विविध रस एवं भावों और समसामयिक परिस्थितियों की विसंगतियों को अभिव्यक्त करते गीत-नवगीतों का संग्रह: इतना भी आसान कहाँ है


समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 987 063 1805; ईमेल: drdinesh57@gmail.com

समीक्ष्य पुस्तक: इतना भी आसान कहाँ है
ISBN: 978.93.5518.866.3
रचनाकार: डॉ.जगदीश व्योम
पृष्ठ: 144, प्रकाशन वर्ष- 2023
मूल्य: ₹ 399 रुपये
प्रकाशक:वाणी प्रकाशन 4695,21-ए,दरियागंज,न. दिल्ली-110002

दिल्ली सरकार में उप शिक्षा निदेशक के पद से सेवा निवृत्त, हिन्दी साहित्य में गीत, नवगीत और हाइकु तथा बाल कहानी, बाल उपन्यास आदि विविध विधाओं में सृजन करने वाले वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. जगदीश व्योम जी का गीत-नवगीत संग्रह -‘इतना भी आसान कहाँ है’ को वाणी प्रकाशन दिल्ली ने प्रकाशित किया है जिसके 144 पृष्ठों में 55 गीत-नवगीत तथा छन्दमुक्त रचनाओं को संग्रहीत किया गया है।

पुस्तक की भूमिका प्रसिद्ध साहित्यकार, पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष और हरदेव बाहरी जी के साथ अनेक कोशों का सृजन करने वाले प्रसिद्ध कोशकार, डॉ. राजकुमार सिंह जी ने लिखी है जिसमें वह लिखते हैं-

दिनेश पाठक ‘शशि’
‘नवगीतकारों में तरलता, अनुभूति की सघनता और प्रभावान्वित का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। नवगीतकारों की परम्परा में शम्भुनाथ सिंह, वीरेन्द्र मिश्र, ठाकुर प्रसाद सिंह, रवीन्द्र भ्रमर, रमानाथ अवस्थी, सोमठाकुर, उमाकांत मालवीय आदि के बाद एक चर्चित नाम डॉ.जगदीश व्योम का है, जिन्होंने नवगीत विधा को नया आयाम दिया।’(पृष्ठ-6)

डॉ.नामवर सिंह जी के शब्दों में नवगीत की परिभाषा कुछ इस प्रकार से है-‘नवगीत ने गीतकाव्य को सिर्फ भाषा,शिल्प और छन्द की नवीनता ही नहीं प्रदान की है, बल्कि उसकी अन्तर्वस्तु को युगानुरूप सामाजिक चेतना देकर उसको प्रासांगिकता भी प्रदान की है। उसमें युग बोलता है, उसमें वर्तमान समय की धड़कनें सुनाई पड़ती हैं।’

इस परिभाषा को ध्यान में रखकर यदि डॉ. जगदीश व्योम जी के गीत-नवगीतों का अवलोकन किया जाय तो इनके गीत-नवगीतों की एक-एक पंक्ति पढ़ने वाले के हृदय में गहरे तक उतरती चली जाती है।

 सामाजिक विषमता का प्रतिकार करने के लिए आगे न बढ़ने वाली नपुंसक भीड़ को लक्ष्य कर, वह लिखते हैं-

राजा मूँछ मरोड़ रहा है
सिसक रही हिरनी!
बड़े-बड़े सींगों वाला मृग
राजा ने मारा
किसकी यहाँ मजाल
कहे राजा को हत्यारा
मुर्दानी छायी जंगल में
सब चुपचाप खड़े
सोच रहे सब यही
कि आखिर
आगे कौन बड़े
घूम रहा आक्रोश वृत्त में
ज्यों घूमे हिरनी। (पृष्ठ-27)

जिसके हाथ में शक्ति है वह यदि न्यायपूर्ण, पक्षपात रहित व्यवहार नहीं करता है तो आमजन की चिंता का बढ़ना स्वाभाविक है। इसी बात को व्यक्त करती रचना-‘सिमट गई सूरज के’ में कैसी निरीहता को अभिव्यक्ति दी गई है-

सिमट गई
सूरज के
रिश्तेदारों तक ही धूप
न जाने क्या होगा!
घर में लगे उकसने कांटे
कौन किसी का क्रंदन बाँटे
अँधियारा है गली-गली
गुमनाम हो गई धूप
न जाने क्या होगा। (पृष्ठ-37)

और जब अत्याचारों की, झूठे प्रलोभनों की पराकाष्ठा होती है तो जिस प्रकार अधिक खींचने पर इलास्टिक की इलास्टीसिटी  भी समाप्त हो जाती है उसी तरह जनता के अन्दर जाग्रति उत्पन्न होने पर वह शोषक को भी खदेड़ने का साहस रखती है। डॉ. व्योम की रचनाएँ केवल यथास्थिति को ही नहीं दर्शातीं, वह समाज में परिवर्तन का आह्वान भी करती नजर आती हैं-

रानी तू कह दे राजा से
परजा जान गई
अब अपनी अकूत ताकत
परजा पहचान गई
मचल गई जिस दिन परजा
सिंहासन डोलेगा
शोषक की औकात कहाँ
कुछ आकर बोलेगा
उठो!उठो! सब उठो!
उठेगी पूरी विकट वनी। (पृष्ठ-28)
’’’’’

जंगल में कितनी ताकत है
कौन इन्हें समझाए
ये चाहें तो
राजा क्या है
अखिल व्योम भी झुक जाए
मार हवा के टोने
सबको
रहते सदा जगाते पेड़...(पृष्ठ-45)

डॉ. जगदीश व्योम अपनी रचनाओं में समाज में व्याप्त शोषण, अत्याचार और विसंगतियों के विरुद्ध आवाज तो बुलन्द करते हैं किन्तु वे विद्ध्वंस के समर्थक नहीं हैं। वे शालीनता और अहिंसावादी स्वरूप को श्रेष्ठ मानते हैं-

उठो मनुज
थामनी पड़ेगी
ये पागल आँधी
आज उगाने होंगे
घर-घर में
युग के गांधी
मिलता ‘व्योम’
विरासत में,युग
जैसा बोता है  (पृष्ठ-58)

डॉ.व्योम जी एक सहृदय, सहज और सरल स्वभाव के व्यक्ति हैं और जो सहज व्यक्ति होता है वह प्रकृति के लुभावने रूपों से कैसा दूर रह सकता है। इसलिए उनका प्रकृति प्रेम भी कुछ रचनाओं में दृश्टव्य है। ‘मुन्नार के चाय बागान’ का मोहक वर्णन करते हुए वह लिखते हैं-

टेड़े हैं रास्ते
पर
लोग बहुत सीधे
सदियों से खड़े पेड़
चाय के उनींदे
बिना शोर किये हवा
बतियाती कान में...
सड़कें
मुन्नार की हैं।
दूध से धुली हुई
इर्द-गिर्द बिछे हैं
गलीचे सम्मान में
आओ!
हम चलें कहीं
चाय के बागान में!(पृष्ठ-58)

प्रकृति के ही एक और रूप का वर्णन देखिए। भीषण ग्रीष्म ऋतु़  के प्रकोप से नदी,नाले,सूख गये हैं। पेड़-पौधे कुम्हला गये हैं। हवा इतनी गरम हो गई है कि लगता है कि प्यास के कारण वह पानी की तलास कर रही है। डॉ. व्योम जी ने प्रकृति का कैसा साक्षात् दृश्य उपस्थित कर दिया है-

जाने क्या हो गया कि
सूरज इतना लाल हुआ
प्यासी हवा हाँफती
फिर-फिर पानी खोज रही
सूखे कंठ-कोकिला,
मीठी बानी खोज रही
नीम द्वार का,
छाया खोजे
पीपल गाछ तलाशे
नदी खोजती धार
कूल
कब से बैठे हैं प्यासे
पानी-पानी रटे रात-दिन
ऐसा ताल हुआ...(पृष्ठ-59)

प्रकृति सम्बन्धी अन्य रचनाओं में-बादल ने छोड़ दिये,और पर्यावरण के प्रदूषण तथा  सीमेंट के जंगलों ने पेड़-पौधों को बहुत नुकसान पहुँचाया है जिसके कारण प्रकृति पर निर्भर जीव-जन्तुओं व पक्षियों का जीवन भी संकट में आ गया है। घरों में अब पहले की तरह 10-20 की संख्या में फुदकती गौरैया नजर नहीं आतीं। इसी दर्द को बहुत ही मार्मिक रूप से प्रस्तुत किया गया है इस रचना में-

गौरेया ने
फिर बस्ती में
आना छोड़ दिया
सुबह-सुबह
उठने से पहले
चीं चीं चीं गाना
बिना डरे
घर-भीतर उसका
था आना-जाना
थाली से
चुग्गा चुन लेना
उसे सुहाता था
घर के
हर कोंने से
उसका नाता था
ऐसा क्या हो गया
कि यूँ ही
नाता तोड़ लिया (पृष्ठ-64)
और प्रदूषण पर ही चिंता व्यक्त करती यह रचना-
गंगा बहुत उदास
भगीरथ कहाँ गये!
लहरों ने अपने तट खोये
तट लगते
रोये अब रोये
कूड़ा,कचरा नाली,नाला
सब कुछ है गंगा में डाला
हम इतने बेशर्म! (पृष्ठ-67)

इसी तरह की एक रचना हैं-‘मेरा भी है अपना जीवन’, राजनीति पर कटाक्षकरती रचनाओं में-ये जंगल एक अजूबा है, हिरना क्यों उदास मन तेरा, बाजीगर बन गई व्यवस्था, बीत गयी है अर्द्धशती आदि का नाम लिया जा सकता है तो सम्बन्धों की दरकन को अभिव्यक्त करतीं रचनाएँ हैं- अब न जाने खील सा, किससे करें गिला।

वर्तमान युग में मंचीय साहित्य की गरिमा में निरन्तर होते जा रहे ह्रास की ओर भी इंगित करते हुए व्योम जी कहते हैं-

गीत बाँच कर
मंचों पर
ताली बजवाना
और बात है
पर, गीतों में
पानी को
पानी कह पाना और बात है...(पृष्ठ-91)

डॉ. जगदीश व्योम के अनुभव और अनुभूतियों का संसार बहुत विशद है। बचपन का दृश्य उपस्थित करती उनकी रचना-बचपन के दिन, एक अद्भुत रचना है जो पाठक को उसके बचपन में ले जाने की पूर्ण सामर्थ्य रखती है।

इस संग्रह में एक रचना श्रृंगारपरक भी है जो व्योम जी के हृदय के भावों में लहलहाते उपवन का दिग्दर्शन कराती नजर आती है। श्रृंगार भी ऐसा जिसे पूरी शालीनता के साथ प्रस्तुत किया गया है-

पिउ पिउ न पपिहरा बोल
व्यथा के बादल घिर आएँंगे
होगी रिमझिम बरसात
पुराने जख्म उभर आएँगे। (पृष्ठ-103)

युगों-युगों से शोषित और प्रताडित नारी की व्यथा को अभिव्यक्त करती रचनाओं में -युग युग से नारी ने तथा वृन्दावन की विधवाएँ इस संग्रह में संग्रहीत हैं।

जीवन जीने के लिए मनुष्य को आशावादी होना आवश्यक है। डॉ. जगदीश व्योम जी ने आशावाद का दामन मजबूती से पकड़े रहने का पाठ पढ़ाती रचना इस संग्रह में संग्रहीत की है, वह है- पीपल की छाँव।

प्रात की प्रभाती
लाती हादसों की पाती
उषा-किरन आकर
सिंदूर पौंछ जाती
दाने की टोह में
फुदकती गौरैया का
खण्डित हुआ विश्वास
फिर भी मत हो बटोही उदास।(पृष्ठ-107)

इस संग्रह में महादेवी वर्मा जी एवं पन्त जी को भी अपने काव्य प्रसून अर्पित किए हैं।

पुस्तक में समाहित समस्त गीत लयात्मक एवं आकर्षक हैं। जन-जीवन में विश्वास, आशावादिता, विसंगतियों से लड़ने का आह्वान, पर्यावरण के प्रति चिंता, राष्ट्रोत्थान के प्रयास, सभी कुछ जिस सहजता से डॉ.जगदीश व्योम ने इस संग्रह में समाहित किया है वह स्तुत्य है। मुद्रण त्रुटिहीन एवं साफ-सुथरा है। हिन्दी साहित्य जगत में पुस्तक का सर्वत्र स्वागत होगा तथा डॉ. जगदीश व्योम के यशवर्द्धन में यह और अधिक सहायक सिद्ध होगी , ऐसी आशा है।

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