पापा गुड्डा - मार्मिक संस्मरण

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- एर्मा बॉम्बैक 


जिस ज़माने में मैं एक नन्ही बच्ची थी, पापा फ़्रिज के अंदर लगे बल्ब की तरह होते थे। हर घर में पाये जाते थे। लेकिन जैसे फ़्रिज का दरवाज़ा बंद होने पर किसी को बत्ती का पता नहीं होता वैसे ही किसी को भी पता नहीं था कि पापा की भूमिका क्या है।

मेरे पापा अलस्सुबह घर से निकल जाते थे और शाम को वापस आने पर हमें देखकर प्रसन्नता से फूल जाते थे।


अचार का मर्तबान यदि किसी से भी नहीं खुलता था तो पापा ही उसे खोलते थे। घर में एक वे ही थे जो तहखाने में अकेले जाने से नहीं घबराते थे। दाढी बनाते हुए उनके गाल कई बार कट जाते थे लेकिन उनका खून बहना सामान्य बात थी, दुलारे जाने जैसी कोई दुर्घटना नहीं। बारिश होने पर यह तय था कि वे भीगते हुए जाकर कार को हमारे लिये दरवाज़े तक लायेंगे। घर में किसी के भी बीमार पडने पर वे ही दवा लिखाकर और खरीदकर लाते थे।

पितृ दिवस पर विशेष प्रस्तुति
पापा सदा व्यस्त रहते थे। किसी को कांटे न चुभें, इस इरादे से गुलाब की झाड़ियों को तराशने से लेकर चूहेदानी लगाना तक सब उनके ही काम थे। मेरे स्केट्स अच्छे चलें इसलिये उनकी ऑइलिंग वे ही करते थे। मेरे पूरी तरह साइकिल चलाना सीखने तक वे मेरी पहली साइकिल के साथ कम से कम हज़ार मील तो दौडे ही होंगे।

मेरे रिपोर्टकार्ड पर हस्ताक्षर वे ही करते थे, मुझे सुलाते भी थे। माँ की कपड़े सुखाने वाली डोरी को हर सप्ताह वे ही कसते थे। वे हमेशा हमारी फ़ोटो लेते थे लेकिन खुद किसी भी तस्वीर में नहीं होते थे।


मुझे हर किसी के पापा से डर लगता था, सिवाय मेरे, अपने पापा के। एक बार मैंने उनके लिये चाय भी बनाई थी। चाय नहीं, बस मीठा पानी थी। मेरी छोटी कुर्सी पर बैठकर उसे पीते हुए वे असहज तो थे लेकिन बोले कि चाय बडी स्वादिष्ट थी।


एक बार वे मुझे झील में ले गये। वे नाव खे रहे थे और मैं पानी में पत्थर फेंकने लगी। उनके मना करने पर भी फेंकती रही तो वे बोले कि वे मुझे भी पानी में फेंक देंगे। मुझे लगा कि वे सच नहीं बोल रहे थे। मैंने एक पल रुककर उनकी आंखों में देखा और जान लिया कि वे मज़ाक कर रहे थे। उसके बाद मैंने और पत्थर पानी में फेंके। उन्हें पोकर खेलना नहीं आता था।


मैं अक्सर घर-घर खेलती थी। माता-गुड़िया को करने के लिये लाखों काम थे। लेकिन मुझे कभी समझ नहीं आया कि पिता-गुड़िया को क्या काम दूँ इसलिये मैं उससे कहलवाती, “मैं काम पर जा रहा हूँ” और फिर उसे बिस्तर के नीचे खिसका देती।


एक दिन, जब मैं नौ वर्ष की थी, पिता काम पर जाने के लिये बिस्तर से नहीं उठे। वे अस्पताल गये, और ...  और अगले दिन उनकी मृत्यु हो गई।


कितने ही लोग भोजन और केक लेकर घर आये। इतने सारे लोग इससे पहले कभी भी हमारे घर में नहीं आये थे। मैं चुपचाप अपने कमरे में गई और बिस्तर के नीचे से पिता गुडिया को निकाला, साफ़ किया और अपने बिस्तर पर लिटा दिया।


उन्होंने कभी कुछ नहीं किया फिर भी उनका जाना इतना दुख देगा यह मैं नहीं जानती थी।


मुझे आज तक पता नहीं चला क्यों।


(मूल रचना: "Daddy Doll Under the Bed" By Erma Bombeck, June 21, 1981)