काव्य: अरुण कुमार प्रसाद

अरुण कुमार प्रसाद
स्नातक (यांत्रिक अभियांत्रिकी)। कोल इण्डिया लिमिटेड में प्राय: 34 वर्षों तक विभिन्न पदों पर कार्यरत, अब सेवानिवृत्त।
साहित्यिक आत्मकथ्य: सन् 1960 में सातवीं से लिखने की प्रक्रिया चल रही है, सैकड़ों रचनाएँ हैं, लिखता हूँ जितना, प्रकाशित नहीं हूँ - यदा कदा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ हूँ।


1. तुम्हारा मन दर्पण हो, वत्स

तुम्हारा मन दर्पण हो
कि पहचान सको स्वयं को
अपनी कमियों के साथ प्रथम
भाग्य के सहारे नहीं, 
कर्मठता को फिर।
तुम्हारा तन अर्पण हो
देखे हुए स्वप्न को।
तर्क, बुद्धि, विवेक से संचालित
पूरने के संकल्प के साथ।
प्राणपन से फिर।
आशीर्वचन और शुभकामनाएँ
अनुगामी हों।
स्निग्ध अंकों से उतरकर
कठोर धरती पर पाँव टिकाओ तुम।
प्रतिकूलताओं को आँख दिखाओ तुम।
हर अप्राप्य ऊँचाइयों पर
ध्वज फहराओ तुम।
अंधेरा तब तक अंधेरा है
जब तक कोई लौ न उठे मचल।
पराजय तब तक है पराजय
जब तक तुम उठो न सँभल।
मन के संसार में तन को
पिरोना सीखो।
स्तब्ध, नि:शब्द आकाश में
चीखना सीखो।
हर युद्ध को अदम्य प्रण से
जीतना सीखो।
तुम कुशलता से हर कौशल
सीखना सीखो।
आशीर्वाद प्राप्त हो तुम्हारे दर्पण को।
अनहद नाद प्राप्त हो तुम्हारे मन को।
***


2. रिसते रिश्ते

सत्य रिश्ता नहीं, 
अथवा रिसता नहीं
कौन सा रिश्ता नहीं रिसा है?
चीख, चिल्लाकर या मौन पिसा है।
चीख, चिल्लाकर जिये रिश्ते
अधिकार का समर है
मौन रहकर जिया हुआ रिश्ता
गँवाया हुआ अवसर है।
अथवा
हासिल हक का असर है।
स्वार्थ से ऊपर कोई रिश्ता नहीं।
अथवा क्रय-विक्रय के जाल में यह
पिसता नहीं।
रिश्ते की सृष्टि
और सृष्टि का रिश्ता
परिभाषित है किन्तु, 
प्रमाणित नहीं।
कृष्ण का महाभारत
ईश्वर के प्रासंगिक होने का है।
रिश्तों को रिसता हुआ दिखाने का है।
अहंकार का रिश्ता है।
और यहाँ घृणा रिसता है।
बुद्ध के अहिंसा का प्रण
मानव-कल्याण का रिश्ता है।
कालांतर में स्वार्थ से भिड़कर
शनै: शनै: रहा रिसता है।
मनुष्य के जीवन में अहं जब
लेता है आकार।
रिसता है सहोदर होने का भी भाव।
अपने लिए जीने की कामना करते ही
पड़ती है रिश्ते में दरारें।
स्वार्थ के अस्वच्छ होते ही
विशृंखलित होती है सारी करारें।
आपाधापी मचे तो रिसते हैं रिश्ते।
वर्चस्व की लड़ाई में रिसते हैं रिश्ते।
महत्वाकांक्षा की ऊँचाई में रिसते हैं रिश्ते।
उत्तराधिकार की ढिढाई में रिसते हैं रिश्ते।
अच्छाइयों की परिभाषाएँ और पहचान होती हैं।
रिश्ते के भी और ‘रिसते हुओं’ के भी।
भाई बहन के रिश्ते अनावश्यक अभिभावात्मक हो तो
रिसते हैं।
देवताओं के और दानवों के रिश्ते
अच्छाइयों को जीने के लिए रहे रिसते।
उनकी अपनी-अपनी मान्यताएँ थीं अच्छाइयों के।
एक को शासन करने का गुमान।
दूसरे का शासित नहीं होने का आह्वान।
स्त्रियों और पुरुषों के सम्बंधों का आधार
निभाये गये रिश्ते हैं।
पति हों पत्नी हों, भाई हों, बहन हों
न निभाये जायें तो रिसते हैं।
रिश्तों का विद्रोह रिसते हैं।
विद्रोह के रिश्ते रिसते हैं।
अधिकार की लड़ाई त्यागे हुए लोग
जिंदगी भर रिसते हैं।
बौनेपन की अपनी ही चक्की में पिसते हैं।
अधिकार के लिए उठो।
स्वयं को स्वीकार करने उठो।
***


3. स्त्री बाकी है

मेरे अस्तित्व में जन्म ही से बाकी रही है स्त्री।
हर ही तत्व में सर्वांश शुन्य, बाकी रहती है स्त्री।
स्त्री शक्ति के जन्म का प्रारंभ है, शिव का संयोग है। 
शक्ति शिव की शक्ति नहीं शिव का शक्ति-प्रयोग है। 
कहते अतः हैं शक्ति के बिना शिव केवल शव है।
शक्ति कर्म की गति, क्रिया का सामर्थ्य कर्ता का संकल्प है।
निर्धारित करती है सृष्टि का जन्म और ध्वंस, स्त्री। 
विशालता से सारा कुछ विंदु में समाहित कर लेती है स्त्री।
बिंदु को तोड़कर इतनी विशाल संचरना कर देती है स्त्री।
काल की अनंत यात्रा का प्रारंभ और प्रारंभ का अंत है स्त्री।
स्त्री व ब्रह्म, ऊर्जा और पदार्थ, शक्ति और शिव, सृष्टि और विध्वंस।
ब्रह्म क्यों? ऐसा प्रश्न ब्रह्म से बड़ा है, उत्तर ब्रह्म सा अति सूक्ष्म।
हिमवत्, अग्निसम, प्रकाशमय, तम आच्छादित सांध्य, भोर में।
सुप्त व्योममय, जाग्रत सप्त सुर स्त्री कंठ में ध्वनित रोर में।
हर ज्वालामुखी के तरल आग में बची रहती है स्त्री अवश्य। 
हर प्रलय के महा समाधि में बची रहती है स्त्री अवश्य।
स्त्री ही जन्म देती है सारे कण, कण को कर्म की प्रेरणा।
अतः संसार में जो है और जैसा है वह है स्त्रैण अवधारणा।
स्त्री अपने को दुहराती रहती है व्योम में तरंग रूप में अनाम।
स्त्री ब्रह्मांड के हर स्वरूप को समेटती है कालांतर में, विश्राम।
विस्तृत होती है पुन:, यह चक्र है ध्वंस और विनिर्माण का।
किन्तु, यह चक्र क्यों है अनुत्तरित; था, है, रहेगा बिना प्रमाण का।
***

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