बच्चों के दोस्त कथाकार प्रकाश मनु की बाल कहानियाँ अशोक बैरागी

समीक्षा: अशोक बैरागी


पुस्तक का नाम: 21 वीं सदी की श्रेष्ठ बाल कहानियाँ
लेखक: प्रकाश मनु
प्रकाशक: डायमंड बुक्स, नई दिल्ली
संस्करण: 2023
पृष्ठ: 270
मूल्य: ₹ 300 रुपए
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बच्चों के चहेते दोस्त, अलमस्त किस्सागो और कोई पच्चीस बरसों तक ‘नंदन’ पत्रिका के संपादक से जुड़े रहे प्रकाश मनु का नाम आते ही मन में फुरफुरी-सी होती है। कथा-रस में डूबी उनकी कहानियाँ स्पंजी रसगुल्ले की-सी मीठी और मोहक हैं। शायद इसीलिए बच्चे तो बच्चे, बड़े भी दीवाने हैं मनु जी की कहानियों के। भई, हों भी क्यों नहीं! आखिर उनकी अदा, नजाकत, अल्हड़ मस्ती, अपनत्व की जादुई भाषा, बच्चों के मन से जुड़ी बातें और कथा कहने का अंदाज एकदम अलहदा और सबसे न्यारा जो है। वास्तव में मनु जी कहानी लिखते नहीं, बल्कि कहानी के शब्द-शब्द को श्वास-श्वास जीते हैं। मनु जी बच्चों के मन से जुड़ते हैं, उनकी रुचि को समझते हैं, स्वभाव को परखते हैं, उनके भावों में डूबते हैं और उनकी इच्छाओं को जानते हैं। तभी तो वे कहानी को श्रेष्ठता के उस सोपान तक पहुँचा देते हैं, जहाँ पहुँचना हर किसी के वश की बात नहीं।

एक और बड़ी बात यह है कि मनु जी बच्चों को शिक्षा देने के लिए कहानी नहीं लिखते, बल्कि वे स्वयं किसी पात्र के माध्यम से बालक बनाकर उनके साथ खेलते हैं। यों वे खेल-खेल में बच्चों के मन में बड़ी सहजता से वे सब बातें उतार देते हैं, जिन्हें वे कहना चाहते हैं। यही कौशल उन्हें बच्चों का प्यारा दोस्त बनाता है।

अभी कुछ अरसा पहले मनु जी की बाल कहानियों की नई पुस्तक ‘21वीं सदी की श्रेष्ठ बाल कहानियाँ’ पढ़ने को मिली। डायमंड बुक्स से प्रकाशित इस पुस्तक की तेईस कहानियाँ केवल कहानियाँ नहीं, बल्कि इनमें बालमन की बड़ी अद्भुत छवियाँ हैं, जो हर पाठक को लुभाती हैं। अपने पास बुलाकर खेल-खेल में पढ़ना-लिखना सिखाती हैं। साथ ही अपने चारों ओर के परिवेश की सच्चाई दिखाकर सभ्य मानव होने का संस्कार देती हैं। हर कहानी इतनी सहज-सरल, जिसे पढ़ते हुए समय का कुछ होश ही न रहे। बल्कि आप कह सकते हैं, हर कहानी अपने ढंग की लाजवाब कहानी, जिसमें आप मनु जी के अलमस्त कहानीकार को पास से देख सकते हैं, और मिल सकते हैं!

अशोक बैरागी
आप पुस्तक की पहली ही कहानी ‘मूँछों वाले मास्टर जी’ को देख लीजिए। पहले तो कहानी का नाम सुनते ही, ‘मूँछों वाले...’ अध्यापक की एक सरस और हास्य भरी छवि मन में गुदगुदी-सी पैदा करती है। ऊपर से मास्टर जी का बोलने का अंदाज और उनका विचित्र मसखरापन कथा-रस को चार चाँद लगा देता है। पर कुक्कू की हिम्मत तो देखिए, स्कूल जाने की उत्सुकता और स्कूल में पहले ही दिन कोई डर-झिझक नहीं। यहाँ अध्यापक का बच्चे के मन से जुड़ना, बच्चे को खोलना, बच्चे को बोलने के लिए उत्साहित करने का अंदाज बहुत ही मनोरंजक है। मनु जी बताना चाहते हैं कि बच्चा स्नेह और प्यार से सीखना है। मीठी पुचकार से समझता है। बच्चों के मन में अध्यापक के प्रति किसी प्रकार का भय एवं घबराहट तो होनी ही नहीं चाहिए, तभी बच्चा अच्छे ढंग से सीख सकता है। 

तिवारी मास्टर जी का पढ़ाने का निराला ढंग वर्तमान अध्यापकों के लिए भी एक अच्छी सीख है। इससे बच्चा किताबों, अध्यापक और स्कूल से जुड़ाव महसूस करता है। जबकि दूसरी ओर, भोलानाथ जी जैसे अध्यापकों के कारण कोई भी बच्चा अध्यापक और स्कूल से जुड़ नहीं पता। स्कूल उनके लिए जेल और मास्टर दानव हो जाते हैं। परिणाम वही होता है, बच्चे की प्रतिभा दबकर रह जाती है और बच्चा स्कूल का नाम सुनते ही दूर भागता है।

प्रकाश मनु
कहानी में तिवारी जी जिस हास्य भरे अंदाज में बच्चों से उसका नाम पूछते हैं, उससे केवल वही बच्चा नहीं, बल्कि दूसरे बच्चे भी खूब हँसते-चहकते हुए आनंद लेते हैं। कुक्कू जोर से चिल्लाकर कहता है, “घुग्घु नहीं मास्टर जी, कुक्कू, कुक्कू...!!”

“क्या कहा, घुग्घू...?” मास्टर जी फिर से पूछ लेते हैं। खूब हँसते-हँसते। इस बार उनकी मूँछें भी फुरफुरा रही थीं।

बात यहीं पर नहीं रुकती, बाद में कुक्कू की बहन कम्मो दीदी के आने पर भी, वही हास्य-विनोद और मसखरापन। ऐसे में बच्चा खुद बोलने और अपनी बात रखने को उत्साहित होता है। यह बाल मनोभावों से जुड़ने और शिक्षण शैली में सुधार को लेकर लिखी गई एक बेहद खास कहानी है।

मुझे याद है, जब मैं पहली बार, दिसंबर 2015 में मनु जी से मिला, तब यह कहानी उन्होंने मुझे सुनाई थी। उस समय कहानी सुनाने का उनका अंदाज, जिंदादिली से भरे शब्द, हाव-भाव, भंगिमाएँ, आवाज़ का उतार-चढ़ाव, चेहरे और आँखों में झलकता विस्मय और जिज्ञासा, सब कुछ मुझे याद है। आज पुन: इस कहानी को पढ़कर ऐसा लगा, मानो मैं वहीं उनके बगल में बैठा, उसी अनूठे अंदाज में कहानी सुन रहा हूँ। यह मनु जी के जीवन से जुड़ी वास्तविक घटना है। कुक्कू कोई और नहीं, स्वयं मनु जी ही हैं और कम्मो उनकी बड़ी बहन कमलेश दीदी हैं। मनु जी अपनी कहानियों के विषय में लिखते हैं, “इधर लिखी गई मेरी बाल कहानियों में फिर एक नया मोड़ दिखाई पड़ता है। उनमें किस्सागोई तथा कथा-रस कहीं अधिक बढ़ा है। साथ ही वे जीवन के और अधिक नजदीक आई हैं। जीवन का यथार्थ और मार्मिक सच्चाइयाँ उनमें हैं, तो साथ ही उम्मीद का उजाला भी।” कहानी पढ़ने पर उनकी बात पर यकीन कहीं अधिक बढ़ जाता है।
भावों और रसों की विविधता मनु की कहानियों की विशिष्टता है। ऐसी ही बहुत ही मजेदार हास्य और रोमांच से भरी कहानी है, ‘जब गब्बर सिंह ने की पुताई’। हास्य के साथ-साथ शौर्य और साहस से भरपूर इस कहानी में मनु जी ने गब्बर सिंह का ऐसा जबरदस्त चित्र और चरित्र उकेरा है कि सुनने, पढ़ने और देखने वाले दाँतों तले उँगली दबा लेते हैं। कहानी खूब लुभाती, हँसाती और गुदगुदाती है। कहानी के भावों का उतार-चढ़ाव और काव्य-सी प्रवाहमान और कोमल भाषा में कमाल की गति, लय और आकर्षण है, जिसके कारण बार-बार इसे पढ़ने को मन करता है। कहानी में वर्णित प्रकृति का मनोहर एवं अनुपम सौंदर्य देखते ही बनता है। आप खुद देख लीजिए—
“उसकी झोंपड़ी के पास एक नदी बहती थी। पूनो नदी। बड़ा साफ वहाँ का पानी था। आसपास खूब फलदार पेड़-पौधे। आम, जामुन, अमरुद, पपीते, बेर और खूब बड़े-बड़े बेल। और हाँ, साथ ही चारों ओर फूल ही फूल थे। मह-मह, मह-मह। ऐसा लगता, जैसे दूर-दूर तक फूलों की कोई लंबी-चौड़ी रंग-बिरंगी चादर बिछी हुई है। खूब सारे बेल-बूटों वाली। चित्र-विचित्र। वहाँ दिनभर चिड़ियाँ चह-चह करतीं। चारों और परिंदों का मीठा शोर। देखकर गब्बर सिंह का दिल खुश हो जाता।”

गब्बर सिंह! जैसा नाम, वैसा ही भीमकाय जबर व्यक्तित्व। वैसी ही कद-काठी, साहस-हिम्मत, अलमस्त लपाझम चाल और रोआबदार आवाज। वैसी ही निराली दिनचर्या, उसके कसरत करने का ढंग, ढेर सारा खाना-पीना और आराम। ऐसा ही अजब अनूठा, हट्टा-कट्टा व्यक्तित्व शेर पर सवा शेर पहलवान, अपने आप में गजब की कल्पना है। बब्बर शेर की पूँछ से पुताई करना और भीखू चाचा समेत उसकी कमर पर सवारी करते हुए, हाथ उठाकर गाने के हैरतअंगेज कारनामे खूब हँसाते हैं। साहस और हास्य की एक अनूठी बानगी देखिए। एक ओर गब्बर सिंह बबर शेर की पूँछ को पुताई करने वाला पुत्ता समझकर जोर से खींचने लगता है और उधर बबर शेर खींचता है। इस विचित्र स्थिति के बारे में मनु जी लिखते हैं—
“शेर बबर की पूँछ तो थी छोटी-सी, पर झोंपड़ी की दीवारें थीं ऊँची। सो जब गब्बर सिंह खींच रहा था, शेर ने सोचा, हाय! हाय!! कहीं मेरी पूँछ ही न उखड़ जाए!...यह जालिम तो मानेगा नहीं। तो मुझी को कुछ करना चाहिए।”

मनु जी ने कमाल की कथा बुनी है, जिसे सुनते-पढ़ते हुए हँसते-हँसते पेट में बल पड़ जाते हैं। बीच-बीच में उऩ्होंने शर्म से पानी-पानी होना, दम साधना, सिट्ठी-पिटी गुम होना, आँखें बाहर आना और फूला न समाना जैसे सार्थक मुहावरों का प्रयोग किया है। शब्द-चयन का एकदम देसी अंदाज कथा-रस को बढ़ा देता है। कहानी को पढ़कर कहा जा सकता है कि व्यक्ति अपने साहस, बल और सूझबूझ से बड़े से बड़े खूंखार जानवर को भी वश में कर सकता है।
‘चिंकू मिंकू और दो दोस्त गधे’ भी ऐसी ही हास्य और लास्य से भरी बेमिसाल कहानी है। यह जिंदादिली के साथ घुमक्कड़ी के आनंद को अनूठे ढंग से पाठकों के सामने रखती है। चिंकू-मिंकू और उनके दो दोस्त गधे, इन चारों दोस्तों की अनजानी यात्रा, फक्कड़पन, बहादुरी और साहस के कारनामे काबिले तारीफ़ हैं। कहानी अनायास ही एक-दूसरे के प्रति स्नेह-समर्पण और कर्तव्य-पालन का पाठ पढ़ाती है। इसके साथ ही हमारे समाज की एक सच्ची तस्वीर भी सामने आती है? यहाँ कितने भाँति-भाँति के लोग रहते हैं, कुछ अच्छे, भले, तो कुछ बुरे और विघ्नसंतोषी, जिन्हें दूसरों की खुशी सुहाती नहीं है, यह भी स्पष्ट होता है। कहानी में बीच-बीच में सूक्तियों जैसे सुगढ़ वाक्य बहुत ही प्रेरक हैं। जैसे, ‘सारी दुनिया ही तो आदमी का घर है’ या ‘यह दुनिया तो प्यार की भूखी है’। कहानी शुरू से अंत तक एक गहरी जिज्ञासा और कौतुक से भरी है। पात्रों की भाषा सहज, सरस और सधी हुई है। संवाद भी रुचिपूर्ण और चुस्त हैं। घुमक्कड़ी या यायावरी करना कितनी मजेदार चीज है, इसका यहाँ पता लगता है।

कहानी बिन कहे यह समझा देती है कि हर जीव के अंदर एक अद्भुत कलाकार छिपा होता है। आवश्यकता केवल अवसर देने और उसमें छिपी प्रतिभा को पहचानने की है। दोनों दोस्त गधे बाँके और बदरू अपने हैरतअंगेज कारनामों से लोगों का खूब मनोरंजन करते हैं और बच्चों को प्यार बाँटते हैं। ये बच्चों के मन की और बच्चे इनके मन की भाषा का समझते हैं। वहीं ये दोनों बुल्ली बाबू जैसे गड़बड़ किस्म के लोगों का भेजा भी बात की बात में दुरुस्त कर देते हैं। 
मनु जी ने गधों को नायक बनाकर उन्हें उनकी बेचारगी और बुद्धूपन की चौहद्दी से बाहर निकालने का सफल और सार्थक प्रयास किया है। गधों और बच्चों की दोस्ती की यह लाजवाब कहानी दूसरे जीवों के प्रति प्रेम, दया और सहानुभूति का भी संदेश देती है। कहानी की खास बात यह भी है कि इसमें आए स्थानों और पात्रों के नाम बहुत ही विचित्र, मजेदार, खूब हँसाने और रोमांच पैदा करने वाले हैं। ऐसे नाम बच्चों में विशेष आकर्षण का केंद्र होते है। जैसे चिंकू, मिंकू, गज्जूधामी, रामभद्दर और गुंडा बुल्ली बाबू आदि।
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मनु जी की कहानियों के केंद्र में हमेशा बच्चे होते हैं। इनकी कहानियों में बच्चों की शरारतें, खिलंदड़ापन, नटखटपन और भोले-भाले हँसोड़ किस्म के बच्चों का बड़ा ही स्वाभाविक चित्रण मिलता है। उनकी कुछ कहानियों के पात्र अकेलेपन और गरीबी की त्रासदी झेलते तो नजर आते हैं। पर शीघ्र ही वे अपने मन में छिपे उजाले को पहचान लेते हैं, और फिर अपने कला-कौशल, सृजनशीलता और चारित्रिक दृढ़ता से पाठकों के मन में सदा-सदा के लिए बस जाते हैं। मनु जी के भटके हुए पात्र भी जीवन के प्रति आस्था और विश्वास लिए नजर आते हैं। लेखक की सूझ-बूझ और पात्रों के हृदय का प्रकाश उन्हें अपराध की दुनिया, आत्महत्या के पाप और अमानवीय होने से बचा लेता है। वे एक सही राह अपनाकर अपने जीवन और अन्य लोगों को भी नई राह दिखाने वाले आदर्श बन जाते हैं।

फिर मनु जी अपनी कहानियों का कथ्य इस ढंग से बुनते हैं कि कहानी के मुख्य पात्र या अन्य पात्रों के हृदय में अच्छाई का बीज स्वतः अंकुरित होकर लहलहाने लगता है। पात्रों को मन की उधेड़-बुन से गुजरते हुए स्वयं अच्छे-बुरे की पहचान होने लगती है। और यही उनकी कहानियों का सबसे सबल पक्ष है। ‘सांताक्लॉज़ का पिटारा’, ‘आओ पढ़ें नई किताब,’ ‘हाथ से बड़े हाथ,’ और ‘फागुन गाँव की परी’ ईमानदारी और परिश्रम से परिपूर्ण कुछ ऐसी ही कहानियाँ हैं।

विज्ञान और गणित शिक्षण एक अद्भुत कला है। इन विषयों को कुछ नीरस मान लिया जाता है, परंतु यदि इन्हें रोचक बनाकर पढ़ाया जाए तो बच्चे इनमें जी-जान लगा देते हैं। विज्ञान और फंतासी पर आधारित मनु जी की कहानियों में ‘गोपी की फिरोजी टोपी’, ‘पप्पू की रिमझिम छतरी’, ‘गिली गिलगिल’ आदि वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित कहानियों की बात ही अलग है। मनु जी ने अपने सृजनात्मक कौशल और अनूठी कल्पना शक्ति से ऐसी कहानियों को बहुत ही सरस और रोचकता से परिपूर्ण बना दिया हैं। इनमें बहुत-सी कल्पनाएँ संभावनामूलक हैं। ऐसी कहानियाँ ज्ञान-विज्ञान के प्रति रूचि जाग्रत करके तकनीकी समझ पैदा करती हैं। सहज भाव से लिखी ये कहानियाँ आधुनिक प्रगतिशील और वैज्ञानिक मूल्यों को अभिव्यक्त करती हैं।

इसके अलावा मनु जी की कई कहानियों में बच्चों की कल्पना के सतरंगी पंखों से भरी उड़ानें हैं। उनके बाल पात्र बच्चों की वास्तविक दुनिया का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये बहुत भोले, चपल, मस्तमौला, अल्हड़, कल्पनाशील और नई-नई चीजों के प्रति जिज्ञासु हैं। इनकी कहानियाँ मनोरंजन के साथ रोमांचित करती हुई, जीवन के मर्म का संदेश देती है। ये कहानियाँ भावना, कर्म और संघर्ष की सीख देती हैं, पर यह सीख सीधे-सीधे नहीं आई है। कई कहानियाँ समाज की आर्थिक और पारिवारिक स्थितियों का यथार्थ चित्रण भी करती हैं। जैसे ‘सांताक्लॉज का पिटारा’। फिर एक बात और। मनु की कहानियों में फंतासी कहीं आधुनिक तकनीक से लैस होकर आई है, तो कहीं मोहक कल्पनाओं और भावप्रवणता के साथ आई है। अब देखा जाए तो ‘फागुन गाँव की परी’, ‘चिंकू-मिंकू और दो दोस्त गधे’ और ‘गोपी की फिरोजी टोपी’ कहानियों में फंतासी है, पर इन तीनों कहानियों में वह बहुत अलग-अलग रूपों में आई है, और मन पर अलग-अलग प्रभाव छोड़ती है। कहीं उसमें मन की करुणा शामिल है, कहीं प्यार की मिठास और कहीं विज्ञान की नई-नई खोजों का रोमांच और कौतुक भी।

‘गोपी की फिरोजी टोपी’ का कमाल देखिए, यह भी तकनीकी विज्ञान पर आधारित है। इसमें एक तरफ तकनीक का कमाल है, तो दूसरी तरफ अंतरात्मा की आवाज। इसमें गोपी नाम का एक लड़का विज्ञान की किताबों और इंटरनेट की मदद से कंप्यूटराइज्ड टोपी बना लेता है। हर तरफ उसे शाबाशी और इनाम मिलने शुरू हो जाते हैं। वह इस बात को गुप्त रखता है। हर बार प्रथम आने वाला प्रशांत भी गोपी की इस अनोखी टोपी के कारण इस बार सेकंड आता है। शुरू-शुरू में तो गोपी को यह अच्छा लगता है, लेकिन फिर मुश्किल आती है। उसकी अंतरात्मा इस बात को स्वीकार नहीं करती और उसे खुद अपने किए पर ग्लानि महसूस होती है। वह अपनी अंतरात्मा की बात मानकर खुद स्वीकारता है कि वह उतना होशियार और योग्य नहीं है। वह कंप्यूटरनुमा टोपी की मदद से हर बार प्रथम आया है। सभा भवन में प्रधानाचार्य और सब बच्चों के सामने मंच पर खड़े होकर वह इस बात के लिए माफी माँगता है। हालाँकि प्रधानाचार्य फिर भी, इस अनोखी खोज के लिए उसकी तारीफ किए बिना नहीं रहते।

यह कहानी सिद्ध करती है कि हर बच्चा जीनियस और लाजवाब है। बच्चे मन के बड़े सच्चे होते हैं। उनकी योग्यता और रुचि को परखकर यदि उन्हें अपनी प्रतिभा, ज्ञान और कौशल को बाहर लाने के उचित अवसर मिलें, उन्हें भीतर से माँजा और निखारा जाए और सभी संसाधन दिए जाएँ तो वे अपने क्षेत्र में बहुत बड़ा काम कर सकते हैं।

कहानी में इस छोटे बच्चे गोपी की बड़ी खोज को मनु जी ने किसी परीकथा की तरह बड़े ही रोचक ढंग से लिखा है। नहीं!...बल्कि सुनाया है। कहानी अपनी श्रेष्ठता और कलात्मक उत्कर्ष पर तब पहुँचती है, जब गोपी कक्षा में अपने प्रथम आने की भीतरी सच्चाई सबको बताता है। वह अपनी आत्मा की आवाज सुनता है और जैसे अंदर-बाहर से बदल सा जाता है। यही चीज है, जो कहानी को विशिष्ट बनाती है।

मुझे तो ‘बुद्धू का रिक्शा कमाल’ कहानी में रिक्शा वाले बुद्धू का सीधा-सादा चरित्र भी बहुत पसंद आया। जब ऐसी कथा सामाजिक संदर्भों से जुड़कर जीवन में प्रवेश करती है तो उसकी सार्थकता और उपयोगिता और बढ जाती है। ‘फागुन गाँव की परी’ भी ऐसी ही फंतासी है, जो जीवन की वास्तविकता बयान करती है। निम्मा परी को धरती का जीवन, यहाँ के परिश्रमी लोग, हरी-भरी प्रकृति बहुत भाती है। निम्मा भले ही परी हो, पर वह एक साधारण मनुष्य की तरह काम करते हुए ज्यादा आनंदित होती है। उसे बुधना के साथ काम करना, ईटें उठाना, अम्माँ के हाथ का चूरमा, आटा गूँथना, रोटियाँ सेंकना, पानी भरना, बच्चों के साथ मस्ती करना और कहानी सुनना अच्छा लगता है।

वास्तव में मनु जी निम्मा और बुधना के माध्यम से श्रम का महत्व बताना चाहते हैं। वे भावुकता को जीवन के यथार्थ से जोड़ते हैं। महानगर या शहर को लोक जीवन से जोड़ते हैं। बुधना तो स्वयं ही परिश्रमी हैं, पर निम्मा परी कोमल और भावुक होते हुए भी हार नहीं मानती। वह भी बुधना के साथ खूब शारीरिक श्रम करती है। यह कहानी एक नए प्रयोग की तरह है, जिसका एक छोर फंतासी से निर्मित है, तो दूसरा जीवन के यथार्थ से।

कहना चाहिए कि ये आधुनिक युग की और नई किस्म की परीकथाएँ हैं। इस संदर्भ में मनु जी कहते हैं कि, “मेरा मानना है कि हम नए जमाने की नई परीकथाएँ लिखें तो उनमें बहुत कुछ नया होगा, और वे बच्चों के दिल पर कहीं ज्यादा असर छोड़ेंगी। ठीक वैसे ही, जैसे यथार्थ पर आधारित कहानियाँ या उपन्यास भी मौजूदा दौर में कुछ अलग से होने चाहिए, जिसमें कथारस और किस्सागोई हो, बच्चे जिनके साथ बह सकें। वरना रूखी-सूखी, फार्मूलाबद्ध यथार्थपरक कहानी या बाल उपन्यासों को कोई नहीं पढ़ना चाहेगा।”

मनु जी की कहानी ‘फागुन गाँव की परी’ पढ़ते हुए उनके इन शब्दों का अर्थ पूरी तरह खुलने लगता है। साथ ही यह भी कि बच्चों के लिए लिखते हुए, वे असल में करना क्या चाहते हैं और किस तरह की सर्जनात्मक आकुलता महसूस करते हैं।

चलिए, अब इस पुस्तक की एक और कहानी ‘शहीद गली को सलाम’ को देखते हैं। सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय अंग्रेजी सरकार के दमन-चक्र और भारतीयों के पद-दलित होते स्वाभिमान के कारण जन-जन में रोष था। गाँधी जी के इस आंदोलन का प्रभाव किशोरों और नवयुवकों पर भी पड़ा। सैकड़ों युवाओं के अंदर देश के लिए मर मिटने का जज्बा हिलोर मार रहा था। ‘शहीद गली को सलाम’ इसी भावना को आधार बनाकर लिखी गई भावपूर्ण कहानी है। कहानी का अंत बहुत मार्मिक और संवेदित करने वाला है। देखिए—
“पूरी कथा सुनाकर दादी चुप हुईं, तो राजेश्वर को उनकी आँखों में दीए की लौ की तरह दिप-दिप करता हरनाम का चेहरा दिखाई दिया। मानो वह मुसकराकर कह रहा हो, मैं तो अभी जिंदा हूँ, भला शहीद भी कभी मरते हैं...?”

मनु जी ने इस कहानी में अपने मन के पवित्र भावों को इतने सहज और करीने से पिरोया है कि यह कहानी देश के उन अमर शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि बन गई है, जो इतिहास में गुमनाम रह गए।

दूसरी ओर ‘भुल्लन चाचा इंडिया गेट पर’ बहुत ही हँसाने, गुदगुदाने और संवेदित करने वाली कहानी है। भुल्लन चाचा बेशक देहाती हैं पर उनका व्यक्तित्व बड़ा ही उदार और विराट है। उनमें दया, करुणा, प्रेम, सहयोग और पर-दुखकातरता है। साथ ही एक बिल्कुल नए किस्म की सूझ भी, जिसकी ज्यादातर शहराती लोग शायद कल्पना भी नहीं सकते। यही कारण है कि भुल्लन चाचा अनजान को भी अपनेपन के रिश्तो में बाँध लेते हैं। उनकी गुब्बारे बेचने की कला, अभिनय और बात करने का कौशल बड़ा ही मजेदार है। उनके संवादों में मस्ती, प्रेम की भावना और रवानगी है। भुल्लन चाचा गुब्बारे बेचकर एक निस्सहाय की मदद ही नहीं करते, बल्कि मानवता की जीवंत मिसाल कायम करते हैं। यही संस्कारों का सृजन है और जीवन का उत्सव भी। भाषा में ऐसी तरलता और मिठास है कि पाठक रमता चला जाता है। मनु जी ने इस कहानी में भाव, भाषा और संवेदना को बड़े ही अजब ढंग से गूँथा है।

प्रकाश मनु की कहानियों में भुल्लन चाचा का चरित्र निराला है। वे बड़े ही साहसी, भावपूर्ण, और सूझ-बूझ वाले संवेदनशील पात्र हैं, जो सबको अपनी ओर खींचते है। मनु जी ने भुल्लन चाचा को लेकर कई अनोखी और मजेदार कहानियाँ लिखी हैं। जैसे ‘भुल्लन चाचा खो गए’, ‘भुल्लन चाचा कनॉट सर्कस देखने गए’, ‘भुल्लन चाचा इंडिया गेट पर’, ‘भुल्लन चाचा की दीवाली’, ‘भुल्लन चाचा की होली’, और ‘भुल्लन चाचा ने मनाया बाल दिवस’ आदि। भुल्लन चाचा का काम करने, सोचने-विचारने, रहने-सहने और खाने-पीने का अंदाज भले ही देसी यानी सहज-सरल हो, पर उनकी कार्यशैली बच्चों और बड़ों सभी के दिल को छू जाने वाली है।

आज दीपावली, होली, दशहरा, क्रिसमस आदि पर्वों को मनाने के तौर-तरीके बदल गए हैं। ये पर्व जाति-धर्म की चौहद्दी में सिमटकर रह गए हैं। पर ये पर्व और उत्सव हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। हमारी थाती हैं। हमें प्रेम, दया, करुणा और सहनशीलता का संदेश देते हैं। पहले इस अवसर पर होने वाली सजावट, साफ-सफाई, बनने वाले पकवान, तरह-तरह के मेले और रंग-बिरंगी झाँकियाँ, झलमल-झलमल दीपों की पंक्तियाँ आदि को लेकर उत्साह, उमंग, खुशी और सात्विकता का भाव मन में रहता था। लेकिन आज बाजार ने हमारी सोच, कार्य-शैली, खानपान और घर के आयोजन में दखल अंदाजी कर दी है। अब जिन लोगों ने वह पुरानी मौज-मस्ती और आनंद देखा है, उन्हें त्योहारों का यह आधुनिक एवं विकृत रूप देखकर बड़ी पीड़ा होती है। त्योहार मनाने की सहजता में बड़ा अपनत्व था। आत्मीयता थी। परस्पर स्नेह और विश्वास था। जबकि आज की इस तामझाम में स्वार्थ है। दिखावा है। संकीर्णता है। धार्मिक, सांस्कृतिक और वैचारिक प्रदूषण है। और ऐसा होना व्यक्ति, घर-परिवार, समाज, राष्ट्र और पूरी मानव जाति के लिए कतई शुभ नहीं है।

आज के दौर में दीपावली मनाने की एक बानगी देखिए। भुल्लन चाचा अपने गाँव हुल्लारीपुर की यादों में खोए थे। तभी किसी बच्चे ने कहा, “अरे, आजकल शहरों में तो बुरा हाल है, चाचा! दीवाली के दिन तो घरों से निकलना ही मुश्किल हो जाता है। लोग शाम से ही घरों में बंद हो जाते हैं। एक तो पटाखों का भीषण धाँय-धुम्म का कानफोड़ू शोर। ऊपर से ऐसा प्रदूषण कि सच्ची-मुच्ची कमजोर दिल के लोग तो कलेजा ही थाम लें...!”

इसके साथ ही भुल्लन चाचा इन कहानियों के माध्यम से बच्चों में समाज हित में अच्छा काम करने का हौसला भरते हैं। सत्य-असत्य का ज्ञान देते हैं। उनके मन में अतःप्रेरणा पैदा करते हैं। बच्चों को त्योहारों के सात्विक आयोजन का ज्ञान कराते हैं। साथ ही बच्चों में अभिनय, नृत्य, गायन, वादन, लेखन और चित्रकारी जैसी कलाओं के प्रति रुचि, अनुशासन और अनुराग के भाव-संस्कार डालते हैं।

आजकल इन त्योहारों पर नवजात शिशुओं का, पशु-पक्षियों का, बड़े-बुजुर्गों का, हृदय और श्वास के रोगियों का जीना दूभर हो जाता है। अनावश्यक शोर, प्रदूषण और फालतू का दिखावा बड़े बुजुर्गों को बड़ी ही तकलीफ देता है। ऐसे में मनु जी ‘भुल्लन चाचा की दीवाली’ के माध्यम से जो संदेश देना चाहते हैं, वह सराहनीय है। इस कहानी को लिखने का मनु जी का उद्देश्य भी गीत की इन पंक्तियों में सामने आ जाता है— 
हम बच्चों की यह सरकार
करती है बस, यही पुकार—
दीए जलाओ डगर-डगर,
दिवाली हो जगर-मगर।
नहीं पटाखे मगर जलाना,
नहीं प्रदूषण और बढ़ाना।
विनती करती बारंबार,
हम बच्चों की यह सरकार।

ऐसी कहानियों के माध्यम से मनु जी बताना चाहते हैं कि इन त्योहारों के पीछे प्रेम-सौहार्द की, भाईचारे और सहिष्णुता की एक उज्ज्वल एवं गौरवपूर्ण परंपरा रही है। संभवत: मनु जी प्रकारांतर से मैथिलीशरण गुप्त की ये पंक्तियाँ हमें समझना चाहते हैं कि, “हम क्या थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी? आओ मिलकर के विचारें ये समस्याएँ सभी।”

वास्तव में मुझे ऐसा लगता है कि यहाँ भुल्लन चाचा में खुद प्रकाश मनु जी की ही मानसिक छवि है। जो भी भुल्लन चाचा कहता है, करता है, सोचता है और चाहता है, वही मनु जी का स्वप्न भी है। इस बारे में मनु जी लिखते हैं, “बिल्कुल देसी रंग-ढंग वाले भुल्लन चाचा इस कदर मेरे मन में बस चुके हैं कि लगता है, कुछ न कुछ हिस्सा तो मेरी शख्सियत का भी उनमें शामिल है।” 
मुझे लगता है, यह बात बिल्कुल सही है। जो भी भुल्लन चाचा की कहानियाँ पढ़ेगा, उसे लगेगा कि वह प्रकाश मनु जी से ही रूबरू मिल रहा है।
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चलिए, अब पुस्तक की एक और भावनात्मक कहानी ‘हाथ से बड़े हाथ’ देखते हैं। यह एक बहुत ही प्रतिभावान और कला-प्रेमी बच्चे आशुतोष की कहानी है। वह बहुत बड़ा और नामी चित्रकार बनना चाहता है और कक्षा में भी हमेशा प्रथम आता है। इसमें उसके कला अध्यापक रमेश जी का निरंतर प्रोत्साहन और मार्गदर्शन उसे बहुत बल देता है। पर अचानक एक दुर्घटना में आशुतोष के दोनों हाथों की उँगलियाँ बेजान हो जाती हैं। जब वह निराशा और हताशा के गर्त में जाने लगता है, तब उसके अध्यापक रमेश उसे एक लड़की, अंबिका से मिलवाते हैं, जो अद्भुत जीवटता की जिंदा मिसाल है। वह अपने पैरों से ही सुंदर और कलात्मक कढ़ाई-बुनाई करती है। मोती जैसे सुनहले अक्षर लिखती है। यहीं से आशुतोष के जीवन को नई ऊर्जा और दिशा मिल जाती है। अंबिका से प्रेरित होकर वह अपने पैरों में ब्रश थाम लेता है। निरंतर अभ्यास द्वारा वह महान कलाकार बन जाता है। उसके चित्रों की प्रशंसा प्रसिद्ध चित्रकार देवधर भी करते हैं। इस प्रकार वह अपने गिरते हुए आत्मविश्वास को बहुत ऊँचाई तक ले जाता है। ऐसी कहानियाँ विकलांगता या परिस्थितियों से विवश बच्चों की विलक्षण संभावनाओं को सार्थक करती नजर आती हैं।

इसी तरह ‘सांताक्लॉज का पिटारा’ मानवीय संवेदना और सरोकारों से भरी समाज को बेहतर मानवीय समाज बनाने की एक आदर्श कहानी है। कहानी में अनेक पात्र हैं, जो भिन्न-भिन्न विपरीत परिस्थितियों जैसे गरीबी, अन्याय, शोषण, रूढ़ियों, अशिक्षा, बेरोजगारी, माँ-बाप के परस्पर कलह के शिकार हैं। जॉन के पापा की नौकरी छूट जाने पर उसकी मम्मी और पापा का एक संवाद देखिए—
“कोई नहीं देता सूजी, कोई नहीं...! बल्कि जो बड़े नजदीकी दोस्त बनते थे, नौकरी छूटते ही उन सबने भी मुँह फेर लिया।” जॉन के पापा जैसे अंदर ही अंदर रो रहे थे।
“पर फिर होगा कैसे...? कुछ तो करना होगा। हिम्मत रखो...हिम्मत से बात बन जाती है।” जॉन की मम्मी घोर अँधेरे में भी रास्ता टटोल रही थीं।

पात्रों का यों घोर दुख और संकट में भी आशा, आस्था और विश्वास बनाए रखना, बहुत बड़ी बात है। यह उनका आत्मविश्वास ही है, जो उन्हें हर प्रकार के भय और निराशा से मुक्ति का रास्ता दिखाता है।

कहानी ऊपर से देखने पर फंतासी लगती है, प्रतीकात्मक भी है लेकिन बड़े ही अनोखे ढंग से समाज का सच बयाँ करती है। आज क्या घटित हो रहा है समाज में? हैरी जैसे लाखों-लाख बच्चे हैं, जिनके पास अच्छे कपड़े नहीं है, किताबें और खिलौने नहीं हैं। उन्हें अपनी गरीबी के कारण उपहास का पात्र बनना पड़ता है। अमीरों और गरीबों के बीच भेदभाव की खाई गहराती जा रही है। चारों ओर बेरोजगारी के कारण पीड़ा और निराशा का माहौल है। कंपनियाँ अपने कर्मचारियों की छँटनी करके उन्हें निकाल रही हैं, जिसके कारण अभिभावक अपने बच्चों की फीस तक नहीं दे पा रहे हैं। 21वीं सदी में ज्ञान-विज्ञान और दूसरे क्षेत्रों में उन्नति के बाद भी आज परिवारों में लड़कियाँ भेदभाव और अपेक्षा की शिकार हैं। उन्हें लड़कों की तुलना में हीन माना जाता है।
पिंकी रोज-रोज की पिटाई से तंग है, ऐसे भयावह परिवेश में जरा बच्चों की मनोदशा देखिए, उसकी कराह सुनिए, “पता नहीं मैंने क्या कसूर किया है, कि सुबह से शाम तक बस पिटाई...पिटाई...पिटाई! इससे तो अच्छा होता कि मैं पैदा ही नहीं हुई होती।”

वहीं एक पिछड़ी सोच वाले समाज की लड़की पढ़ना चाहती है। पर उसे अवसर नहीं दिया जा रहा। रमजानी जैसे बहुत से बच्चे माता-पिता की आपसी लड़ाई में पिसते हैं। उन्हें समय पर अच्छी शिक्षा, संस्कार, सुरक्षा, खान-पान और देखभाल नहीं मिल पाती। फिर इसी समाज में बीनू और सत्ते जैसे बच्चे भी हैं, जिन्हें अपनी मजबूरी के कारण दूसरों के घरों में काम करना पड़ता है। ये दोनों एक-दूसरे का सहारा बनते हैं। एक-दूसरे की हिम्मत बँधाते हैं। कहानी अपनी उदात्त भावना, उत्कृष्ट शैली और भाषाई सहजता के कारण सार्थक और सुंदर बन पड़ी है। साथ ही वह साधारण पाठक को भी कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित करती है।

सांता के अथक प्रयास और प्रेरणा से उसके जैसे अनेक सांता तैयार हो जाना कहानी और उनके लेखक की सफलता है। सांता के मन में बार-बार एक ही बात गूँज रही थी, “अगर हर बच्चा सांता बन जाए तो यह दुनिया सुंदर बनेगी, सचमुच सुंदर।” तभी सांता को अनंत दिशाओं में गूँजती हुई आवाज सुनाई दी, “हम बनेंगे, हम बनेंगे...हम बनेंगे सांता! हम सांता के कामों में मदद करेंगे।”
मनु जी ने कथा में शुरू से अंत तक अपने मन के भाव-संवेदन को शब्दश: इस ढंग से पिरोया है कि पाठक उसमें बँध जाता है। आगे क्या होगा, यह जानने की ललक और जिज्ञासा उसमें बढ़ती ही जाती है। इसके कथा-प्रसंगों में उत्सुकता इतनी गहरी समा गई है कि आप इसे बीच में नहीं छोड़ सकते। भाषा की सहजता, पात्रों की सादगी, सरलता, निर्मलता और उनके जीवन की सच्चाई से जुड़ी हुई है। कहानी में कोई शब्द ऐसा नहीं है, जिसका अर्थ खोजना या किसी से पूछना पड़े। भाषा में एक आंतरिक लय है। साथ ही पात्रों से भाषा का आत्मीय जुड़ाव है। कथ्य और भाव संवेदन में, कहानी कहने के अंदाज और भाषा में कहीं कोई बनावटीपन नहीं। ये सभी चीजें एक-दूसरे में अभूतपूर्व ढंग से गुँथी हुई हैं। आगबबूला होना, फूटी आँख न सुहाना, सुर में सुर मिलाना, आँसू पोंछना, परचम लहराना, आँखों का तारा जैसे अनेक व्यावहारिक मुहावरों के साथ ही आम बोलचाल में आने वाले देशज, उर्दू और अंग्रेजी शब्दों का प्रसंगानुकूल सुंदर प्रयोग किया गया है।
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अपनी कहानियों को सरस, रोचक और भावपूर्ण बनाने के लिए मनु जी कहानी के कथ्य, पात्र और भाषा पर बहुत चिंतन और प्रयोग करते हैं। एक कहानी के अनेक ड्राफ्ट तैयार करना, बार-बार पढ़ना, बाल भावनाओं के अनुरूप निरंतर बदलाव करना और फिर उसे बाल पाठक की दृष्टि से पढ़ना, मनु जी की रचना-प्रक्रिया के महत्वपूर्ण अंग हैं।

एक अच्छी बाल कहानी लिखने को मनु जी चुनौतीपूर्ण कार्य मानते हैं। उनकी कहानियों में बच्चों के मन को रमाने के लिए, उनमें संवेदना पैदा करने के लिए, बच्चों के जैसे हँसते-खेलते, बातें करते खिलौने, मानवीय गुणों से भरपूर जीव-जंतु और परियाँ भी सामान्य मनुष्य के रूप में मस्ती और परिश्रम करती नजर आती हैं। मनु जी ने कहानियों के पात्रों को सरल हृदय, कोमल कल्पनाओं, संवेदनाओं और मनोभावों को सतरंगी पंख दिए हैं। उनमें अच्छा करने का और लक्ष्य तक पहुँचने का एक जोश है। जुनून है। और अंततः अपने लक्ष्य को वे प्राप्त कर ही लेते हैं। ये पात्र अपने स्वभाव से हर किसी को अपना बना लेने की क्षमता रखते हैं। वे दुख-परेशानी में भी अच्छाई की राह को नहीं छोड़ते। दुनिया के किसी भी कोने में रहें, पर वे अपने मन की उज्ज्वलता की छाप जरूर मन पर डालते हैं। इसके साथ ही वे हर विकट स्थिति में भी अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हुए खुशियाँ बाँटते नजर आते हैं। अपनी कहानियों में ऐसे पात्रों को गढ़ना एक कथाकार के रूप में मनु जी का सबसे प्रिय शगल है। बल्कि उऩके लिए कहानी लिखने का मतलब ही शायद ऐसे भोले, भले जिंदादिल पात्रों को गढ़ना है, जो इस दुनिया को कहीं अधिक सुंदर बनाएँ।

फिर पुस्तक में संगृहीत मनु जी की ये कहानियाँ भले ही अलग-अलग समय में लिखी गई हों, परंतु उनसे 21वीं सदी की ऊष्मा और ताजगी महसूस की जा सकती है। ये कहानियाँ आज के समाज की आवश्यकताओं के हिसाब से लिखी गई हैं। ये कोरी कपोल कल्पनाओं पर आधारित नहीं हैं, और न ही केवल रहस्य-रोमांच पैदा करती। ये कहानियाँ जीवन की वास्तविकताएँ लिए हुए हैं। इनमें कर्म का मर्म छिपा है। ये आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और तकनीक के प्रति रुचि और चेतना पैदा करती हैं। ये सृजन की संभावनाओं को संभव बनाने वाला स्पेस खोजती हैं। जीवन की कुरुपताओं, विसंगतियों, गरीबी, बेबसी तथा लाचारी से जूझते हुए आशाओं के दीप जलाना सिखाती हैं। बच्चों में छिपी संभावनाओं और प्रतिभाओं को निखारती हैं। बालमन की भावनाओं एवं कल्पनाओं को साकार करती हैं।

बाल साहित्य के संदर्भ में एक जगह मनु जी लिखते हैं, “बच्चों और बचपन को पूरी निश्छलता के साथ प्यार किए बिना आप बच्चों के लिए कुछ भी नहीं लिख सकते।” आगे मनु जी कहानी को परिभाषित करते हुए अपनी इन ‘21वीं सदी की श्रेष्ठ बाल कहानियों’ के केंद्रीय विषय के बारे में लिखते हैं कि, “कहानी अँधेरे में रास्ता टटोलने का दूसरा नाम है।...इनमें परीकथाएँ हैं तो हास्य कथाएँ भी, विज्ञान फंतासी कथाएँ हैं तो हमारे आसपास के जीवन की असलियत को दर्शाने वाली कहानियाँ भी। साथ ही देश के लिए कुछ कर गुजरने के जज्बे से भरी हुई देशराग की बड़ी भावनात्मक कहानियाँ भी हैं। पर इनमें बहुत कुछ नया-नया सा है।”

मनु जी ने अपनी कहानियों में परिश्रम, ईमानदारी, सच्चाई, प्रेम, सहयोग, दया, करुणा, शिक्षा, संस्कार, पर्यावरण चेतना, प्रकृति प्रेम और राष्ट्रीयता जैसे उदात्त सांस्कृतिक जीवन मूल्यों को मनकों की तरह करीने से पिरोया है। बच्चे ही इन सब कहानियों के केंद्र में हैं और इन शाश्वत जीवन मूल्यों के साथ सभी प्रकार की भूमिकाएँ निभाते हैं। ये सहज, सरल और बलवीर नायक विपरीत परिस्थितियों में भी आस्था, विश्वास, साहस और धैर्य जैसे प्रगतिशील जीवन मूल्यों की डोर नहीं छोड़ते। ऐसी कहानियों के माध्यम से मनु जी समाज में ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ की स्थापना के लिए जो प्रयास कर रहे हैं, उसमें पाठकों के दिल में भी थोड़ा उजाला और सकारात्मक ऊर्जा पैदा होती है।

‘21वीं सदी की श्रेष्ठ बाल कहानियाँ’ अच्छी और भावपूर्ण बाल कहानियों के संकलन के साथ ही, इक्कीसवीं सदी के बच्चों के लिए रोशनी की एक मशाल भी है। इस बड़ी उपलब्धि के लिए आदरणीय प्रकाश मनु जी को बहुत-बहुत बधाई।
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डॉ. अशोक बैरागी, 
हिंदी प्राध्यापक, राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, टयोंठा, कैथल, हरियाणा।
चलभाष: 9466549394

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