कविताएँ: मीनाक्षी मोहन

मीनाक्षी मोहन
पर उन यादों का क्या जो नहीं छोड़ पाये

कितने सूर्यास्त और सूर्योदय बीत गये
कहानी कितनी आगे निकल गयी
पर उन यादों का क्या जो नहीं छोड़ पाये —

आज बरसों पुरानी पापा-अम्मी की चिट्ठियाँ
भारत का स्टैंप, नीले रंग का – 
कुछ हिदायतों, कुछ रेसिपीस कुछ तुम लोग कब आओगे से भरा
एक कसक सी दे गया, काश वो दिन लौटा पाते।

हमारा वह छोटा सा हुगली नदी के किनारे बसा शहर
जो फ़ैक्टरी की धड़कन से चलता था
जहाँ पाँच बजे सुबह के भोंपू से हम जागते थे
और दिन की दिनचर्या शुरू होती थी।

हाथ में किताब दबा सहेलियों  के साथ गपशप कर स्कूल जाना, 
घर आकर खेलना, सहेलियों से रूठना, मनाना, 
कभी इमली पेड़ों से तोड़ कर नमक मिर्च से खाना, 
कभी काग़ज़ की नावों की रेस, 
जीतने की ख़ुशी तो हारने पर रोना।



अपनी बालकनी से आते जाते
जहाज़ी यात्रियों का हाथ हिला-हिलाकर
अभिनंदन कर हम कितने खुश होते थे,
सोचते थे कैसी होगी उनकी जहाज़ी ज़िंदगी,
क्या होगी उनकी कहानी?

वो बड़ा सा बरगद का पेड़
जो एक चबूतरे के सीने को चीरता खड़ा था
उस पर भूत प्रेत बस्ते थे शायद, कभी सड़कों पर
डायन के उल्टे पैरों के निशान भी नज़र आते थे --
उन कहानियों में एक डर था, जानने कि उत्सुकता भी।

उस शहर में सब एक दूसरे को जानते थे,
होली, दीवाली, दुर्गा पूजा, जन्माष्टमी 
सब एक साथ मनाते, 
जन्माष्टमी में झांकियाँ देखने घर घर जाना, 
फिर गुजिया, बालूशाहियों का तो मज़ा ही और था।

ऐसा था मेरा शहर जहाँ बचपन की कितनी यादें हैं
जिसकी महक आज भी रग रग में बसी है,
ना हमारे पास सेल फ़ोन था, ना ही टीवी
पर उस सीधी साधी ज़िंदगी में भी हम ख़ुश थे।

काश अपने जीवन की ये कहानी हम फिर जी पाते!
बहुत याद आता है वो अपना बचपना।


पर उन यादों का क्या जो नहीं छोड़ पाये
जिनकी ख़ुशबू आज भी रग-रग में बसी है।
*** 


विधि का विधान

इन्द्रधनुषी किरणें
बादलों की लुका छुपी
में भी मुस्कुराती रहीं
ओस की बूंदें भी गुलाब की पंखुड़ी
से झांक कर उन रंगीनी किरणों के हार
से अपने को सजाती रहीं
फिर आँधी के एक झोंके ने
सब कुछ मिटा दिया
और मैं अपनी खिड़की से विधि का
विधान देखती रही!
***


(1)
सूरज की पहली किरण से रंगी
गुलाब की पंखुड़ी ने ओस की बूँद से कहा
मैं प्यासी मेरी प्यास बुझा दो
ओस कुछ झिझकी फिर मुस्कुराई
पर मैं तुम तक पहचूँ कैसे
तुम तो तितलियों की रंगीन
ओढ़नी से ढकी हो!

(2)
कहने को तो बहुत कुछ था
पर कह नहीं पाये
उनको तो सिर्फ़ अपनी ही सुननी थी!
***

डॉ. मीनाक्षी मोहन एक लेखिका, कवयित्री और कलाकार हैं।
वह व्यापक रूप से प्रकाशित हुई है। उनकी सबसे हालिया किताबें द रीबर्थ ऑफ द डेमन और टेपेस्ट्री ऑफ वीमेन इन इंडियन माइथोलॉजी हैं। वे नेशनल लुइस यूनिवर्सिटी, शिकागो की सहकर्मी-समीक्षित पत्रिका, सम्पादकीय बोर्ड में हैं। वह कॉन्फ्लुएंस, यूके की सलाहकार संपादक में से एक हैं। मीनाक्षी को सेतु द्विभाषी जर्नल अवार्ड ऑफ एक्सीलेंस और पैनोरमा इंटरनेशनल राइटर्स कैपिटल फाउंडेशन अवार्ड मिला है। उन्हें हाल ही में लिटरोमा लॉरिएट लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड भी मिला। मीनाक्षी अमेरिका में रहती हैं।

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