कविता: रंगमंच पर पहली बार

प्रकाश मनु

545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008
चलभाष: 981 060 2327,
ईमेल: prakashmanu334@gmail.com


जादू तो बहुत देखे थे, मीता
पर देखा रंगमंच पर पहली बार...
कि देखा जब भटकती जिंदगी का नाटक
तुम्हारे हाथों कुछ नए रंग नाट्य-मुद्राओं में!

हाँ, यह जादू ही था मीता
और कहानी भी मेरी ही थी जो लिखी गई विष्णु खरे के आग्रह पर
सुबह-सवेरे आठ से रात के साढ़े दस ग्यारह तक लैपटॉप पर 
टकटकाती रहीं उँगलियाँ
और बीच-बीच में विष्णु जी के त्वरित संदेश 
कि कहानी आज ही चाहिए प्रकाश जी,
मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ...

जी लिख रहा हूँ पूरी होते ही भेजूँगा तत्काल
जी लिखी गई बस अब फाइनल टच...
जी अभी-अभी, बस पाँच मिनट पहले भेज दी कहानी...
रात साढ़े ग्यारह यह संदेश भेजा गया उत्सुक संपादक को 
फिर मैं गया सोने
उठा सुबह चार पर कि विष्णु जी के लिखे आखर 
चमक रहे थे मेरे सिरहाने
कहानी अद्भुत है प्रकाश जी, वसंतदेव का चरित्र बड़ा ही दिलचस्प
आभार...!

कहानियाँ लिखीं तो बहुत थीं पर ऐसी कहानी तो सचमुच
पहली बार ही लिखी गई
जिसमें कहानी में नाटक था, नाटक में नाटक...
जिसे एक बड़े संपादक ने बड़ी बेसब्री से मुझसे लिखवाया

और उसी को रंगमंच पर उतारने की पागल जिद थी तुम्हारी मीता
कि सर आप अनुमति दें 
तो मैं इसे लाना चाहती हूँ अपने ढंग से रंगमंच पर

अगर तुम्हें पसंद है तो समझो कहानी मेरी नहीं तुम्हारी है
तुम्हें जो करना हो सो करो—यही कह सकता था मैं सो कहा
और फिर तुम्हारे फोन पर फोन उत्सुकता और उत्साह से भरे
कभी-कभी तो रोमांचक भी मेरे लिए
कि कहानी बहुत जटिल है मनु जी, एक बड़ी चुनौती है यह मेरे लिए
हाँ मुझे भी लगता है कैसे करोगी तुम कि इसमें बहुत कुछ ऐसा है
जिसे रंगमंच पर लाना गोयम मुश्किल वगरना गोयम मुश्किल...
खुद मेरा चिंतातुर स्वर खुद में उलझा हुआ

हाँ सर, मैं जानती हूँ, पर तय कर लिया है मैंने कि मुझे करना है 
मैं करूँगी और कभी घर आकर आपसे भी 
डिस्कस करूँगी पूरी स्क्रिप्ट
यों इतना तो समझ ही गई हूँ पढ़ते हुए चौथी बार कहानी 
कि इस कहानी को नाटक में बदलने का मतलब है 
नाटक में नाटक में नाटक...
पर वह दिखाऊँ कैसे, इसी उलझन में फँसी हूँ अब तक

बिल्कुल ठीक, तुमने समझ लिया मीता 
जो इस कहानी का पेंच है
यह सचमुच ही जटिल मामला है किसी रंगकर्मी के लिए, मैंने कहा 
सच ही नाटक में नाटक में नाटक... 
यही तो असली मुश्किल!

पर मैं इसीलिए तो कर रही हूँ इसे मनु जी, 
कि यह एक नई चुनौती है मेरे आगे...
हाँ, आप अपनी कुछ कविताएँ भेजें जो वसंतदेव और दूसरे पात्रों
के मुँह से सुनवाई जा सकें तो बात कुछ बने
शायद स्पेस का भराव कुछ सार्थक तरीके से हो सके

सो कविताएँ जो इधर लिखी गई थीं एक खास मनःस्थिति में
वे की गईं तुम्हारे हवाले...
और फिर वह फाइनल रिहर्सल थी जिसमें तुम्हारे आग्रह पर
मैं शामिल हुआ था सुनीता भी मेरी चिर संगिनी

नाटक में बहुत कुछ था जो बहता था मेरे आर-पार 
मगर कुछ खाली-खाली सा भी भीतर टीसता कसकता हुआ
मैंने देखा तुम्हारी ओर तो सुनाई पड़े हिचकिचाते विनम्र शब्द तुम्हारे
सर, कल ही होना है नाटक और वक्त 
अब बहुत ज्यादा नहीं है...
शायद मेरे चेहरे पर लिखा असंतोष पढ़ लिया था तुमने
सुनीता ने बेहतर ढंग से दिए कुछ अच्छे सुझाव
कविताएँ बुलवाने का जिम्मा लिया मैंने और अगले दिन 
सुबह दस से मैं नाटक में था और नाटक मुझमें 
देश-काल की सारी हदों के पार अपनी मुकम्मल शक्ल तलाशता

संवाद फिर एक बार बदले जा रहे हैं और बोले जा रहे हैं फिर-फिर
बदले जा रहे हैं दृश्य आगे-पीछे और बीच के भी कुछ
बदला जा रहा कविताएँ पढ़ने का अंदाज कि उसमें आए वह प्रभाव
जो किरदारों के भीतर घुमड़ते दुख के काले बादलों और द्वंद्व को 
साकार करे रंगमंच पर

मेरे इर्द-गिर्द नाटक था एक नया ही 
और मैं अवाक...
देखा हैरानी से कि ऐसे विकट समय में भी मुसकराते हुए
किस कदर थामे हुए थीं तुम सारी रस्सियाँ और डोर कथा की निष्कंप

और अब रंगमंच पर होना था नाटक और जी मेरा धक सा
क्या बनेगी कुछ बात कि बिगड़ेगा सारा ताना-बाना
ये आखिरी वक्तों में किए गए जो बदलाव उससे कहीं अटकेंगे
तो नहीं तुम्हारे अदाकार मीता...?
नहीं सर, आप यकीन करिए, नाटक होगा और यादगार
मैंने भरोसा दिया था न आपको पहले ही दिन
वही भोली मुसकान जो तुम्हें मीता मिश्रा बनाती है

और अब प्रेक्षागृह में लाकर बैठा दिया गया मुझे
कि कभी भी शुरू हो सकता था मनु जी, नाटक
मेरे भीतर घड़ी की टिक-टिक...टिक कि सच ही
जीने-मरने की घड़ियाँ थीं वे मेरे लिए
और सामने वह नाटक जो मुझसे और हम सबसे निकलकर 
अब रंगमंच पर था
और तुम्हारे कुशल हाथ उसे आगे बढ़ा रहे थे इतनी संजीदगी से
कि बाज दफा तो भावोत्तेजना में छलके आँसू आँखें गीली सी

नाटक में वसंतदेव थे जो मुझसे निकलकर अब रंगमंच पर 
चले आए थे
और एक नहीं पूरे चार बनाए गए वसंतदेव
उनका बचपन, शरारती किशोर मन उद्धत तरुणाई
और अंत में बड़े कद के एक बड़े साहित्यकार के रूप में 
अपनी सम्मान-सभा को संबोधन...

वसंतदेव थे इतने-इतने रूपों मे इतनी भावमुद्राओं में
और लोग तमाम लोग जो निकले तो कहानी से ही थे
पर तुम्हारे नाटक ने उनकी आत्मा में बजते संगीत को पहचाना 
और नाटक में नाटक की तरह सहेजा उतारा रंगमंच पर
पूरी आश्वस्ति से उनकी देह-भाषा को अर्थ देते हुए

और अब यह नाटक था, नाटक में नाटक...
जी नहीं, नाटक में नाटक में नाटक 
कि जो चक्कर शुरू से ही तंग करता था मुझे और तुम्हें भी
और अब कथा की सारी डोरें तुम्हारे हाथ में थीं
जो कभी प्रहसन में बदल जाती तो कभी गूँजता 
कोई करुण सा विषाद राग उसमें
कभी रहस्यमय फंतासी क्षिप्र वेग से कौंधती पूरे मंच पर
अँधेरे को चीरती बिजलियाँ...

मंच पर विचित्र प्रकाश-वृत्तों की नाव में तैरता पूरा नाटक
तेजी से रंग-रूप शक्लें बदलता 
किसी जादुई झपताल की तरह  
मगर किसी जिंदा फिल्म से जिंदगी से कम नहीं

दर्शक देख रहे थे आनंद विभोर बीच-बीच में तालियाँ 
बीच-बीच में गायन और लोक संगीत के सुर-ताल
और एक करुण राग धीमे-धीमे बहता हुआ प्रेक्षागृह के
एक सिरे से दूसरे तक...

और कि मेरी आँखों में अचरज
कि मेरा ही नाटक मुझसे निकलकर 
इतना बड़ा कैसे हो गया
कि उसमें सिमट आईं जीवन की सब अशेष गतियाँ 
राग-विराग तेज हलचलों जैसी हलचल
कि सारी की सारी कायनात ओस नहाए खिले-खिले गेंदा फूलों की तरह...

इसलिए कि इसकी ब्रह्मा तुम थीं मीता
तुम थीं भरत मुनि का ही एक नया संस्करण 
इक्कीसवीं सदी का
लेकिन विनम्र हर किसी को स्नेह और आदर बाँटती हुई

अंत में रंगमच पर तुम सब और तुम्हारे आग्रह पर मैं भी
मैंने देखा तुम्हें और तुम्हारी पूरी टीम को झुकते हुए मेरे पैरों की ओर
और मैं अपलक, अवाक... 
पूरे प्रेक्षागृह में तालियों की गूँज
आँखों में सराहना, प्यार

मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह सब जो है 
वह नाटक है या नाटक से बाहर...
जब तुम मुझे और सुनीता जी को सहारा देकर 
बाहर विदा करने नहीं आईं
तुमने ही नहीं, सबने कहा भीगी पलकों से, अलविदा...!

मैं लौटा घर, पर वह लौटना कहाँ था मीता 
रात भर चलता रहा मेरे भीतरी रंगमंच पर नाटक 
जिसके सारे सूत्र थे तुम्हारे हाथों में
मैं कभी नाटक में चला जाता कभी नाटक मुझ में उतर आता...
मैं कभी वसंतदेव बन जाता कभी वसंतदेव मुझमें समा जाते
मेरे दिल आँखों और समूचे वजूद में 

तुम जो कि थीं उस नाटक की निर्देशिका
बड़े कौशल से सारे तारों को जोड़ती फिर हँसकर बिखरा देती हुई
उन्हें फिर से नए-नए रूपों में जोड़ने के लिए
ताकि नाटक के भीतर से एक और नाटक, फिर एक और 
नया नाटक जन्म ले...!

यों जिंदगी में जादू बहुत देखे थे मीता
देखे नाटक भी कम नहीं
पर उस दिन देखा रंगमंच पर जो पहली बार...
उसे याद करूँ तो आज भी भीगती हैं आँखें
***

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।