अच्छी सलाह (प्रांत-प्रांत की कहानियाँ)

(प्रांत-प्रांत की कहानियाँ से साभार)
मूल भाषा: कश्मीरी
लेखक: बाज़गोई हमरा ख़लीक़
अनुवाद: देवी नागरानी

परिचय: देवी नागरानी जन्म: 1941 कराची, सिंध (तब भारत), 12 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, 2 भजन-संग्रह, 12 सिंधी से हिंदी अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिंधी, हिन्दी, तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्पर अनुवाद। श्री मोदी के काव्य संग्रह, चौथी कूट (साहित्य अकादमी प्रकाशन), अत्तिया दाऊद, व रूमी का सिंधी अनुवाद. NJ, NY, OSLO, तमिळनाडु, कर्नाटक-धारवाड़, रायपुर, जोधपुर, केरल व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। डॉ. अमृता प्रीतम अवार्ड, व मीर अली मीर पुरस्कार, राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद व महाराष्ट्र सिन्धी साहित्य अकादमी से पुरस्कृत। अंतर्जाल: https://nangranidevi.blogspot.com ईमेल: dnangrani@gmail.com 


एक बार कश्मीर में एक राजा रहता था जो शिकार का बहुत शौक़ीन था। एक दिन वह जंगल में शिकार खेलने गया और एक हिरन पर उसकी नज़र पड़ी। उसने हिरन का पीछा किया लेकिन वह इस तरह तेज़ भाग रहा था कि राजा उसे पकड़ न सका। हिरन उसकी नज़रों से ओझल हो गया। राजा ने वापस जाने का इरादा किया, लेकिन जब उसने इधर-उधर नज़र दौड़ाई तो वह बौख़ला गया। 

हमरा खलीक़
‘ओ ख़ुदाया! शायद मैं रास्ता भूल गया हूँ।’ 

वह रास्ता तलाश करता रहा लेकिन जंगल में और फँसता चला गया। भटकते-भटकते उसे जंगल में शाम हो गई थी, इसलिये राजा ने जंगल में ही ठहरने का इरादा किया। अचानक उसकी नज़र एक साधु पर पड़ी जो एक दरख़्त के नीचे ध्यान में बैठा हुआ था। 

‘यहाँ जंगल में किसी इन्सान का मिलना निहायत ख़ुशनसीबी है। शायद यह मेरी कुछ रहनुमाई कर सके।’ राजा यह सोचकर साधु के पास पहुँचा। 

साधु ने जब उसकी कहानी सुनी तो वह फौरन उसके साथ चल पड़ा, क्योंकि वह जंगल से अच्छी तरह वाक़िफ़ था। 

‘जनाब आपने इतनी मदद की है, मैं ज़िंदगी भर शुक्रगुज़ार रहूँगा। मेहरबानी करके आप मेरी सल्तनत में कुछ अरसा मेरे साथ गुज़ारें। आपके पधारने से मेरी इज़्ज़त अफ़ज़ाई होगी।’ पहले तो साधु ने इनकार कर दिया लेकिन राजा के बार-बार इसरार करने पर वह राज़ी हो गया। 

राजा ने फौरन उसके लिये एक छोटा सा मकान तैयार करवाया और उसका नाम ‘महाराज का मंदिर’ रखा। हर शाम राजा उसकी सेवा में हाज़िर होकर उसके उपदेश सुनता। 

उसकी जनता और दरबारियों को उसकी यह बात बिलकुल पसंद नहीं थी। उनका विचार था कि राजा की ज़रूरत साधु से ज़्यादा दरबार को है। लेकिन राजा उनकी बात बिलकुल नहीं सुनता था। 

‘मैं साधु के पास जाकर चैन महसूस करता हूँ’ वह कहता था। एक दिन जब राजा साधु के पास पहुँचा तो उसे महसूस हुआ कि साधु कुछ परेशान और मायूस सा है।

‘महाराज जी क्या बात है?’ राजा ने साधु से सवाल किया। 

‘मेरे बच्चे, यह वक़्त तुम्हारे लिये अच्छा नहीं है। तुम किसी आफ़त से घिरने वाले हो। तुम्हारे दरबारी तुम्हारे खिलाफ़ साज़िश कर रहे हैं। तुम्हारी ज़िन्दगी ख़तरे में है, तुम फौरन दरबार छोड़ कर चले जाओ। जितना धन और रत्नादि साथ ले जा सकते हो, ले जाओ, लेकिन अभी महल छोड़ दो।’ 

राजा बेहद परेशान हुआ और साधु के क़दमों में झुक गया। साधु ने एक काग़ज़ उसे दिया ‘यह कागज़ ले जाओ। उसमें कुछ मंत्र हैं, उनका पालन करना। ये बहुत महत्वपूर्ण हैं, और तुम्हारे लिये कारगर सिद्ध होंगे। किसी अनजानी जगह चले जाओ, वहाँ तुम सुरक्षित रहोगे। ईश्वर तुम्हारी रक्षा करे।’ 

राजा ने महल में आकर यात्रियों जैसे वस्त्र पहनकर उनके ऊपर एक गरम ‘पैरहन’ पहन लिया। 

पैरहन की जेबों में उसने कुछ रत्न टाँककर सिक्के थैले में रख लिये। अगली सुबह जल्दी ही वह महल से निकलकर झेलम नदी की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसकी उत्सुकता बढ़ी और उसने साधु का दिया हुआ कागज़ निकाल कर पढ़ना शुरू कर दिया। 
‘अजनबी इलाके में किसी पर भरोसा न करो। सिर्फ़ उन दोस्तों पर विश्वास करो जिन्होंने परेशानी में तुम्हारा साथ दिया है। बुरे वक़्त में रिश्तेदार भी अपने नहीं होते।’ राजा साधु की नसीहतों को याद करता हुआ चलता रहा। अगली सुबह होने तक वह अपने राज्य से बाहर निकल चुका था और पहाड़ के दूसरी ओर पहुँच गया। उसने देखा कि पहाड़ पर हरियाली थी और हल्के गुलाबी फूल खिले थे। चारों तरफ बड़े-बड़े वृक्ष थे और सुबह के सूरज की मद्धिम रोशनी फूलों और हरियाली पर पड़ रही थी। 
‘वाक़ई कश्मीर स्वर्ग है’ उसने सोचा और आराम करने वहीं बैठ गया। साथ लाया हुआ खाना खाने लगा। खाने के पश्चात् वह थोड़ी देर लेट गया। जब उठा तो काफ़ी ताज़गी महसूस की। राजा ने अपने भविष्य के बारे में सोचा और एक ऐसे रास्ते पर चल पड़ा जो उसे हुकूमत और फरमान के अमल के दूसरी तरफ़ ले जाए। वह चलता रहा। चलते-चलते एक कस्बे में पहुँचा। दूरी पर एक मकान नज़र आया जो शायद सराय थी।

बत्तियाँ जल रही हैं, इसका मतलब है अब तक कोई जाग रहा है। मेरा ख़याल है मुझे यहाँ रात गुज़ारनी चाहिए।’ सोचते हुए उसने दरवाज़े पर पहुँचकर दस्तक दी। 

दरवाज़ा एक कुरूप स्त्री ने खोला, जिसे देखकर राजा को बड़ी नफ़रत हुई, लेकिन वह इतना थक गया था कि आगे जाने की हिम्मत नहीं रही। उसने बड़ी मुश्किल से सवाल किया, ‘क्या मैं यहाँ रात बसर कर सकता हूँ?’

‘अंदर आओ’ औरत ने मुस्कराकर जवाब दिया और एक कमरे की तरफ़ ले गई। कमरा बेहद छोटा सा था लेकिन बहुत साफ़-सुथरा था।

‘तुम यहाँ सो सकते हो, मुझे यक़ीन है कि तुम्हें आराम मिलेगा। मेरी सराय इसी बात के लिये मशहूर है’ वह औरत मुस्कराते हुए बोली और कमरे से चली गई।

राजा बिलकुल बेहोश होने वाला था, लेकिन उसे अचानक साधु की नसीहत याद आ गई। उसने पलंग से चादर उठाकर देखी तो वह देखकर हैरान रह गया। पलंग के नीचे एक संदूक-सी थी जो ताबूत लग रही थी।

‘ओ ख़ुदा! अगर मैं इस बिस्तर पर लेट जाता तो मर जाता, शुक्र है कि मैंने अपने गुरु की बात समझी और बिस्तर उठाकर देख लिया। मैं उस मनहूस औरत को नही छोडूँगा’

उसने गुस्से से सोचा और दाँत पीसते हुए अपना ख़ंजर बाहर निकाला। वह ख़ंजर लेकर उस औरत पर झपटा और उसे मार डाला। थोड़ी देर वहाँ आराम करके वह आगे चल पड़ा।

दो दिन बाद वह एक गाँव में पहुँचा जहाँ उसके बचपन का मित्र रहता था। उसने पहले ही अपने मित्र को संदेश भेजा था कि वह उससे मिलना चाहता है। उसका मित्र उससे मिलने आया। 

‘ओ मेरे ख़ुदा, मैं तुम्हें बिलकुल नहीं पहचान सकता था। तुम इतने दुबले, कमज़ोर और थके लग रहे हो। चलो मेरे घर चलकर आराम करो।’

राजा अपने दोस्त के घर चला गया जहाँ उसकी बहुत आवभगत हुई। दोनों दोस्त अपने बचपन की बातें करते रहे। फिर राजा ने उसे सारी बात बताई।

‘लेकिन तुम्हें इस तरह नहीं करना चाहिए, हमें कुछ और सोचना चाहिए। ’ उसके दोस्त ने कहा
‘मैं क़रीब के राज्य में जाकर मदद लेना चाहता हूँ ताकि अपने वज़ीरों की साज़िशों से लड़ सकूँ।’ राजा ने अपने मित्र को बताया।

इसी तरह तीन महीने बीत गए। अब राजा ने जाने का मन बनाया। ‘तुम पैदल मत जाओ, मेरा घोड़ा ले लो।’ दोस्त ने आग्रह किया।

राजा घोड़े पर सवार होकर रवाना हुआ। रास्ते में उसे फिर साधु की नसीहत का ख़याल आया कि सिर्फ़ उन दोस्तों पर भरोसा करो जो मुश्किल में काम आए हो।’ उसने सोचा कि यह दोस्त ऐसा ही है और मैं उस पर हमेशा भरोसा कर सकता हूँ।

थोड़ी देर बाद वह अपने चाचा की सल्तनत में पहुँच गया। जब वह राजा के दरबार में गया तो राजा ने उसके हुलिये को देखकर गर्दन हिलाई - ‘तुम मेरे भतीजे नहीं हो। मेरे भतीजे तो बहुत रईस हैं’ कहकर राजा को बाहर निकलवा दिया।

‘यह मेरा अपना चाचा था जिसने इतनी बेहूदा हरक़त की है। साधु ने कितनी सच्ची बातें की हैं’, राजा ने सोचा। उसने हिम्मत नहीं हारी और पड़ोस की रियासत में गया। वहाँ के राजा ने उसके साथ बहुत अच्छा सुलूक किया और कहा - 

‘आपकी सहायता मेरे लिये गौरव की बात होगी। मेरी पूरी सेना आपके लिये हाज़िर है। ख़ुदा करे आप विजयी हों।’

राजा ने उस सेना के साथ कश्मीर पर हमला किया। सात दिन तक घमासान युद्ध हुआ। आख़िरकार राजा विजय हुआ। उसने सहायक सेना को सम्मानित करके वापस भेज दिया। 

राजा ने अपने सहायक मित्र को अपना मंत्रीबनाया और अपने गुरु के पास आशीर्वाद लेने पहुँचा। बदक़िस्मती से गुरु सख़्त बीमार था और आखिरी साँसे ले रहा था। 

‘बच्चे! ख़ुदा करे तुम्हें लंबी उम्र मिले और आराम व सुकून की ज़िन्दगी गुज़ारो। मैं तुम्हारी पुर-अमन और पुरसुकूँ सल्तनत में मरना पसंद करूंगा’ यह कहकर साधु ने आख़िरी हिचकी ली और आँखें मूँद ली।

राजा ने उसकी समाधि बनवाई जो वहाँ के लोगों के लिये एक पवित्र स्थान बन गई। 
***

परिचय: हमरा ख़लीक़: नमकीन चाय और बकरख़ानियाँ ( Folk Tales from Kashmir) 
हमरा ख़लीक़ का जन्म 1938, दिल्ली में हुआ। उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से बी॰ए॰, बी॰एड॰ और एल॰एल॰बी॰ की। उनके अनेक अफसाने, और अनुवाद कार्य प्रकाशित है। रस्किन बॉन्ड के नॉवेल ‘कबूतरों की परवाज़’ का अनुवाद भी प्रकाशित है। उनके पिता रबिया पिनहाँ उर्दू, व फारसी के साहिब दीवान शायर थे।

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