महबूब (प्रांत-प्रांत की कहानियाँ)

(प्रांत-प्रांत की कहानियाँ से साभार)
मूल भाषा: रूसी
लेखक: मैक्सिम 
गोर्की

परिचय: देवी नागरानी जन्म: 1941 कराची, सिंध (तब भारत), 12 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, 2 भजन-संग्रह, 12 सिंधी से हिंदी अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिंधी, हिन्दी, तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्पर अनुवाद। श्री मोदी के काव्य संग्रह, चौथी कूट (साहित्य अकादमी प्रकाशन), अत्तिया दाऊद, व रूमी का सिंधी अनुवाद. NJ, NY, OSLO, तमिळनाडु, कर्नाटक-धारवाड़, रायपुर, जोधपुर, केरल व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। डॉ. अमृता प्रीतम अवार्ड, व मीर अली मीर पुरस्कार, राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद व महाराष्ट्र सिन्धी साहित्य अकादमी से पुरस्कृत। अंतर्जाल: https://nangranidevi.blogspot.com ईमेल: dnangrani@gmail.com 


मैक्सिम गोर्की
यह उन दिनों की बात है जब मैं मास्को में रहकर पढ़ाई करता था। जिस जगह पर मैंने कमरा किराए पर लिया था, वह पुरातनकाल की टूटी फूटी इमारत थी। उसमें बस यही एक फायदा था कि किराया बहुत कम था। 

मेरे सामने वाले कमरे में एक औरत रहती थी जो कुछ ऐसे किस्म की औरत थी, जिससे मेरा मतलब है - किसी के चरित्र के बारे में कुछ कहना अच्छी बात नहीं! आप खुद समझ जाए! वह पोलैंड की रहने वाली थी, सब उसे "टेरेसा" के नाम से पुकारते थे। लाल बालों और लंबे कद वाली, आकर्षक टेरेसा के चेहरे पर एक अजीब कशमकश भी होती थी। जैसे कि उसका चेहरा पत्थर से तराश कर बनाया गया हो। उसकी आँखों की चमक, टैक्सी ड्राइवर वाला रवैया और उसकी शख्सियत में झलकती मर्दानगी, ये सब बातें मेरे अंदर एक डर पैदा करतीं थीं।
उसका दरवाजा मेरे दरवाज़े के बिल्कुल सामने था। जब भी मुझे यक़ीन होता कि वह घर में मौजूद है तो मैं अपना दरवाज़ा कभी भी खुला नहीं रखता था। पर ऐसा कभी-कभार होता था। दिन में मैं कमरे में नहीं होता था, रात को वह बाहर चली जाती थी। कभी-कभी सीढ़ियों पर उससे सामना हो जाता तो उसके होठों पर मुस्कान आ जाती थी। पर न जाने क्यों मुझे उसकी यह मुस्कान व्यंग्यात्मक लगती। 
 दो-तीन बार मैंने उसे नशे की हालत में दरवाज़े के पास खड़े देखा। उसके बाल खुले होते, आँखों में उदासी और वीरानी और होंठों पर वही मुस्कान। ऐसे मौकों पर वह मुझसे कुछ न कुछ ज़रूर कहती थी।
"क्या ख्याल है मेहरबान शागिर्द?" और फिर उसकी असभ्य हँसी गूंजने लगती थी, जो, उसके लिए मेरे दिल में बसी नफ़रत में और इज़ाफा कर देती। 
 ऐसे अवसरों से बचने के लिए मैं अपना कमरा भी बदलने को तैयार था। पर कोई और कमरा खाली नहीं था।  दूसरी बात यह है कि मेरे कमरे की खिड़की से बाहर जो हसीन नज़ारा दूर-दूर तक नज़र आता था, वह सुविधा हर कमरे में न थी। इसलिए मैं दिल में व्यथित होते हुए भी ख़ामोशी से उसे बर्दाश्त करता रहता था।
एक दिन खाट पर लेटा कमरे की छत को घूर रहा था और कक्षा में गैर हाज़िर होने का बहाना ढूंढने में व्यस्त था, तब दरवाजा खुला और टेरेसा तेज़ी से भीतर दाखिल हुई।
"बादशाही बरक़रार हो जनाब शागिर्द।" उसने अपनी सख्त आवाज में कहा।
"क्या बात है?" मैं उठकर बैठ गया। उसके चेहरे पर मुझे परेशानी और एक भीतरी उलझाव दिखाई दे रहा था। ये उसके व्यक्तित्व के विपरीत कुछ अजीब लक्षण थे। 
"देखो" टेरेसा शब्दों को तोलते हुए कहने लगी: "मुझे... मुझे, ... मैं एक निवेदन लेकर आई हूँ।"
मैं खाट पर बैठे उसे देखता रहा। मैंने सोचा "हे ईश्वर" मेरे पास चरित्र पर हमला होने वाला है क्या? हिम्मत कर नवयुवा, हिम्मत से काम लो।"
टेरेसा वहीं दरवाजे पर खड़े खड़े कहने लगी, "मैं एक पत्र भेजना चाहती हूँ, मेरा मतलब है एक पत्र लिखवाना चाहती हूँ। बस यही बात है।"
 उसकी आवाज आश्चर्यजनक रूप से बहुत ही डरी हुई और विनम्र थी। मैंने दिल ही दिल में खुद पर लानत भेजी और बिना कुछ कहे उठकर लिखने वाली मेज़ के पास रखी कुर्सी पर जा बैठा, "हूँ" मैंने कहा "बैठो और लिखवाओ।" 
वह चुपचाप चलते हुए दूसरी कुर्सी पर सावधानी से बैठी। उसके बाद उसने मेरी ओर इस तरह देखा जैसे कोई बच्चा गलती करने के पश्चात शर्मसारी से देखता है।
मैंने कहा "किसके नाम लिखवाना है?"
"बोरिस कारपोफ़" (Boris Karpov) के नाम" उसने कहा। "वह वारसा में रहता है, तीसरे मर्कजी रोड के फ्लैट नंबर तीन सौ बारह में।"
"जी कहिए क्या लिखवाना है।"
"मेरे प्यारे बोरिस," उसने कहना शुरू किया। "मेरी जान, मेरे महबूब, मेरी जान तुम में अटकी हुई है। तुमने बहुत समय से कोई स्नेह भरा संदेश नहीं भेजा है। क्या तुम्हें अपनी नन्ही उदास कबूतरी की याद नहीं आती?" केवल तुम्हारी, टेरेसा।
मैंने बड़ी मुश्किल से अपने आप को ठहाका लगाने से रोका। "नन्ही उदास कबूतरी" यानि आप खुद सोचिए, कबूतरी का कद छः फुट हो सकता है? उसके हाथ पत्थर की तरह सख्त हो सकते हैं? बरसात के दिनों में भीगने से परहेज करने वाली ऐसी कबूतरी हो सकती है जिसका घोसला पेड़ों की बजाय किसी घर की चिमनी में हो?"
ऐसे में मैंने खुद को रोकते-रोकते उससे पूछा, "यह बोरिस कौन है?"
"बोरिस कारपोफ़" उसने सख्त लहज़े में जैसे मुझे पूरा नाम लेने की हिदायत दी। 
"एक नवयुवा।"
"नवयुवा?" 
"हाँ, पर तुम हैरान क्यों हो? क्या मुझे ऐसी लड़की का कोई नवयुवा प्रेमी नहीं हो सकता?"
मैंने उसे गौर से देखा। वह जो खुद को लड़की कहने पर तुली हुई थी, उसका भला क्या इलाज हो सकता है? मैंने कहा "नवयुवा महबूब हो सकता है,  क्यों नहीं हो सकता?"
उसने कहा, "मैं तुम्हारी दिल से आभारी हूँ, यह पत्र लिखकर तुमने मुझ पर एहसान किया है। अगर तुम्हें कभी, किसी भी तरह की मदद की ज़रूरत हो तो बिना हिचकिचाहट..."
"नहीं, नहीं।" मैंने कहा। 
"बहुत बहुत मेहरबानी।" उसने फिर कहा, "अगर किसी कमीज़ का बटन लगवाना हो या सिलाई वगैरह करवानी हो"
मैंने अपना चेहरा शर्म से लाल होते हुए महसूस किया और सख्ती के साथ उसकी ओर देखते हुए कहा कि मुझे इस तरह की किसी भी सेवा की ज़रूरत नहीं है। 
वह चली गई।
 दो हफ़्ते बीत गए।
एक दिन शाम के वक्त मैं खिड़की के पास खड़ा, बाहर देखते हुए सैर के लिए जाने की सोच रहा था। मैं अप्रसन्न था, मौसम भी खराब था, बाहर जाकर कुछ सुकून हासिल करने की गुंजाइश कम ही थी। उस दुविधा का कोई हल निकले, यही सोच दुःखी कर रही थी। उस वक्त कोई और काम भी नहीं था।
 उसी वक्त दरवाज़ा खुला और कोई अंदर चला आया।
"मेहरबान शागिर्द तुम व्यस्त तो नहीं? हैं?" मैंने मुड़कर टेरेसा को देखा। उसके अंदाज में वही विनम्रता थी।
मैंने कहा, "नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। क्या काम है?" 
"मैं चाहती हूँ कि तुम एक और पत्र लिखकर दो।"  
"जी, "बोरिस कारपोफ़" के नाम?"
"नहीं इस बार यह पत्र उनकी तरफ से है।"
"क्या?"
"मैं भी कितनी मूर्ख हूँ।" टेरेसा ने कहा।
"यह पत्र मेरे लिए नहीं है मेहरबान शागिर्द, मैं माफ़ी चाहती हूँ। यह मेरे एक दोस्त की तरफ से हैं। दोस्त नहीं, एक जान-पहचान वाले की तरफ से है। उसकी भी मेरे जैसी यानि टेरेसा जैसी एक महबूबा है, समझ रहे हो न? वह उसे पत्र लिखवा कर भेजना चाहता है, क्या तुम उस दूसरी टेरेसा के नाम पत्र लिख दोगे?"
मैंने गौर से उसे देखा। उसके चेहरे पर परेशानी थी और उसके हाथ काँप रहे थे। धीरे-धीरे बात कुछ समझ में आने लगी।
"सुनो मैडम," मैंने कहा "यह चक्कर क्या है? मुझे यक़ीन है कि आप मुझे हकीक़त नहीं बता रही हो। और अब तो मुझे लग रहा है कि यह बोरिस और टेरेसा कहीं भी नहीं है। आप इस गोरखधंधे से मुझे दूर ही रखें। मुझे माफ़ कीजिए, उम्मीद है कि आप मेरी बात भली-भांति समझ गई होंगी। मैं ऐसी दोस्ती  हर्गिज़ भी बढ़ाना नहीं चाहता।"
मेरी बात सुनकर वह भयभीत हो गई। आगे बढ़ने या वापस जाने की दुविधा में जकड़ी हुई, कुछ कहने और न कहने के बीच में फँसी हुई। जाने अब क्या होने वाला था? शायद मुझे अंदाजा लगाने में गलती हो गई थी। शायद बात कुछ और थी।
"मेहरबान शागिर्द..." उसने कहा और फिर अचानक खामोश हो गई। उसने अपनी गर्दन हिलाई, मुड़कर दरवाज़े की ओर चलने लगी, दरवाजे के पास पहुँचकर क्षण भर के लिए रुक गई और फिर बाहर निकल कर चली गई।
मैं गुस्से और शर्मिंदगी की हालत में था। बाहर गैलरी से उसके दरवाज़ा खुलने और धमाके से बंद होने की आवाज़ आई। वह निश्चित ही बहुत गुस्से में थी। मैंने दिल ही दिल में खुद को कोसा और उसके पास जाकर उसे मना कर अपने कमरे में ले आकर उसकी मर्जी के अनुसार पत्र लिखने का फैसला किया। मैं उसके कमरे का दरवाज़ा खोल कर भीतर गया। वह कुर्सी पर सर झुकाए बैठी थी।
"सुनो!" मैंने कहा। 
मेरी आवाज सुनते ही वह उछल कर खड़ी हो गई। उसकी आँखें लाल थी। वह तेज़ी से मेरी ओर आई, मेरे कंधे पर हाथ रखकर दर्द भरे स्वर में कहा, "मैं नहीं सुनूंगी, तुम सुनो। वह बोरिस कहीं भी न हो और ये टेरेसा "मैं" भी कहीं न रहूँ, उससे तुम्हें क्या फ़र्क पड़ता है? क्या कागज़ पर कलम चलाना तुम्हारे लिए मुश्किल काम है? कहो? मान लो कि न कोई बोरिस है, न ही कोई टेरेसा है, इससे अगर तुम्हें खुशी मिलती है तो खुश हो जाओ।"
मैं हैरानी से उसकी और देखता रहा।
"माफ़ करना," मैंने कहा "यह सब क्या है? क्या तुम यह कहना चाहती हो कि कोई बोरिस नहीं है और न ही कोई टेरेसा है?"
"टेरेसा तो मैं हूँ।"
मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया मैं उसके चेहरे को ताकता रहा और सोचता रहा कि न जाने हम दोनों में से पागल कौन है?
वह खुद को संभालते हुए एक तरफ हो गई और मेज़ की दराज़ खोलकर कुछ ढूंढने लगी। फिर एक कागज़ का टुकड़ा लेकर मेरी तरफ़ आई।  
"तुम्हारे लिए, मेरी खातिर बोरिस को पत्र लिखना इतना ही मुश्किल काम था, तो यह लो।" कहते हुए उसने वह कागज़ का टुकड़ा मेरे मुँह पर दे मारा। 
"यह वही पत्र है जो तुमने बोरिस के नाम लिखा था। मैं किसी और से लिखवा लूंगी।"
 मैं उसकी और बस देखता ही रहा। फिर कहा "देखो टेरेसा, इन सब बातों का मतलब क्या है? तुम किसी और से पत्र क्यों लिखवाओगी? जबकि मैं बोरिस  के नाम का पत्र तुम्हें लिखकर दे चुका हूँ, जो तुमने उसे भेजा ही नहीं है?"
"कहाँ नहीं भेजा?" उसने कहा, "बोरिस को?"
मैं चुपचाप खड़ा रहा। 
"कोई बोरिस नहीं है," उसने चिल्लाते हुए कहा। "पर मैं चाहती हूँ कि वह रहे। मैंने बोरिस के नाम पत्र लिखवाया तो उससे किसी को क्या नुकसान पहुँचा? अगर वह इस दुनिया में कहीं भी मौजूद नहीं है तो उससे क्या फर्क पड़ता है?"
 उसने उन्माद में कहा "मैं उसके नाम का पत्र लिखवाती हूँ तो मुझे लगता है कि वह कहीं मौजूद है। और फिर मैं एक पत्र उसकी ओर से अपने लिए लिखवाती हूँ, और फिर उसका जवाब लिखवाती हूँ।"
उसकी आँखों से अविरल आँसुओं की धार बह रही थी "तुम बोरिस की तरफ़ से वह पत्र लिख देते तो मैं किसी और से पढ़वा लेती और फिर सोचती कि बोरिस, मेरा महबूब कहीं मौजूद है। लिखे हुए वे पत्र मेरे पास रहते तो उन्हें सुनकर और लिखवाकर अपने भीतर एक नई दुनिया आबाद करके, इस मक्कार और बदसूरत दुनिया की कड़वाहटों को कम महसूस करती। इसमें तुम्हारा या किसी और का, या इस दुनिया का क्या बिगड़ता?"
मैं गर्दन झुकाए खड़ा रहा जैसे कोई गुनहगार अदालत में खड़ा रहता है, और मैंने आँखों में भर आए आब को रोकने की कोशिश भी नहीं की। 
***


लेखक परिचय: मैक्सिम गोर्की (28 मार्च 1868 - 18 जून 1936) 
मक्सीम गोर्की का जन्म निज़्हना नोवगोरोद (आधुनिक गोर्की नगर) में हुआ। 1892 में गोर्की की पहली कहानी मकार चुद्रा (रूसी: Макар Чудра) प्रकाशित हुई। गोर्की की प्रारंभिक कृतियों में रोमांसवाद और यथार्थवाद का मेल दिखाई देता है। "बाज़ के बारे में गीत" (1895), "झंझा-तरंगिका के बारे में गीत" (1895) और "बुढ़िया इजेर्गील" (1901) नामक कृतियों में क्रांतिकारी भावनाएँ प्रकट हो गई थीं। दो उपन्यासों, "फोमा गोर्देयेव" (1899) और "तीनों" (1901) में गोर्की ने शहर के अमीर और गरीब लोगों के जीवन का वर्णन किया है। गोर्की ने अनेक नाटक लिखे, जैसे "सूर्य के बच्चे" (1905), "बर्बर" (1905), "तह में" (1902) आदि, जो बुर्जुआ विचारधारा के विरुद्ध थे।  नाटक "शत्रु" (1906) और "माँ" उपन्यास में (1906) गोर्की ने बुर्जुआ लोगों और मजदूरों के संघर्ष का वर्णन किया है। "मेरा बचपन" (1912-13), "लोगों के बीच" (1914) और "मेरे विश्वविद्यालय" (1923) उपन्यासों में गोर्की ने अपनी जीवनी प्रकट की। इन्होंने अनेक पत्रिकाओं और पुस्तकों का संपादन किया। गोर्की सोवियत लेखकसंघ के सभापति थे। गोर्की की समाधि मास्को के क्रेमलिन के समीप है। मास्को में गोर्की संग्रहालय की स्थापना की गई थी। गोर्की की अनेक कृतियाँ भारतीय भाषाओं में अनूदित हुई हैं। महान हिंदी लेखक प्रेमचंद गोर्की के उपासक थे।

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