दुआ मुझे उत्सुकता से देख रहा था, तो मैंने उससे कहा कि लड़की की तबीयत खराब हो जाती है पेट्रोल की गंध से, इसीलिए इसका मन लगाना जरूरी है।
“साब, कहीं से छोटी इलायची मिल जाए, तो थोड़ी-सी ले लेंगे। उससे तबीयत खुद-ब-खुद सँभलती है।” रामलाल दुआ ने सुझाव दिया।
“छोटी इलायची...?” मुझे झटका-सा लगा, “हाँ-हाँ, इलायची! खूब याद दिलाया, इलायची घर से लेकर तो चले थे, कहाँ गई पुड़िया...?”
“शायद बुआ जी के घर रह गई।” छुटकी ने आशंका प्रकट की। मगर तब तक बड़की ने किसी जादुई कहानी की तरह पर्स में से इलायची की पुड़िया निकालकर हाथ में रख दी, “लो पापा, मिल गई!”
इलायची से सचमुच छुटकी की तबीयत कुछ सँभली। एक इलायची मैंने ली, एक रामलाल दुआ को दी...और इलायची चबाते हुए मौसम, चिलचिलाती धूप की तपिश, महँगाई, पोल्यूशन, हर मामले में सरकार की ढिल-पों और बेवकूफी...मौजूदा खराब समय और आने वाले और जयादा खराब समय की चर्चा आदि-आदि से गुजरते हुए हमारी बातचीत कब, कैसे एक अतरंग कथा की ओर मुड़ गई, इसे तो कैसे कहूँ! ये बातें कुछ तय करके तो होती नहीं! बस, चलती हैं तो चल ही निकलती हैं। 
यहाँ तक कि रास्ते में पानी की जरूरत पड़ी तो रामलाल दुआ ने अपनी पानी की बॉटल मुझे पकड़ाते हुए कहा, “बहिन जी को बोलिए, इसमें से पानी ले लें। एकदम साफ पानी है। रास्ते में ठेले-वेले का पानी पीना तो खतरे से खाली नहीं है।” फिर तुरंत इसमें जोड़ा, “मैं तो जी, घर से चलने से पहले दो बार खुद से पूछता हूँ, रामलाल दुआ, पानी लिया? फिर जब तक पानी की बॉटल साथ न रख लूँ, घर से बाहर हरगिज नहीं निकलता।”
बहरहाल, इसी बातचीत में मालूम पड़ा कि रामलाल दुआ यू.पी. का है—यू.पी. के रामपुर शहर का। शायद मैंने अपने यू.पी. वासी होने की चर्चा की थी, और इसी पर रामलाल दुआ भी दौड़कर अपने गृहनगर जा पहुँचा था। और अब उसकी आँखें चमक रही थीं—कहना चाहिए, काफी असामान्य ढंग से चमक रही थीं! हालाँकि अपने घर और अपने शहर का जिक्र चलने पर उसके चेहरे—एक सीधे-सादे, गोल, शरीफ किस्म के चेहरे पर दुख की कुछ ऐसी झाँइयाँ नजर आईं, जिन्हें मैं चाहूँ भी तो अपने शब्दों में बाँध नहीं सकता।
तभी पहले-पहल पता चला कि जिस टैक्सी—यानी नीली मारुति वैन को रामलाल दुआ चला रहा है, वह असल में उसी की है।
तभी पता चला कि उसकी एक बेटी है रिंकी—छुटकी जितनी ही, जिसे वह बहुत प्यार करता है। और एक बेटा है नील, जो बेटी से शायद साल-डेढ़ साल बड़ा है।
“साब, हमें तो सब कुछ मिला जिंदगी में। हमें किसी से कोई शिकायत नहीं है। हालाँकि जो कुछ गुजरा, सो तो गुजरा...गुजर ही गया! उसका अब क्या सोचना!...किससे क्या गिला?”
रामलाल दुआ पता नहीं, खुद से कह रहा था या मुझसे? लेकिन उसके स्वर में बेहद संजीदगी थी, जो सीधे दिल में उतरती थी।
क्यों...? क्यों...? क्या...! क्या हुआ भाई रामलाल दुआ तुम्हारे साथ? मैं पूछना चाहता था, मगर कह नहीं पाया।
“जिंदगी भी एक नाटक है साब, और वह नाटक कभी खत्म नहीं होता। हमारे मर जाने के बाद भी! कितनी ही कोशिश करें, हम इस नाटक से छूट नहीं सकते। क्यों साब, आपको नहीं लगता?” उसने सवालिया निगाहें मेरी ओर उठा दीं।
इससे एक गलत ‘सिग्नल’ मेरी पकड़ में आ गया कि रामलाल दुआ का नाटक-वाटक से कोई रिश्ता है, यानी कोई ‘पुराना खिलाड़ी’ है जो कभी थिएटर वगैरह करता रहा है। मुझे अपने एक लँगोटिया यार की याद आई जो नौटंकी के लिए घर से भाग निकला था, और नौटंकी की ‘तीसरी कसम’ टाइप कोई एक साँवले बदन की दुबली-पतली-सी, तीखे नाक-नक्श वाली औरत थी, जिसके चक्कर में पड़ गया। फिर सालों बाद वह घर वालों की पकड़ाई में आया तो उसे मार-पीटकर बाल-वाल कटवाकर और शरीफजादों वाले कपड़े पहनाकर बमुश्किल बंदा बनाया गया।
मैंने गौर से रामलाल दुआ की ओर देखा। उसके जरूरत से थोड़े ज्यादा ही सेहतमंद शरीर में कोई ऐसी कला-अला नजर नहीं आती थी! फिर भी क्या कह सकते हैं! कभी ऐसी कोई ‘बीमारी’ रही होगी। आदमी का कुछ पता नहीं चलता।
पर मैंने जब इस बारे में कुछ खोलकर पूछना और दरयाफ्त करना चाहा, तो उसने साफ कहा, “जी, काहे का नाटक-वाटक? हमारी तो जिंदगी खुद एक नाटक है। आप देखेंगे कि यह जो जिंदगी का नाटक है—राम जी का नाटक, यह सारे नाटकों से बढ़कर है।” कुछ रुककर उसने फलसफाना अदाज में कहा, “यहाँ तो हर चीज नाटक है साब। जो मैं आपसे बात कर रहा हूँ, हो सकता है, वह भी कोई नाटक हो!”
इस ‘नाटक...नाटक’ की अजब-सी धुन में मैं थोड़ा ऊब गया और खिड़की से बाहर देखने लगा। छुटकी अब तक मेरे कंधे से लगकर सो गई थी। लिहाजा मन अब थोड़ी देर हवा में खुलकर उड़ना चाहता था। यों भी ‘एम्स’ पार हो जाने के बाद सड़क कुछ इस कदर खुली मिल जाती है कि मन उड़ना ही चाहता है! कभी यहाँ, कभी वहाँ। कभी अतीत का दुख भरा बीहड़, तो कभी बार-बार आकार लेता और बिगड़ता भविष्य। कभी दोस्त, कभी दुश्मन। कभी घर-परिवार।...और कभी सब कुछ इस कदर गड्डमड्ड कि जैसे कोई आर्टिस्ट तेजी से तूलिका चलाकर कोई बडी सी एब्सट्रेक्ट पेंटिंग बना रहा हो...और फिर बनाते-बनाते अचानक खुद भी उसी पेंटिंग में समा गया हो
अजूबा...!
जी, हाँ...! दुनिया में ऐसे तमाम अजूबे होते हैं, और किसकी जिंदगी में नहीं होते। क्या यह जो रामलाल दुआ इस समय गाड़ी चला रहा है, इसकी जिंदगी में न होंगे? जरूर होंगे भाई, जरूर...इसी का नाम तो जिंदगी है!
जैसे चलती का नाम गाड़ी, ऐसे ही रुक-रुककर तमाम धचके और झपाटे खाकर चलती का नाम जिंदगी!
क्यों, आप ऐसा नहीं मानते क्या?... 

[3]
अलबत्ता, इस बीच रामलाल दुआ ने फिर एक-दो बार मेरा ध्यान आकर्षित किया। और घर-परिवार की कुछ ऐसी बातें छेड़ दीं, जिन्हें मैं चाहते हुए भी अनसुना नहीं कर सका।
मालूम पड़ा कि वह अपने बच्चों को बेहद प्यार करता है। रात दस-ग्याह बजे भी पहुँचे, तो बच्चे इंतजार करते हुए मिलते हैं कि देखें, पापा आज उनके लिए क्या लाए हैं? फिर शुरू होती हैं पापा से बातें और फरमाइशों का लंबा सिलसिला कि पापा, आज तो कोफ्ते बनाओ। पोहा बनाओ, चीला बनाओ। और रामलाल दुआ तब टैक्सी ड्राइवर का बाना छोड़कर, झट फुर्ती से एक शानदार ‘कुक’ का बाना पहने लेता है और वो-वो लजीज आइटम बनाकर पेश करता है कि बच्चों के चेहरे खिल जाते हैं।
“क्यों, मम्मी से नहीं कहते वे?” मैं चौंका।
इस पर रामलाल दुआ के चेहरे पर जो कुछ अजीब-सी आड़ी-तिरछी रेखाएँ उभरीं, उन्हीं में उसकी पूरी जीवन-कथा पढ़ी जा सकती थी।
“मम्मी...? उहँ, एक तो वह इतनी दिलचस्पी नहीं लेती, फिर वह पापा जैसा लजीज खाना भी नहीं बना सकती! बच्चों को तो ऐसा आदमी चाहिए न साब, जो बगैर चिढ़े हुए उनके मन की सारी फरमाइशें पूरी करे और उन्हें खुश रखने की हरचंद कोशिश करे। तभी तो बच्चे सोते नहीं मेरे बगैर। खाना खाने के बाद रात बारह बजे तक उनकी बातों का पीरियड चलता है, और तब कहीं उन्हें नींद आती है।” रामलाल दुआ की आँखों में झप से एक चमक कौंध गई।
फिर उसके स्वर में एक अजीब-सी आर्द्रता नजर आने लगी, “मुझे तो अपनी जिंदगी में कोई खुशी नहीं मिली साब। पर अब नहीं मिली, तो नहीं मिली। उसका तो क्या किया जाए? पर मैं अपने बच्चों को दुनिया-जहान की सारी खुशियाँ देना चाहता हूँ—जी हाँ, सारी! मेरा बस चले तो मैं आसमान के चाँद-तारे तोड़कर उनकी झोली में डाल दूँ।” कहते-कहते उसकी आँखें छलछला आईं। चुपके से हथेली के पार्श्व से उसने उन्हें पोंछ लिया।
अब तक हमारी टैक्सी वजीरपुर डिपो के आसपास जा पहुँची थी। वह फैशनेबल और आधुनिक साज-सज्जा से पूर्ण ‘सूर्या मड हाउस’ जिसे सगाई के लिए चुना गया था, यहाँ से कोई डेढ़-दो किलोमीटर दूर था। पर जब गंतव्य का पता चला रामलाल दुआ को, तो उसके चेहरे पर खिंचाव सा हो गया, “होटल!...होटल क्यों चुना साब आपने? घर की तो बात ही कुछ और है। घर पर जो खाना बन सकता है, साफ-सुथरा और जायकेदार और किफायती भी, होटल वाले क्या खाकर मुकाबला करेंगे उसका? फिर—माफ कीजिए—होटल में फंक्शन हो, तो मन में कोई छाप नहीं पड़ती साब! ऐसा लगता है, बाहर-बाहर गए और बाहर-बाहर से आ गए। घर में चाहे थोड़ी-बहुत दिक्कत हो, पर घर की बात कुछ और है। आदमी जो एक बार आता है, कभी भूलता नहीं। इसीलिए तो साब, उसे घर कहते हैं।”
फिर वह उसी धुन में लहक-लहककर बताने लगा, “अभी साब, मेरे साले की शादी की सालगिरह थी। पच्चीस साल हो गए साब उसकी शादी को। खूब धूम-धड़ाका हुआ। बड़ा-सा फंक्शन उन्होंने रखा। मैं भी पहुँचा अपनी वाइफ और बच्चों के साथ तो मालूम पड़ा, किसी होटल-वोटल में चलने का प्रोग्राम है। तो मैंने कहा—मारो झाडू होटल को! मुझे आप बताइए क्या बनना है और बेफिकर हो जाइए!...और साब, मैंने सब सँभाल लिया। खुद मैं गया मंडी में और आलू से लेकर बैगन, गोभी, मटर, पनीर सब कुछ खरीद लाया, इसी गाड़ी में रखकर जिसमें आप बैठे हैं।...
“अब तो जी, रात में मैंने शाही पनीर बनाया, और उड़द की धुली हुई दाल। सुबह गोभी के शानदार पराँठे और आलू-मटर की सब्जी। दोपहर को कोफ्ते, पुलाव, रायता। रात में आलू-बैगन ऐसे कि चाटते रह जाओ हाथ! और आप यकीन नहीं करेंगे, सबके सब उगलियाँ चाटते रह गए कि वाह रे रामलाल दुआ, तेरी वजह से तो हमने जश्न मना लिया, जश्न! वरना तो क्या होटल, क्या होटल का सड़ा हुआ घासलेटी खाना। सबमें जैसे मोबिलाइल डाल रखा हो। हर चीज में एक जैसी बू-बास। एक ही-सा स्वाद, मरे हुए चूहे जैसा! और रोटियाँ ऐसी चिबड़ी कि दाँतों को कुश्ती लड़नी पड़े। लोगबाग कैसे खा लेते हैं साब, हमसे तो खाया नहीं जाता।...”
रामलाल दुआ ने बात बीच में छोड़कर, एकाएक टैक्सी साइड में खड़ी की। झट गाड़ी से केन निकालकर इंजन में थोड़ा पानी डाला, फिर अपनी सीट पर जमते हुए कहा—
“...घर की चीज में एक और अच्छाई है साब, जिसे आप भी मानेंगे कि घर के लिए आप कोई खराब चीज लेकर नहीं आओगे। न खराब गोभी, न आलू, न मटर-पनीर। ऐसा कुछ भी जिसमें गड़बड़ हो, आप उसे हाथ नहीं लगाओगे। मगर होटल वाले को क्या फर्क पड़ता है? वो तो ऐसी सारी चीजें बटोरकर ले जाएँगे। बस, सस्ती मिलनी चाहिए। सड़ा हुआ गोभी या सड़ा हुआ आलू—तो ग्राहक निपटेगा, हमें क्या! जबकि अच्छा खाने वाले इन चीजों की चिंता करते हैं। हर औरत इस चीज को जानती है। गरीबनी से गरीबनी औरत भी सड़ी हुई चीज नहीं लेकर जाएगी सब्जी मंडी से, चाहे जो हो! और मैं तो साब, मसाले भी साबुत खरीदता हूँ, उन्हीं को पीसकर काम चलाता हूँ। पता नहीं हल्दी या गरम मसाले के नाम पर बाजार में क्या चीज मिल जाए! और आप ये मत सोचो कि उसमें पैसा ज्यादा लग जाता है। अजी, जो दावत हमने अपने साले के घर दी, उसमें पैसा एक चौथाई भी नहीं लगा और चीजें टनाटन। आदमी अगर खुद को थोड़ी तकलीफ दे ले, तो...!” 
“कौन करे भई रामलाल दुआ, ये सारे झंझट?” मैंने उसके लंबे भाषण से थोड़ा परेशान होकर कहा, “पहले शादी-ब्याह हो या कोई और फंक्शन, तो बिरादरी के लोग आ जाते थे और सब सँभाल लेते थे। तब चाहे तंदूर ता लो या मिठाइयाँ बना लो, सब हो जाता था। मगर अब कोई किसी के घर झाँकने नहीं जाता। सब ऐन टाइम पर पहुँचते हैं टाई-सूट पहनकर...बन-ठनकर! तो अकेला बंदा क्या-क्या करे, क्या-क्या न करे!”
“यही तो...यही तो...यही तो मुश्किल है साब! आदमी ने बिरादरी को छोड़ दिया और बिरादरी ने आदमी को। इसका असर अभी तो नहीं, मगर आगे जाकर जरूर कहीं न कहीं नजर आएगा साब। और तब हमारे हाथ में पछतावे के सिवा कुछ नही रहेगा। हुआ यह कि आदमी ने पहले खुद को औरों से काटा, फिर औरों ने उसे काट दिया। अब तो हर आदमी अकेला है, साब। बड़ी जल्दी ही वह समय आने वाला है कि किसी के मरने पर कंधा देने और रोने को चार आदमी भी नहीं जुटेंगे। किराए के लोग लाने पड़ेंगे! याद रखना रामलाल दुआ की बात साब, यह मैं कोई झूठ नहीं कह रहा!...”
वैन एक झटके के साथ रुकी, सामने ‘सूर्या मड हाउस’ था। मैं बच्चों को सँभालने में व्यस्त हो गया और रामलाल दुआ की बात अधूरी रह गई।

[4]
‘सूर्या मड हाउस’ में पहुँचे तो उम्मीद के मुताबिक खासी गहमागहमी थी। और वहाँ लरजती हुई साड़ियों, क्रीजदार पैंटों, रेडिमेड शर्टों, स्कर्टों, नकली हँसियों और नफीस ठहाकों का एक भरा-पूरा जंगल था, जिसमें हम थोड़ा झिझकते और परेशान होते हुए घुसे और एक कोने में जाकर अँट गए।
थोड़ी देर में ‘ठंडा’ सर्व किया गया तो मैं गिलास लेकर बाहर गया। रामलाल दुआ ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, “इसकी क्या जरूरत थी, साब?”
“अरे भाई, ले लो। ऐसा कैसे हो सकता है कि हम अदर ठंडा पीते रहें और तुम बाहर गरमी और लूओं में अपनी टैक्सी में प्यासे पड़े रहो।” मैंने प्यार से कहा।
रामलाल दुआ ने धन्यवाद के साथ गिलास थाम लिया और मैं अदर आ गया।
थोड़ी देर बाद खाने की बारी आई तो मैंने बैरे से कहा, “एक प्लेट हमारे टैक्सी ड्राइवर के लिए भेजिए। वह बाहर ही है, नीली वाली मारुति वैन में।”
बैरा थाली लेकर बाहर गया और लौट आया, “वहाँ तो कोई नहीं है, साब।” 
“अरे...!” हैरान होकर बैरे के साथ मैं बाहर गया तो सचमुच रामलाल दुआ नजर नहीं आया, वैन लॉक्ड थी। परेशान होकर इधर-उधर ताका, तो वह एक पान वाले की दुकान पर नजर आ गया। वह उससे लहक-लहककर बातें कर रहा था और खूब खुश था।
मैंने बैरे से प्लेट लेकर पास जाकर उसे पकड़ानी चाही, पर वह लगातार ‘न-न’ कर रहा था, “नहीं साब, मैं तो सुबह घर से खाना खाकर निकलता हूँ और रात को घर पर जाकर ही खाता हूँ। मेरे लिए लंच-वंच का कोई चक्कर नहीं। और फिर बाहर का खाना...बुरा न मानिए, मैं तो अवॉइड ही करता हूँ।’
“अब ले लो भाई! हम भी कोई होटल-वोटल का खाना खाने वाले जीव नहीं। मगर कभी-कभार तो नियम तोड़ना ही पड़ जाता है।”
मेरे बहुत आग्रह पर उसने प्लेट पकड़ ली और धीमे से अपनी मारुति वैन की ओर बढ़ गया। उसकी आँखों में एक ऐसी नमी थी, जिसने क्षण भर के लए मुझे बाँध-सा लिया।
इसके बाद कोई घंटा-डेढ़ घंटा और लगा उस पार्टी के निबटने में, जिसमें लोग खाने पर बुरी तरह टूट पड़ने के बाद अब उसे पचाने के लिए बातों का ‘हॉट’ सिलसिला चलाए हुए थे। और इतना मुसकरा रहे थे कि मैं खुद को हँसी और मुसकानों के ‘सुगंधित दलदल’ में फँसा हुआ महसूस कर रहा था।
हम चले तो रामलाल दुआ कुछ और आत्मीय ‘सुर’ में अपनी कथा के गर्भगृह में प्रवेश कर चुका था।
अब वह बता रहा था—
“मेरी माँ ग्रेट औरत थी साब, एकदम ग्रेट! कितना प्यार करती थी मुझे, यह मैं आपको बता नहीं सकता।...और मुझे लगता था, बस, मैं अपनी माँ के लिए जान दे दूँ तो हो गया मेरे जीवन का मकसद पूरा!”
“और पिता...?” मैंने औचक ही पूछ लिया।
“उलटे—माँ से एकदम उलटे! आप यकीन नहीं करेंगे साब, मेरी कहानी सुनकर कि ऐसा भी कोई पिता होता है या कि हो सकता है! आप कहेंगे, झूठ बोल रहा है रामलाल दुआ! पर मेरी कहानी का एक शब्द भी झूठ हो तो हे प्रभु, जो कातिल को सजा मिलती है, बड़े से बड़े पापी को सजा मिलती है, वह सजा मुझे मिले।”
“मगर...तुम्हारे पिता ऐसे क्यों थे रामलाल?” मैंने बात की तह में उतरने की कोशिश में, जैसे एक बेवकूफी भरा सवाल पूछ लिया।
“क्या कह सकते हैं साब, क्या कह सकते हैं?” रामलाल दुआ ने जैसे दुख से सिर धुनते हुए कहा, “मुझे तो कई बार लगता है, ईश्वर एक बनिया है। हिसाब बराबर रखता है साब, एकदम बराबर। इतनी अच्छी माँ उसने मुझे दी, तो बाप ऐसा जल्लाद कि उसे बाप कहते शर्म आए। हालाँकि आपको यकीन नहीं आएगा कि मैं अब भी अपने पिता की इज्जत करता हूँ। इसलिए कि जो कुछ उन्होंने किया सो किया, मगर बाप तो एक ही होता है। साब, उसकी जगह तो कोई नहीं ले सकता न!...
“हाँ तो साब, माँ मेरी गुजर गई और मेरी जिंदगी तो उसी दिन फीकी पड़ गई जिस दिन माँ गई इस दुनिया से। कितना भर-भरकर प्यार करती थी मुझे। मझे तो कितने लाड़ से खिलाती-पिलाती, पुचकारती थी। मुझे एक जरा-सा काँटा भी चुभ जाए, तो तड़पती थी। मैं जब तक रोटी न खा लूँ, उसके गले में रोटी जा नहीं सकती थी। और आज...? आप यकीन नहीं करेंगे साब, आप जब प्लेट में मेरे लिए खाना लेकर आए और मेरी ‘ना...ना’ के बावजूद मेरे हाथ में थमा गए, तो मुझे अपनी माँ की याद आ गई। आपमें अपने लिए वही प्यार देखा, साब। आपकी आँखों में ठीक वही भाव था, जो मेरी माँ की आँखों में हुआ करता था, जब वह मेरे लिए थाली लेकर आती थी और पुचकारकर कहती थी, ‘ले, खा ले रामलाल।’ आज इतने बरस बाद लगता है, आपमें अपनी माँ को देख लिया।...”
कहते-कहते रामलाल दुआ की सिसकियाँ चालू हो गईं। वह फूट-फूटकर रो पड़ा।

[5]
संयोग से उस समय वैन रुकी हुई थी और उसमें मेरे और रामलाल के सिवाय और कोई नहीं था। सुनीता और दोनों बेटियाँ छुटकी और बड़की सामने मेरे बड़े भाई साहब के घर मिलने गई थीं। और वैन में मैं और रामलाल अकेले थे। भाभी की जिद थी कि मैं भी एक बार ऊपर आऊँ! बार-बार संदेश आ रहे थे, पर रामलाल दुआ को ऐसे गहरे भावोद्रेक के क्षणों में अकेला छोड़कर जाने का मेरा मन नहीं हुआ। लिहाजा उसे फूट-फूटकर रोते देख, मैंने खींचकर गले से लगा लिय। उसे भरसक दिलासा दिया कि नहीं, तमाम मुश्किलों के बावजूद उम्मीद अभी खत्म नहीं हुई है...कि दुनिया अभी बची हुई है।
कुछ ही देर में सुनीता और दोनों बेटियाँ लौटकर आ गई थीं और गाड़ी चल पड़ी थी।
“लेकिन क्यों, तुम्हारे पिता ऐसे क्यों हो गए रामलाल दुआ?” मैं जैसे समझ नहीं पा रहा था और बार-बार किसी अटकी हुई जिद्दी सूई से इसी चीज को खोलने में लगा था।
“शायद इसलिए कि...मेरे पिता पहले बिजनेसमैन हैं, बाद में पिता।” रामलाल दुआ ने संजीदा स्वर में कहा, “उन्होंने अपने जीवन में किसी चीज को माना या उसकी पूजा की तो पैसे की, सिर्फ पैसे की! पैसे से ज्यादा कीमती इस दुनिया में उन्हें कुछ और नहीं लगा साब, न कोई आदमी न रिश्ता। इसी चीज से खुंदक खाकर तो मैं घर से निकला था साब।”
“अरे, क्यों? किसलिए?...यह चीज तो तुमने मुझे बताई ही नहीं।” मेरे मुँह से खुद-ब-खुद मुड़े-तुड़े-से शब्द निकले, “क्या कोई खास घटना हुई थी।”
“अजी, खास तो क्या!...यों खास कह भी सकते हैं।” साफ लग रहा था कि रामलाल दुआ अपनी जीवन-कथा के इस चैप्टर को खोलना नहीं चाहता। जबरन उसे इधर आना पड़ा था, “खास तो यही था साब, कि हमारी एक बड़ी भाभी थी, जरा तेजतर्रार। थोड़े पैसे वाले घर की थी। तो हमारा बड़ा भाई भी उससे दबता था और पिता भी! तो ऐसे में उसका दिमाग तो खराब होना ही हुआ, साब। उसने माँ से भी कुछ उलटा-सीधा बोल दिया। एक दिन मेरे सामने ही ज्यादा आँय-बाँय की तो मैंने कहा—खबरदार, आज तो मैंने सुन लिया। मगर आइंदा से मेरी माँ से कुछ कहा तो इस घर में या तो तू नहीं या मैं नहीं!
“बस, वो तो जी लगी फूँ-फाँ करने, रोने-गाने, चिल्लाने! बड़े भाई को पकड़कर ले गई अलग कोने में। कुछ उलटा-सीधा पढ़ाया। दोनों ने साब, घर में आफत मचा दी। इधर मैंने पिता से कहा, ‘या तो इन लोगों को घर से अलग करो या फिर मैं निकलता हूँ। बड़ी भाभी ने माँ से जो बातें कहीं, मैं उन्हें हरगिज बर्दाश्त नहीं कर सकता।’
“तो इस पर बाप ने कहा, ‘ये तो यहीं रहेंगे, तुझे घर में नहीं रहना तो निकल जा।’
“मैंने कहा, ‘ठीक है, मैं निकल जाऊँगा।’
“बाप बोला, ‘तो फिर देर क्यों करता है, अभी निकल...!’
“मैं बोला, ‘लो, अभी निकलता हूँ।’
“मैंने साब, आप यकीन करोगे—घर से कोई कपड़ा-लत्ता नहीं लिया! दो पैसे तक नहीं लिए और जिस हाल में था, उसी में घर से बाहर आ गया। बस, माँ रोती-कलपती, आँसू बहाती रही मेरे लिए। उसकी धाड़ें बाहर तक आ रही थीं। बाकी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा।...”
एक क्षण के लिए होंठ भींचकर रामलाल दुआ ने अपनी भावनाओं को जैसे काबू में किया। फिर थोड़े पसीजे हुए स्वर में बोला—
“तो खैर! वो रात मैंने रेलवे स्टेशन पर गुजारी। कैसे गुजारी? कैसे आग रात भर मेरे भीतर जलती रही और कैसे खून का घूँट मैंने पिया, यह सब मुझसे मत पूछो, साब। मगर हाँ, रात भर मैंने एक फैसला कर लिया। और उसके बाद अगले दिन से उसी स्टेशन पर कुलीगीरी का काम शुरू कर दिया। ईश्वर की कृपा से शरीर तो ठीक ही था, मेहनत करने लायक। दिल में वलवला भी था कि बाप को कुछ बनकर दिखाना है। तो जी, मैंने जमकर कुलीगीरी शुरू कर दी। और एक-दो दिन नहीं, कोई साल-डेढ़ साल तक यही सिलसिला चालू रहा। लोग जो भी देखते थे, हैरान होते थे। अब कोई बड़ा शहर तो है नहीं रामपुर। वहाँ जान-पहचान वाले भी खूब मिलते थे और हैरान-परेशान होकर पूछते, ‘अरे, रामलाल, तू तो लाला खरैतीलाल दुआ का बेटा है ना? बाप ने क्या घर से निकाल दिया? कुलीगीरी की नौबत कैसे आ गई?’
“मैं कहता, ‘देखो भाई, मैं किसी खरैतीलाल का बेटा नहीं। मैं तो खुदा का बंदा हूँ और उसके अलावा मेरा कोई बाप नहीं।’
“तो खैर साब, मेरी मेहनत सच्ची थी तो रंग लाई। मैं ढाबे का मोटा-झोटा खाता था, खूब मेहनत-मजूरी करता और स्टेशन पर ही सो जाता। डेढ़-एक साल में जेब में कुछ पैसे जमा हो गए। अब कपड़े का काम तो मैं शुरू से जानता था। बाप की कपड़े की दुकान थी, सो यह मेरे खून में था। तो मैं कपड़े के एक व्यापारी माणिकलाल मनचंदा के पास गया और बोला, ‘सेठ साब, मैं कपड़े का काम शुरू करना चाहता हूँ। मुझे थोड़ा-सा कपड़ा उधर चाहिए। जैसे-जैसे बिकेगा, मैं देता जाऊँगा। हाँ, मेरे पास एक हजार रुपए हैं। ये आप सिक्योरिटी के रख लो अपने पास!’
“सेठ ने मेरा कंधा थपथपाया, ‘तू चिंता न कर रामलाल। मैं जानता हूँ, तू मेहनती लड़का है। मैंने तेरे बारे में खूब सुना है। तू जितना मर्जी कपड़ा ले ले। और पैसे जब हों, तो देना। न हों तो मत देना।’
“देख लो साब, कोई अपना न हो तो विपदा में कैसे-कैसे मदद करने वाले मिल जाते हैं।” रामलाल दुआ ने कहा, “तो साब, मैंने कपड़े का काम चालू कर दिया। दुकान तो कोई थी नहीं। कपड़ों की खूब बड़ी-सी गठरी बाँधकर निकलता और देहात में रोजाना तीन-चार सौ की बिक्री करके लौटता था। चालीस-पचास रुपए रोज के कमा लेता था। कुछ रोज बाद तो हालत यह हो गई साब, कि मेरे ग्राहक इंतजार में रहने लगे, रामलाल आएगा, हमारे मनमाफिक डिजायन का कपड़ा लेकर। तो अब तो बिक्री और बढ़ गई, महीने के दो-तीन हजार रुपए बचने लगे। होते-होते दो साल में इतने बचे कि मैंने एक छोटी-सी दुकान किराए पर ले ली और कपड़े का बिजनेस शुरू कर दिया।”
“यहाँ एक छोटी-सी बात और! मैं भूल न जाऊँ, इसलिए सुन लो, साब। जिस दिन दुकान का मुहूर्त था, मैंने घर पर संदेश भिजवाया, ‘मुझे पाँच हजार रुपए की सख्त जरूरत है। अगर मिल जाएँ तो मैं एक साल के भीतर मय सूद लौटा दूँगा।’...”
“अच्छा...!” मुझे हैरानी हुई।
पर रामलाल दुआ रुका नहीं, बहता गया, “अब मैं कोई बेवकूफ तो था नहीं! मैं अच्छी तरह जानता था, साब कि मुझे क्या जवाब सुनने को मिलेगा। फिर भी दिल नहीं माना। मैं एक दफा टैस्ट करना चाहता था कि देखें उनका दिल कितना बड़ा है। तो साब, मेरे बाप ने साफ-साफ कह दिया कि ‘रामलाल, इस घर में तेरे लिए एक पैसा नहीं है। तू जी या मर, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता!’ तो जी, जो थोड़ा-बहुत भरम कह लो या गलतफहमी बनी हुई थी मन में, वह उस दिन खत्म हो गई। उस दिन घर आकर मैं कितना फूट-फूटकर रोया हूँ, यह किसको बताऊँ? बताया भी तो कौन समझेगा? मुझे लग रहा था, लोगों के बाप मर जाते हैं। पर मेरा बाप तो जिंदा होकर भी मर गया...!”
उत्तेजना के मारे उसका स्वर काँपने लगा था।

[6]
खुद मेरी हालत अच्छी नहीं थी। मैं कोशिश करके भी यकीन नहीं कर पा रहा था कि कोई पिता ऐसा हो सकता है, ऐसा! और यकीन न करूँ, यह भी कैसे हो सकता था, जब कि रामलाल दुआ मेरे सामने ही बैठा था, जिसने अभी-अभी मुझे यह सब बताया था।
“उफ! यकीन नहीं होता, इतना सख्त भी कोई बाप हो सकता है।” मैंने विचलित होकर कहा।
“क्या कह सकते हैं?” रामलाल दुआ अचानक दार्शनिक हो गया, “हो सकता है, इसी में कुछ भला हो मेरे लिए! हो सकता है, कुछ सोचा हो मेरे बाप ने कि अपने आप ठोकर खाकर घर आएगा, और मैंने तय कर लिया था कि नहीं जाऊँगा। जान दे दूँगा लेकिन घर नहीं जाऊँगा। और मैंने अपना कौल निभाया, नहीं गया साब, आज तक नहीं गया।”
“तो काम चल निकला तुम्हारा?...मेरा मतलब कपड़े की दुकान?” मैंने फिर से उसी ‘किस्से’ पर लौटते हुए कहा।
“हाँ साब, खूब चल गई दुकान। बाजार में अच्छी-खासी इज्जत हो गई। थोक के दुकानदार दिल खोलकर मुझे उधार देते थे और मैं माल बेचकर टाइम से पैसा वापस कर देता था। ग्राहक की संतुष्टि, बस यही मेरा ‘एम’ था। तो साब, लोग पूछ-पूछकर मेरी दुकान पर आते थे। और कहते थे कि रामलाल दुआ, तेरी दुकान छोड़कर हमने कहीं नहीं जाना, भले ही कोई मुफ्त में माल क्यों न देता हो! लेकिन साब, शुरू-शुरू में दिक्कतें भी बहुत आईं! मैंने आपको बताया ना वो किस्सा कि मेरे बाप ने सूखी ना कर दी थी। तो एक दिन मैं अपनी दुकान पर बैठा था और रो रहा था कि मेरे जैसा अभागा भी कोई होगा, जिसका बाप जिंदा होते हुए भी मर गया।... 
“अब चांस देखो साब, मेरी दुकान के ऊपर ही एक बैंक था। तो बैंक का एकाउंटेंट कोई कपड़ा खरीदने आया। मुझे रोता देखकर बोला, यार, तू रोता क्यों है? मैंने रोते-रोते कहा, बाप मर गया है, इसलिए...! और पूरा किस्सा सुना दिया। उसने कहा, तू चिंता न कर, मैं कुछ करता हूँ। तो साब जी, उस एकाउटेंट ने, कमलकिशोर सक्सेना उसका नाम था—पाँच छोड़, दस हजार रुपए मुझे लोन दिला दिया, अपनी जिम्मेदारी पर! वह लोन, साब, मैंने ढाई साल में पूरा चुकता कर दिया किस्तों में, ब्याज समेत!...तो साब, अब एक और चांस देखो! बैंक में जिन साब ने लोन दिलाया था—सक्सेना साब, वो बड़े भले आदमी थे। एकदम देवता। उन्होंने एक दिन पूछा कि रामलाल दुआ, तुम्हारी शादी हो गई? मैंने कहा—नहीं साब, मैं अकेला बंदा हूँ। कोई मेरा कुछ करने वाला नहीं है। कौन करेगा मुझसे शादी?
“इस पर उन्होंने कहा—इससे क्या! अच्छे तदुरुस्त आदमी हो। नेक खयाल हैं तुम्हारे। कमाते-धमाते भी ठीक-ठाक हो। फिर क्या मुश्किल है?
“मैंने कहा, आपकी जान-पहचान में कोई लड़की हो तो देखना साब।
“कुछ रोज बाद सक्सेना साब आकर बोले, रामलाल, मेरी एक छोटी साली है। सुंदर है, अच्छे स्वभाव की है। बस, थोड़ी साँवली है और एक आँख में थोड़ा डिफेक्ट है। तुम कहो तो बात करूँ?
“मैंने कहा, ठीक है साब। मैंने शक्ल थोड़े ही देखनी है। बस, लड़की ऐसी हो कि मेरा साथ निभा सके!
“कुछ रोज बाद हमने एक-दूसरे को देखा, पसंद कर लिया और शादी हो गई।”
“अच्छा! शादी में क्या तुम्हारे घर वाले भी आए। माता-पिता, भाई-भाभी...?” मैंने बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा।
“हाँ साब, मैंने तो सबको खूब आदर से बुलाया था और जितना भी जिसका आदर-सत्कार कर सकता था, किया! मगर मेरे बाप ने, आप यकीन नहीं करेंगे, शादी में एक फूटी कौड़ी नहीं खर्ची। बहू तक को जेब से निकालकर आशीर्वाद के ग्यारह रुपए नहीं दिए। हाँ, मेरी माँ ने जरूर चोरी से कोई साढ़े अट्ठानवे रुपए की रेजगारी और एक पुरानी सोने की अँगूठी दी थी ट्रंक से निकालकर। मैंने साब, उसे ले तो लिया। मगर उसे छाती से लगाकर देर तक रोता रहा। आज तक माँ के दिए हुए वो साढ़े अट्ठानवे रुपए मेरे पास ज्यों के त्यों पड़े हैं। उन्हें खर्च नहीं किया साब मैंने, और वह अँगूठी भी पहनी नहीं गई। रखी हुई है आज तक माँ की निशानी के तौर पर! हर साल बैसाखी वाले दिन निकालता हूँ और सिर पर लगाता हूँ।...बैसाखी मेरी माँ का जन्मदिन है साब!”
“तो माँ कब गुजरीं? कब हुआ उनका इंतकाल...?” बेसुधी में उसकी ‘कहानी’ के साथ बहते-बहते मैंने पूछा।
“हाँ जी, माँ गुजर गईं, उस घर में बहुत-बहुत दुख पा के! और मैं तो कहता हूँ, अच्छा हुआ जो उनकी जल्दी मुक्ति हो गई, वरना और जीतीं तो और दुख उठातीं।” कहते-कहते उसका गला भर आया। क्रोध और करुणा का एक ऐसा उफान उसके भीतर उमड़ा कि चेहरा तमतमा गया।
उसी आवेश में बहते हुए रामलाल दुआ ने पतियाए हुए स्वर में कहा, “किसी ने घर में उसकी इज्जत नहीं की, साब। एक देवी थी, जो आई थी हमें प्यार का पाठ पढ़ाने। पर दुखी दिल लेकर चली गई। इसीलिए आज हमारे घर की यह हालत है। पूरा घर जैसे भूतों का डेरा बना हुआ है।...आप उस घर में साँस नहीं ले सकते पाँच मिनट। मैं ठीक कहता हूँ साब! दम घुटने लगता है।”

[7]
उसने कातर निगाहों से मुझे देखा। फिर एक ठंडी साँस लेकर बोला, “और यही वजह है साब, कि मुझे रामपुर छोड़ना पड़ा। मुझसे देखा नहीं जाता था साब, घर की जो हालत थी और बाप को जिस तरह बेइज्जत किया जाता था। अब जैसा बोओगे, सो तो काटोगे ही। मगर मुझसे नहीं देखा गया तो रामपुर छोड़कर चला आया दिल्ली। मन कहता था—भाग...भाग! कहीं भी चल, कहीं भी जा, मगर यहाँ नहीं। सो सब टाँडा-टीरा बटोरकर चला आया दिल्ली। एकाध बिजनेस जमाने की कोशिश की ट्रांसपोर्ट वगैरह का, पर जो पार्टनर था, वह बेईमानी कर गया साब। पूर डेढ़ लाख उसने खा लिए और भाग गया।...
“तो अब क्या रास्ता था? बाकी जो पैसे थे, बटोर-बटारकर और बीवी के गहने बेचकर यह मारुति वैन खरीदी और टैक्सी ड्राइवर बन गया। दिल्ली में गुजारा मुश्किल से होता था। किसी भले आदमी ने कहा कि फरीदाबाद में हुडा के फ्लैट मिल रहे हैं आसान किस्तों पर। तो जैसे-तैसे अपने रोजाना के खर्चे और जरूरी चीजों में थोड़ी खींचतान करके एक फ्लैट ले लिया, और यहाँ आ गया।... 
“अब जिंदगी चल रही है साब। बहुत ज्यादा नहीं है। मगर ऐसा भी नहीं है कि रोटी-पानी का कोई झंझट है। जो मिला, काफी मिला। मुझे तो किसी से शिकायत नहीं है, साब।”
रामलाल दुआ कह रहा था, तो साफ लग रहा था, उसके अंदर कोई है, जो जार-जार आँसुओं में रो रहा है। रो रहा है, पर अपने आँसुओं को सामने आने भी नहीं देना चाहता। ताकि कोई उसे बेचारा न समझे।...
न, न, न, दया नहीं। किसी की दया नहीं। कतई नहीं!—जैसे बिन कहे, उसका आविष्ट चेहरा बोल रहा है।
आखिर वह जैसा भी है, एक भरापूरा बंदा है, और जी रहा है अपने ढंग से। अपनी भरपूर खुद्दारी के साथ। और भला क्या चाहिए आदमी को?
एक अजब सी कशमकश। एक युद्ध अपने आपसे।...जी हाँ, इसी का नाम शायद रामलाल दुआ है।

[8]
कुछ देर की चुप्पी। शायद अपने आवेग को सँभालने के लिए उसे यह जरूरी लगा हो। फिर थोड़े हलके ‘सुर’ में संजीदगी से बोला, “माँ तो अब रही नहीं, पर बाप के बारे में जरूर सोचता रहता हूँ अब भी। बाप चाहे कुबाप हो, पर है तो बाप। मैं सोचता हूँ, मैं उनका बेटा होकर उनके लिए कुछ नहीं कर सकता? वहाँ रामपुर में तो साब, बड़ी दुर्दशा है। अब तो हालत यह है कि भाई-भाभी, जिनके पास वो रहते हैं, बात-बात में उनकी बेइज्जती करते हैं और यहाँ तक कि उनके बच्चे भी!...
“अभी पिछले साल की बात है। मेरे बड़े भतीजे ने उन्हें इतनी बुरी तरह धक्का दे दिया कि जमीन पर जा गिरे। कूल्हे की हड्डी में फ्रैक्चर हो गया। पूरे साल भर तक इलाज हुआ, अच्छे से अच्छे डॉक्टरों को दिखाया, मगर हड्डी ठीक से जुड़ने में नहीं आती। यों भी बुढ़ापे का शरीर है, हड्डियों में भी अब जान कहाँ रही। अब थोड़ा-थोड़ा लँगड़ाकर तो चल लेते हैं मगर वो बात नहीं रही। और पूरे शहर में बेइज्जती अलग हुई कि लाला खरैतीलाल दुआ के पोते ने उनको मारा।...देख लो साब, कैसा वक्त आ गया है!”
रामलाल ने एक पल रुककर अपने आप को सँभाला, फिर बोला, “आपको इस घटना की असली वजह बताऊँ तो आप भी ताज्जुब करोगे। मेरे भतीजे बबलू ने जो दिन भर दोस्तों के साथ आवारागर्दी करता है और लड़कियाँ छेड़ता है, पिता जी से मोटर साइकिल खरीदने के लिए पच्चीस हजार रुपए माँगे थे। अब ये पुराने आदमी हैं साब, किफायत से खर्च करने वाले, तो उन्होंने मना कर दिया। बस इसी बात पर बबलू ने—आप देखिए, उनके सगे पोते ने गुस्से में उन्हें धक्का दे दिया। और कोई साल भर वे हाय-हाय करते खाट पर पड़े रहे। अब जैसे-तैसे लाठी लेकर डगमगाते, लगड़ाते हुए दुकान पर जाते हैं, मगर इज्जत घर में दो पैसे की नहीं है। और शहर में भी लाला खरैतीलाल दुआ के पुराने दिल लद गए। जिंदा रहकर भी मुर्दे के समान है साब, वो आदमी।...
“और घर की हालत...? अब मैं आपको तफसील से बताऊँ। आप इससे अंदाजा लगाइए कि मुझे जब पता चला कि ऐसी-ऐसी बात हो गई तो मैं यहाँ से गया टैक्सी लेकर कि उन्हें अपने साथ फरीदाबाद लेकर आऊँगा। गाड़ी में उन्हें आने में कोई मुश्किल नहीं होगी। पर आप देखिए, मेरे साथ क्या बर्ताव हुआ!...यानी मैं उनसे मिलने तो गया, पर मैं उस घर में एक दिन नहीं रुका। मैंने उस घर में एक वक्त का खाना तक नहीं खाया। चाय तक नहीं पी। मैं सीधा रामपुर में होटल में रुका था और कोई पंद्रह दिन वहीं रहा।...
“तो रोजाना होटल में नहा-धोकर, खाना खाकर जाता था। बाप के पास बैठता दो-चार घंटे, फिर लौटकर होटल में आकर टिक जाता। और मुझसे—यह हकीकत है, साब—अगर मैं झूठ बोल रहा होऊँ तो जो गाय का मांस खाने की सजा होती है, वह सजा मुझे मिले—कभी किसी ने एक वक्त की रोटी या चाय के लिए नहीं पूछा। जबकि किस मुश्किल से मैं वहाँ पहुँचा था। वैन चाहे अपनी है, पर यहाँ से वहाँ तक जाने का पेट्रोल का खर्जा तो लगता है कि नहीं? होटल में रुकने का, खाने का, चाय-पानी का खर्चा अलग से। और फिर पूरे पंद्रह दिन तक काम का हर्जा! यह सब काहे के लिए? उसी बाप के लिए न, जिसने चाहे कितने ही दुख दिए, धक्का मारकर घर से निकाला, मगर फिर भी मेरे मन में उसके लिए इज्जत बची हुई है। मैं तो खुद से एक ही बात कहता हूँ कि रामलाल दुआ, अगर तेरे बाप ने खुद को आदर के योग्य साबित नहीं किया, तो क्या! तुझे तो अपना फर्ज पूरा करना ही है।...”
कहते हुए रामलाल दुआ रुका, तो उसके चेहरे पर कुछ ऐसी मासूमियत और संजीदगी थी कि भीतर मन भर आया। आँखें भीग सी गईं। मेरे लिए समझ पाना मुश्किल था कि यह कैसा आदमी है, जो अपने आप और हालात से इतनी बड़ी लड़ाई ल़ड़ रहा है, चुपचाप। बिना किसी से कुछ कहे। यह क्या छोटी बात है?
कहने को रामलाल दुआ एक साधारण आदमी ही तो है। एक निहायत मामूली आदमी। लेकिन एक मामूली आदमी के पास भी कितना कुछ असाधारण और अद्भुत होता है, समझ पाना मुश्किल है।...मुझे लगा, इस आदमी को तो प्रणाम करना चाहिए!
पर मैंने किसी तरह अपनी भावुकता पर विराम लगाया और निगाहें फिर से रामलाल दुआ के चेहरे पर गड़ा दीं, जहाँ पता नहीं कितने दुख-दाह, द्वंद्व और बेचैनी की झाँइयाँ थीं।
“हाँ भई रामलाल, तुम कुछ कह रहे थे न पिता जी के बारे में...?” मैंने चुपचाप निगाहों से उसके चेहरे को टटोलते हुए पूछा।
“हाँ, जी...जी हाँ!” रामलाल दुआ ने फिर से सुर पकड़ते हुए कहा, “पिता को लेकर चिंता मेरे भीतर इतनी थी कि अकसर मैं रात को सो नहीं पाता था।...और एक दफा नहीं, मैं बहुत दफे उनसे मिलने जा चुका हूँ, साब। कोई दस-बारह बार। पर भाई-भाभी के घर में मेरी इतनी भी इज्जत नहीं, जितनी कि घर में घुस आए खजैले कुत्ते की! वो भी जानते हैं कि कितनी ही दुर-दुर करो, फिर भी आएगा, क्योंकि इसका बाप यहाँ है। और मजे की बात देखो साब, जिस बाप के लिए मैं धक्के खाता वहाँ पहुँचता हूँ, वह अभी तक इस उमर में भी माया-मोह के चक्कर में इस कदर फँसा है कि उसे लिए बेटा-वेटा कोई चीज नहीं है पैसे के आगे! मैं कहता हूँ, पिता जी, छोड़ो यह सब। क्या ले जाना है आपको अपने साथ? मेरे पास आकर रहो सुख से चार दिन। मेरे भी दिल को शांति पड़ेगी!...पर उनका मन तो साँप की तरह पैसे की कुंडली मारकर बैठा है। मैं, आपको यकीन नहीं आएगा, पंद्रह दिन तक लगातार रट लगाता रहा कि आप चलिए...चलिए...चलिए मेरे साथ! पर वे नहीं आए। टस से मस नहीं हुए।’
“उन्हें कोई गलतफहमी न रहे, इसलिए मैंने साफ-साफ कहा कि मुझे आपका एक पैसा नहीं चाहिए। बस, मेरी एक ही इच्छा है कि कुछ आप हमारे घर चलकर रहिए, ताकि हमें भी लगे कि हमारा घर भी घर है। जरा अपनी छोटी बहू को, पोते-पोतियों को भी देखिए। वो तरसते हैं आपके लिए।...मगर मजाल है जो उनके कानों पर जू भी रेंग जाए!
“आखिर में जब मैं लौट रहा था, निराश होकर मैंने कह ही दिया कि देखिए पिता जी, आप माया के चक्कर में पड़ गए हैं। अब इस उम्र में आप माया का जंजाल छोड़िए। एक बेटे को आपने देख लिया, अब दूसरे बेटे को भी आजमाकर देख लीजिए। हमें भी सेवा का मौका दीजिए।...मगर नहीं साब, माया तो बेड़ी बनकर उनके पाँवों में पड़ी है।”
“क्यों? क्या वहाँ दुकान तुम्हारे बड़े भाई के जिम्मे नहीं है?...क्या इस उम्र में भी पिता जी ही उसे देखते हैं?”
मेरे सवाल ने उसे खासा उत्तेजित कर दिया। बड़े ही तमतमाए चेहरे के साथ उसने कहा, “अरे, राम भजिए! किसी और को भला कैसे जिम्मा दे सकते हैं वे? बयासी साल के हो गए, लेकिन चाबियाँ अभी तक उन्हीं के हाथ रहती हैं। कोई लाख माथा पटक ले, उनसे एक पैसा ले नहीं सकता।...आप मानेंगे साब, जितने दिन वे बिस्तर पर रहे, रोजाना बेटे से दुकान का पूरा हिसाब लेकर तब सोते थे। ऐतबार उन्हें किसी का नहीं है, चाहे उनके सगे पिता जी स्वर्ग से नीचे उतर आएँ, तो भी नहीं।”
“यानी दुकान अभी तक उन्हीं के अंडर है? वही सँभालते हैं सब कुछ...?” मैंने हैरान होकर पूछा।
“बिल्कुल! बड़े भाई को तो सिर्फ महीने का घर चलाने का खर्चा देते हैं, बाकी सब कुछ अपनी मुट्ठठी में! और मुट्ठी इतनी सख्त है कि कोई एक निक्की पाई तो ले ले उनसे!...”
“ऐसा क्यों?” मैंने भौचक होकर कहा, “आखिर आदमी परिवार के लिए ही तो करता है सब कुछ!”
“इसलिए कि किसी पर उनका विश्वास नहीं है। आपको बताया तो है साब, पैसा ही उनका प्राण, मित्तर, प्यारा है...वही खुदा, वही ईश्वर! बस, पैसा ही दुनिया में एक ऐसी चीज है जिसके लिए वे मजे से जान दे सकते हैं।”
रामलाल दुआ के होंठ व्यंग्य से शायद कुछ ‘टेढ़े’ हो गए।
“खैर, मैं वहाँ से लौट तो आया।” फिर से उसी घटना-क्रम पर लौटते हुए उसने कहा, “घर आकर मैंने उन्हें चिट्ठी लिखी। अपने अल्प ज्ञान के बावजूद मैंने कोशिश कर-करके ऐसी भाषा लिखी, चुन-चुनकर एक-एक ऐसा शब्द...कि सीधा मन में उतरता जाए। मैंने उन्हें लिखा कि पिता जी, अब इस उम्र में तो आपको समझना चाहिए। आप ‘नीति’ भूलकर ‘नीयत’ के चक्कर में फँस गए हैं...!”
“तो खूब लंबा-सा पत्र मैंने लिखा साब, जिसमें दिल का पूरा दर्द उड़ेल दिया। पर उन्होंने उसका जवाब तक नहीं दिया।...एक लाइन तक नहीं!”
“अब मैं फिर से एक और चिट्ठी लिख रहा हूँ। आधी लिख ली है, बाकी आधी और पूरी करनी है। उसमें हो सकता है, महीना-डेढ़ महीना लग जाए। मुझे इतनी अच्छी भाषा कहाँ आती है! पर लिखना ऐसा चाहता हूँ कि उन्हें महसूस हो कि उन्होंने किया क्या है और क्या उन्हें करना चाहिए था। अभी तक सही अल्फाज ढूँढ़ने में लगा हूँ। रोजाना कुछ-कुछ वाक्य लिखता हूँ। सारे दिन गाड़ी चलाता हुआ सोचता रहता हूँ, तब मुश्किल से दो-चार पंक्तियाँ लिख पाता हूँ। जिस दिन पूरी हो जाएगी चिट्ठी, आपको दिखाऊँगा। मुझे कविता तो नहीं आती, पर कोई कवि भी क्या ऐसी चिट्ठी लिखेगा, जो मैंने अपने पिता को लिखी है...!
“पहले भी जो दो-तीन चिट्ठियाँ भेजी थीं, मेरे पास उनकी रफ कापी होगी साब! आप देखना कभी, आप मान जाएँगे कि रामलाल दुआ, तुझमें कुछ बात है।”

[9]
रामलाल दुआ ने थोड़ी आत्मकरुणा से भरी निगाहों से मुझे देखा, और फिर उसने एक दूसरी ही पगडंडी पकड़ ली—
“और दिल में कोई बात न होती या कोई आग, कोई तड़प न होती अंदर, तो मैं घर से भागता ही क्यों साब! शुरू से ही लगता था कि रामलाल दुआ, तुझे सच्चाई का पक्ष लेना है...और एक भला और नेक बंदा बनना है। कितना बन सका हूँ साब, कह नहीं सकता, मगर अंदर तड़प तो वही है।
“आपको वो किस्सा सुनाऊँ साब, जब मैं रामपुर रेडियो स्टेशन जाया करता था। आपको पहले बताया था न? अच्छा, नहीं बताया।...वो ऐसा है जी, मैं बचपन में गाने का बहुत शौकीन था। मुकेश के, रफी के गाने तो हू-ब-हू बिल्कुल उन्हीं की आवाज में गा लेता था। कोई पहचान नहीं सकता था माई का लाल कि ये मुकेश की आवाज नहीं, रामलाल दुआ की आवाज है...या कि ये रफी साब नहीं गा रहे हैं, अपना यार रामलाल दुआ मौज में आकर अलाप ले रहा है!
“तो साब, मैं बहुत छोटा-सा था, तभी से रामपुर रेडियो स्टेशन वाले मुझे गाने के लिए बुला रहे हैं, युववाणी में! उन दिनों वहाँ के स्टेशन डायरेटर थे शाद साब! वो तो साब, इस कदर मुझे प्यार करते थे कि पूरे रेडियो स्टेशन पर यह बात फैल गई थी और हर शख्स की जुबान पर थी कि रामलाल दुआ शाद साब का खोया हुआ बेटा है जो बचपन में तीन साल की उमर में उनसे बिछुड़ गया था, जब वे किसी मेले में गए थे, और फिर उसका कुछ पता नहीं चला। बहुत खोजा, बहुत तलाशा, मगर कहीं कोई निशानी तक नहीं! तो इसी दर्द ने साब, शाद साब को भी एक मशहूर म्यूजीशियन बनाया! और क्या एक से एक कमाल की धुनें बनाया करते थे साब वो! सितार और बाँसुरी तो उनके हाथ में आते ही जादू-मंतर...बस जादू-मंतर हो जाती थी एकदम!”
“मुझे भी कहा करते थे कभी-कभी साब वो, कि रामलाल दुआ, तुझे मैं सिखाऊँगा ये सब और अपने पास रखूँगा बेटा बनाकर। खुद ब्याह-शादी करूँगा तेरी, नौकरी दिलवाऊँगा। लाइफ बन जाएगी तेरी! पर मैं कहता, नहीं साब, अपन मौज में गा लेता, इतना काफी है। अपन बैठकर छह-छह घटे म्यूजिक वगैरह का, सितार-बाँसुरी का रियाज नहीं कर सकता। यह सब अपने बस की बात नहीं! मूड में आया तो गाया, नहीं तो नहीं। अपना तो बस ये शौक है। व्यापारी का बेटा हूँ सो बिजनेस आता है। म्यूजीशियन की लाइफ अपन को सूट नहीं करेगी, सो यह शौक चलेगा नहीं साब!
“बाद में शाद साब का लखनऊ तबादला हो गया। जाते समय वो भी और उनकी घरवाली भी, सादिया बेगम नाम था जी उनका—मुझे छाती से चिपकाकर आँखों में आँसू भर-भरकर रोए। मनाते रहे कि तू चल, चल हमारे साथ! और रुलाई तो मेरी भी साब, बहुत छूट रही थी। मैं फूट-फूटकर रो पड़ा कि मेरे असली माँ-बाप तो छूट ही गए, और ये जो नए माँ-बाप मिले, तो ये भी अब बिछुड़ रहे हैं। फिर जाने कभी मुलाकात हो न हो!...पर साब, मैं चाहते हुए भी उनकी बात मान नहीं सका। ऐसे मामलों में तो साब, अंदर से मन जो बात कहे, सो ही माननी चाहिए। मेरा पक्का यकीन है! क्यों साब, आपका क्या खयाल है?”
उसकी आँखों में सवाल कम, एक उमड़ती-घुमड़ती हुई वेदना ही ज्यादा थी, जो न जाने कब आँसुओं में तब्दील हो गई।

[10]
“चलो खैर, जो गुजरी सो गुजरी! भूलो अब बीती बातें।” मैंने कंधे पर हाथ रखकर उसे दिलासा देते हुए कहा, “अब, बीवी-बच्चे तो खूब प्यार करते होंगे?”
इस पर रामलाल दुआ का चेहरा थोड़ा खिंच-सा गया। थोड़े तंज के साथ बोला, “हाँ, बीवी तो ठीक है, वैसी ही जैसी और बीवियाँ होती हैं। पत्नी का धर्म निभा देती है, लेकिन बच्चे सच में ऐसे हैं जो बहुत प्यार करते हैं। जानते हैं कि हमारे बाप ने बहुत कष्ट सहे हैं हमारे लिए...इस घर को बनाने के लिए! इसीलिए वे दूना-चौगुना प्यार लुटाकर मेरे दुख को कम करते रहते हैं। और साब, बच्चों से बात करने से ज्यादा खुशी मुझे किसी और चीज में नहीं मिलती!...”
“और ससुराल वाले...? वहाँ से तो खूब प्यार मिलता होगा?” पूछने पर रामलाल दुआ फिर उदास हो गया। बोला, “हाँ, साब, ठीक ही है! सब पैसे की माया है। ससुराल वाले भी जानते हैं कि जो थोड़ा कमजोर है औरों से, उसे दबा लो। अब मेरी ससुराल में सभी तो अफसर हैं, सिवाय मेरे। साले खूब अच्छी सरकारी नौकरियों में हैं!...एक साढ़ू तो बैंक मैनेजर ही है। उसका किस्सा तो आपको बताया था कि मेरी शादी उसी ने कराई थी। बाकी एक साढ़ू रेलवे में स्टेशन मास्टर, एक सेक्शन ऑफीसर है उद्योग मत्रालय में। सभी एकसे एक पहुँचे हुए हैं। और अपन तो साब, टैक्सी ड्राइवर होकर ही रह गए!...तो साब, टैक्सी ड्राइवर की खातिर तो टैक्सी ड्राइवर जैसी ही होगी न, कोई अफसर जैसी तो हो नहीं सकती। और यह बात कोई और नहीं, खुद मेरी बीवी कहती है। जिस दिन मेरी बीवी ने कहा था पहली दफा, तभी से मेरे माथे पर मोटे-मोटे हर्फों में खुद गया है—‘टैक्सी ड्राइवर’! और अब तो मुझे भी इसमें इतना मजा आने लगा है कि मैं चाहूँ भी तो इस पेशे को बदल नहीं सकता!”
कहते-कहते, रामलाल दुआ की आँखें फिर से पनीली हो गईं। कहीं मेरी पकड़ में उसकी यह कमजोरी न आ जाए, इसलिए होशियारी से नजरें बचाकर वह बाहर देखने लगा था। फिर अचानक जैसे पूरा साहस बटोरकर उसने मेरी ओर देखा और पनीली, बेहद पनीली आवाज में कहा, “पत्नी?...बस पत्नी ही तो मेरी हार है। वही अगर मुझे इस कदर न दागती तो मैं...मैं पूरी दुनिया से लड़ सकता था साब, पूरी दुनिया से!...”
रामलाल दुआ रो तो नहीं रहा था, पर उसका पूरा शरीर थरथरा रहा था।
उसकी उदास नजरों का पीछा करते-करते मैंने एक निगाह बाहर डाली। हमारी बातों के साथ-साथ वैन तेजी से भागी जा रही थी। हवा में थोड़ी ठंडक घुल चुकी थी। मुद्रिका का रास्ता पार करके अब हम ‘अपर्णा आश्रम’ पर थे।
जल्दी ही गाड़ी मथुरा रोड पर आ गई। यानी फरीदाबाद अब काई पचीस मिनट दूर था...
“मैं जरूर कभी तुम्हारी कहानी लिखूँगा रामलाल दुआ। तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं?” मैंने उसे टोहते हुए पूछा।
“आप...अच्छा, आप राइटर हैं। तभी तो...मैं खुद भी सोच रहा था कि आप जरूर कुछ न कुछ हैं, कोई बिल्कुल अलग किस्म के आदमी...वरना तो कौन हमसे इस तरह बात करता है!” कहते-कहते उसकी आँखों में चमक भर गई, “ठीक है साब, आप...आप लिखिए, जरूर लिखिए! मैं आपको और भी चीजें बताऊँगा।”
कुछ रुककर उसने झिझकते हुए कहा, “कभी आप खाली हों साब, तो मैं आपको अपना घर भी दिखाना चाहता हूँ। आप देखिएगा आकर कभी! आपको इस गाड़ी में बिठाकर ले जाऊँगा। हमारे घर के पास ही सूरदास जी की जन्मस्थली है—सीही गाँव में, वहाँ अभी एक कवि-सम्मेलन भी करवाया था सरकार ने...आप चाहोगे तो आपको वहाँ भी ले चलूँगा।”
“तो ठीक है, अगले इतवार को! एकदम पक्का रहा।” मैंने उसके प्रस्ताव पर खुशी जताते हुए कहा।
कोई साढ़े नौ बजे उसने हमें घर पर छोड़ा। तब तक छुटकी मेरे कंधे पर लगी-लगी सो चुकी थी। पीछे वाली सीट पर सुनीता और बड़की तंद्रा में थीं। पैसे लेकर अगले इतवार को आने का वादा करके ‘नमस्कार’ करके उसने विदा ली।

[11]
अगले इतवार को वह शायद किसी जरूरी काम से उलझ गया। और उसके कुछ रोज बाद, शनिवार की सुबह उसका फोन आया तो मैं एक दिलचस्प उपन्यास पढ़ रहा था। जाहिर है, मैं तीव्रता से किसी और भावधारा में बहने लगा था। रामलाल दुआ की कहानी याद थी, पर नाम उसका विस्मृति के हलके कुहासे में चला गया था...
उसने फोन पर संकोचभरी आवाज में कहा, “प्रकाश जी, मैं दुआ...पहचान रहे हैं न!”
“हाँ-हाँ!” मैंने असमंजस में पड़कर कहा। मैं वाकई पहचान नहीं पाया था, पर यह कहना शायद बदतमीजी होती! इस बीच मैं लगातार उसकी आवाज के सहारे पहचानने की कोशिश कर रहा था।
“असल में पिछले इतवार को तो मैं आ नहीं सका। कुछ काम था...कल अगर आप कहें तो मैं आ जाऊ!”
“हाँ-हाँ, ठीक...!”
मैंने कह तो दिया, पर पहचान अब भी नहीं पाया था। मेरे एक मित्र दुआ साहब एयरफोर्स में बड़े अधिकारी रहे हैं। मुझे लगा कि कहीं वही तो नहीं बोल रहे? हालाँकि आवाज थोड़ी बदली हुई थी...
लेकिन फोन रखते ही मुझे अपनी गलती पता चल गई। यह तो रामलाल दुआ था, टैक्सी ड्राइवर...!
उसी समय मैं समझ गया—रामलाल दुआ कह भले ही रहा हो इतवार को आने के लिए, पर वह नहीं आएगा। हरगिज नहीं आएगा। मेरी आवाज का अनुत्साह उससे छिपा न रह गया होगा।
मैंने सुनीता से कहा, “गलती हो गई! उसने भी सिर्फ ‘दुआ’ कहा और मैं पहचान नहीं पाया। अगर उसने पूरा नाम रामलाल दुआ ही कहा होता तो...”
“नहीं, तुम्हारी क्या गलती है!” सुनीता ने मेरे जख्म पर फाहा रखते हुए कहा, “इतने लोग रोजाना मिलते हैं, हर किसी का नाम थोड़े ही याद रखा जा सकता है! कोई लंबी पहचान तो थी नहीं। या फिर वह पूरी बात बताता कि मैं टैक्सी ड्राइवर रामलाल दुआ बोल रहा हूँ, आप उस दिन मेरी टैक्सी में बैठकर...!”
“यही तो...यही तो तुम नहीं जानतीं सुनीता। यही तुम नहीं समझोगी!” मैं एकाएक चिल्ला पड़ा, “वह टैक्सी ड्राइवर के रूप में मेरे पास नहीं आ रहा था, एक व्यक्ति रामलाल दुआ के रूप में...एक दोस्त। तुम समझीं, समझीं कुछ?”
सुनीता अचकचाकर मुझे देख रही थी कि अचानक मुझे हुआ क्या है! और मेरी गलती सचमुच ऐसी ‘अक्षम्य’ थी कि रामलाल दुआ फिर नहीं आया—आज तक नहीं आया। 
हो सकता है, अपना अपमान करने वाले ‘हृदयहीन’ लोगों में उसने एक नाम और जोड़ लिया हो! और यों भी, इसमें झूठ गया है? मेरा खयाल है, आप मुझसे सहमत होंगे।

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