विमर्श और सरोकारों का कथासंसार

कृष्ण बिहारी पाठक
कृष्ण बिहारी पाठक

व्याख्याता हिंदी, तिरुपति नगर, हिंडौन सिटी, जिला करौली – 322230 (राजस्थान)
चलभाष: 9887202097
ईमेल: kpathakhnd6@gmail.com

साहित्यिक चर्चाओं के बीच यह परिणामी कथन प्रायः सामने आता है कि पाठकों की संख्या प्रायः घट रही है, अध्ययन की संस्कृति क्षीण हो रही है। बहुत हद तक यह स्थापना ठीक भी जान पड़ती है। कारण इसके एकाधिक हो सकते हैं परंतु इस संबंध में सबसे महत्वपूर्ण कारण यह अनुभव किया जा सकता है कि रचनाओं में से तिरोहित होती साहित्यिकता के अनुपात में उनकी पठनीयता घटती जा रही है। जिस अनुपात में किसी लिखावट या रचना में साहित्यिक आग्रह वर्तमान होता है उसी अनुपात में वह पठनीयता का आग्रह बनाए रखने में सफल हो सकती है।

प्रगति गुप्ता
कोई सामाजिक व्यक्ति किसी रचना को इसलिए पढ़ने नहीं बैठता कि इसे पढ़कर कुछ समय कट जाएगा, कुछ मन बहलेगा। बल्कि वह इसलिए किसी रचना से जुड़ता है और जुड़ना चाहता है कि उसके अनुशीलन से उसे जीवन और जगत की वास्तविकताओं से साक्षात्कार हो सके, विश्व मानव की समस्याओं के समाधान की दृष्टि और दिशा मिल सके, उसकी अनुभूतियाँ और संवेदनाएँ बची रहें, उसके भावों सद्भावों की सुरुचि और सुकुमारता सजीव रहे। यही बातें किसी रचना को साहित्य का दर्जा प्रदान करती हैं। अध्ययन की प्रवृत्ति और संस्कृति का सीधा संबंध रचना में अंतर्निहित इसी साहित्यिक अर्थवत्ता और मूल्य मीमांसा से होता है।

आज अधिकांश रचनाएँ अपनी इस प्राणशक्ति के अभाव में जिस वेग से अवतरित होतीं हैं उससे दूने वेग से विसर्जित हो जाती हैं, ऐसी भंगुरधर्मी रचनाएँ अध्ययन और पठनीयता के संस्कारों को कैसी और कितनी संजीवनी प्रदान करतीं हैं, कहने की आवश्यकता नहीं।

इन्हीं भंगुरधर्मी रचनाओं के बीच से जब कोई रचनात्मकता अपनी संपूर्ण साहित्यिक ऊर्जा, भावात्मक ऊष्मा और संवेदनात्मक सजीवता के साथ सामने आती है तो सुखद आशा बंधती है। सुधी रचनाकार प्रगति गुप्ता के कथा संसार में ऐसी ही ऊर्जा, ऊष्मा और सजीवता का संगम है।

किशोर मन के गुलाबी सपने, दो पीढ़ियों के बीच के अंतर्द्वंद्वों की उमस में छटपटाते अपने , समाज और संसार की विसंगतियों को आत्मदीप्ती से तार-क्षार करती संघर्षरत नारी, यौवन का खिलंदड़पन और खुमारी, संबंधों और अपनत्व की गरमाहट, मकान को घर बनाने वाली बेटियों की गुनगुनाहट, एकाकी निर्वासित जीवन, दांपत्य के क्षण, निष्ठुरता और निर्ममता, बनावट, दिखावट और प्रदर्शनप्रियता, छीजती संवेदनाएँ, रिश्तों में सतहीपन, संवेदनाओं की टूटती छूटती कड़ियाँ, जीवन और जगत की श्वेत स्याह घड़ियाँ, भौतिकतावाद में छीजती संस्कृति, विलोपित होती संवेदनाएँ, और इन सबके बीच जीवन की निर्मम सच्चाई को जीती स्त्री, उन सच्चाइयों से जूझती स्त्री , और जूझकर जीतती स्त्री की नानाविध रूप छवियों और भाव संवेदनाओं पर कहानीकार की दृष्टि सबसे ज्यादा जमी है। स्त्री विमर्श इनकी किस्सागोई का सुमेरू मनका है जो इसकी वर्तुल समग्रता को संतुलित कर रहा है।

प्रगति गुप्ता की प्रतिनिधि कथाकृतियों में कहानी संग्रह स्टेपल्ड पर्चियाँ, कुछ यूँ हुआ उस रात यहाँ उल्लेखनीय हैं। ज्ञानपीठ से प्रकाशित स्टेपल्ड पर्चियाँ संग्रह की ग्यारह कहानियों में विषयगत वैविध्य और वस्तुगत गांभीर्य को साधकर मानो कथाकार प्रगति गुप्ता ने अपनी रचनात्मक संभावनाओं के सीमातीत वितान का दिग्दर्शन करा दिया है। जीवन के अतीत व्यतीत अनुभवों की पड़ताल करती लेखिका अतीत के अविस्मरणीय घटनाक्रमों को परत दर परत अपनी स्मृति विस्मृति के पृष्ठों पर उकेरती है, लेखिका के शब्दों में कहें तो ये परतें ही पर्चियाँ हैं जो इस तरह संग्रहबद्ध होकर स्टेपल्ड हो गई हैं।

‘अदृश्य आवाजों का विसर्जन’ संग्रह की पहली कहानी है। मनोविश्लेषणपरक इस कहानी में आत्मालाप के माध्यम से कथानायिका अपने विगत की ध्वनियों की टकराहट को सुनकर उन्हें विसर्जित कर स्याह सफेद अनुभवों को चुकाना चाहती है। अंतस की संवेदनाओं के कारुणिक स्पर्श के साथ प्रगति गुप्ता यहाँ एक मंजी हुई कहानीकार के रूप में सामने आती हैं।

‘गुम होते क्रेडिट कार्ड्स’ कहानी में प्रेमविवाह और दांपत्य की तह में स्त्री आत्मनिर्भरता का विमर्श उभरा है। इसी तरह दांपत्य जीवन में झाँकती कहानी तमाचा हैं, जहाँ अपनत्व और आत्मीयता को लीलती तथाकथित आधुनिकता, स्वच्छंदता के दुष्प्रभावों के साथ कथा खुलती है।

‘खिलवाड़’ कहानी माता पिता के लाड़-प्यार के चलते बिगड़ती नई पीढ़ी की आत्मघाती सच्चाइयों की कहानी है। अनुशासनविहीन जीवन की परिणति और दुर्दशा की त्रासदी परिजनों को किंकर्तव्यविमूढ़ चिंतनीय दशा के गर्त में धकेल देती है यह सत्य बहुत मार्मिकता के साथ उद्घाटित हुआ है।

‘अनुत्तरित प्रश्न’ कहानी नीता और अनमोल के माध्यम से जीवन की चुनौतियों का सामना करने के संकल्प दिखाती है। खुद को खत्म करना या तत्पर होना कोई समाधान नहीं है यह संदेश यहाँ मुखर हुआ है साथ ही वर्तमान परिदृश्य की अवसादग्रस्त मानसिकता के प्रत्युत्तर में यह कहानी रास्ता दिखाती है। कहानी में अनमोल का पुरुष होते हुए भी नार्योचित व्यवहार दिखाकर लेखिका ने असामान्य व्यवहार करने वाले लोगों की मनोदशा का यथार्थ दर्शाया है।

‘सोलह दिनों का सफर’ में आसन्न मृत्यु इंदु की करुण कथा है। मूक शिथिल अल्पविराम सी त्रासद अवस्था में पड़ी इंदु के लिए परिजनों को पीड़ित देखने की छटपटाहट ने आगत मृत्यु की गंध को और गहरा दिया है। मृत्यु के बाद इंदु के परमाण्विक शरीर की परिजनों के बीच उपस्थिति दिखाकर लेखिका ने अपनी कल्पनाशीलता का परिचय दिया ही है मृत्यु के बाद पल्ला झाड़ लेने की अमानवीय मनोवृति पर भी अमर्ष व्यक्त किया है।

‘गलत कौन’ कहानी में डॉ नरेन और मरीज नरेन के माध्यम से लेखिका गरीब की बीमारी और चिकित्सक की संवेदनाओं का ताना-बाना बुना है। मरीजों के अनुपात में ओछी पड़ती चिकित्सा सुविधाओं के सत्य तथ्य भी यहाँ मुखर हैं।

संग्रह की अन्य कहानियों में ‘काश!’, ‘बी-प्रैक्टिकल’, ‘स्टेपल्ड पर्चियाँ’, तथा ‘माँ! मैं जान गई हूँ’ जिनमें जीवन जगत के दैनंदिन क्रिया व्यापारों के बीच डूबते तिरते मानवीय संबंधों के बंधन हैं, भाव अभाव भरी दुनिया में छूटते टूटते, बनते-बिगड़ते समीकरण हैं, जिन्हें अपनी कल्पनाशीलता और कथाकौशल से कहानीकार प्रगति गुप्ता ने सजीवता प्रदान की है। भाषा में रोचकता और कौतूहल के मेल से कहानियों की पठनीयता को बल मिला है।

‘कुछ यूँ हुआ उस रात’ लेखिका का एक और कहानी संग्रह है। इस संग्रह में तेरह कहानियाँ हैं जिनमें कहीं सामयिक संवेदनाओं की पड़ताल है तो कहीं दैनंदिन के सुख-दुख की कथा व्यथा। कहीं स्त्री जीवन के संघर्ष हैं तो कहीं पुरुष के मन की सुरुचिपूर्ण संवेदनाएं सब मिलाकर आज के जीवन यथार्थ को देखने का बाइस्कोप बनकर ये संग्रह सामने आता है। भावसरस भाषा और मनोवैज्ञानिक एप्रोच प्रगति गुप्ता के कथालेखन की अप्रतिम विशेषता है जो उनकी अन्य कृतियों के समान यहाँ भी आकर्षित करती है।

इस संग्रह की कहानी ‘अधूरी समाप्ति’ विषय चयन और अंतर्वस्तु की दृष्टि से अपना विशिष्ट महत्व रखती है। आज के डिजिटल जीवन में मानव बनाम मशीन की पारस्परिकता को कोरोना की त्रासदी से जोड़कर लेखिका ने अद्भुत कथासृष्टि की है। इस एक ही कहानी में मानव स्वभाव की धुर विपरीत संभावनाओं में एक सिरे पर निश्छल प्रेम है तो दूसरे सिरे पर छल छंद की कहानी है।

‘पटाक्षेप’ कहानी में अनेक कथासूत्रों के बीच प्रगति गुप्ता की संवेदनाएँ दिव्याँग विमर्श पर ठहरी ठिठकी हैं। कहानी के इशिका, इरा, इंद्रनील के माध्यम से मानो लेखिका हाथ पकड़कर भावक को मूक की मौनमधि पुकार सुनाने और बधिर के आत्म से साक्षात्कार कराने निकली है। दिव्याँग जगत की सीमा संभावनाओं को यह कहानी काटती छूती चलती है।

संग्रह की एकाधिक कहानियों में लेखिका वंचित, शोषित, पीड़ित नारी के पक्ष में खड़ी दिखती है। मरीजों की काउंसलिंग के दौरान लेखिका ने लोगों के जीवन को निकट से स्पर्श किया है। सहानुभूति से समानुभूति की यात्रा पर लेखिका का कथा मन निकला है, यही कारण है कि ये कहानियाँ अपने पहले ही प्रभाव में पाठक के मन को स्पंदित कर उसके अंतस का स्पर्श करती हैं। रचनागत पात्र और परिवेश से इस अभिन्न एकात्मकता का खुलासा करते हुए संग्रह की भूमिका में स्वयं लेखिका ने रेखांकित किया है - एक सजग और सचेत लेखक के लिए समाज की पीड़ा उसकी अपनी पीड़ा बन जाती है। उसका आंतरिक संघर्ष, मनन और चिंतन लिखने पर मजबूर कर देता है। लेखक की संवेदनशीलता जितनी गहरी होगी उसकी अनुभूतियों की तीव्रता उतनी ही मारक होगी। एक लेखक के रूप में मैंने ऐसा बहुत बार महसूस किया है। (भूमिका, कुछ यूँ हुआ उस रात)

टूटते मोह की विधवा जानकी, सपोले कहानी की लाचार स्त्रियाँ, खामोश हमसफर की स्मृति जो अपने हाथों जीवन की नई इबारत लिखती है, कल का क्या पता में गाहर्स्थ्य की चुनौतियों से जूझती कजरी सहित संग्रह की कहानियों में जीते जूझते अनगिनत पात्रों एवं उनकी परिस्थितियों को वर्णन शैली से लेखिका ने जीवन्त कर दिया है। एक कहानीकार की पूर्ण सफलता यह होती है कि वह कहानी में उसके संघटक तत्वों का सुरुचिपूर्ण अभिनिवेश करते हुए रचनागत औचित्य का निर्वहन पूर्ण निष्ठा के साथ करे।

प्रगति गुप्ता की सभी कहानियों में औचित्य का निर्वहन, मनोवैज्ञानिक एप्रोच और संप्रेषण पूरी पारदर्शिता के साथ वर्तमान है। व्यक्ति, परिवार और समाज जीवन के विमर्शों की उपस्थिति से चिंतन और परिवर्तन की दिशाएं भी खुलती जाती हैं। समर्थ कथाकार ने सरोकारों से लेकर विमर्श तक व्यापक परास के साथ अपनी सृजन संभावनाओं का आभास कराया है ही, जीवन की जटिलता और भावनाओं की उलझनों में जूझती , उलझती संवेदनाओं और भावनाओं के सुकुमार स्वरूप को कथाकार ने आहत नहीं होने दिया है, वह इन्हें अक्षत सौंदर्य और मृदुलता के साथ बचाकर लाती है इस आशा के साथ कि मानव और मानवीयता में अंतर्निहित आस्था, अस्तित्व और विश्वास चिरंतन बने रहें।
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