सनातन धर्म की विशालता, सार्वभौमिक एकता व इसके सर्वकल्याण-समर्पण को सिद्ध करने वाली पुस्तक -”सनातन-हिन्दू धर्म”

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 987 063 1805; ईमेल: drdinesh57@gmail.com

समीक्ष्य पुस्तक: सार्वभौमिक एकता और मानव-कल्याण को समर्पित सनातन-हिन्दू धर्म (अध्यात्म चिंतन)
ISBN: 978-81-928008-4-4
रचनाकार: पद्मश्री डॉ.रवीन्द्र कुमार
पृष्ठ: 96, प्रकाशन वर्ष- 2017
मूल्य: ₹ 120 रुपये
प्रकाशक:वर्ल्ड पीस मूवमेंट ट्रस्ट, मेरठ-250001

साहित्यवाचस्पति और बुद्धरत्न व गाँधीरत्न जैसे अन्तर्राष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत,राष्ट्रवादी विचारधारा के पोषक, प्रखर चिंतक, तथा चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय मेरठ के पूर्व कुलपति, लोकपाल, स्वामी विवेकानन्द सुभारती विश्वविद्यालय, मेरठ एवं ग्लोबल पीस अन्तर्राष्ट्रीय पत्रिका के मुख्य सम्पादक, पद्मश्री डॉ. रवीन्द्र कुमार जी, सौ से अधिक ग्रन्थों के लेखक एवं सम्पादक हैं। आपने गत 35 वर्षों में राष्ट्रीय एकता एवं साम्प्रदायिक सौहार्द हेतु विश्व के अनेक देशों में शान्ति यात्राओं का नेतृत्व किया है। अनेक राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों व कार्यशालाओं का आयोजन किया है। आपकी पुस्तक ‘सार्वभौमिक एकता और मानव-कल्याण को समर्पित सनातन-हिन्दू धर्म’ पढ़ने का सौभाग्य मिला।

यह पुस्तक पद्मश्री डॉ. रवीन्द्र कुमार जी की, ओडेन्स, डेनमार्क में वहाँ की एक शोध छात्रा सुश्री तान्या व उनकी माताश्री श्रीमती लेने के साथ, सनातन हिन्दू धर्म के मूलाधार- वृहद कल्याण और सार्वभौमिक एकता के लिए इसकी कटिबद्धता के विषय में हुई वार्ता पर आधारित है।

दिनेश पाठक ‘शशि’
पुस्तक के विषय में डॉ. रवीन्द्र कुमार जी कहते हैं, ”सनातन-हिन्दू धर्म की व्यापकता, शाश्वतता और सर्वकालिकता को साधारण रूप में प्रस्तुत करना ही मेरा एकमात्र उद्देश्य है। इसके माध्यम से सनातन धर्म की वास्तविकता को समझा जा सके, यही मेरा अभिप्राय है।” (पृष्ठ 13)
विद्वान लेखक ने पूरी पुस्तक में जगह-जगह रामचरित मानस, गीता, भागवत ईशोपनिषद, संहिताएँ, सूत्र और पुराण् आदि-आदि ग्रन्थों के उद्धरण देते हुए यह सिद्ध किया है कि सनातन धर्म ही एकमात्र ऐसा धर्म है जो विश्व-कल्याण और विश्व बन्धुत्व की भावना रखने वाला और फैलाने वाला है-
“गीता मेरे अन्तःकरण को जाग्रत रखती है। आत्मा, बुद्धि, मन एवं चित्त को निष्काम कर्मयोग की मूल भावना के अनुसार निर्देशित करती है। हिन्दू हृदय-सम्राट सनातन धर्म के सर्वकालिक प्रहरी मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन को प्रस्तुत करती रामायण और श्रीरामचरित मानस जनैकता-सार्वभौमिक एकता के मुझे साक्षात् रूप में दर्शन कराती है-‘सियाराम मय सब जग जानी, करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी।’ “ (पृष्ठ 16)

इतना ही नहीं डॉ. रवीन्द्र कुमार जी ने शोधछात्रा सुश्री तान्या और उसकी माँ श्रीमती लेने के सभी प्रश्नों का उत्तर देते हुए यह भी सिद्ध किया है कि सनातन धर्म ही प्राचीनतम धर्म है-
“सनातन धर्म से जुड़े प्राचीनकालिक ग्रन्थों, वाल्मीकीय रामायण और श्रीमद्भगवद्गीता में, जो कि हजारों वर्ष प्राचीन हैं, वेदों के उल्लेख से भी इनकी अति प्राचीन कालिकता सिद्ध है। सनातन धर्म की आधारभूत धर्म के रूप में वास्तविकता प्रकट है।

इस प्रकार ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करने पर, वेदों और संस्कृत भाषा को केन्द्र में रखकर विचार करने के बाद, दृढ़ता पूर्वक यह कहा जा सकता है कि सनातन धर्म विश्व का प्राचीनतम धर्म है। (पृष्ठ 26)

शोध छात्रा सुश्री तान्या के यह पूछे जाने पर कि क्या सनातन धर्म -वैदिक हिन्दू जीवन मार्ग की मूल भावना को इस रूप में स्पष्टतः प्रकट करने वाले ऐसे किसी श्रेष्ठ मंत्र का उल्लेख कर सकते हैं? के उत्तर में डॉ. रवीन्द्र कुमार जी द्वारा गायत्री मंत्र के उदाहरण के साथ ही उसके पुष्टिकरण के लिए दिए गये जैन धर्म की स्तुतियों व प्रार्थनाओं, बौद्ध धर्म की प्रतिबद्धताओं, सिख धर्म-सम्प्रदाय के मूलमंत्र, पश्चिम एशिया के पाँच प्रमुख धर्म-सम्प्रदायों में-यहूदी प्रार्थनाओं, पारसी-जरथुस्त्री की मूल मान्यताओं, ईसाइयों की कामनाओं तथा इस्लाम में प्रकट प्रार्थना-स्तुति और बहाई धर्म-सम्प्रदाय के विश्वासों का, और चीन के दो धर्म-सम्प्रदाय-कन्फ्यूशी व ताओ में कन्फ्यूशी के विचार तथा ताओ की मान्यताओं के स्पष्टीकरण दिए गये हैं साथ ही अनेक उदाहरण ईशोपनिषद् से, तैत्तरीय उपनिषद् से, माण्डूक्योपनिषद् से तथा केनोपनिषद् से, कठोपनिषद् व हिरण्यगर्भ सूक्त आदि से दिए गये हैं जो लेखक की सर्वतोमुखी प्रतिभा एवं गहन अध्ययनशीलता को दर्शाते हुए उनकी प्रकाण्ड विद्वता को प्रकट करता है।

इस बात की पुष्टि पुस्तक के प्राक्कथन में जे.के. विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ.एम.रामरत्नम् के विचारों से भी होती है जिसमें वे डॉ. रवीन्द्र कुमार जी के बारे में लिखते हैं-
“जब कोई व्यक्ति असाधारण प्रतिभा का प्रदर्शन करता है और उस प्रतिभा से सत्यमार्ग का अनुसरण करते हुए जगत-उत्थान प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो ऐसा स्वयं ईश्वर अपनी शक्ति द्वारा उस मनुष्य के माध्यम से ही कराते हैं।” (पृष्ठ 6)

पुस्तक में मनुष्य को सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी बताते हुए, विद्वान लेखक ने सनातन धर्म के मूल ग्रन्थ, वेद महावाक्यों नेति नेति,अहं ब्रह्मास्मि, अयं आत्मा ब्रह्म तथा अद् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे आदि का उद्धरण देते हुए लिखा है-
“मानव सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। उसे ईश्वर की विशेष कृपा प्राप्त है। प्रभु-कृपा से वह अति विशिष्ट गुणों से संयुक्त है। उसमें अनुभूति एवं प्रगति की अपार क्षमताएँ विद्यमान हैं। इसलिए, समस्त प्राणियों में मनुष्य को ही कर्त्तव्यो से बांधा गया है। इन वेद महावाक्यों से मानव अपनी सम्प्रभुता की अनुभूति करे। अर्थात् वह भलीभाँति यह समझे कि वह दिव्यता से परिपूर्ण है। उसका व्यक्तित्व महिमावान है, परमशक्तिशाली व श्रेष्ठ है। सर्व प्राप्ति के लिए वह सक्षम है। साथ ही प्राणिमात्र के कल्याण हेतु भी वह सहायक है। अपने ऊपर पूर्ण विश्वास रखते हुए उसे स्वअनुभूति करनी चाहिए।” (पृष्ठ 50, 51)

सनातन धर्म आदि काल से ही अपनी सर्वश्रेष्ठता सिद्ध करता आ रहा है। विद्वान लेखक डॉ. रवीन्द्र कुमार जी ने भी अनेक उदाहरणों सहित पुस्तक-‘सनातन हिन्दू धर्म’ में पुनः-पुनः इस बात को उद्घाटित किया है-
“सनातन धर्म-वैदिक-हिन्दू मार्ग सार्वभौमिक एकता को समर्पित अपने अद्वितीय मूलाधार एवं सर्व कल्याण के अपने आह्वान के बल पर तथा सौहार्द, सहिष्णुता, सहनशीलता, स्वीकार्यता और परस्पर आदर जैसे अपने अनुयायियों के अतिश्रेष्ठ संस्कारों की शक्ति से विश्वनज को, बिना किसी भेदभाव और पूर्वाग्रह के समृद्धि के मार्ग पर नेतृत्व प्रदान करने में सक्षम है।” (पृष्ठ 86)

‘सर्वे भवन्तु सुखिना’ तथा ‘सबका साथ, सबका विकास’ की भावना रखने वाला सनातन-हिन्दू धर्म , विश्व की समस्त समस्याओं के निराकरण की क्षमता भी रखता है, ऐसा लेखक का विश्वास है-
“हम शब्द को केन्द्र में रखकर दृष्टिकोण-सामजस्य के बल पर प्रत्येक अवरोध, कठिनाई, विरोधाभास, विसंगति व समस्या , वह छोटी हो या बड़ी स्थानीय या अन्तर्राष्ट्रीय, समाधान के लिए समस्त धरावासियों को सामूहिक अथवा साझे प्रयासों-प्रयत्नों द्वारा एक साथ लाने की क्षमता भी सनातन-हिन्दू धर्म रखता है। (पृष्ठ 87)

पुस्तक के अंतिम आठ पृष्ठों में मूर्धन्य साहित्यकार, पद्मश्री डॉ. रवीन्द्र कुमार जी ने एक आलेख-‘सनातन-हिन्दू धर्म के दर्पण में भारतीय संस्कृति’ भी समाहित किया है जिसमें बहुत ही सारगर्भित रूप से सनातन-हिन्दू धर्म की व्याख्या की गई है।

पुस्तक की भाषा-शैली सरल और सहज ग्राह्य है। आवरण शीर्षक के अनुरूप आकर्षक है तथा मुद्रण त्रुटिहीन है। पुस्तक का पाठन और चिंतन-मनन निश्चित रूप से सनातन-हिन्दू धर्म की विशेषताओं से अवगत कराने वाला, लाभकारी सिद्ध होगा, ऐसी आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है।

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