दो कविताएँ: राजेश पाठक

राजेश पाठक
गाँव

गाँव चाहता है 
बची रहे संवेदना
बचा रहे 
भोलापन व अपनापन भी

बची रहे 
पुरखों की विरासत
बचे रहें 
दो जोड़े बैल 
और बची रहे 
कुछ धुर ही सही
पर उपजाऊ जमीन

गाँव नहीं चाहता
पूरा का पूरा शहर बनना
कि उसकी उपजाऊ जमीन पर
उगने लगे मकान की फसलें
वह चाहता है 
बची रहें संवेदनशील नस्लें

गाँव को पूरा का पूरा 
शहर बनाने की कवायद
ठीक वैसे ही 
जैसे कोई माँ-बाप
थोप जाते हैं
अपने बच्चों के माथे पर
अपनी महत्वाकांक्षाओं के बोझ
बिना उनकी 
क्षमता, रुचि व प्रकृति को जाने।
***


मिट्टी

पेट के सवाल को
रोटी से हल करते-करते
गाँव से शहर में
बसता चला गया आदमी 

छोड़ दिया गाँव में बसा 
भरा-पूरा परिवार

छोड़ा तो छोड़ा
थोड़ा भी लगाव
नहीं रख सका मिट्टी से

कि जब चलता था
तो उसके पाँवों में
लगी मिट्टी पूरी की पूरी
नहीं हट पाती थी
उतनी भी आसानी से
लाख धोता था 
पानी से

अब तो शहरी संस्कृति में
इतना घुल गया कि
पाँवों में थोड़ी धूल
लगी भी नहीं
कि झाड़ देता है उसे
जैसे गाँव से शहर आये
किसी रिश्तेदार से 
मुँह मोड़ लेता है 
असभ्य समझ कर 

और इस तरह धीरे-धीरे
मिट्टी गाँव की हो
या शहर की
उससे पाता रहता है छुटकारा

पर यह भी कि
एक दिन नजर आ ही जाते हैं 
शहर में बनाए गए
नये मकान के अंदर
दीवारों की पोर में
उग आए छोटे-छोटे
पीपल, बरगद के पौधे

उन्हें नोच-उखाड़
फेंकने के बावजूद
वे लगातार उग आ रहे हैं
उन्हें अपनी मिट्टी की गंध
पता है
और उन्हें 
मिट्टी से जुड़े
व उसके साथ
उगे रहना पसंद है।
***

राजेश पाठक
पता - द्वारा जिला सांख्यिकी कार्यालय, गिरिडीह, झारखंड 815301
शिक्षा -एम ए 
संप्रति झारखंड सरकार अंतर्गत जिला सांख्यिकी पदाधिकारी

एक कविता संग्रह (पुकार) वर्ष 2014 में प्रकाशित

विभिन्न समाचार-पत्रों/पत्र-पत्रिकाओं (वागर्थ, साहित्य अमृत, सरस्वती, अहा! जिंदगी, कथाबिंब, ककसाड़, नवकिरण, प्राची,हिमप्रस्थ, मुस्कान,चहल पहल, साहित्यगंधा,कलम हस्ताक्षर,दी अंडरलाइन, उदंती, प्रेरणा अंशु,नवल,शबरी, अणुव्रत, हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, सन्मार्ग आदि) में रचनाएँ निरंतर प्रकाशित।

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