मधुदीप की लघुकथाएँ

   उजबक की कदमताल   

मधुदीप
समय के चक्र को उल्टा नहीं घुमाया जा सकता। हाँ, बनवारीलाल आज पूरी शिद्दत के साथ यही महसूस कर रहा था। समय चालीस साल आगे बढ़ गया है मगर वह अभी भी वहीं खड़ा कदमताल कर रहा है। उसने भी कई बार समय के साथ आगे बढ़ने की बात सोची मगर परम्पराओं और दायित्वों में जकड़े पाँवों ने हमेशा ही मना कर दिया तो वह बेबस होकर रह गया।
     जब सब-कुछ बदल गया है तो उसके पाँव कदमताल छोड़कर आगे क्यों नहीं बढ़ जाते? तीनों छोटे भाई अपनी-अपनी सुविधाओं के तहत शहरों में जा बसे हैं। उनके बच्चे अब सरकारी नौकरियों में अधिकारी हैं, कुछ तो विदेश तक पहुँच गए हैं मगर वह और उसका एकमात्र पुत्र आज तक गाँव के इस कच्चे घर की देहरी को नहीं लाँघ पाए। पिता का साया बचपन में ही चारों भाइयों के सिर से उठ गया तो वह उन तीनों के लिए पिता बन गया। जमीन तो थोड़ी ही थी, यह तो माँ की कर्मठता और उसकी जीतोड़ मेहनत थी कि वह सभी छोटों को हिल्ले से लगा सका।
     चार बेटों की कर्मठ माँ की इहलीला कल रात समाप्त हो गई थी और आज दोपहर वह अपने सपूतों के काँधों पर सवार होकर अपनी अन्तिम यात्रा पर जा चुकी थी। उतरती रात के पहले प्रहर में चारों भाइयों का भरा-पूरा परिवार अपने कच्चे घर की बैठक में जुड़ा हुआ था।
     “बड़े भाई, अब गाँव की जमीन-घर का बँटवारा हो जाये तो अच्छा है।” छोटे ने कहा तो बनवारीलाल उजबक की तरह उसकी तरफ देखने लगा।
     “हाँ, अब गाँव में हमारा आना कहाँ हो पायेगा ! माँ थी तो...” मँझले ने जानबूझकर अपनी बात अधूरी छोड़ दी तो उजबक की गर्दन उधर घूम गई।
     सन्नाटे में तीनों की झकझक तेज होती जा रही है। बनवारीलाल को लग रहा है कि समय का चक्र बहुत तेजी से घूम रहा है और वह वहीं खड़ा कदमताल कर रहा है। मगर यह क्या? उसके पाँवों के तले जमीन तो है ही नहीं।


  टीस  

पूर्व दिशा में धीरे-धीरे दिन उग रहा था। अलसाई-सी सुबह पार्क की ओर जा रही थी। दीनदयाल नंगे पाँव घास पर टहल रहे थे। जयप्रकाश प्राणायाम के बाद सूर्य-नमस्कार कर रहे थे। कुछ लोग असली-नकली ठहाके लगा रहे थे।
     थोड़ी देर में दीनदयाल और जयप्रकाश दोनों बेंच पर आ बैठे। दोनों खामोश थे।
     “लोग इतना हँस कैसे लेते हैं जयप्रकाश भाई?”
     दीनदयाल ने कहा तो जयप्रकाश उनकी उदासी को पढ़ने की कोशिश करने लगे।
     तभी एक गेंद उनके पाँवों के पास आकर ठहर गई। दो सुन्दर फूल उनके पास आकर ठिठक गए थे।
     “मुझे अपने साथ खिलाओगे?” दीनदयाल गेंद को उठाकर एक हाथ से दूसरे हाथ में उछालने लगे तो दोनों फूल एक-दूसरे की ओर देखकर खिल उठे।
     “यस अंकल !”
दीनदयाल ने गेंद उछाली और फूलों के साथ उछलने-दौड़ने लगे।  जयप्रकाश वहीं बेंच पर बैठे मुस्कराते रहे। कुछ देर में ही हाँफते हुए वे फिर बेंच पर जयप्रकाश के पास आ बैठे।
     “असली जिन्दगी तो इन बच्चों के साथ ही है भाई!” दीनदयाल के गहरे नि:श्वास ने जयप्रकाश को चौंका दिया।
     “अवनीश आज विदेश जा रहा है ना!” एक की दृष्टि दूसरे के चेहरे पर टिक गई।
     “हाँ भाई! अवनीश और बहू के साथ पिंकू भी चला जायेगा।”
     इस बार गेंद उछलकर विपरीत दिशा में गई थी और अब दो फूल उसी दिशा में जा रहे थे।
     पार्क के सामने की ऊँची बिल्डिंग उदास हो गई थी।
 
  नमिता सिंह      

हँसता हुआ नूरानी चेहरा, काली जुल्फें रंग सुनहरा...जी हाँ, आप नमिता सिंह के बारे में बेशक यह जुमला उछाल सकते हैं मगर उसके व्यक्तित्व को किसी भी सीमा में बाँधने से पहले उसके जीवन में एक ही दिन में घटी इन तीन घटनाओं पर अवश्य ही गौर कर लें।
     यह पिछले सप्ताह की बात है। नमिता सिंह कार्यालय जाने के लिए रिक्शे में बैठकर मैट्रो की तरफ जा रही थी। सरे-राह एक मनचले ने अपनी बाइक रिक्शे के आगे अड़ा दी।
     “रिक्शे को छोड़कर मेरी बाइक पर आ जाओ, फुर्र-से दफ्तर पहुँचा दूँगा।”
     उम्मीद के विपरीत वह कूदकर रिक्शा से उतरी और बाइक के आगे जा खड़ी हुई।
     “पेट्रोल है बाइक में?”
     सुनकर युवक हक्का-बक्का रह गया और इसके बाद जो झन्नाटेदार झापड़ उसके गाल पर पड़ा कि दिन में ही उसकी आँखों के सामने तारे नाच उठे।
     कार्यालय में पहुँचकर नमिता सिंह ने अपना कम्प्यूटर ऑन किया तो कुछ मैसेज उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। उसने इधर-उधर देखा, पूरा कार्यालय व्यस्त था। हाँ, मिस्टर चक्रधर की निगाहें उसकी मेज की तरफ उठी हुई थीं।
     “हैलो मिस्टर चक्रधर! कैसे हैं आप!” उसकी सीट पर पहुँचकर नमिता सिंह ने कहा तो चक्रधर की मुस्कान चौड़ी हो गई।
     “तो आप मुझे ‘प्रपोज’ करना चाहते हैं?” उसने अपनी आँखें  उसकी आँखों में डाल दीं।
     “आप इजाजत दें तो!” चक्रधर ने कहा तो अवश्य लेकिन वह उसकी आँखों की चुभन अपनी आँखों में महसूस कर रहा था।
     “भाभीजी को तलाक दोगे या फिर धर्म-परिवर्तन का इरादा रखते हो?”
     “क्या?” बस एक शब्द।
     “मिस्टर चक्रधर! यह कार्यालय है, होश में रहा करो। आपके सारे मैसेज मेरे कम्प्यूटर में सुरक्षित हैं।” इससे पहले कि दूसरी मेजों की निगाहें उस तरफ उठें, वह अपनी सीट पर जा चुकी थी।

     शाम को घर के ड्राइंगरूम में गहमागहमी थी। चन्द्रशेखर अपने माता-पिता के साथ नमिता सिंह को देखने आया हुआ था। चाय पी जा चुकी थी। हाँ, हूँ...सब-कुछ लगभग तय हो चुका था। शगुन लेने-देने की तैयारी चल रही थी कि तभी नमिता सिंह की आवाज पर सब-कुछ ठहर गया।
     “चन्द्रशेखरजी, मैं नहीं जानती कि मेरे माता-पिता और आपके माता-पिता के मध्य क्या बात हुई है मगर इस विवाह के लिए मेरी एक शर्त है।” नमिता सिंह ने कहा तो सभी की निगाहों में एक प्रश्न आ गया।
     “हमारा विवाह आर्य समाज मन्दिर में होगा और बिना किसी दान-दहेज़ के होगा। हाँ, एक बात और...”
     सभी निगाहें उत्सुकता में उठी रहीं।
     “आप और मैं दोनों ही अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान हैं। स्वभाविक है, आप अपने माता-पिता का पूरा दायित्व वहन करेंगे। मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है। हाँ, मैं इतना अवश्य चाहूँगी कि आप मुझे भी मेरे माता-पिता का दायित्व वहन करने की स्वीकृति देंगे।”
     नमिता सिंह के कहने के साथ ही अब वे निगाहें बाहर जाने के दरवाजे पर अटक गई थीं।
     अब आप चाहें तो नमिता सिंह पर यह जुमला बेशक उछाल सकते हैं --- हँसता हुआ नूरानी चेहरा, काली जुल्फें रंग सुनहरा...।