व्यंग्य: निठल्ले का सॉफ्टवेयर

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

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सवेरे से निठल्ला बैठा हूँ। एक लोटा चाय पी चुका हूँ फिर भी स्फूर्ति नहीं लौट रही, हो तो लौटे। यहाँ मक्खियाँ भी नहीं है जिन्हें उड़ाने के लिए हाथ-पैर हिलाने पड़ें। बस ले-देकर सुख-दुख का एक ही साथी है, सेलफोन पर खुला फेसबुक ऐप। इसकी शैया पर मेरे पाँच हजार आभासी मित्र सो सकते हैं। क्या मालूम ये सब फेसबुकिए आज कहाँ खोए हैं! स्टेट्स बता रहा है कि वे ऑनलाइन हैं पर असल में वे कहीं और हैं। वे ऐप पर लॉग-इन कर कहीं मटरगश्ती कर रहे हैं, जैसे कुर्सी पर कोट टांग कर सरकारी कर्मचारी करते हैं। ऐप खुला छोड़ देने भर से ये मित्र ऑनलाइन जीवंत दिखते हैं, फिर चाहे कड़कड़ाती सर्दी की सिमटी रजाई में से उनके खर्राटे निकल रहे हों। आज मेरे निठल्लेपन के लिये ये ही दोषी हैं,  आभासी हैं, कैसे मित्र हैं, मित्र जैसे दिखते ही नहीं हैं।

इसी बेखुदी में एक विचार आया कि काश मैं कोई ऐसा सॉफ्टवेयर बना लूँ जो सारे आभासी मित्रों की आबादी की जाँच करे। ऐसे महाबिज़ी लोगों की तलाश करे जिन्होंने मित्र बनने के बाद एक भी कमेंट या लाइक नहीं किया। फिर उन्हें तत्काल प्रभाव से अनफ्रेंड कर दे। अमित्र ही क्यों, उन्हें ऐसी काली सूची में डाल दे कि वे ताउम्र मुझसे मित्रता नहीं कर सकें। ऐसे निठल्लों के फोटो अपने पास रखने का क्या फायदा!  जिन लोगों के भरोसे में अपनी आ रही किताबों के कवर पेज पोस्ट करता हूँ, वे उन्हें देखते तक नहीं। अरे, मैं कौन उनसे किताब खरीदने के लिए आग्रह कर रहा हूँ। मेरी आशा छोटी-सी है। वे भले लव की इमोजी न लगा पाएँ, फूल न लगा पाएँ, बस एक लाइक लगा दें। ये आभासी मित्र जानते नहीं कि किताब के कवर पर भी लाइक नहीं मिलें तो पाँच प्रतियाँ छापने वाले प्रतिष्ठित प्रकाशक तक सरलता से यह कहते हुए टरका सकते हैं कि ए लेखक, तुम्हें कभी चुल्लू भर पानी मिल जाए तो मुझसे पूछ लेना कि आगे क्या करना है।

निठल्ले बैठने की बजाय सॉफ्टवेयर बनाने के विचार से मुझे कुछ राहत मिली। मैं सोचने लगा, दुनिया में आभासी मित्रों की कमी नहीं है। धैर्य रखकर कोशिश करूं तो एक से एक बुद्धिमान, सर्वथा सुन्दर, व टॉप-क्लास मित्र मिल सकते हैं। ऐसे आशावादी विचारों से मुझे तत्काल राहत मिल गई। सोचता रहा कि जब सॉफ्टवेयर बनाना ही है तो क्यों न उसमें ऐसा प्रोग्राम डाल दूँ जो रसीली जी के मित्र-पृष्ठ पर जाकर उनके सारे आभासी मित्रों को स्कैन कर डाले और मुझे बता दे कि उनके वे कौन से नौ दो ग्यारह आभासी मित्र हैं जो उनकी हर पोस्ट पर दिन-रात इमोजियाँ चिपकाते रहते हैं, खुद ऊँघते रहते हैं, पर उन्हें जगाये रखते हैं। ऐसे सहृदय कुछ मित्र ही मुझे मिल जाएँ तो मेरा फेसबुक पर जीवित रहना सार्थक हो जाए।

मेरे दिमाग ने सोचना शुरू किया तो मुझे खुशी हुई कि एक लोटा चाय अपना असर दिखा रही थी। इसी उधेड़बुन में मैंने सोचा कि इस सॉफ्टवेयर में मैं एक और कोड डाल दूँ। मेरे जो मित्र एक साथ सवा सौ लोगों को उम्मीद भरी नजरों से एक पोस्ट टैग करते हैं, उनमें कौन-कौन वैष्णवजन हैं जो पराई पीर को समझते हैं और निस्पृह भाव से अपने मैदान पर दूसरों की पोस्ट दौड़ने देते हैं। मुझे केवल एक दर्जन ऐसे वैष्णवजन चाहिए जिन्हें मैं टैग करूँ तो वे मेरे टैग का मान रखें। सॉफ्टवेयर बना ही रहा हूँ तो लगे हाथ कुछ स्मार्ट रेडिमेड कमेंट उसमें डाल दूँ। जिसका जन्मदिन हो उसे ऑटोमेटिक फुग्गे और बधाइयाँ चली जाएँ। इस महंगाई के जमाने में मुफ्त की बधाइयों से आदमी खुश हो ले, इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है। जहाँ शोक का माहौल हो वहाँ गमगीन इमोजी जाए तो शोक की सांद्रता बढ़ती है। अल्पज्ञानी फेसबुकिये वहाँ लाइक भेज कर अपने अज्ञान को सार्वजनिक करने से बच जाएंगे।

स्मार्टफोन ने मेरे संवाद को तेज बना दिया है। प्रिय लिखता हूँ तो मित्र का नाम स्वतः आ जाता है और जैसा मसला हो उसके अनुरूप शब्दों का असला आ जाता है। मित्रों की लंबी-लंबी पोस्ट पढ़ने में मेरी दिलचस्पी नहीं होती। उन्हें देखने भर से मरे ज्ञानतंतु जाग्रत हो जाते हैं। मैं अपने सॉफ्टवेयर को इतना लायक बनाना चाहता हूँ कि वह खुद पढ़ ले और मेरी ओर से उस पर यथोचित कमेंट्री कर दे। अपनी घटिया पोस्टें चला-चला कर फेसबुकियों ने मेटा के शेयर का डॉलर मूल्य आधा करवा दिया है। अब फेसबुकियों ने सामग्री का स्तर ऊँचा नहीं उठाया तो यह मुफ्त का टाइमपास बंद हो जाएगा। पर मैं इतना क्यों सोच रहा हूँ, स्मार्ट सॉफ्टवेयर बनाऊँगा तो वह खुद ही सोच लेगा। चलो मित्रों वादा रहा मैं एक श्रेष्ठ सॉफ्टवेयर दूँगा। आप इसे बिना झंझट के डाउनलोड कर सकेंगे। हैकरों से सुरक्षित हो इंस्टॉल कर सकेंगे और अपनी डिवाइस को जवान रख सकेंगे। अब तो आप मुझे वोट, न, न, एक लाइक देंगे न!

1 comment :

  1. पुलकित करने वाला व्यंग्य 👍

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