'पारू के लिए काला गुलाब' - मेजर रॉबर्ट गिल व पारू की मार्मिक प्रेम कथा

विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति:  पारू के लिए काला गुलाब (उपन्यास)
उपन्यासकार: नीलम कुलश्रेष्ठ
मूल्य: ₹ 249/-
प्रकाशक: प्रलेक प्रकाशन, मुंबई


कभी-कभी लगता है, ईश्वर अनेक लोगों को एक साथ समान भाव-चिन्तन से जोड़ देता है, लोग सृजन में लग जाते हैं, कोई चित्र बनाता है, कोई मूर्ति गढ़ने लगता है और कोई कविता, कहानी, उपन्यास लिखने में लग जाता है। अभी मेरे सामने अहमदाबाद, गुजरात में रह रहीं वरिष्ठ लेखिका, चर्चित उपन्यासकार नीलम कुलश्रेष्ठ जी द्वारा रचित उपन्यास 'पारू के लिए काला गुलाब' खुला पड़ा है, यह मेजर रॉबर्ट गिल व पारू की प्रेम कथा पर आधारित है। सुखद संयोग ही है, इसी प्रेम कथा पर आधारित सोलापुर, महाराष्ट्र की प्रमिला वर्मा द्वारा रचित वृहदाकार उपन्यास "राबर्ट गिल की पारो" को पढ़ने और समीक्षात्मक चिन्तन करने का सुअवसर मुझे मिला है। हालांकि दोनों ने अपने-अपने तरीके से चिंतन किया है, कतिपय मत भिन्नता भी दिखाई देती है, फिर भी दोनों ने बहुत श्रम व शोध किया है और अद्भुत प्रेम कथा को जीवंत किया है। प्रमिला वर्मा की तरह नीलम कुलश्रेष्ठ वरिष्ठ साहित्य सेवी हैं, खूब सक्रिय रहती हैं और उनके लेखन की चर्चा दूर-दूर तक है।

विजय कुमार तिवारी
उपन्यास को हिन्दी गद्य की आधुनिक विधा के रूप में स्वीकार किया जाता है। कुछ लेखकों, साहित्यिकों का मानना है, भारत में उपन्यास लेखन की शुरुआत पाश्चात्य लेखन से प्रभावित होकर हुआ है। यह एक तरह से अनावश्यक विवाद है। हमारे यहाँ सदियों से वैदिक साहित्य लिखे गए हैं, पुराण, उपनिषद, काव्य, महाकाव्य, कथा आदि का लेखन खूब हुआ है। समीक्षा की दृष्टि से यह विधा सहज भी है और जटिल भी। वैसे ही उपन्यास लेखन को भी सहजता व दुरूहता में समझा जा सकता है। उपन्यासकार के लिए आकाश खुला रहता है, वह उड़ान भरता है और कहानी के भीतर कहानियाँ बुनता है। साहित्य के मर्मज्ञ विस्तार से उन तत्वों की पड़ताल करते हैं, चर्चा करते हैं जिनका उपयोग उपन्यास में हुआ होता है या होना चाहिए। हालांकि सर्वमान्य परिभाषा या सिद्धान्त तय करना किसी भी प्रवहमान विधा के लिए सहज नहीं है।

ऐसे ही जयपुर, राजस्थान से बहुचर्चित उपन्यासकार, साहित्यकार प्रबोध कुमार गोविल जी हैं जिनका विपुल मात्रा में लिखा साहित्य पाठकों को प्रभावित कर रहा है। मेरे लिए सुखद है, मुझे भी उनके कहानी संग्रहों, आत्म-कथाओं, फिल्म आधारित चरित्रों और उपन्यासों को पढ़ने, समझने का अवसर मिला है तथा मैंने उनकी अनेक पुस्तकों की समीक्षाएँ की है।

जीवन की जटिलताएँ, जीवन चेतना, जीवन का विस्तृत स्वरूप, चरित्रों का पूर्ण चित्रण, भावनाओं की पूर्ण अभिव्यक्ति आदि के लिए जिन विस्तारों की आवश्यकता है, उसकी पूर्ति उपन्यास लेखन द्वारा ही संभव है। विस्तार में गये बिना, जीवन की गुत्थियों को खोले बिना, हर प्रसंग का उल्लेख किए बिना रचनाकार का मन संतुष्ट नहीं होता या जो कहना चाहता है, कह नहीं पाता। ऐसे हालात में विस्तृत फलक का उपन्यास लिखकर ही वह संतुष्ट होता है। चरित्र आधारित उपन्यास, ऐतिहासिक उपन्यास, सामाजिक उपन्यास, यथार्थ कथ्य-कथानक के उपन्यास, मनोवैज्ञानिक चिन्तन के उपन्यास आदि के साथ अब तो भावनाओं और गहरे राजनीतिक अनुभवों को समेटे नाना तरह के उपन्यास लिखे और पढ़े जा रहे हैं। उपन्यास लेखन की यही सबसे अच्छी खूबसूरती है कि इसमें मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन उभरता है या कोई कालखण्ड, कोई घटनाक्रम विस्तार पाता है। कभी-कभी कहानियाँ भी औपन्यासिक पृष्ठभूमि लिए होती हैं जो अपने भीतर बहुत कुछ समेटे रहती हैं। यह विवाद का नहीं, समझने की बातें हैं और साहित्यिक लोग समझते भी हैं।

नीलम कुलश्रेष्ठ
अपने उपन्यास 'पारू के लिए काला गुलाब' की भूमिका में नीलम कुलश्रेष्ठ लिखती हैं- "मैं होश संभालते ही, अजंता की पेंटिंग्स की फोटोज, पत्रिकाओं में देख-देखकर इनकी दीवानी हो गई थी। इनकी अनुकृति देखते ही मेरे मन में एक कलात्मकता स्वतः जाग्रत हो जाती थी।" ऐसी ही दीवानगी हर व्यक्ति से बड़ा से बड़ा सृजन करवा लेती है । अपनी भूमिका में उन्होंने विस्तार से सारे संदर्भों, अपनी सृजन यात्रा और हर पड़ाव का उल्लेख किया है। किसी ऐतिहासिक या लोक में चर्चित प्रसंग को लेकर लेखन के लिए बहुत श्रम करना पड़ता है, इतिहास खंगालना होता है और पूरी तरह जाँचना-देखना होता है। प्रेम कथाओं में नाना आवश्यक-अनावश्यक प्रसंग स्वतः जुड़ते चले जाते हैं जिसे बिना गहराई से परखे, जोड़ लेना इतिहास के साथ अन्याय माना जाता है और वह ग्रंथ आलोचनाओं का शिकार हो जाता है। नीलम जी ने अपने इस सृजन में इसका पूरा ध्यान रखा है और यथासंभव अनावश्यक छेड़ छाड़ से बचाया है। इस मार्मिक व साहसिक प्रेम-कथा को पढ़ने से पूर्व उनकी लिखी भूमिका अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।

भूमिका से एक रहस्य और उभरता है-स्वयं उपन्यासकार ने इतिहासकारों को पढ़ा है, जुड़े स्थानों की यात्राएँ की हैं, बहुत कुछ अपनी आँखों से देखने का प्रयास किया है और गहरी अनुभूतियों के साथ लिखती हैं-"ब्रिटिश सरकार ने भारत सम्बन्धी हर ब्रिटिशर्स के काम व नाम के दस्तावेज को व्यवस्थित रूप से संभालकर रखा था। बस नहीं रखा था सुरक्षित इन दस्तावेजों में पारू का नाम क्योंकि वह एक भारतीय थीं।  प्रोफेसर प्रकाश ने अपने शोध से पारू के महत्व को खोज निकाला था।" वे लिखती हैं-"इस प्रेम कथा से मेरा मन आंदोलित हो गया था।" आगे उन्होंने सहजता से स्वीकार किया है-मैं मेजर व पारू को याद कर पिघलने लगती।" उन्होंने नेट पर गहन छान-बीन की, इस विषय पर बनी फिल्म देखी और प्रोफेसर प्रकाश की शोधों को प्रामाणिक माना। अंत में कहने-बताने में अच्छा लग रहा है और मुझे संतोष है, "नीलम कुलश्रेष्ठ ने इस प्रेम-कथा को लिखने में अपने हिसाब से न्याय करने की कोशिश की है।"

मेजर रॉबर्ट गिल का आगमन भारत में सेना के अधिकारी के रूप में हुआ परन्तु उनकी रुझान यहाँ की सभ्यता-संस्कृति, यहाँ का रहन-सहन, यहाँ का जन-जीवन और बहुत कुछ समझने की ओर था। मन में प्रश्न उठा-"क्या सच ही शान्ति भारत के लोगों के जीवन में है?" उन्होंने अपने दुभाषिये से अपमान जनक तरीके से व्यंग्य किया जिसका उत्तर उन्हें इन वाक्यों में मिला-"हमारी संस्कृति है, 'अतिथि देवो भव'। आप हमारे अतिथि हैं। इन गुफाओं के चित्रों के चित्र बनाकर अपने देश ले जाना चाह रहे हैं तो हम कैसे आपकी इच्छा पूरी करने इस सुनसान जंगल में आपके साथ नहीं आते?"

सन 1819 में बंगाल नेटिव इन्फेंट्री के मेजर अलबर्ट व्हीलर किसी तेंदुए का पीछा करते हुए अजंता की इन अंधेरी गुफाओं में आ घुसे थे। पहले उन्हें भय हुआ। जब मशाल जलाकर रोशनी की गयी तो उनके होश उड़ गये-"खूबसूरती की सम्पदा बिखरी हुई थी इन गुफाओं की दीवारों पर, चित्रकला का इतना सौंदर्य? कैसे अब तक दुनिया से छिपा हुआ था? निगाह पड़ चुकी है तो अब इनकी खोज करनी है, इनके बारे में सब कुछ जान लेना है और इस छिपी हुई कला को दुनिया को दिखाना है।"

इसी काम के लिए कलाकार, चित्रकार, फोटोग्राफर मेजर राबर्ट गिल को नियुक्त किया गया है। वह भी चकित हैं, स्तब्ध हैं और नाना प्रश्नों को लेकर खोए हुए हैं कि इन ऊँचे पहाड़ों की गुफाओं में सदियों पहले कैसे बनाई गयी होगी दीवारों पर पेंटिग्स। भित्ति पर बने गलियों, साधारण घरों, राज दरबार, बुद्ध व सांचे में ढले शरीर वाली स्त्रियों के चित्र, लोगों की वेशभूषा और स्त्रियों के सिर पर बालों के जूड़े कैसे बनाए गए होंगे? यह चित्रकारी सदियों पुरानी है। नीलम कुलश्रेष्ठ राबर्ट गिल की भावनाओं को शब्द देती हैं, "सांवले रंग में भी इतना भरपूर आकर्षण हो सकता है? कमर के खूबसूरत कटाव चित्र में भी लचकीले लग सकते हैं? गुफाओं की रहस्यमय दीवारों पर बने इन चित्रों के रंग अब तक इतने जीवंत कैसे हैं?” वह दूसरा चकित करने वाला दृश्य दिखाती हैं। राबर्ट को बुद्ध के चरणों में ताजे फूल दिखाई दे रहें हैं। उसे आश्चर्य हो रहा है, इतनी सुबह कौन आया होगा इस दुर्गम पहाड़ी पर चढ़कर बुद्ध की मूर्ति की अर्चना करने? नीलम जी के पास शोध से प्राप्त निष्कर्षों की पूंजी है, राबर्ट के भीतर का अचरज भरा कोलाहल और अनगिनत प्रश्न हैं। उनकी लेखनी धीरे-धीरे रहस्यों से परदा उठा रही है और पाठक गहरे आलोक में खोते जा रहे हैं।

उन्होंने अपनी इस औपन्यासिक कृति को 21 खण्डों में विस्तार दिया है। वर्णित विवरणों को पढ़ते हुए लगता है, उन्होंने श्रम, गहन शोध और अपनी लेखनी द्वारा अद्भुत दृश्य चित्रांकन किया है। औरंगाबाद के निजाम को राबर्ट गिल की सेवा-व्यवस्था की जिम्मेदारी मिली है, नईम दुभाषिया है और अनेकों सिपाही सुरक्षा में लगे हुए हैं। वह रोचक तरीके से हर प्रसंग लिखती हैं और जहाँ मौका मिलता है, रुमानियत के दृश्य खींच लेती हैं। ताजमहल के पीछे का दृश्य देखिए जब राबर्ट अपनी पत्नी फ्रेंसिस फ्लावरड्यू के साथ हैं-"चाँदनी रात की खामोशी में चाँदनी में नहाई दमकती बेहद गोरी लचीली देह वाली फ्रेंसिस का कोमलता से हाथ पकड़े उस संगमरमर की भव्य इमारत, जो चाँदनी रात में खुद चाँद बनी हुई थी के बगीचे में टहलते हुए उस प्यार में डूबते रहे थे जो कभी शाहजहाँ ने मुमताज महल से किया था। उसे देखकर दोनों आगोश में बँध गए थे, उन कंपनों को महसूस करते जो उनके शरीर को थरथरा रही थी।" औरंगजेब की मजार का प्रसंग भी उनके शोध का हिस्सा है जो उसके चरित्र से भिन्न दिखाई देता है।

सबसे जीवन्त प्रसंग है अजंता की गुफाओं की यात्रा, वहाँ के चित्र, सारा विवरण और पात्रों के बीच के संवाद। अजंता के सौन्दर्य को देखकर वह प्रश्न करती है-ब्यूटी हमेशा बीस्ट के साथ क्यों होती है? इन बीहड़ और भयानक पहाड़ियों में सौन्दर्य की अकूत संपदा बिखरी पड़ी है। गुफाओं के बारे में, संख्या और कालखण्ड के बारे में स्थानीय पंडित से बहुत सी जानकारी मिलती है। यहाँ संवाद में भारतीय संस्कृति की झलक मिलती है और जानकारियाँ भी। बौद्धकालीन व्यवस्था, शब्दावली, परम्पराओं की चर्चा और आसपास की प्रकृति व यहाँ की संस्कृति को समझने का सुझाव मिलता है। पंडित राबर्ट गिल से महत्व की बात करता है-"अजंता में ये चित्र नहीं हैं, ये भारतीय जीवन शैली है, हमारी संस्कृति है। आप इनके चित्र बनाकर ही अपने देश नहीं ले जाएंगे बल्कि बुद्ध का शांतिपूर्ण संदेश, उनके विचार, उनकी अहिंसा आपके साथ जायेगी।" गिल के मन में चित्रों में बहुतायत स्त्रियों की उपस्थिति प्रश्न खड़ा करती है। उसे गाँव के मुखिया से मिलवाया जाता है जो शंका की दृष्टि से देखते हुए हिदायतें देता है-"गोरे से कह देना, खबरदार जो उसने हमारे खेतों या हमारी औरतों पर दृष्टि डाली तो---।"

रॉबर्ट गिल के आश्चर्य की सीमा नहीं है, दूसरे, तीसरे, चौथे, हर दिन कौन इतनी सुबह इन दुर्गम पहाड़ियों में आकर बुद्ध की मूर्ति के चरणों में फूल चढ़ा जाता है। भोर होने के पहले, अगले दिन अपने दल-बल के साथ वह अंधेरे में पहुँच गया और देखकर चकित हुआ, एक युवा भील लड़की अंजुलि में फूल लिए, आँखें बंद किए अपने मांसल होंठों से कुछ बुदबुदा रही थी। भील स्त्री के सौन्दर्य व देहयष्टि का चित्रण करते हुए नीलम जी लिखती हैं-"सांवली लचकीली देह, वक्ष व नाभि पर नाम मात्र को वस्त्र, एक-एक अंग जैसे तराशा हुआ, लंबी मुंदी हुई आँखें।" राबर्ट को लगता है-"भिति पर बनी कोई सुन्दर नारी का चित्र दीवार से निकलकर लचकता बाहर निकल आया है या शिल्पी ने तराश कर एक-एक अंग गढ़ा है या सांचे में ढली कोई मूर्ति अपने छलकते यौवन के साथ मदमाती, दीवार से बाहर प्रकट हुई है।" नीलम जी की पारखी निगाहों की उड़ान, शोधपूर्ण उनकी खोज और ऐसे सारे प्रसंग पाठकों को सराबोर व रोमांचित करने वाले हैं। भारतीय संस्कृति, यहाँ के राजे-रजवाड़ों के ठाटबाट, अंग्रेज महिलाओं की भारतीय स्त्रियों से तुलना आदि पर गहन विमर्श समझने योग्य है। राबर्ट पारू से प्रभावित है और आसक्त भी। लेखिका ने रोचक तरीके से, संवाद करते हुए दोनों के बीच के प्रेम का उल्लेख किया है। पारू अपनी समस्याएँ बताती है। वह रंग बनाना जानती है जिसे देखने राबर्ट अजंता गाँव में जाता है। नईम भील जाति की स्त्रियों को लेकर बताता है-ये लेडी नहीं हैं, ये फौलाद की बनी औरतें हैं, बहुत कठिन जीवन जीने की आदी।"

नीलम कुलश्रेष्ठ को रोचक संवाद लिखने में महारत हासिल है और वह अपने शोधों के आधार पर पात्रों के जीवन का यथार्थ परोसती हैं। राबर्ट गिल पारू द्वारा बनाये हुए रंगों को देखता है, खुश होता है और नित्य अजंता की गुफाओं में साथ चलने व सहायता के लिए उसे तैयार कर लेता है। पारू बिना कहे ब्रश आदि को धो-पोंछकर सजा देती है। बुद्ध के बाद यदि कोई पेंटिंग गिल को पसंद आयी तो वह थी नृत्य मुद्रा में लचकती-देवदासी। उसके बाएँ हाथ की हथेली, अंगूठा और अंगुलियाँ मिलकर, लोच लेकर आधा कमल का फूल बना रही थीं। नीलम जी आगे लिखती हैं-दूसरा हाथ वक्ष के नीचे था जिसकी अनामिका और अंगूठा आपस में जुड़े थे। नर्तकी का कमर का कटाव एक लय बनकर गुनगुनाता लग रहा था। जब स्त्री आकृति पूरी हुई, गिल को झटका सा लगा-क्यों नहीं वह भारतीयता को अपने चित्रों में उतार पा रहे हैं? पारू को भी लगा, चित्र में कहीं कोई कमी है। वह उस तस्वीर के पास अपनी कमनीय कमर में उत्तेजक कटाव लाकर वहीं नृत्य मुद्रा बनाती खड़ी हो गयी और नर्तकी की आँखों के प्रणय आमंत्रण भाव से गिल को देखने लगी। गिल का शरीर थरथरा उठा। पारू का चेहरा लाल पड़ गया, सांसें तेज-तेज चलने लगी और उसे पहली बार अपने शरीर में एक नई सरसराहट सी महसूस हो रही थी। राबर्ट पारू की रंगों की समझ से चकित था। पारू को भी यह कलात्मक काम लुभाने लगा था। गिल की सज्जनता पर वह मर मिटी थी। नीलम कुलश्रेष्ठ ने पारू व राबर्ट के बीच के हास-परिहास, तीखा खाना, पानी पीना आदि प्रसंगों का जीवन्त दृश्य लिखा और तत्कालीन मनोभावों को मूर्त किया है।

 राबर्ट मुम्बई में बेटी की खराब तबीयत सुनकर पहुँचा है, पत्नी खुश नहीं है और वह भी बेचैन है। नीलम जी राबर्ट की तत्कालीन परिस्थितियों पर सटीक चिन्तन करती हैं-"खुद ही समझ नहीं पा रहे कि बेचैन हैं या कहीं गहरी तृप्ति उनकी भटकती हुई, हमेशा कुछ ढूँढ़ती आत्मा के तल में जा बैठी है। ऐसा लग रहा है, कोई बरसों की तलाश खत्म हो गयी है, उनके अंदर जो अधूरा था, वह पूरा हो गया है। उन्हें लगता है, यदि पारू नहीं मिलती तो वह कभी भी अपना लक्ष्य पूरा नहीं कर पाते। कीमती जीवन है तो उसे किसी लक्ष्य के लिए उपर वाले ने दिया हुआ है।" वह पारू के उपर चीता के आक्रमण का रोमांचक प्रसंग लिखती हैं, राबर्ट फुर्ती से पारू को बचा लेते हैं, चीता को मार डालते हैं और दहशत से भरी पारू को घोड़े पर बैठा कर उसके घर छोड़ आते हैं। लेखिका तत्कालीन स्थिति-परिस्थिति, मन के भाव और भीतरी प्रेम को खूब जीवन्त करती हैं और संवेदना, प्रेम का दृश्य रचती हैं। अगले दिन राबर्ट पारू को काला गुलाब भेंट करता है। नीलम जी लिखती हैं-"प्यार कब किसी भाषा का मोहताज होता है? उसने कब काले-गोरे, उम्र, देश-परदेश की सीमाओं का ध्यान रखा है?" अब यह नित्य का नियम बन गया है, रोज उसे वह काला गुलाब देते हैं और पारू अपनी लरजती उँगलियों में शर्माती हुई थाम लेती है।

नीलम कुलश्रेष्ठ के पास हास-परिहास वाली शैली है और शब्द सामर्थ्य भी। उनके लेखन में अंग्रेजी शब्दावली की भरमार है, उर्दू के साथ स्थानीय शब्द भी जगह पाते हैं और उनकी हिन्दी दूसरी भाषाओं के साथ मिश्रित दिखाई देती है। सबसे रोचक है, पारू और गिल अपने मन की बात एक-दूसरे से कहने, समझाने लगे हैं। वह अंग्रेजी नहीं समझती, गिल उसकी बोली नहीं समझते परन्तु दोनों एक-दूसरे के मन को, भावनाओं को और प्रेम को समझते हैं। कहानी को विस्तार देना, मोड़ देना नीलम जी को खूब आता है। गिल का बंगला बन गया है, मुम्बई से पत्नी और बच्चे आ गये हैं परन्तु दोनों के विचार नहीं मिलते। लेखिका के भीतर की रसिकता जहाँ अवसर मिलता है, उभर आती है, लिखती हैं-'मेजर ने अपनी पत्नी की कमर में हाथ डालकर उसके होंठों को चूम लिया।' वैचारिक विरोधाभास देखिए, जिन पेंटिंग्स को बनाने में गिल ने श्रम किया है, उसे फ्रेंसिस गँवारू, यूजलेस और ओल्ड कहकर वहाँ से हटा देने का भाव दिखाती है। हद तो तब होती है जब पारू  को देखकर हँसते हुए कहती है-"इज दिस योर माडल? दिस हाफ न्यूड देशी व ब्लैक नेटिव गर्ल?" पारू सोचती है, ऐसी सुन्दर पत्नी के होते हुए मेजर क्यों उसमें इतना बिंध गये हैं कि जब वह उनके पास होती है या दूर, लगता ही नहीं कि वह कोई दो अलग लोग हैं।

नीलम जी लिखती है-"लेकिन वह इंसान को इंसान समझते हैं।" पत्नी का झगड़ा करके मुम्बई लौट जाना, सुरजी की शादी में पारू का नृत्य करना और प्रेम के गीत गाना, वह हर प्रसंग को रोचकता के साथ गरिमा प्रदान करती हैं। प्रेम के क्षणों में बना चित्र देखिए-"सामने की दीवार पर थी नाममात्र के आभूषण पहने अनावृत्त सीने वाली, पलकें झुकाये, बालों का गोल जुड़ा बनाये, आभूषणों से सजाये, सिर झुकाये एक नवयौवना स्त्री की आकृति, दाएँ हाथ को लम्बा कर शिला पर टिकाए व बाएँ हाथ को मदमाते अंदाज में आधा उठाए शिला पर बैठी हुई राजा नंद की पत्नी महारानी शिवाली की पेंटिंग। उस पेंटिंग में महारानी के लचीले, कोमल शरीर को कुछ इस तरह तना दिखाया हुआ था कि कमर के कटाव के उपर और उभरा अनावृत्त सीना मादकता में डूबा हुआ था। कमर के खूबसूरत कटाव की लोच आँखों में बिंधी जा रही थी। --और उसके सामने थी एक ऊँचे पत्थर पर बैठी पारू हूबहू इसी अवस्था में।" नीलम जी की कल्पना की उड़ान देखिए-"पारू ने अपने मादक नयन उठाये। पारू की उन नशीली आँखों में क्या था---मादकता----आमंत्रण---समर्पण की अपरिमित चाह? या यहाँ से वहाँ तक खुला आकाश?” वह लिखती हैं-"बरसों वीरान पड़ी रही अजंता की रूखी-सूखी गुफाएँ इस प्यार के तूफान से थरथरा रही थीं, सकुचा भी रही थीं। ऐसे प्रसंग, ऐसी अनुभूतियाँ गहरे अनुभव के आधार पर ही चित्रित हो सकती हैं। लेखिका स्त्री के मनोविज्ञान को समझती हैं, पारू मन ही मन ललकारती है-"गोरी मैम! तुम में इतना ही दमखम था तो क्यों नहीं अपने पति के साथ अजंता की पेंटिंग बनाने में लग गई?" उसका मन हुआ एक बार वो घमंडी मैम अपने गोरे साहब को देखे जो होंठों पर तृप्त मुस्कान लिए, आँखें बंद किए एक ब्लैकबिच की आगोश में, उसके अनावृत्त सीने पर सिर रखे हुए हैं। गिल परम संतुष्टि के साथ स्वीकार करते हैं-"तुम्हीं मेरी प्रेरणा हो।" अगले खण्ड में नीलम जी महाबालेश्वर की जीवन्त यात्रा का वर्णन करती हैं और बहुत सी जानकारियाँ देती हैं।

उन्होंने ठगों पर विजय के प्रसंग को रोचक तरीके से व्यक्त करते हुए लिखा है-"गाँव के लोग स्वागत में खड़े हैं, बीच में आरती की थाली लिए खड़ी थी पारू। अपने प्रियतम के लिए उसका चेहरा गौरव से दिपदिपा रहा था।" बम्बई से एशियाटिक सोसायटी के तीन अधिकारी मेजर की पेंटिंग देखने आये, हर तरह से प्रसन्न होकर लौटे और उन्होंने मेजर के तनख्वाह बढ़ाने व प्रमोशन की चर्चा की। वह कलाकार की मूल भावना को व्यक्त करते हुए लिखती हैं-"मेजर मन ही मन मुस्करा उठे कि अब उन्हें पैसे के लिए क्या करना है? दुनिया का सबसे बड़ा खजाना जो उनकी निरंतर भटकती, जाने क्या ढूँढती अतृप्त रूह की प्यास मिटाता है, मिल चुका है।" गिल की पत्नी का बम्बई पहुँचकर रुख़ क्या रहा ?

वह गिल, पारू, नईम सहित सभी पात्रों का अद्भुत चरित्र सृजित करती हैं और उनके भावुक करने वाले दृश्य रुलाकर रख देते हैं। ऐसी परिस्थितियों की विवेचना करना और कोई निर्णय ले पाना सहज नहीं होता। गिल को अपने ग्रैंड पा के द्वारा बचपन में 'लेजेंड' की परिभाषा और ईश्वर कृपा जैसी बातें याद आती हैं।

अपनी पत्नी से तलाक के बाद रॉबर्ट गिल की मनःस्थिति ऐसी है, तीसरे दिन भी पेंटिंग बनाने का मन नहीं होता। अपने-अपने तरीके से नईम व पारू उपाय में लगे हैं ताकि उनका मन लग जाये। गिल पारू को काला गुलाब देना नही भूलते परन्तु उनकी आँखों में पहले जैसा प्यार का ज्वार नहीं छलकता। वह लिखती हैं-"जीवन कब रुका है किसी सुख पर-, किसी दुख पर? खुद ही हर दिन एक-एक कदम रखना मरहम बन मन के सारे निशान मिटाता चलता है या दिल के गहरे तल में सहेजता चलता है।" पारू  सब कुछ समझती है और उनका दुख अपने आँचल से धीरे-धीरे पोंछने लगती है। गिल सोचते हैं, यदि पारू नहीं होती तो उनका क्या होता?  वह नाना प्रसंगों के साथ कहानी को आगे बढ़ाती हैं और पात्रों के मनोभावों को व्यक्त करती चलती हैं। नईम का कथन समझने लायक है-'मैं इन दोनों के पास महीनों से हूँ, दो समर्पित कलाकारों का समर्पण व मुहब्बत से दुनिया का ये महानतम काम सम्पन्न हो रहा है। ये बात अब कोई मायने नहीं रखती कि कौन अनपढ़ है, कौन पढ़ा-लिखा है-, कौन गोरा है, कौन काला-, कौन देशी है और कौन विदेशी--।` पारू का सुरजी के साथ संवाद या मुखिया के साथ, नीलम जी के लेखन कला का यथार्थ रूप उभरता है। राबर्ट गिल को जाना है, सारी पेंटिंग्स को लन्दन पहुँचाना है। नीलम कुलश्रेष्ठ ने दोनों के वियोग के पलों को सम्पूर्ण मार्मिकता के साथ उकेरा है और गहरे प्रेम को समझाने की कोशिश की हैं।

लन्दन जाने से पहले गिल ने मुखिया से कहा-"एक रिक्वेस्ट है, जब तक मैं लौट कर नहीं आऊँ, तुम पारू की देख-भाल करते रहना, उसे कोई परेशान न करे।" उधर बंगले के एकान्त कमरे में मेजर ने पारू को पूरी तरह आश्वस्त करता रहा कि वह उसके लिए अवश्य वापस आयेगा। नीलम कुलश्रेष्ठ इस प्रसंग को शब्द देती हैं-वह भी अपनी भाषा में कहने लगी, "उसे ये सुकून भरी जकड़न चाहिए--, सशक्त बाजुओं की सुरक्षा चाहिए---, हमेशा के लिए--।" भावुक करने वाला दृश्य देखिए-अचानक उसने कमर पर जकड़े हुए मेजर के हाथ की हथेली को अपने पेट पर फिराया और अपनी भाषा में कहा-"मुझे पता है आप कभी वापस नहीं आओगे। मेरी इच्छा थी कि मैं अपनी कोख में एक नन्हा गिल साहेब पैदा करूँ लेकिन पता है मेरी ये इच्छा अब कभी पूरी नहीं होगी।" ऐसे दृश्य बुनना, भावपूर्ण संवाद लिखना और प्रेम भरे आत्मीय क्षणों को जीवन्त करना नीलम जी की लेखनी का सशक्त पक्ष है।

लन्दन प्रवास के सारे सन्दर्भ, क्रिस्टल पैलेस में गिल द्वारा अपनी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगाना और विस्तार से सब के प्रश्नों का उत्तर देना आदि का लेखन उन्होंने किया है। गिल ने भारत सम्बन्धी बहुत सी जानकारियाँ दी और प्रमाणित करना चाहा, सभ्यता-संस्कृति, शिक्षा और विकास जैसे हर मामले में भारत हमसे आगे है। उन्होंने यह भी कहा-"भारत के अजंता गाँव में रंग की जानकार एक अनपढ़ भील लड़की है जिसने दुनिया के इस महानतम कार्य को सिद्ध करने के लिए हर कदम पर मेरा साथ दिया।" कहानी का दारुण, भयावह पक्ष अभी शेष है। राबर्ट गिल वापस लौटते हैं, अपने प्रेम के लिए और अपनी पारू के लिए। फिर क्या होता है?

सुरजी को गिल के घर की देखभाल के लिए बुला लिया गया। उधर लन्दन से दुखद समाचार मिला कि क्रिस्टल पैलेस में लगी भीषण आग में उनकी बनायी पेंटिंग्स सहित बहुत सा सामान जल गया है, मात्र चार पेंटिंग्स सही सलामत बची हैं जिन्हें ब्रिटिश म्यूजियम को सौंप दिया गया है। कुछ अधजली पेंटिंग्स को भी सुरक्षित रखा गया है। गिल की मनोदशा का, उनके प्रेम का लेखिका ने भावपूर्ण वर्णन किया है। पारू के गाँव को ही गिल अपना मानता है, उसने नईम से कहा-" समझ लो, पारू के गाँव को छोड़कर हम अब कहीं रहने नहीं जायेंगे।"

कुछ समय बाद लन्दन से दुखद समाचार मिला कि क्रिस्टल पैलेस में लगी भीषण आग में उनकी बनायी पेंटिंग्स सहित बहुत सा सामान जल गया है, मात्र चार पेंटिंग्स सही सलामत बची हैं जिन्हें ब्रिटिश म्यूजियम को सौंप दिया गया है। कुछ अधजली पेंटिंग्स को भी सुरक्षित रखा गया।  

मेजर के लिए जेम्स फर्ग्यूसन का उनके पास आना वरदान बन गया था। उन दोनों ने काली मिर्च के पेड़ों को देखने के लिए  यरकॉड [तमिलनाडु ] की यात्रा की और प्रकृति के सौन्दर्य को देखकर अभिभूत हो उठे। काली मिर्च की लताएँ पेड़ों का सहारा लेकर विकसित होती हैं। नीलम जी गिल के मनोभावों को चित्रित करती हैं-'स्त्री को भी तो लता यानी क्रीपर्स कहा जाता है। वह भी अपना जीवन किसी पुरुष को ऐसे ही जकड़कर व्यतीत करती है। `    

दूसरी बार जेम्स के साथ उन्होंने मध्य प्रदेश और राजस्थान की ऐतिहासिक इमारतें देखी। जेम्स ने गिल से पूछा-आप अजंता में वहाँ की पेंटिंग्स को अपने कैमरे में उतारते रहे होंगे? उन्होंने ‘हाँ’ में जवाब दिया परन्तु कोई रुचि नहीं दिखाई। जेम्स ने कहा-"किसी भी कला पर दुनिया का अधिकार होता है। कलाकार अपने दुख से उठकर दुनिया की, कला से झोली भर देता है। कभी-कभी इसी गहन दुख को साधकर अपने जख्मी सीने से उसे ही विकसित कर देता है। ये आपके बरसों की तपस्या है।" गिल मौन ही रहे। जेम्स ने उनके साथ मिलकर दो पांडुलिपियाँ तैयार की-` द रॉक कट टेम्पल ऑफ़  इण्डिया `और ` वन हंड्रेड स्टीरियोस्कोपिक इलस्ट्रेशन ऑफ़ आर्किट्रैक्चर एंड नेचुरल हिस्ट्री ऑफ़ वेस्टर्न इण्डिया`।

जेम्स ने अपने साथ गिल को लन्दन चलने का आग्रह किया परन्तु गिल नहीं माने। जेम्स समझ गये, गिल अब कभी अजंता गाँव छोड़कर कहीं नहीं जायेंगे। नईम को अपने अब्बा हुजूर की बात याद आयी, वे कहा करते थे-"जिसका दाना-पानी जहाँ लिखा हो, बेमुरव्वत किस्मत उसे वहीं खींचकर ले जाती है।"

इस तरह नीलम कुलश्रेष्ठ ने इतिहास के गुमनाम पन्नों से निकालकर इस प्रेम कथा को लिखा है जिसमें कलाकारों की आत्माएँ अपनी पूर्णता के साथ उभरी हैं। ऐसे मनोभावों का चित्रण करना, इन विषम परिस्थितियों में सहज है क्या? नीलम कुलश्रेष्ठ ने बहुत सफलता पूर्वक अपना लेखन दायित्व निर्वहन किया है और उनके इस उपन्यास की चर्चा खूब हो रही है।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।